माँ का इंतज़ार कभी खत्म नहीं होता

 

Emotional reunion of an Indian son with his parents in a warm family home after years apart


मुंबई की रात हमेशा की तरह जगमगा रही थी। ऊँची-ऊँची इमारतों की रोशनी आसमान तक चमक रही थी, सड़क पर गाड़ियों की लंबी कतारें दौड़ रही थीं और हर किसी को कहीं न कहीं पहुँचने की जल्दी थी।


लेकिन उन्हीं हजारों रोशनियों के बीच एक छोटा-सा फ्लैट ऐसा भी था, जहाँ अंधेरा सिर्फ कमरे में नहीं, एक बेटे के मन में भी भरा हुआ था।


यश बालकनी में खड़ा दूर आसमान को देख रहा था। हाथ में मोबाइल था। स्क्रीन पर “माँ” लिखा चमक रहा था।


फोन लगातार बज रहा था।


यश ने आँखें बंद कीं… और फिर कॉल कट कर दी।


अंदर कमरे में उसकी पत्नी नेहा लैपटॉप पर काम कर रही थी। उसने धीरे से पूछा—

“फिर मम्मी जी का फोन था?”


“हूँ…” यश ने छोटा सा जवाब दिया।


“तो बात क्यों नहीं कर लेते?”


यश कुछ सेकंड चुप रहा। फिर हल्की कड़वाहट से बोला—


“हर बार वही सवाल… खाना खाया? कब आओगे? अपना ध्यान रख रहे हो ना? अब क्या जवाब दूँ?”


नेहा ने लैपटॉप बंद कर दिया।


“यश, वो तुम्हारी माँ हैं।”


यश अचानक झुंझला गया।


“तो क्या करूँ मैं? यहाँ नौकरी बचाने की टेंशन अलग है, लोन अलग, ऑफिस का प्रेशर अलग… और वहाँ उन्हें लगता है कि मैं बस उन्हें भूल गया हूँ!”


नेहा चुप हो गई।


उसे पता था कि पिछले एक साल में यश बहुत बदल गया था।


पहले वही लड़का था जो हर रविवार माँ के साथ वीडियो कॉल पर खाना खाता था। लेकिन अब… वह खुद से भी दूर होता जा रहा था।


उस रात देर तक यश को नींद नहीं आई।


सुबह ऑफिस पहुँचते ही बॉस ने मीटिंग में सबके सामने उसकी बेइज्जती कर दी।


“अगर अगले महीने तक टारगेट पूरा नहीं हुआ, तो रिजाइन करने के लिए तैयार रहिए।”


पूरा कॉन्फ्रेंस रूम शांत हो गया।


यश का गला सूख गया।


उसने बहुत मेहनत की थी, लेकिन कंपनी लगातार लोगों को निकाल रही थी। हर दिन उसे डर लगता था कि अगला नंबर उसका होगा।


शाम को वह थका हुआ घर लौटा। दरवाज़ा खुलते ही नेहा ने कहा—


“मम्मी जी का फिर फोन आया था।”


यश ने बैग सोफे पर फेंका।


“तो तुम बात कर लिया करो ना!”


“यश…” नेहा ने धीमी आवाज़ में कहा, मम्मी जी रो रही थीं।”


यश रुक गया।


“क्या हुआ?”


“उन्होंने कहा कि बस बेटे की आवाज सुननी थी।”


कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।


यश ने तुरंत नजरें फेर लीं।


“ड्रामा करती हैं…”


लेकिन यह कहते वक्त उसकी आवाज कमजोर पड़ चुकी थी।


उधर छोटे शहर में आरती हर शाम दरवाजे की तरफ देखती रहती।


उसे आदत थी।


पहले यश ऑफिस से लौटकर जोर से आवाज लगाता था—


“माँ! खाना दो जल्दी, बहुत भूख लगी है!”


और वह मुस्कुराते हुए रसोई से जवाब देती—


“हाथ धोकर बैठ पहले!”


