फैसले की कीमत
घर के बड़े ड्रॉइंग रूम में रंग-बिरंगे गुब्बारे लगे थे, केक की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी और हँसी की आवाज़ें दीवारों से टकराकर लौट रही थीं। मौका था रणवीर और साक्षी के बेटे आरव के पहले जन्मदिन का।
दादा-दादी की खुशी देखते ही बनती थी। साक्षी बार-बार बेटे को गोद में लेकर उसे चूम रही थी और रणवीर मेहमानों की खातिरदारी में लगा हुआ था। हर कोई यही कह रहा था—“समय कितनी जल्दी निकल गया।”
केक कटा, फोटो खिंचे, आशीर्वाद मिले और धीरे-धीरे मेहमान अपने-अपने घर लौटने लगे। घर में अब सिर्फ अपने लोग रह गए थे। रणवीर बाहर गाड़ी में सामान रखने गया।
लेकिन उसी वक्त किस्मत ने करवट ले ली…
सड़क पर अचानक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी गाड़ी को टक्कर मार दी।
कुछ घंटों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग चलती रही, लेकिन अंत में रणवीर हार गया…
खुशी का घर एक पल में सन्नाटे में बदल गया।
साक्षी की आँखों के आँसू जैसे सूख ही नहीं रहे थे। गोद में छोटा-सा आरव… जिसे अभी ठीक से “पापा” कहना भी नहीं आया था।
दिन बीतते गए… दर्द थोड़ा कम हुआ, पर खालीपन वहीं रहा।
रणवीर के माता-पिता ने खुद को संभाला और पूरा प्यार अपने पोते और बहू पर लुटाने लगे।
एक दिन सास ने साक्षी से धीरे-धीरे बात शुरू की— “बेटा… जिंदगी बहुत लंबी है… क्या तुम आगे बढ़ने के बारे में सोच सकती हो?”
साक्षी चुप रही।
कुछ दिनों बाद बात फिर उठी— “अगर तुम चाहो तो हम तुम्हारी शादी करवा सकते हैं… ताकि तुम्हारी जिंदगी फिर से बस सके…”
साक्षी ने धीमे से सिर हिलाया— “मैं तैयार हूँ… लेकिन एक बात है… मैं इस घर में रहकर नई जिंदगी शुरू नहीं कर पाऊंगी…”
घरवालों को उसकी बात समझ आ गई।
रिश्ते देखने शुरू हुए।
लेकिन हर जगह वही सवाल— “बच्चा साथ रहेगा क्या?”
और हर बार यही जवाब सामने आता— “अगर शादी करनी है तो बच्चा नहीं चलेगा…”
कई महीनों बाद एक रिश्ता आया—अमित का।
अमित एक अच्छा बिज़नेस करता था, सुलझा हुआ इंसान था, लेकिन उसकी एक शर्त थी— “मैं साक्षी से शादी करूंगा… लेकिन बच्चे को साथ नहीं रख सकता…”
साक्षी के सामने फिर वही सवाल खड़ा था— माँ बने रहना… या पत्नी बनकर नई जिंदगी शुरू करना…
रातों की नींद गायब हो गई।
वो आरव को देखती… फिर अपने भविष्य के बारे में सोचती…
आखिरकार एक दिन उसने फैसला लिया।
उसने सास-ससुर के सामने कहा— “अगर आप लोग आरव को अपना लें… तो मैं शादी के लिए तैयार हूँ…”
रणवीर के माता-पिता की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने कहा— “ये बच्चा हमारा खून है… हम इसे अपनी आखिरी साँस तक संभालेंगे… लेकिन बेटा… सोच लो… ये फैसला आसान नहीं है…”
साक्षी ने दिल पर पत्थर रखकर हाँ कर दी।
कानूनी तौर पर आरव अब उसके दादा-दादी का बेटा बन गया।
कुछ ही समय बाद साक्षी और अमित की शादी हो गई।
शुरुआत में साक्षी फोन करती, हाल-चाल पूछती, कभी-कभी मिलने भी आती…
लेकिन धीरे-धीरे फोन कम हो गए…
फिर एक दिन पूरी तरह बंद…
साल बीतते गए…
आरव बड़ा होता गया… स्कूल जाने लगा… लेकिन उसकी माँ सिर्फ एक धुंधली याद बनकर रह गई।
उधर साक्षी की जिंदगी भी आगे बढ़ रही थी…
लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था…
शादी के कुछ साल बाद साक्षी माँ नहीं बन पाई।
इलाज हुआ… दवाइयाँ चलीं… डॉक्टर बदले… शहर बदले…
लेकिन नतीजा वही रहा—
खालीपन।
अब उसे अपने फैसले की कीमत समझ आने लगी थी।
एक दिन अचानक साक्षी और अमित, रणवीर के माता-पिता के घर पहुँचे।
दरवाज़ा खुला… सामने आरव खड़ा था… अब वो बड़ा हो चुका था…
साक्षी उसे देखते ही रो पड़ी।
वो दौड़कर उसे गले लगाना चाहती थी…
लेकिन आरव एक कदम पीछे हट गया।
“आप कौन हैं?”
ये शब्द तीर की तरह साक्षी के दिल में उतर गए।
अंदर बैठकर साक्षी ने रोते हुए कहा— “मैं अपनी गलती सुधारना चाहती हूँ… मैं अपने बेटे को वापस लेना चाहती हूँ…”
रणवीर के पिता ने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा— “जब ये छोटा था… तब इसे माँ की जरूरत थी… तब तुमने इसे छोड़ दिया… आज जब तुम्हें जरूरत है… तब तुम इसे लेने आई हो?”
साक्षी सिर झुका कर रोती रही।
“माँ बनना सिर्फ जन्म देने से नहीं होता… निभाने से होता है…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अमित भी कुछ नहीं बोल पाया।
थोड़ी देर बाद दोनों वहाँ से उठकर चले गए…
पीछे रह गया एक घर… जिसने अपना बेटा खोकर भी एक बच्चे को माँ-बाप दोनों का प्यार दिया…
और एक औरत… जिसने अपनी ही जिंदगी में सबसे बड़ा रिश्ता खो दिया…
कहते हैं— कुछ फैसले उस वक्त सही लगते हैं…
लेकिन वक्त बीतने के बाद वही फैसले जिंदगी की सबसे बड़ी सज़ा बन जाते हैं।

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