जब रिश्तेदारों के सामने खुला बहु का सच
रसोई में बर्तनों की तेज़ आवाज़ गूंज रही थी। गैस पर एक साथ कई चीज़ें पक रही थीं और पूरे घर में मेहमानों की चहल-पहल थी। बड़े से आँगन में कुर्सियाँ लग चुकी थीं। रिश्तेदार एक-दूसरे से बातें कर रहे थे, बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे और घर की मालकिन सुशीला देवी बार-बार सब इंतज़ाम देख रही थीं।
आज उनके घर खास दावत रखी गई थी। कारण था उनके बड़े बेटे रोहन का प्रमोशन। पूरे खानदान को बुलाया गया था और सुशीला देवी ने सबके सामने गर्व से कह दिया था—
“मेरी दोनों बहुएँ इतनी स्वादिष्ट खाना बनाती हैं कि लोग उंगलियाँ चाटते रह जाएँगे।”
रिश्तेदार भी उत्साहित थे। किसी ने कहा— “अच्छा! फिर तो आज मज़ा आ जाएगा।”
किसी ने हँसते हुए कहा— “सुशीला, अगर बहुएँ सच में इतनी अच्छी रसोइया हैं तो आज पता चल ही जाएगा।”
ये सुनकर सुशीला देवी मुस्कुराईं, लेकिन उनके मन में हल्की घबराहट भी थी। उन्होंने तुरंत अपनी दोनों बहुओं—नेहा और कविता—को रसोई में बुलाया।
दरवाज़ा बंद करते ही उनका चेहरा सख्त हो गया।
“सुनो तुम दोनों… आज मेरी इज्जत का सवाल है। मैंने सबके सामने बहुत तारीफ कर दी है। ऐसा खाना बनना चाहिए कि कोई कमी ना निकाले।”
नेहा घबराकर एक कोने में खड़ी हो गई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने धीरे से कहा—
“मम्मी जी… मुझे आपसे कुछ कहना है।”
“क्या?” सुशीला देवी ने तेज़ आवाज़ में पूछा।
नेहा की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे खाना बनाना ठीक से नहीं आता… मैंने शादी के बाद हमेशा बाहर का खाना ऑर्डर किया या इंटरनेट देखकर थोड़ा बहुत बनाया… लेकिन इतने लोगों का खाना… वो भी अकेले… मुझसे नहीं होगा।”
सुशीला देवी का चेहरा उतर गया।
“क्या मतलब नहीं आता? शादी से पहले तो कहती थी सब बना लेती हूँ!”
नेहा रोते हुए बोली— “मैं डर गई थी… लगा अगर सच बोलूँगी तो आप लोग मुझे पसंद नहीं करेंगे।”
इतना सुनते ही सुशीला देवी गुस्से से भर गईं।
“अगर आज मेहमानों के सामने बेइज्जती हो गई तो क्या होगा?”
तभी दूसरी बहु कविता आगे आई। वो गाँव से आई थी, शांत स्वभाव की लड़की थी। उसने धीरे से कहा—
“मम्मी जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं संभाल लूँगी।”
सुशीला देवी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“तुम अकेले इतना सब बना लोगी?”
कविता मुस्कुराई।
“मम्मी जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए… मैं अपनी तरफ से पूरी मेहनत करूँगी और किसी को शिकायत का मौका नहीं दूँगी।”
उसने तुरंत दुपट्टा कमर में खोंसा और काम में लग गई। एक तरफ उसने सब्जियाँ काटीं, दूसरी तरफ आटा गूंथा। गैस पर दाल चढ़ाई, साथ में मसाले तैयार किए। उसकी तेजी देखकर नेहा भी हैरान रह गई।
कविता ने तरह-तरह के व्यंजन बनाने शुरू किए— गरमा-गरम पूरियाँ, शाही पनीर, दाल तड़का, जीरा राइस, कढ़ी पकोड़ा, आलू की सूखी सब्ज़ी, कुरकुरी कचौड़ी और मिठाई में रसगुल्ले।
इतना ही नहीं, बच्चों के लिए उसने नूडल्स और स्प्रिंग रोल भी तैयार कर दिए।
धीरे-धीरे पूरे घर में खाने की खुशबू फैल गई। रिश्तेदार बार-बार रसोई की तरफ देखने लगे।
एक बुजुर्ग चाची बोलीं— “लगता है खाना बहुत बढ़िया बना है।”
डाइनिंग टेबल पर जब सारे व्यंजन सजाए गए तो हर कोई देखकर दंग रह गया।
सबसे पहले मेहमानों ने इंस्टेंट मोमोज और पैकेट वाला पास्ता चखा, जो नेहा ने बड़ी मुश्किल से तैयार किया था। किसी ने मुस्कुराकर कहा—
“ठीक है… लेकिन घर वाला स्वाद नहीं है।”
फिर सबने कविता के हाथ का खाना खाना शुरू किया।
पहला निवाला खाते ही सबकी आँखें चमक उठीं।
“वाह!”
