अनदेखे हाथों का आशीर्वाद

 

Emotional Indian daughter-in-law cleaning her late father-in-law’s eyeglasses beside an old diary in a warmly lit family home.


नेहा जल्दी-जल्दी रसोई का काम निपटा रही थी। गैस पर चाय चढ़ी थी, टोस्ट सिक रहे थे और मोबाइल पर बार-बार ऑफिस की मीटिंग के मैसेज आ रहे थे।


“हे भगवान… आज फिर देर हो जाएगी…” उसने घड़ी देखते हुए धीरे से कहा।


नेहा एक बड़ी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थी। शादी को अभी डेढ़ साल ही हुए थे। उसके पति आदित्य का अपना बिज़नेस था और घर में सिर्फ़ तीन लोग थे—नेहा, आदित्य और उसके ससुर श्यामलाल जी।


श्यामलाल जी शांत स्वभाव के बुज़ुर्ग थे। पत्नी को गुज़रे कई साल हो चुके थे। दिनभर किताबें पढ़ना, पौधों को पानी देना और पुराने रेडियो पर गाने सुनना ही उनका सहारा था।


नेहा उनका सम्मान तो करती थी, लेकिन ऑफिस और घर की दोहरी ज़िम्मेदारियों के बीच उसके पास भावनाओं के लिए बहुत कम समय बचता था।


उस सुबह भी वह बैग उठाकर जल्दी से निकलने लगी ही थी कि पीछे से आवाज़ आई—


“बहू… ज़रा इधर आना बेटा।”


नेहा ने पलटकर देखा। श्यामलाल जी अपने कमरे में बैठे थे।


“जी पिताजी?”


“मेरा वो नीला स्वेटर अलमारी से निकाल दोगी?”


नेहा के चेहरे पर हल्की झुंझलाहट आई, लेकिन उसने बिना कुछ कहे स्वेटर निकालकर दे दिया।


ऑफिस पहुँचते-पहुँचते वह परेशान हो चुकी थी।


शाम को उसने आदित्य से कहा, “तुम्हें नहीं लगता पिताजी जानबूझकर मुझे रोकते हैं? रोज़ जब मैं निकलती हूँ तभी उन्हें कोई काम याद आता है।”


आदित्य थोड़ा मुस्कुराया। “अरे… बूढ़े लोग हैं। शायद अकेलापन लगता होगा।”


“लेकिन मैं भी इंसान हूँ आदित्य। रोज़ ऑफिस के लिए लेट हो जाती हूँ।”


आदित्य ने बात टाल दी।


लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ।


जैसे ही नेहा बाहर निकलने लगी—


“बहू… ज़रा पानी की बोतल भर देना।”


उसके अगले दिन—


“बहू… मेरा मोबाइल कहाँ रखा है देखना।”


कभी दवा, कभी अखबार, कभी चश्मा।


धीरे-धीरे नेहा के मन में चिढ़ बढ़ने लगी।


एक दिन तो उसने गुस्से में आदित्य से साफ कह दिया— “अब मुझसे ये रोज़-रोज़ नहीं होगा।”


आदित्य कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, “ठीक है… तुम सुबह ही उनकी सारी चीज़ें व्यवस्थित करके रख दिया करो।”


नेहा को भी यही सही लगा।


अगले दिन उसने दवाइयाँ, पानी, चश्मा, अखबार—सब पहले से ही रख दिया।


उसे लगा आज तो राहत मिलेगी।


लेकिन जैसे ही वह गेट तक पहुँची, फिर आवाज़ आई—


“बहू… एक मिनट।”


नेहा ने गहरी साँस ली और अंदर गई।


श्यामलाल जी धीरे से बोले— “बेटा… जाते-जाते दो मिनट बैठ जाओ।”


“पिताजी, बहुत देर हो रही है…”


“बस एक मिनट।”


नेहा अनमने मन से बैठ गई।


श्यामलाल जी मुस्कुराए। “अच्छा… अब जाओ। ध्यान से जाना।”


नेहा बिना कुछ बोले निकल गई।


कार चलाते हुए उसके मन में बार-बार यही बात घूमती रही— “आख़िर ऐसा क्या है जो उन्हें रोज़ रोकना होता है?”