अब वही घर हर शाम चुप रहता था।


एक दिन पड़ोस की शर्मा आंटी फिर आ गईं।


“अरे बहन, बेटा तो अब मुंबई वाला बड़ा आदमी हो गया। अब उसे कहाँ याद रहेंगे माँ-बाप।”


आरती बस हल्का सा मुस्कुरा दी।


लेकिन उनके जाते ही वह कमरे में जाकर रो पड़ी।


विनोद जी चुपचाप सब देख रहे थे।


उन्होंने धीरे से कहा—


“इतना मत सोचा करो। लड़का अपनी जिंदगी में व्यस्त है।”


आरती आँसू पोंछते हुए बोली—


“व्यस्त इतना भी क्या होना कि माँ की आवाज सुनने का समय ना मिले?”


विनोद जी के पास इसका कोई जवाब नहीं था।


कुछ दिनों बाद आरती की तबीयत अचानक बिगड़ गई।


तेज बुखार और कमजोरी के कारण उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।


डॉक्टर ने कहा—


“तनाव बहुत ज्यादा ले रही हैं। इन्हें खुश रखिए।”


विनोद जी ने उसी रात यश को फोन किया।


इस बार यश ने कॉल उठा लिया।


“हाँ पापा?”


“बेटा… तेरी माँ अस्पताल में है।”


यश के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।


“क्या हुआ माँ को?!”


“कुछ गंभीर नहीं… लेकिन वो तुझे बहुत याद कर रही है।”


यश तुरंत अगले दिन की फ्लाइट देखने लगा। लेकिन तभी ऑफिस से मेल आया—


“कल की प्रेजेंटेशन मिस हुई तो नौकरी खतरे में पड़ सकती है।”


यश कुर्सी पर बैठ गया।


एक तरफ माँ… दूसरी तरफ नौकरी।


पूरी रात वह इसी उधेड़बुन में बैठा रहा।


तभी नेहा उसके पास आकर धीरे से बोली—


“मुंबई की यह नौकरी बाद में भी संभल जाएगी… लेकिन अगर देर हो गई ना, तो शायद तुम खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाओगे।”


यश ने परेशान होकर उसकी तरफ देखा।


“अगर मैं आज ऑफिस नहीं गया, तो नौकरी जा सकती है नेहा…”


नेहा ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।


“नौकरी दोबारा मिल सकती है यश… लेकिन माँ-बाप दोबारा नहीं मिलते।”


इतना सुनते ही यश की आँखें भर आईं। उसने तुरंत नजरें झुका लीं, ताकि नेहा उसके टूटते हुए चेहरे को न देख सके।


उसी शाम वह अपने शहर पहुँचा।


तीन साल बाद।


घर का दरवाज़ा खुलते ही उसे वही पुरानी खुशबू महसूस हुई।


दीवार पर वही घड़ी… वही सोफा… वही आँगन…


बस माँ पहले से ज्यादा कमजोर दिख रही थीं।


आरती ने जैसे ही बेटे को देखा, उनकी आँखों से आँसू बह निकले।


“यश…”


यश उनके पैरों में बैठ गया।


“माँ… सॉरी…”


इतना कहते ही उसका गला भर गया।


आरती ने कांपते हाथों से उसका चेहरा पकड़ा।


“तू ठीक है ना बेटा?”


यश फूट पड़ा।


उसे लगा था माँ शिकायत करेंगी… ताने देंगी…


लेकिन माँ को तो बस उसकी चिंता थी।


उस रात बहुत दिनों बाद पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खा रहा था।


आरती बार-बार उसकी प्लेट में खाना परोस रही थीं।


“इतना दुबला क्यों हो गया है?”


यश बस चुपचाप उन्हें देखता रहा।


उसे एहसास हो रहा था कि जिस प्यार से वह भाग रहा था… वही उसकी सबसे बड़ी ताकत था।


रात को उसने पिता को छत पर अकेले बैठे देखा।


विनोद जी आसमान की तरफ देख रहे थे।


यश धीरे से उनके पास जाकर बैठ गया।


कुछ देर दोनों चुप रहे।


फिर यश बोला—


“पापा… मैं बहुत बुरा बेटा हूँ ना?”


