अधूरी आवाज़ का सहारा
बरसात के बाद की सुबह थी। आँगन में पानी की छोटी-छोटी बूंदें अब भी चमक रही थीं। घर के अंदर हल्की सी ठंडक थी, लेकिन माहौल में एक अजीब सा तनाव घुला हुआ था।
कविता रसोई में खड़ी चाय बना रही थी। चेहरे पर थकान थी और मन में खीझ।
“इतनी बड़ी जिम्मेदारी मेरे ऊपर क्यों डाल दी?” वह खुद से बड़बड़ाई।
तभी पीछे से हल्की सी आहट हुई।
उसने मुड़कर देखा—छह साल का नयन दरवाजे के पास खड़ा था।
पतला-दुबला, मासूम चेहरा… लेकिन आंखों में हमेशा एक डर सा रहता था।
नयन उसकी जेठानी का बेटा था। कुछ महीने पहले बीमारी से उसकी जेठानी का निधन हो गया था। उसके बाद कविता के पति संदीप उसे अपने घर ले आए थे।
नयन बोल नहीं पाता था।
कविता को वह कभी अपना नहीं लगा।
“क्या है?” उसने रूखे स्वर में पूछा।
नयन ने हाथ से इशारा किया—उसे पानी चाहिए था।
कविता ने बिना देखे गिलास उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“खुद ले लो… हर समय कोई तुम्हारी सेवा करने के लिए नहीं बैठा है।”
नयन धीरे से गिलास लेकर कोने में बैठ गया।
उसकी आंखों में सवाल थे… लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं था।
कविता का अपना बेटा रोहन था, जो उसके दिल का टुकड़ा था।
रोहन के लिए नए कपड़े, अच्छे स्कूल, खिलौने… और नयन?
उसके हिस्से में बस बचा-खुचा।
जब रोहन खेलता, नयन दूर खड़ा देखता रहता।
एक दिन उसने रोहन की कार उठाई ही थी कि कविता की तेज आवाज गूंजी—
“हाथ मत लगाना! तोड़ दोगे!”
नयन तुरंत सहम गया।
उसने खिलौना वहीं रख दिया।
संदीप के सामने कविता का व्यवहार बिल्कुल बदल जाता था।
वह नयन को बड़े प्यार से अपने पास बुलाती, उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरती और मीठे स्वर में उससे बात करती।
संदीप यह देखकर मन ही मन संतुष्ट हो जाता कि उसकी पत्नी ने नयन को सच में अपना लिया है।
लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग थी—यह सब सिर्फ दिखावा था, असली भावनाएँ तो उसके व्यवहार के पीछे कहीं छिपी हुई थीं।
एक दिन दोपहर के समय अचानक स्कूल से फोन आया।
“मैडम, नयन खेलते समय गिर गया है। घुटने में हल्की चोट आई है… आप आकर उसे ले जाइए।”
संदीप उस समय काम के सिलसिले में शहर से बाहर था, इसलिए कविता के पास खुद जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।
स्कूल पहुँचते ही कविता की नज़र नयन पर पड़ी।
वह एक बेंच पर चुपचाप बैठा था—सिकुड़ा हुआ, जैसे खुद में ही सिमट गया हो।
उसके घुटने पर लगा खून अब सूखकर गहरा निशान बन चुका था,
लेकिन उसके चेहरे पर दर्द से ज़्यादा डर साफ दिखाई दे रहा था।
ऐसा लग रहा था मानो उसे चोट से नहीं…
बल्कि किसी अनदेखी सज़ा या डाँट का भय सता रहा हो।
घर लौटते समय अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। कुछ ही पलों में सड़क पर पानी भर गया और रास्ता फिसलन भरा हो गया।
कविता ने अपनी चाल तेज़ कर दी, ताकि जल्दी घर पहुँच सके। नयन उसके पीछे-पीछे छोटे-छोटे कदमों से चल रहा था, बार-बार संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए।
इसी बीच उसका पैर फिसल गया और वह धड़ाम से पानी से भरे गड्ढे में गिर पड़ा। उसके कपड़े भीग गए, हाथ-पैर कीचड़ से भर गए।
कविता ने पीछे मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर झुंझलाहट साफ झलक रही थी।
“तुमसे सीधा चला भी नहीं जाता!” उसने तीखे स्वर में कहा।
इतना कहकर वह बिना रुके आगे बढ़ गई, जबकि नयन वहीं भीगा हुआ, सहमा सा उठने की कोशिश करता रह गया।
कुछ कदम बाद उसने देखा—
नयन वहीं बैठा था।
भीग चुका था।
उठने की कोशिश कर रहा था, लेकिन डर के कारण उठ नहीं पा रहा था।
उसकी आंखों में वही पुराना डर था।
लेकिन इस बार उसमें एक और चीज थी—
अकेलापन।
अचानक कविता को याद आया—
जब रोहन छोटा था और पहली बार गिरा था…
वह कैसे दौड़कर उसे उठाने गई थी।
कैसे उसे सीने से लगा लिया था।
उसने फिर नयन की तरफ देखा।
उस पल उसे पहली बार महसूस हुआ—
यह बच्चा सिर्फ बोझ नहीं है…
यह भी किसी का सपना था… किसी की दुनिया।
वह तेजी से वापस गई।
नयन के पास बैठी।
धीरे से उसका हाथ पकड़ा।
“उठो…”
उसकी आवाज पहली बार नरम थी।
नयन ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में हैरानी थी।
जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई उसे उठाने आया है।
कविता ने उसे उठाया।
अपने दुपट्टे से उसका चेहरा पोंछा।
और पहली बार… उसे अपने सीने से लगा लिया।
नयन का छोटा सा शरीर डर से कांप रहा था।
धीरे-धीरे वह कविता के करीब आया और हल्के से अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया।
उसके होंठ थरथरा रहे थे… जैसे भीतर बहुत कुछ कहना चाहता हो, लेकिन शब्द साथ नहीं दे रहे हों।
उसने हिम्मत जुटाई…
आवाज़ गले में अटकती रही…
और फिर बड़ी मुश्किल से उसके होंठों से टूटी हुई ध्वनि निकली—
“म… मा…”
शब्द पूरा नहीं बन पाया था,
लेकिन उस अधूरे उच्चारण में भी पूरा अपनापन, पूरा विश्वास और गहरी ममता छुपी हुई थी।
कविता की आंखों से आंसू बह निकले।
उसे लगा जैसे उसके दिल का कोई बंद दरवाजा खुल गया हो।
उस दिन के बाद सब बदल गया।
अब नयन अकेला नहीं था।
कविता उसे अपने हाथों से खाना खिलाती।
रोहन के साथ बैठाकर पढ़ाती।
दोनों बच्चों के बीच फर्क खत्म हो गया।
कुछ महीनों बाद…
एक दिन नयन दौड़ता हुआ आया।
उसने साफ आवाज में कहा—
“माँ…”
कविता रुक गई।
उसने नयन को गले लगा लिया।
अब वह रिश्ता मजबूरी का नहीं था…
दिल का था।
संदेश:
कभी-कभी रिश्ते हमें मिलते नहीं…
हमें उन्हें अपनाना पड़ता है।
और जब अपनापन सच्चा हो—
तो अधूरी आवाज़ भी पूरी हो जाती है। ❤️

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