समय बीतता गया।


धीरे-धीरे नेहा ने प्रतिक्रिया देना कम कर दिया। अब वह कई बार अनसुना करके भी निकल जाती।


श्यामलाल जी फिर भी आवाज़ लगाते— “बहू…”


लेकिन अब नेहा के कदम नहीं रुकते थे।


उनकी आँखों में हल्की उदासी उतर आती, मगर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।


फिर एक दिन अचानक श्यामलाल जी की तबीयत बिगड़ गई।


उम्र अपना असर दिखा चुकी थी।


कुछ ही दिनों बाद वे इस दुनिया से चले गए।


घर सूना हो गया।


बरामदे की कुर्सी खाली रहने लगी। रेडियो चुप हो गया। पौधों में भी जैसे चमक कम हो गई।


लेकिन ज़िंदगी रुकती कहाँ है।


समय बीतता रहा।


करीब दो साल बाद एक रविवार को नेहा घर की सफाई कर रही थी। स्टोर रूम में रखी पुरानी अलमारी साफ करते समय उसे श्यामलाल जी का एक छोटा सा डिब्बा मिला।


उसमें कुछ पुरानी तस्वीरें, चश्मा और एक डायरी रखी थी।


नेहा धीरे-धीरे डायरी के पन्ने पलटने लगी।


अचानक एक पन्ने पर उसकी नज़र ठहर गई।


उसमें लिखा था—


“दिनांक 12 जुलाई…


आज फिर बहू जल्दी में थी। मैं जानता हूँ उसे देर होती है, लेकिन जब वह मेरे पास आती है तो घर में कुछ पल के लिए अपनापन लौट आता है।


उसकी सास जाते-जाते मेरा हाथ पकड़कर बोली थी— ‘देखिए… हमारी बहू बहुत समझदार है, लेकिन बाहर की दुनिया बहुत कठिन है। उसे हमेशा ये एहसास कराइएगा कि इस घर में उसके अपने लोग हैं।’


बस तभी से मैंने एक आदत बना ली।


जब भी बहू ऑफिस के लिए निकलती है, मैं उसे किसी बहाने पास बुला लेता हूँ।


कभी चश्मा… कभी दवा… कभी स्वेटर…


क्योंकि जब वह झुककर चीज़ देती है, मैं मन ही मन उसके सिर पर हाथ रखकर भगवान से कहता हूँ—


‘मेरी बेटी को हर मुसीबत से बचाना।’


शायद उसे कभी समझ न आए, लेकिन एक बुज़ुर्ग के पास प्यार जताने के तरीके बहुत छोटे होते हैं।”


डायरी पढ़ते-पढ़ते नेहा के हाथ काँपने लगे।


उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।


उसे याद आने लगा— वो हर सुबह… वो आवाज़… वो “ध्यान से जाना बेटा…”


आज पहली बार उसे एहसास हुआ कि जिन बातों को वह बोझ समझती रही, वो दरअसल दुआएँ थीं।


उस दिन नेहा बहुत देर तक श्यामलाल जी का चश्मा हाथ में लेकर रोती रही।


अगली सुबह ऑफिस जाने से पहले वह धीरे से उनके कमरे में गई।


कमरा अब भी वैसे ही सजा था।


उसने चश्मा उठाया, साफ किया और टेबल पर रख दिया।


फिर आँखें बंद करके धीमे से बोली—


“पिताजी… आज भी आशीर्वाद दे दीजिए।”


खिड़की से आती हवा ने जैसे उसके सिर को हल्के से छू लिया।


और कई दिनों बाद नेहा के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।


सच यही है…


रिश्ते हमेशा बड़े शब्दों से नहीं निभते।


कभी-कभी किसी का रोज़ बुलाना, हाल पूछना, इंतज़ार करना या छोटी-छोटी बातें कहना भी प्रेम का ही रूप होता है।


लेकिन अफसोस…


हम अक्सर उन भावनाओं की कीमत तब समझते हैं, जब उन्हें जताने वाले लोग बहुत दूर जा चुके होते हैं।



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