“क्या स्वाद है!”
“ऐसा खाना तो बड़े-बड़े होटलों में भी नहीं मिलता!”
एक रिश्तेदार बोले— “सुशीला, तुम्हारी बहु तो कमाल निकली।”
दूसरे ने कहा— “सच में, इतने प्यार से बनाया खाना सीधे दिल तक पहुँच रहा है।”
पूरा घर तारीफों से गूंज उठा।
सुशीला देवी का चेहरा गर्व से चमकने लगा। उन्होंने तुरंत कहा—
“आखिर बहु किसकी है!”
सब हँस पड़े।
लेकिन नेहा एक कोने में खड़ी चुपचाप रो रही थी। उसे लग रहा था कि सब उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं।
दावत खत्म होने के बाद सुशीला देवी ने उसे कमरे में बुलाया।
“तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला?”
नेहा सिर झुकाकर रोने लगी।
“मम्मी जी… मुझे लगा अगर सच बता दूँगी तो कोई मुझे पसंद नहीं करेगा।”
“आज अगर कविता नहीं होती तो मेरी बहुत बेइज्जती हो जाती।”
नेहा हाथ जोड़कर बोली— “मुझे माफ कर दीजिए। मैं सच में सीखना चाहती हूँ।”
इतने में कविता भी कमरे में आ गई।
उसने तुरंत नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“दीदी, इसमें रोने की क्या बात है? हर इंसान सब कुछ लेकर पैदा नहीं होता। सीखने से सब आ जाता है।”
नेहा हैरानी से उसे देखने लगी।
“लेकिन मैंने तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया… कई बार तुम्हारा मज़ाक उड़ाया।”
कविता मुस्कुराई।
“पुरानी बातें भूल जाइए। अब हम दोनों मिलकर घर संभालेंगे।”
सुशीला देवी का गुस्सा भी धीरे-धीरे शांत हो गया।
उन्होंने गहरी साँस ली और बोलीं—
“ठीक है। अब से तुम दोनों साथ मिलकर काम करोगी। घर की असली ताकत लड़ाई में नहीं, साथ रहने में होती है।”
अगले दिन से नेहा सचमुच बदल गई।
वो रोज़ कविता के साथ रसोई में खड़ी होने लगी। शुरुआत में उससे गोल रोटी नहीं बनती थी। कभी नमक ज्यादा हो जाता, कभी सब्ज़ी जल जाती।
लेकिन कविता कभी उसका मज़ाक नहीं उड़ाती।
वो हँसकर कहती— “गलती होगी तभी तो सीखोगी।”
धीरे-धीरे नेहा को भी खाना बनाना आने लगा।
कुछ महीनों बाद फिर घर में एक बड़ा समारोह रखा गया।
इस बार जब रिश्तेदार आए तो उन्होंने देखा कि दोनों बहुएँ साथ मिलकर खाना बना रही हैं। एक नई चीज़ें बना रही थी, दूसरी पारंपरिक स्वाद संभाल रही थी।
खाना खाते ही सब फिर तारीफ करने लगे।
एक रिश्तेदार मुस्कुराकर बोले— “अब समझ आया… सुशीला की बहुएँ सच में घर की शान हैं।”
सुशीला देवी गर्व से दोनों बहुओं को देखने लगीं।
उनकी आँखों में खुशी साफ दिखाई दे रही थी।
अब घर में ना तुलना थी, ना ताने।
सिर्फ अपनापन था… और साथ मिलकर आगे बढ़ने की खूबसूरत शुरुआत।

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