गरीब बेटी का सबसे बड़ा सम्मान

 

Emotional Indian family celebrating birthday together with loving parents and supportive in-laws in a beautifully decorated home


सुबह का समय था। रसोई में चाय की हल्की खुशबू फैल रही थी और आँगन में रखे गमलों पर धूप धीरे-धीरे उतर रही थी। घर के बाकी लोग अभी सो रहे थे, लेकिन पूजा की आँखें सुबह से ही खुली हुई थीं।


वो रसोई में खड़ी चुपचाप नाश्ता बना रही थी। उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। तभी पीछे से उसकी सास शारदा जी की आवाज आई—


“बहू, आज इतनी जल्दी उठ गई? तबीयत तो ठीक है ना?”


पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा—


“जी मम्मी जी, सब ठीक है।”


लेकिन शारदा जी उसकी आवाज़ का दर्द समझ गई थीं। उन्होंने पास आकर पूछा—


“कुछ बात है क्या?”


पूजा कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से बोली—


“मम्मी जी… आज पापा का जन्मदिन है।”


“अरे! तो ये तो खुशी की बात है। फिर तुम इतनी उदास क्यों हो?”


पूजा की आँखें भर आईं।


“मैं सोच रही थी… इस बार भी शायद मैं उनसे मिलने नहीं जा पाऊँगी।”


शारदा जी ने हैरानी से पूछा—


“क्यों? किसने मना किया?”


पूजा बोली—


“किसी ने नहीं… पर हर बार यही लगता है कि बार-बार मायके जाने से लोग क्या सोचेंगे। और फिर… मेरे घर की हालत भी तो आप लोगों जैसी नहीं है।”


इतना कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई।


दरअसल पूजा एक साधारण परिवार की लड़की थी। उसके पिता रामकिशोर जी एक छोटी किराने की दुकान चलाते थे। माँ सिलाई करके घर में हाथ बँटाती थीं। बड़ी मुश्किलों से उन्होंने पूजा को पढ़ाया-लिखाया था।


लेकिन पूजा की शादी शहर के बड़े कपड़ा व्यापारी महेश अग्रवाल के बेटे आदित्य से हुई थी। शादी के बाद से ही पूजा हमेशा यही सोचती रहती कि कहीं उसके मायके वालों को ससुराल में छोटा महसूस ना कराया जाए।


उधर आदित्य हमेशा उसे समझाता—


“पूजा, रिश्ते दिल से चलते हैं, पैसों से नहीं।”


लेकिन पूजा के मन का डर कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।


तभी आदित्य भी उठकर रसोई में आ गया।


“अरे वाह, यहाँ तो सुबह-सुबह मीटिंग चल रही है।”


शारदा जी मुस्कुरा दीं।


“तुम्हारी पत्नी आज अपने पापा को बहुत याद कर रही है।”


आदित्य तुरंत पूजा के पास आया।


“तो इसमें उदास होने वाली क्या बात है? चलो, आज शाम को सब लोग पापा जी का जन्मदिन मनाने उनके घर चलते हैं।”


पूजा घबरा गई।


“नहीं-नहीं आदित्य… वहाँ हमारा पूरा परिवार जाएगा तो पापा परेशान हो जाएंगे। उनका छोटा-सा घर है।”


आदित्य हँस पड़ा।


“घर छोटा हो सकता है पूजा… लेकिन दिल नहीं।”


इतना कहकर वो ऑफिस के लिए तैयार होने चला गया।


पूरा दिन पूजा का मन बेचैन रहा। उसे बार-बार अपने पड़ोस की औरतों की बातें याद आ रही थीं।


शादी के समय लोगों ने कितनी बातें बनाई थीं—


“इतने बड़े घर में गरीब घर की लड़की कैसे बहू बन गई?”


“ज़रूर लड़के में कोई कमी होगी।”


“अरे, अमीर लोग बिना मतलब किसी गरीब की बेटी नहीं लाते।”


इन बातों ने पूजा के मन में डर बैठा दिया था।


शाम को आदित्य ऑफिस से लौटा तो उसके हाथ में कई पैकेट थे।


पूजा ने पूछा—


“ये सब क्या है?”


