दो बिस्कुट और एक गिलास पानी
पुराने रेडियो के ऊपर रखा नीले रंग का स्कूल बैग जैसे ही कमला की नज़र में आया, उसके हाथ वहीं रुक गए। पाँच साल बीत चुके थे, लेकिन उसने आज तक किसी को उस बैग को खोलने नहीं दिया था।
घर छोटा था, लेकिन बहुत सलीके से सजा हुआ। दीवारों पर चूने की परत थी, खिड़कियों पर फीके पड़ चुके परदे और आँगन में मिट्टी का एक छोटा-सा चबूतरा, जिस पर तुलसी का पौधा लगा था।
उस घर में दो लोग रहते थे—सत्तर साल के रामदास और पैंसठ साल की कमला।
मोहल्ले के लोग कहते थे कि दोनों बहुत कम बोलते हैं।
लेकिन एक आदत ऐसी थी, जिसे पूरे मोहल्ले ने वर्षों से बदलते नहीं देखा।
घर के बैठक वाले कमरे में रखी लकड़ी की मेज पर एक स्टील की प्लेट रहती थी। प्लेट में दो बिस्कुट और एक गिलास पानी।
कोई मेहमान आता तो पूछ बैठता, "काका, ये किसके लिए रखते हो?"
रामदास मुस्कुरा देते।
"हमारे बेटे के लिए।"
लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते।
क्योंकि उनका बेटा, मोहित, पाँच साल पहले इस दुनिया से जा चुका था।
मोहित उनका इकलौता बेटा था।
बचपन से ही बहुत सीधा।
जब दूसरे बच्चे पतंग उड़ाते थे, वह घायल चिड़ियों को उठाकर घर ले आता था।
कमला डाँटती, "हर बार कोई न कोई जानवर उठा लाते हो। घर है या अस्पताल?"
मोहित हँस देता।
"माँ, इसे भी दर्द होता होगा न।"
रामदास गाँव की डाकघर में क्लर्क थे।
ज़्यादा कमाई नहीं थी, लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
मोहित पढ़ने में तेज़ था।
सरकारी स्कूल से पढ़ा।
फिर शहर के कॉलेज में दाखिला मिला।
पहली बार जब वह पढ़ाई के लिए बाहर गया, कमला तीन दिन तक उसके कमरे में जाकर रोती रही।
रामदास समझाते, "बच्चे बड़े होते हैं तो उड़ना सीखते हैं।"
कमला कहती, "उड़ जाए, पर घर लौटना नहीं भूलना चाहिए।"
मोहित ने घर से दूर जाकर भी अपने माता-पिता से दूरी नहीं बनने दी।
वह हर रविवार बिना नागा फोन करता।
"माँ, खाना खा लिया?"
"पापा, दवा समय पर ले ली न?"
उसकी आवाज़ सुनते ही कमला के चेहरे पर मुस्कान आ जाती और रामदास की सारी थकान जैसे उतर जाती।
कई बार वह बिना बताए अचानक घर पहुँच जाता।
रसोई में झाँककर हँसते हुए कहता, "माँ, बहुत दिनों से आलू के पराठे नहीं खाए। आज तो वही बनेंगे।"
फिर पिता के पास बैठकर पुराने रेडियो के पेंच कसता, उसकी खरखराती आवाज़ ठीक करने की कोशिश करता और दोनों देर तक छोटी-छोटी बातें करते रहते।
छुट्टी खत्म होने पर वह अपना वही नीला बैग कंधे पर टाँगता, माँ के हाथ का डिब्बा पकड़ता और मुस्कुराकर कहता, "जल्दी फिर आऊँगा।"
कमला दरवाज़े तक उसे छोड़ने जाती और रामदास दूर तक उसकी जाती हुई पीठ देखते रहते।
उन्हें क्या पता था कि एक दिन यही "जल्दी फिर आऊँगा" उनकी सबसे अनमोल याद बन जाएगा।
कॉलेज खत्म होने के बाद मोहित ने नौकरी शुरू कर दी।
शहर की एक निजी कंपनी में काम करता था।
तनख्वाह बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन सपने बड़े थे।
वह कहता, "पापा, सबसे पहले घर की छत बनवाऊँगा। बरसात में पानी टपकता अच्छा नहीं लगता।"
कमला हँसती।
"पहले अपनी शादी कर ले।"
मोहित जवाब देता, "अभी बहुत काम बाकी है।"
उसने घर में नया पंखा लगवाया।
पुराना रेडियो ठीक करवाया।
कमला के लिए चश्मा बनवाया।
रामदास के लिए नई चप्पल खरीदी।
छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ भर देता था।
एक दिन वह दफ़्तर के काम से दूसरे शहर जा रहा था।
बस अड्डे पर पहुँचकर उसने फोन किया।
"माँ, लौटते वक्त तुम्हारे लिए साड़ी लाऊँगा।"
कमला बोली, "कुछ मत लाना। बस जल्दी आ जाना।"
रामदास ने कहा, "रास्ते में खाना खा लेना।"
मोहित हँसा।
"आप दोनों एक जैसी बातें करते हो।"
वो आखिरी बातचीत थी।
रास्ते में बस का भयानक हादसा हो गया।
खबर टीवी पर चली।
मोहल्ले वालों ने नामों की सूची देखी।
किसी ने रामदास के घर जाने की हिम्मत नहीं की।
जब पुलिस आई, कमला दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसे शायद पहले ही सब समझ आ गया था।
उसने सिर्फ इतना पूछा—
"मेरा बेटा बहुत डरा तो नहीं होगा?"
