जब पिता ने बेटी के सम्मान के लिए अपना घर बेच दिया
"जैसे ही रजिस्ट्री ऑफिस के बाहर खड़े रामनारायण ने अपनी जेब से पुरानी चाबी निकालकर आखिरी बार उसे देखा, उनकी आँखें अचानक भर आईं।"
यह वही मकान था, जिसकी एक-एक ईंट उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर जोड़ी थी।
रजिस्ट्री ऑफिस के बाहर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। कोई जमीन खरीदने आया था, कोई बेचने। कोई नए घर के सपने लेकर मुस्कुरा रहा था, तो कोई मजबूरी में अपने पुराने सपनों से विदा ले रहा था।
रामनारायण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
उनकी उम्र लगभग सड़सठ साल थी। सफेद होते बाल, हल्की झुकी कमर और चेहरे पर गहरी थकान साफ दिखाई दे रही थी। उनके हाथों में मकान के कागज़ थे, जिन पर कई जगह उनके काँपते हुए हस्ताक्षर बने हुए थे।
पास खड़ा प्रॉपर्टी डीलर बोला, "बाबूजी, सोच लीजिए। एक बार रजिस्ट्री हो गई तो फिर वापस नहीं होगा।"
रामनारायण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, कुछ फैसले इंसान अपनी खुशी से नहीं, मजबूरी से करता है।"
डीलर चुप हो गया।
उसी समय उनके मोबाइल की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम चमका—"बिटिया स्नेहा"।
रामनारायण ने तुरंत फोन उठा लिया।
"हाँ बेटी।"
दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज़ आई, "पापा, आप सच-सच बताइए। क्या आप सच में घर बेच रहे हैं?"
रामनारायण कुछ क्षण चुप रहे।
"नहीं बेटा, बस... कुछ काम है।"
"पापा, मुझसे झूठ मत बोलिए। पड़ोस वाली आंटी ने सब बता दिया। आप मेरी वजह से घर मत बेचिए। मैं वापस उसी घर चली जाऊँगी।"
यह सुनकर रामनारायण की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"किस घर की बात कर रही हो, बेटी? उस घर की, जहाँ रोज़ तुम्हें ताने दिए जाते थे? जहाँ तुम्हें यह कहा जाता था कि तुम्हारे पिता ने दहेज कम दिया? जहाँ तुम्हें धक्का देकर बाहर निकाल दिया गया था?"
स्नेहा रोने लगी।
"लेकिन पापा, आपकी सारी जमा-पूँजी तो मेरी शादी में ही खत्म हो गई थी। अब छोटे भाई की पढ़ाई भी बाकी है।"
रामनारायण ने खुद को संभालते हुए कहा, "बेटी, घर फिर बन जाएगा। लेकिन अगर बाप अपनी बेटी का आत्मसम्मान टूटते हुए देखता रहे, तो वह जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाता।"
फोन कट गया।
रजिस्ट्री ऑफिस में उनका नंबर आ गया।
क्लर्क ने कागज़ देखते हुए पूछा, "इतना अच्छा मकान बेच रहे हैं? कोई बड़ी परेशानी है क्या?"
रामनारायण ने धीमी आवाज़ में कहा, "परेशानी नहीं साहब... बेटी का दर्द है।"
क्लर्क ने सिर उठाकर उनकी ओर देखा।
रामनारायण बोलते गए, "मेरी बेटी की शादी बड़े अरमानों से की थी। लोगों ने कहा था कि लड़का सरकारी नौकरी में है, बेटी राज करेगी। हमने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया। गहने दिए, फर्नीचर दिया, नकद भी दिया।"
उन्होंने गहरी साँस ली।
"लेकिन शादी के बाद उनकी माँगें खत्म नहीं हुईं। कभी कार चाहिए थी, कभी पैसे। जब मैंने हाथ जोड़कर कहा कि अब देने के लिए कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने मेरी बेटी को ही बोझ समझ लिया।"
ऑफिस में बैठे लोग धीरे-धीरे उनकी बातें सुनने लगे।
"एक दिन मेरी बेटी अपने छह साल के बेटे को लेकर मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। उसके हाथ में सिर्फ एक बैग था और आँखों में इतना डर कि मैं उसे देखकर ही टूट गया।"
रामनारायण की आवाज़ भर्रा गई।
"उस दिन मुझे लगा कि बेटी की विदाई सिर्फ डोली में नहीं होती। कभी-कभी उसकी दूसरी विदाई आँसुओं में भी होती है।"
ऑफिस में सन्नाटा फैल गया।
क्लर्क की आँखें भी नम हो गईं।
उसने पूछा, "तो आप यह मकान बेचकर क्या करेंगे?"
