रिश्ते बाँटने से कम नहीं होते

 

Emotional Indian family moment where two daughters-in-law reconcile in a warm household kitchen while the mother-in-law watches lovingly.


“कई बार इंसान दूसरों से नहीं… अपने ही मन में उठे डर से हारने लगता है, और वही डर रिश्तों के बीच दूरियाँ पैदा कर देता है…”


रीमा बालकनी में खड़ी सामने वाले पार्क को देख रही थी। चेहरे पर हल्की थकान थी और मन में अजीब सी बेचैनी। तभी पीछे से उसकी सास शारदा देवी की आवाज़ आई—


“बहू… चाय ठंडी हो रही है।”


“जी मम्मी जी…” कहकर वह अंदर आ गई, लेकिन उसके चेहरे की उदासी शारदा देवी से छुप न सकी।


रीमा इस घर की बड़ी बहू थी। शादी के बाद उसने पूरे घर को बहुत अच्छे से संभाला था। सास-ससुर, देवर, ननद… सबका ध्यान रखना उसकी आदत बन चुकी थी। पति विकास नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे, इसलिए घर की लगभग सारी ज़िम्मेदारी रीमा के कंधों पर ही थी।


धीरे-धीरे घर के हर सदस्य को उसकी आदत हो गई थी। कौन क्या खाएगा, किसे किस चीज़ से परेशानी है, कौन किस समय चाय पीता है… सब कुछ रीमा को याद रहता।


शारदा देवी भी हर जगह उसकी तारीफ़ करतीं।


“हमारी बहू ने घर को घर बना रखा है…”


यह सुनकर रीमा गर्व से मुस्कुरा उठती।


लेकिन समय कभी एक जैसा नहीं रहता।


देवर रोहन की नौकरी लग गई और कुछ महीनों बाद उसका विवाह निशा से हो गया।


निशा पढ़ी-लिखी, समझदार और हँसमुख लड़की थी। आते ही उसने सबका दिल जीत लिया। ससुर जी के लिए बिना कहे दवा ले आना, शारदा देवी के साथ रसोई में हाथ बँटाना, रोहन का ध्यान रखना… वह हर काम बड़े प्यार से करती।


शुरू-शुरू में रीमा भी उससे बहुत प्यार से रहती।


“तू तो आते ही इस घर में घुल-मिल गई…” वह मुस्कुराकर कहती।


निशा भी आदर से जवाब देती— “दीदी, आप जैसी बड़ी बहन मिल जाए तो डर ही नहीं लगता।”


लेकिन धीरे-धीरे रीमा के मन में एक अनजाना डर जन्म लेने लगा।


अब शारदा देवी कभी-कभी कह देतीं— “निशा के हाथ की खीर बहुत अच्छी बनती है।”


या फिर— “छोटी बहू कितनी सफाई से काम करती है…”


बस, यही बातें रीमा के मन में चुभने लगीं।


उसे लगने लगा कि घर में उसकी अहमियत कम हो रही है।


अब निशा अगर कोई काम करती तो रीमा उसमें कमी निकाल देती।


“इतना तेल क्यों डाल दिया सब्ज़ी में?”


“तुम्हें कपड़े तह करना भी ठीक से नहीं आता।”


“ये कुशन यहाँ अच्छे नहीं लग रहे…”


निशा चुपचाप सुन लेती। वह रिश्ते का सम्मान करती थी।


लेकिन कई बार उसे भी बुरा लग जाता।


एक दिन रोहन ने अपनी पत्नी को उदास देखा तो पूछ बैठा— “क्या हुआ?”


निशा ने धीरे से कहा— “भैया-भाभी जैसा रिश्ता चाहती थी… लेकिन शायद मैं दीदी को पसंद नहीं हूँ।”


रोहन समझ गया कि बात बढ़ती जा रही है।


उधर रीमा भी भीतर ही भीतर परेशान रहने लगी थी। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ा हो जाना उसकी आदत बनती जा रही थी। इसका असर उसके बच्चों पर भी पड़ने लगा।


एक दिन घर में पूजा रखी गई थी। रिश्तेदार आने वाले थे। सभी तैयारी में लगे थे।


निशा रसोई में मिठाई बना रही थी कि तभी रीमा वहाँ आ गई।


“इतनी पतली चाशनी? तुम्हें कुछ आता भी है या नहीं?”