विनोद जी हल्का सा मुस्कुराए।


“अगर बुरा होता, तो आज यहाँ नहीं होता।”


यश की आँखें झुक गईं।


“मैं बस… थक गया था पापा। हर दिन डर लगता था कि सब खत्म हो जाएगा। इसलिए सबसे दूर भागने लगा… आप लोगों से भी।”


विनोद जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


“बेटा, जिंदगी में जब इंसान टूट रहा होता है ना… तब उसे सबसे ज्यादा अपने घर की जरूरत होती है।”


यश चुपचाप सुनता रहा।


“हम बूढ़े हो गए हैं,” विनोद जी बोले, “लेकिन बोझ नहीं बने हैं अभी। तुझे अकेले लड़ने की जरूरत नहीं है।”


यश की आँखों से आँसू बह निकले।


उसने पहली बार खुलकर अपने डर, नौकरी का तनाव, लोन और अंदर की घुटन सब बता दी।


विनोद जी बस सुनते रहे।


फिर बोले—


“याद है बेटा… जब तू छोटा था और साइकिल चलाना सीख रहा था? तू बार-बार गिर जाता था, फिर भी जिद करके कहता था— ‘नहीं, मैं खुद चलाऊँगा।’
लेकिन तुझे शायद पता नहीं चलता था… पीछे से साइकिल की सीट हम ही पकड़े रहते थे, ताकि तुझे चोट ना लगे।”


यश रो पड़ा।


उसे एहसास हुआ कि वह बड़ा जरूर हो गया था… लेकिन माँ-बाप आज भी पीछे खड़े थे।


अगले कुछ दिन उसने पूरा समय परिवार के साथ बिताया।


माँ के साथ बाजार गया।


पापा के साथ दुकान पर बैठा।


पुराने दोस्तों से मिला।


और कई महीनों बाद… उसने खुलकर हँसना सीखा।


मुंबई लौटते समय आरती ने उसके बैग में ढेर सारे डिब्बे रख दिए।


“इतना कौन ले जाएगा माँ!” यश हँस पड़ा।


आरती बोलीं—


“माँ का प्यार है… वजन नहीं।”


सब हँस पड़े।


लेकिन स्टेशन पर ट्रेन चलने लगी, तो इस बार यश की आँखें नम थीं।


उसने खिड़की से हाथ बाहर निकालकर कहा—


“अब हर दिन फोन करूँगा माँ।”


आरती मुस्कुराईं।


“बस खुश रहना बेटा।”


मुंबई लौटने के बाद यश सच में बदल गया।


अब वह चाहे कितना भी व्यस्त हो, रात को माँ से बात जरूर करता।


धीरे-धीरे उसका तनाव भी कम होने लगा।


एक दिन उसने नेहा से कहा—


“पता है… इंसान दुनिया जीतने निकलता है, लेकिन सुकून हमेशा घर में ही मिलता है।”


नेहा मुस्कुरा दी।


कुछ महीनों बाद यश ने अपने माता-पिता को मुंबई बुला लिया।


उस छोटे से फ्लैट में अब फिर हँसी लौट आई थी।


आरती सुबह बालकनी में तुलसी रखतीं, विनोद जी अखबार पढ़ते और नेहा रसोई में चाय बनाती।


यश ऑफिस जाने से पहले हर दिन माँ के हाथ का खाना खाकर निकलता।


अब उसे समझ आ गया था—


माँ-बाप सिर्फ जिम्मेदारी नहीं होते… वो वो जगह होते हैं जहाँ इंसान हर हार के बाद फिर से खड़ा होना सीखता है।


संदेश:

कई बार बच्चे अपने संघर्षों में इतने उलझ जाते हैं कि उन्हें लगता है माँ-बाप उन्हें समझ नहीं पाएंगे। और माँ-बाप यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि शायद बच्चा अब बड़ा हो गया है। इसी चुप्पी में रिश्ते दूर होने लगते हैं। याद रखिए, दुनिया में एक घर ऐसा जरूर होता है जहाँ आपकी असफलता से ज्यादा आपकी मौजूदगी मायने रखती है।



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