एक झूठ, पाँच साल का पछतावा
जिस ननद ने अपनी भाभी पर झूठा आरोप लगाया... एक दिन उसी भाभी के दरवाज़े पर आकर बोली— "मुझे बचा लीजिए।"
बारिश लगातार हो रही थी।
शाम के करीब सात बजे डोरबेल बजी।
नीलिमा रसोई में रात का खाना बना रही थी। उसने गैस धीमी की और दरवाज़ा खोलने चली गई।
दरवाज़ा खुलते ही सामने का दृश्य देखकर वह कुछ पल के लिए बिल्कुल जड़ हो गई।
बरामदे में एक औरत भीगी हुई खड़ी थी। उसके कपड़े बारिश से पूरी तरह भीग चुके थे। चेहरे पर थकान, आँखों में डर और होंठ काँप रहे थे।
नीलिमा ने गौर से देखा।
"सोनल...?"
उसके मुँह से अनायास निकला।
सामने उसकी ननद सोनल खड़ी थी।
वही सोनल... जिसने पाँच साल पहले पूरे परिवार के सामने उस पर ऐसा झूठा आरोप लगाया था कि नीलिमा की दुनिया ही उजड़ गई थी।
सोनल ने सिर झुका लिया।
"भाभी... क्या मैं पाँच मिनट के लिए आपके घर आ सकती हूँ?"
नीलिमा के मन में एक साथ न जाने कितनी यादें उमड़ पड़ीं।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस दरवाज़े से थोड़ा हट गई।
सोनल धीरे-धीरे अंदर आ गई।
ड्रॉइंग रूम में बैठते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
नीलिमा चुपचाप उसके सामने एक तौलिया और पानी का गिलास रखकर बैठ गई।
दोनों के बीच कुछ मिनट तक सन्नाटा पसरा रहा।
आख़िर सोनल ने काँपती आवाज़ में कहा—
"भाभी... मुझे आपकी मदद चाहिए।"
नीलिमा के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
उसने सिर्फ़ इतना पूछा—
"आज मेरी याद कैसे आ गई?"
यह सवाल सुनते ही सोनल का सिर और झुक गया।
उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे।
"क्योंकि... अब मेरे पास कोई नहीं बचा।"
नीलिमा के मन में जैसे किसी ने पुराने घाव फिर से खोल दिए।
उसे वह दिन साफ़-साफ़ याद आने लगा...
जब वह पहली बार इस घर में दुल्हन बनकर आई थी।
पूरा परिवार उसकी सादगी और व्यवहार से खुश था।
पति अमित एक सरकारी इंजीनियर थे।
सास उषा देवी और ससुर महेश जी बहुत सीधे-सादे इंसान थे।
और सबसे छोटी थी सोनल...
कॉलेज में पढ़ने वाली चंचल, हँसमुख लड़की।
नीलिमा ने उसे पहली मुलाकात में ही छोटी बहन मान लिया था।
दोनों साथ बाज़ार जातीं।
साथ खाना बनातीं।
रात को देर तक बातें करतीं।
सोनल की परीक्षाओं में नीलिमा उसकी पढ़ाई तक करवाती।
उसे लगता था कि उसे एक ननद नहीं, छोटी बहन मिल गई है।
लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि सोनल बदल रही है।
जब भी कोई घर में नीलिमा की तारीफ़ करता, सोनल का चेहरा उतर जाता।
अगर सास कह देतीं—
"बहू के आने से घर संभल गया है।"
तो सोनल कई घंटों तक किसी से बात नहीं करती।
नीलिमा ने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया।
उसे लगा, छोटी है... समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन वह नहीं जानती थी कि सोनल के मन में ईर्ष्या धीरे-धीरे ज़हर बन चुकी थी।
एक दिन अमित ने अपनी पहली तनख्वाह से नीलिमा को एक साधारण-सी सोने की चेन खरीदकर दी।
सोनल ने वह चेन देखी तो मुस्कुराई जरूर...
लेकिन उसके मन में आग लग चुकी थी।
उसी दिन उसने तय कर लिया...
कि अब घर में भाभी की इज़्ज़त कम करनी ही होगी।
उसे क्या पता था...