आदित्य बोला—


“पापा जी के लिए कपड़े, माँ जी के लिए शॉल… और हाँ, केक लेना अभी बाकी है।”


पूजा तुरंत बोली—


“इतना सब क्यों लाए? पापा को अच्छा नहीं लगेगा।”


तभी पीछे से महेश जी आ गए।


उन्होंने मुस्कुराकर कहा—


“बेटा, जब बेटी अपने घर आती है ना… तो माँ-बाप सिर्फ उसका चेहरा देखकर खुश हो जाते हैं। उन्हें तो ये भी अच्छा लगेगा कि दामाद उन्हें अपना समझता है।”


रात होते-होते सब लोग पूजा के मायके पहुँच गए।


छोटा-सा घर रंग-बिरंगी लड़ियों से सजा हुआ था। दरवाज़े पर खड़ी पूजा की माँ सुशीला जी उन्हें देखकर घबरा गईं।


“अरे समधी जी… आपको आने की क्या जरूरत थी? हम लोग तो ऐसे ही छोटा-मोटा जन्मदिन मना लेते।”


महेश जी तुरंत बोले—


“समधन जी, बेटी का घर छोटा-बड़ा नहीं होता। वो अपना होता है।”


रामकिशोर जी बार-बार हाथ जोड़ रहे थे।


उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इतने बड़े लोग उनके साधारण घर में इतनी आत्मीयता से कैसे बैठे हैं।


थोड़ी देर बाद केक काटा गया।


पूजा अपने पिता को मुस्कुराते हुए देख रही थी। शायद कई सालों बाद उसने उनके चेहरे पर इतनी खुशी देखी थी।


खाना खाने के बाद सुशीला जी अंदर गईं और एक पुराना डिब्बा लेकर आईं।


उन्होंने पूजा के हाथ में रखते हुए कहा—


“बेटा… ये तेरे लिए।”


पूजा ने खोला तो उसमें चाँदी की पायल थी।


वो तुरंत समझ गई—


ये वही पायल थी जो उसकी माँ शादी-ब्याह में पहनती थीं।


पूजा घबरा गई।


“माँ! ये आप मुझे क्यों दे रही हो?”


सुशीला जी मुस्कुराईं।


“क्योंकि अब ये मेरी बेटी की है।”


पूजा रो पड़ी।


“माँ, आपके पास पहले से ही इतना कम है… और आप ये भी मुझे दे रही हैं?”


तभी महेश जी बोले—


“बहू, माँ-बाप जब बच्चों को कुछ देते हैं ना… तो वो चीज़ नहीं, अपना प्यार देते हैं।”


आदित्य ने भी मुस्कुराकर कहा—


“और वैसे भी, ये दुनिया की सबसे कीमती पायल है।”


रामकिशोर जी की आँखें भर आईं।


उन्होंने धीमी आवाज में कहा—


“समधी जी… सच कहूँ, मुझे हमेशा डर था कि कहीं मेरी गरीबी मेरी बेटी के सम्मान के बीच ना आ जाए।”


महेश जी तुरंत उनके पास आकर बैठे।


“रामकिशोर जी, गरीब वो नहीं जिसके पास पैसा कम हो… गरीब वो है जिसके पास संस्कार ना हों। और आपने अपनी बेटी को इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि हमारा घर खुशियों से भर गया।”


शारदा जी भी बोलीं—


“सच कहूँ बहन जी, हमें दहेज में कुछ नहीं मिला… लेकिन आपकी बेटी ने जो अपनापन दिया है ना, वो करोड़ों से बढ़कर है।”


ये सुनते ही पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।


आज पहली बार उसके मन का डर पूरी तरह खत्म हो गया था।


उसे एहसास हो गया था कि हर अमीर इंसान घमंडी नहीं होता और हर रिश्ता पैसों से नहीं तौला जाता।


थोड़ी देर बाद जब सब लोग वापस लौटने लगे तो रामकिशोर जी ने आदित्य का हाथ पकड़ लिया।


“बेटा… मेरी बेटी का हमेशा ऐसे ही ख्याल रखना।”


आदित्य मुस्कुराया।


“पापा जी, अब ये सिर्फ आपकी बेटी नहीं… हमारे घर की खुशियों की वजह भी है।”


गाड़ी में बैठते समय पूजा ने पीछे मुड़कर अपने माता-पिता को देखा।


उनके चेहरे पर संतोष था… सम्मान था… और सबसे बड़ी बात, अपनी बेटी की खुशी देखकर सुकून था।


घर पहुँचकर पूजा ने शारदा जी के पैर छू लिए।


“मम्मी जी… आज आपने मेरे माता-पिता को जो सम्मान दिया… मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगी।”


शारदा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—


“बेटा, बेटी सिर्फ अपने माँ-बाप की इज्जत नहीं होती… वो दो परिवारों को जोड़ने वाला सबसे खूबसूरत रिश्ता होती है।”


पास खड़ा आदित्य मुस्कुराते हुए बोला—


“तो अब तुम्हारे मन का डर खत्म हुआ या अभी थोड़ा बाकी है?”


पूजा हँस पड़ी।


“अब कोई डर नहीं… क्योंकि अब मुझे पता चल गया है कि रिश्तों की असली अमीरी प्यार और सम्मान में होती है।”


आँगन में हल्की हवा चल रही थी। घर में सबके चेहरों पर मुस्कान थी। और पूजा को लग रहा था कि आज उसके पिता का नहीं… बल्कि उसके विश्वास का जन्मदिन था।



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