पिता का अनमोल कर्ज
"जिस पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी छोटे भाई के परिवार को संभालने में लगा दी… उसी पिता के एक फैसले ने बेटे को रिश्तों की असली कीमत समझा दी।"
"पापा, अब बस भी कीजिए। हर महीने चाचाजी के घर पैसे भेजना बंद कर दीजिए।"
आदित्य ने मोबाइल मेज़ पर रखते हुए झुंझलाकर कहा।
ड्रॉइंग रूम में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
खिड़की के बाहर हल्की बारिश हो रही थी। बूंदें शीशे पर गिरकर फिसल रही थीं।
रमेश जी अपने पुराने चश्मे के पीछे से बेटे को देखते रहे।
उनके हाथ में बैंक पासबुक थी, जिसमें अभी-अभी दस हजार रुपये ट्रांसफर होने की एंट्री हुई थी।
"बेटा, पैसे भेज दिए हैं। अब दवाई का इंतज़ाम हो जाएगा।"
"लेकिन क्यों, पापा?"
आदित्य की आवाज़ ऊँची हो गई।
"चाचाजी के दोनों बेटे नौकरी करते हैं। उन्हें खुद संभालने दीजिए। कब तक आप जिम्मेदारी उठाएँगे?"
पास बैठी उसकी पत्नी नंदिनी भी धीरे से बोली—
"पापा, हम आपका सम्मान करते हैं, लेकिन अब हमारी भी जिम्मेदारियाँ बढ़ रही हैं। घर का लोन है, अन्वी की पढ़ाई है, आपकी दवाइयाँ हैं। हर महीने इतनी बड़ी रकम भेजना समझदारी नहीं है।"
रमेश जी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"समझदारी सिर्फ हिसाब-किताब से नहीं होती, बेटा।"
आदित्य ने बात काट दी।
"भावनाओं से बैंक बैलेंस नहीं बढ़ता, पापा।"
रमेश जी चुप हो गए।
उन्होंने कोई बहस नहीं की।
बस धीरे से उठे और अपने कमरे में चले गए।
अगले दिन रविवार था।
रमेश जी ने कहा—
"चलो आदित्य, आज मेरे साथ गाँव चलना है।"
"अचानक?" कोई खास बात है क्या, पापा?"
रमेश जी हल्का-सा मुस्कुराए।
"हाँ बेटा... आज तुझे कुछ ऐसा दिखाना है, जो शायद मैं इतने सालों से दिखा नहीं पाया। चल, रास्ते में सब समझ जाएगा।"
दो घंटे बाद कार पुराने गाँव में पहुँची।
बरसों पुराना मकान अब भी वैसे ही खड़ा था।
आँगन में नीम का वही विशाल पेड़ था।
चाचाजी मिट्टी के चूल्हे के पास बैठे थे।
उन्होंने रमेश जी को देखते ही गले लगा लिया।
"अरे बड़े भैया! कब आए?"
आदित्य यह सब देख रहा था।
उसे लगा जैसे दोनों भाइयों के बीच वर्षों का नहीं, सिर्फ कुछ घंटों का फासला रहा हो।
दोपहर के भोजन के बाद रमेश जी आदित्य को खेतों की ओर ले गए।
खेत के किनारे एक सूखा कुआँ था।
रमेश जी वहीं रुक गए।
"याद है यह जगह?"
आदित्य ने सिर हिलाया।
"मैं तब बहुत छोटा था।"
रमेश जी ने धीरे से कहा—
"तू छोटा था... लेकिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला यहीं हुआ था।"
उन्होंने मिट्टी उठाकर हथेली पर रख ली।
"तेरी माँ की तबीयत बहुत खराब थी। डॉक्टर ने तुरंत ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये माँगे थे। मेरे पास सिर्फ पच्चीस हजार थे।"
आदित्य ध्यान से सुनने लगा।
"मैं टूट गया था। तभी तेरे चाचा बिना बताए अपना खेत बेच आए।"
आदित्य चौंक गया।
"क्या... चाचाजी ने अपना खेत बेच दिया था?"