पुलिस वाले की आँखें भर आईं।
वह कुछ नहीं बोल पाया।
मोहित चला गया।
घर वैसा ही रहा।
लेकिन उसके बिना सब बदल गया।
कमला ने रसोई में खाना बनाना कम कर दिया।
रामदास देर तक चुप बैठे रहते।
रेडियो बंद रहने लगा।
बैग उसी जगह रखा रहा।
कपड़े अलमारी में वैसे ही टंगे रहे।
पहले मोहल्ले वाले आते।
ढाँढस बँधाते।
धीरे-धीरे रिश्तेदारों का आना कम हो गया। मोहल्ले वाले भी अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौट गए।
घर के बाहर सब कुछ पहले जैसा दिखने लगा, लेकिन रामदास और कमला की दुनिया वैसी नहीं रही।
बेटे के जाने का दुख उनके साथ ही बैठ गया था। कभी उसकी खाली कुर्सी में दिखाई देता, कभी अलमारी में रखे उसके कपड़ों में, तो कभी उस आवाज़ की कमी में, जो कभी इस घर की सबसे बड़ी रौनक हुआ करती थी।
एक दिन कमला चाय बना रही थी।
आदत से मजबूर होकर उसने तीन कप निकाल लिए।
फिर खुद ही रुक गई।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
रामदास ने पहली बार उसे इस तरह रोते देखा कि जैसे बरसों से दबा हुआ दर्द एक साथ बाहर आ गया हो।
उन्होंने धीरे से कहा,
"रो लो। हमेशा मजबूत बने रहने की ज़रूरत नहीं होती।"
कमला बोली,
"मुझे डर है कि कहीं मैं उसके चेहरे की आवाज़ भूल न जाऊँ।"
रामदास ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"माँ-बाप अपने बच्चों को नहीं भूलते।"
उस दिन के बाद एक नई आदत शुरू हुई।
बैठक की मेज पर रोज़ दो बिस्कुट और एक गिलास पानी रखा जाने लगा।
कमला कहती,
"जब नौकरी से लौटता था तो सबसे पहले पानी पीता था।"
रामदास कहते,
"और बिस्कुट चाय में डुबोकर खाता था।"
लोगों को यह अजीब लगा।
कुछ ने कहा,
"दुख ने इन्हें बदल दिया है।"
कुछ ने कहा,
"समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।"
लेकिन कुछ दुख ठीक नहीं होते।
बस उनके साथ जीना सीखना पड़ता है।
मोहल्ले में रहने वाली आठ साल की गुड़िया अक्सर उनके घर आ जाती थी।
एक दिन उसने पूछा,
"दादी, ये बिस्कुट कौन खाता है?"
कमला मुस्कुराई।
"जिसे हम बहुत प्यार करते हैं।"
"लेकिन वो आता नहीं।"
"कुछ लोग दिखाई नहीं देते, फिर भी घर में रहते हैं।"
गुड़िया ने कुछ देर सोचा।
फिर बोली,
"तो क्या मैं भी एक बिस्कुट रख दूँ?"