निशा ने शांत स्वर में कहा— “दीदी, मैंने मम्मी जी से पूछकर ही बनाई है।”


“मतलब अब मम्मी जी भी सिर्फ तुम्हारी ही सुनती हैं?” रीमा गुस्से में बोली।


इतना सुनते ही रसोई में सन्नाटा छा गया।


शारदा देवी बाहर से सब सुन रही थीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप अपने कमरे में चली गईं।


थोड़ी देर बाद उन्होंने रीमा को बुलाया।


रीमा कमरे में पहुँची तो देखा, शारदा देवी खिड़की के पास बैठी थीं।


उन्होंने प्यार से पूछा— “तुझे क्या तकलीफ़ है बेटा?”


“कुछ भी तो नहीं मम्मी जी…”


“माँ से भी मन की बात छुपाएगी?”


बस इतना सुनते ही रीमा की आँखें भर आईं।


“मम्मी जी… मुझे लगता है अब इस घर में मेरी ज़रूरत नहीं रही। पहले हर बात मुझसे पूछी जाती थी… अब सब निशा की तारीफ़ करते हैं…”


शारदा देवी हल्का सा मुस्कुराईं।


“तो यही बात तुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है?”


रीमा चुप रही।


तब शारदा देवी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोलीं—


“जब तू इस घर में आई थी, तब मैंने भी तुझे इसी तरह अपनाया था। अगर उस समय मैं तुझसे जलने लगती तो क्या तू इस घर को अपना पाती?”


रीमा की नजरें झुक गईं।


“बेटा… घर में नया सदस्य आने से किसी का महत्व कम नहीं होता। रिश्ते बाँटने से कम नहीं होते, बढ़ते हैं। तू बड़ी बहू है… अगर तू ही छोटी-छोटी बातों में कटुता घोल देगी तो घर कैसे जुड़ेगा?”


रीमा की आँखों से आँसू बह निकले।


उसी समय दरवाज़े के बाहर खड़ी निशा की भी आँखें नम हो चुकी थीं। वह पानी देने आई थी, लेकिन सारी बातें सुनकर वहीं रुक गई।


शारदा देवी आगे बोलीं—


“निशा तुझे अपनी बड़ी बहन मानती है। तू उसे अपनाएगी तो यह घर स्वर्ग बन जाएगा… और अगर उससे प्रतिस्पर्धा करेगी तो सब दुखी रहेंगे।”


रीमा अब खुद को रोक न सकी। वह माँ के गले लगकर रो पड़ी।


“मुझसे गलती हो गई मम्मी जी…”


थोड़ी देर बाद वह कमरे से बाहर निकली और सीधे रसोई में चली गई।


निशा चुपचाप बर्तन समेट रही थी।


रीमा उसके पास जाकर खड़ी हो गई।


“छोटी…”


निशा ने पलटकर देखा।


रीमा ने धीमे से कहा— “माफ़ कर दे… मैंने तुझे बहुत परेशान किया ना?”


निशा तुरंत घबरा गई— “अरे दीदी… आप ऐसा क्यों बोल रही हैं?”


“क्योंकि मैं सच में गलत थी।”


इतना कहते ही उसकी आँखें फिर भर आईं।


निशा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया— “दीदी… आप बड़ी हैं। मुझे आपसे शिकायत नहीं, सिर्फ प्यार चाहिए।”


बस, अगले ही पल दोनों एक-दूसरे के गले लग गईं।


उसी समय रोहन और विकास भी वहाँ आ गए। दोनों को साथ देखकर वे मुस्कुरा उठे।


डाइनिंग टेबल पर पूजा के बाद सब साथ बैठे। हँसी-मज़ाक का माहौल लौट आया था।


खाना खाते हुए ससुर जी बोले— “आज तो खाने में अलग ही स्वाद है।”


रोहन हँस पड़ा— “क्योंकि आज इसमें प्यार का तड़का लगा है पापा।”


सभी ज़ोर से हँस पड़े।


शारदा देवी चुपचाप अपने परिवार को देख रही थीं। उनकी आँखों में संतोष था।


उन्हें पता था कि रिश्ते समझदारी से सँभाले जाएँ तो घर टूटते नहीं… और थोड़ा सा अपनापन सबसे बड़ी दूरियों को भी मिटा देता है।



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