आदित्य की आवाज़ काँप गई।
"हाँ, बेटा।"
रमेश जी ने धीमे स्वर में कहा।
"लेकिन... दादाजी तो हमेशा कहते थे कि खेत सूखे और घाटे की वजह से बेचना पड़ा था।"
आदित्य की आँखों में हैरानी साफ़ झलक रही थी।
रमेश जी हल्का-सा मुस्कुराए, फिर उनकी आँखें नम हो गईं।
"वो सच नहीं था। वह झूठ उन्होंने सिर्फ इसलिए कहा था, ताकि मुझे कभी यह एहसास न हो कि मेरे कारण मेरे छोटे भाई को अपनी सबसे कीमती जमीन छोड़नी पड़ी।"
कुछ पल दोनों चुप रहे।
हवा में सरसों की हल्की खुशबू घुली हुई थी।
"तेरी माँ बच गई।"
"लेकिन तेरे चाचा की जिंदगी बदल गई।"
"जो खेत उनकी पहचान था... वह चला गया।"
"उन्होंने कभी मुझसे एक रुपया नहीं माँगा।"
आदित्य की आँखें फैल गईं।
"तो आपने कभी बताया क्यों नहीं?"
रमेश जी ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि रिश्तों में किया गया त्याग अगर गिनाया जाए... तो वह सौदा बन जाता है।"
आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।
शाम को लौटते समय उसने देखा—
चाचाजी की पुरानी साइकिल अब भी वही थी।
घर की दीवारों पर जगह-जगह दरारें थीं।
लेकिन चेहरे पर शिकायत का एक भी निशान नहीं था।
रात को घर लौटने के बाद आदित्य देर तक सो नहीं पाया।
अगली सुबह उसने ऑफिस जाते समय अपने पिता की अलमारी खोली।
वहाँ एक पुरानी फाइल रखी थी।
उसमें अस्पताल की रसीदें थीं।
खेत बेचने के कागज़ थे।
और सबसे ऊपर एक पुराना पत्र।
जिस पर लिखा था—
"भैया, खेत तो फिर कभी खरीद लेंगे... लेकिन अगर भाभी को कुछ हो गया, तो उन्हें वापस नहीं ला पाएँगे। आप पैसों की चिंता मत कीजिए, पहले उनका इलाज कराइए।"
पत्र पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आँखें भर आईं।
शाम को उसने पापा को छत पर बैठे पाया।
वह उनके पास जाकर चुपचाप बैठ गया।
कुछ देर बाद बोला—
"पापा..."
"हाँ बेटा?"
"आज समझ आया कि आप पैसे नहीं भेजते..."
"आप अपना कर्ज चुकाने की कोशिश करते हैं।"
रमेश जी मुस्कुरा दिए।
"कुछ कर्ज कभी पूरे नहीं उतरते, आदित्य।"
"उन्हें सिर्फ निभाया जाता है।"
आदित्य ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।
"लेकिन अब यह जिम्मेदारी अकेले आपकी नहीं है।"
उसने मोबाइल निकाला।
बैंक ऐप खोला।
और हर महीने चाचाजी के खाते में जाने वाली राशि दोगुनी कर दी।
रमेश जी ने आश्चर्य से बेटे को देखा।
"इतने पैसे?"
आदित्य मुस्कुराया।
"नहीं पापा..."
"यह पैसे नहीं हैं।"
"यह उस खेत की पहली किश्त है... जो मेरे चाचा ने मेरी माँ की जिंदगी खरीदने के लिए बेच दिया था।"
रमेश जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने बेटे को गले लगा लिया।
तभी नंदिनी भी वहाँ आ गई।
उसने दोनों को देखा और मुस्कुराकर बोली—
"मैंने भी सोच लिया है।"
"इस बार दिवाली पर किसी मॉल से महंगे पर्दे नहीं खरीदेंगे।"
"उस पैसे से गाँव वाले घर की टूटी छत बनवाएँगे।"
आदित्य ने हैरानी से पूछा—
"तुम्हें कैसे पता?"
नंदिनी मुस्कुराई।
"जब जड़ों को पानी मिलता है..."
"तभी शाखाओं पर नए पत्ते आते हैं।"
कुछ महीनों बाद गाँव का घर फिर से चमकने लगा।
पुरानी छत नई हो गई।
आँगन में फिर बच्चों की आवाज़ें गूँजने लगीं।
और रमेश जी हर बार मुस्कुराकर कहते—
"घर ईंटों से नहीं बनता..."
"घर उन लोगों से बनता है जो अपने हिस्से का सुख छोड़कर भी परिवार का भविष्य बचा लेते हैं।"
उस दिन आदित्य ने समझ लिया—
दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति जमीन, पैसा या मकान नहीं होती...
सबसे बड़ी संपत्ति वह इंसान होता है जिसने अपने सपनों का हिस्सा काटकर तुम्हारे सपनों को पूरा किया हो।
क्योंकि...
जिस परिवार में त्याग की यादें जिंदा रहती हैं, वहाँ रिश्ते कभी गरीब नहीं होते।

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