कमला की आँखें भर आईं।
"हाँ बेटा।"
उस दिन से गुड़िया भी मेज पर बिस्कुट रखने लगी।
धीरे-धीरे मोहल्ले के बच्चों को मोहित की कहानियाँ पता चलने लगीं।
कैसे वह घायल पिल्लों का इलाज करता था।
कैसे बूढ़े रिक्शेवाले का किराया दे देता था।
कैसे हर त्योहार पर अनाथालय में मिठाई बाँट आता था।
रामदास कहते,
"इंसान की उम्र नहीं, उसके काम याद रहते हैं।"
बच्चे चुपचाप सुनते रहते।
एक बरसात में मोहल्ले की झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की किताबें भीग गईं।
रामदास ने मोहित का बैग उतारा।
बहुत देर तक उसे देखते रहे।
फिर बोले,
"कमला, इसे बंद रखकर क्या मिलेगा?"
कमला ने बैग को सीने से लगाया।
फिर धीरे से कहा,
"किताबों से उसे कितना लगाव था... अगर उसका ये बैग किसी बच्चे की पढ़ाई के काम आ जाए, तो शायद उसे भी अच्छा लगे।"
दोनों ने मिलकर मोहल्ले के बच्चों के लिए किताबें खरीद दीं।
पुराने बरामदे को साफ किया।
वहाँ छोटी-सी अलमारी रखी।
उस पर लिखा—
"मोहित पाठशाला"
बच्चे स्कूल के बाद वहाँ पढ़ने आने लगे।
कोई कविता पढ़ता।
कोई कहानी।
कोई चित्र बनाता।
कमला सबको पानी पिलाती।
रामदास होमवर्क कराते।
घर में फिर से बच्चों की आवाज़ें गूँजने लगीं।
एक दिन गुड़िया ने पूछा,
"दादा, अगर मोहित भैया होते तो खुश होते?"
रामदास ने कुछ पल सोचा।
फिर बोले,
"बहुत खुश होते। क्योंकि उन्हें लगता था कि जो सीखा है, उसे बाँटना चाहिए।"
गुड़िया बोली,
"तो वो कहीं गए नहीं।"
रामदास मुस्कुरा दिए।
"शायद।"
समय बीतता गया।
कमला के बाल और सफेद हो गए।
रामदास की चाल धीमी पड़ गई।
लेकिन मेज पर रखी स्टील की प्लेट नहीं बदली।
दो बिस्कुट।
एक गिलास पानी।
और पास में रखी मोहित की मुस्कुराती तस्वीर।
कभी-कभी कोई नया आदमी पूछ लेता,
"अब भी रखते हो?"
रामदास कहते,
"आदत है।"
फिर थोड़ी देर बाद जोड़ते,
"और प्यार की आदतें आसानी से नहीं छूटतीं।"
कुछ रिश्ते मौत से खत्म नहीं होते।
वे रोज़मर्रा की छोटी-छोटी आदतों में बदल जाते हैं।
किसी खाली कुर्सी में।
किसी पुरानी शर्ट की खुशबू में।
किसी स्कूल बैग में।
या फिर स्टील की उस प्लेट में, जिसमें रोज़ दो बिस्कुट और एक गिलास पानी रखा जाता है।
क्योंकि माँ-बाप के लिए बच्चे बड़े नहीं होते।
वे हमेशा वहीं रह जाते हैं—
उसी मुस्कान में,
उसी आवाज़ में,
उसी उम्र में,
जब उन्होंने आखिरी बार कहा था—
"माँ, मैं जल्दी लौट आऊँगा।"
और शायद इसी वजह से कमला आज भी मेज साफ करते हुए धीरे से कहती है,
"बिस्कुट नरम हो जाएँगे बेटा... जल्दी आ जाना।"
उसे पता है कि दरवाज़ा नहीं खुलेगा।
कोई कदमों की आहट नहीं आएगी।
फिर भी वह प्लेट सजाती है।
क्योंकि उम्मीद हमेशा मिलने की नहीं होती।
कभी-कभी उम्मीद सिर्फ इतना होती है कि जिसे हमने पूरे दिल से चाहा, उसकी जगह हमारे दिल में हमेशा बनी रहे।
अगर तुम्हारे आसपास भी कोई रामदास और कमला हों, तो उनसे यह मत कहना कि अब भूल जाओ।
बस कुछ देर उनके पास बैठ जाना।
हो सकता है वे अपने बेटे की कोई पुरानी शरारत सुनाने लगें।
और तब तुम्हें समझ आएगा कि दुनिया में सबसे लंबी उम्र यादों की होती है।
कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनके लिए रखे हुए दो बिस्कुट और एक गिलास पानी उम्र भर बताते रहते हैं—
प्यार खत्म नहीं होता, वह बस इंतज़ार का दूसरा नाम बन जाता है।

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