"बेटी का केस लड़ूँगा। उसके बेटे की पढ़ाई कराऊँगा। उसे अपने पैरों पर खड़ा करूँगा।"
"और आप कहाँ रहेंगे?"
रामनारायण मुस्कुराए।
"बेटा, जिस बाप ने पूरी जिंदगी बच्चों के लिए गुजार दी, उसे अपने लिए बहुत बड़ी जगह नहीं चाहिए। दो वक्त की रोटी और चैन की नींद मिल जाए, वही बहुत है।"
पीछे बैठे एक अधेड़ उम्र के आदमी ने अचानक कहा, "भाई साहब, मेरी पत्नी स्कूल चलाती हैं। अगर आपकी बेटी पढ़ी-लिखी है तो हम उसे नौकरी दे देंगे।"
एक महिला बोली, "मैं वकील हूँ। अगर केस में मदद चाहिए तो फीस की चिंता मत कीजिए।"
दूसरे व्यक्ति ने कहा, "बच्चे की पढ़ाई का खर्चा मैं उठाऊँगा।"
रामनारायण अवाक रह गए।
वे बार-बार सबको देखने लगे।
उनके होंठ काँप रहे थे।
"मैंने तो सिर्फ अपना घर बेचने आया था... लेकिन आप लोगों ने मुझे यह एहसास करा दिया कि दुनिया में इंसानियत अभी जिंदा है।"
रजिस्ट्री ऑफिस में मौजूद कई लोगों की आँखें भर आईं।
रामनारायण ने अपनी पुरानी चाबी को हथेली में कस लिया और बोले,
"शायद भगवान इंसान से उसका मकान छीन लेता है, लेकिन सिर से छत नहीं हटाता। वह किसी न किसी रूप में ऐसे लोग भेज देता है, जो टूटे हुए हौसलों को फिर से सहारा दे सकें।"
घर लौटते समय उनके हाथ में कागज़ जरूर थे, लेकिन दिल पहले से हल्का था।
क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि बेटी बोझ नहीं होती, बल्कि समाज की गलत सोच बोझ होती है।
और यह भी कि हर पिता को अपनी औलाद की खुशी खरीदने के लिए अपना सम्मान, अपनी जमा-पूँजी और अपना आशियाना दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
अगर समाज दहेज माँगने वालों का साथ छोड़ दे और पीड़ित बेटियों का हाथ थाम ले, तो शायद किसी रामनारायण को अपने सपनों का घर बेचने की नौबत ही न आए।
कहानी का सार :
बेटियाँ किसी सौदे का हिस्सा नहीं होतीं। दहेज के नाम पर की गई हर माँग एक पिता की मजबूरी और एक बेटी के सम्मान पर चोट करती है। लेकिन अगर समाज संवेदनशील बने, अन्याय के खिलाफ खड़ा हो और पीड़ित परिवारों का सहारा बने, तो टूटे हुए लोगों को फिर से जीने की उम्मीद मिल सकती है।
सवाल आपके लिए :
अगर आप उस रजिस्ट्री ऑफिस में मौजूद होते, तो क्या करते? क्या आपको लगता है कि आज भी बेटियों की शादी कई परिवारों के लिए सम्मान नहीं, बल्कि आर्थिक परीक्षा बन चुकी है? अपने विचार कमेंट में जरूर साझा करें।

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