उसका एक झूठ कई ज़िंदगियाँ बदल देगा।
अगले कुछ दिनों तक सब कुछ सामान्य दिखाई देता रहा।
सोनल पहले की तरह मुस्कुराकर बात करती, लेकिन अब उसकी मुस्कान में अपनापन नहीं था।
नीलिमा यह बदलाव महसूस तो करती थी, मगर उसने कभी उसके मन को टटोलने की कोशिश नहीं की।
उसे लगता था कि शायद पढ़ाई का तनाव होगा।
इसी बीच महेश जी की तबीयत अचानक खराब हो गई।
डॉक्टर ने कुछ जाँचें लिखीं।
घर में पैसों की थोड़ी तंगी थी।
अमित ने अपनी बचत निकालकर पिता के इलाज में लगा दी।
नीलिमा ने भी बिना बताए अपने दो कंगन बेच दिए, ताकि इलाज में कोई कमी न रहे।
लेकिन उसने यह बात किसी को नहीं बताई।
कुछ दिन बाद महेश जी ठीक होकर घर लौट आए।
सब खुश थे।
उसी शाम घर में एक छोटी-सी पूजा रखी गई।
रिश्तेदार भी आए हुए थे।
पूजा खत्म होते ही अचानक सोनल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
सब घबरा गए।
उषा देवी दौड़कर उसके पास पहुँचीं।
"क्या हुआ बेटा?"
सोनल ने रोते हुए कहा,
"मेरी सोने की चेन... मेरी चेन गायब हो गई है।"
घर में हलचल मच गई।
सबने कमरों में तलाश शुरू कर दी।
करीब आधे घंटे बाद सोनल ने काँपते हुए कहा,
"मुझे किसी पर शक है..."
महेश जी ने गंभीर होकर पूछा,
"किस पर?"
सोनल ने धीरे-धीरे अपना हाथ नीलिमा की ओर उठा दिया।
पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
नीलिमा के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई।
"क्या...?"
उसके मुँह से बस इतना ही निकला।
सोनल रोते हुए बोली,
"भाभी मेरे कमरे में अकेली गई थीं। उसके बाद ही चेन गायब हुई।"
नीलिमा स्तब्ध रह गई।
"मैं तुम्हारे कमरे में दवाई रखने गई थी, चोरी करने नहीं।"
लेकिन उस समय किसी ने उसकी बात ध्यान से नहीं सुनी।
कुछ रिश्तेदार फुसफुसाने लगे।
"आजकल तो पढ़ी-लिखी बहुएँ भी..."
यह सुनकर नीलिमा का सिर शर्म से झुक गया।
अमित अपनी पत्नी को अच्छी तरह जानता था।
उसने साफ कहा,
"नीलिमा ऐसा कभी नहीं कर सकती।"
लेकिन सोनल लगातार रोए जा रही थी।
उषा देवी भी असमंजस में थीं।
उन्होंने धीरे से कहा,
"बहू... अगर गलती से रख ली हो तो वापस कर दो। बात यहीं खत्म हो जाएगी।"
यह सुनते ही नीलिमा की आँखों से आँसू बह निकले।
जिस घर को उसने अपना सब कुछ माना...
आज वही घर उससे सफाई माँग रहा था।
उसने बिना कुछ कहे अपनी अलमारी, अपना कमरा और अपना बैग सबके सामने खोल दिया।
लेकिन चेन कहीं नहीं मिली।
फिर भी शक खत्म नहीं हुआ।
रिश्तेदारों के जाने के बाद भी घर का माहौल बदल चुका था।
नीलिमा अब हर नज़र में खुद पर अविश्वास महसूस करती थी।
कुछ दिनों बाद उसने अमित से कहा,
"अगर मेरे रहने से इस घर में अशांति है... तो हम अलग हो जाते हैं।"
अमित बहुत देर तक चुप रहा।
फिर बोला,
"मैं तुम्हें रोज़-रोज़ इस अपमान में नहीं जीने दूँगा।"
दो महीने बाद दोनों किराए के छोटे-से मकान में रहने चले गए।
जाते समय महेश जी की आँखें नम थीं।
लेकिन वे कुछ कह नहीं सके।
सोनल दरवाज़े पर खड़ी सब देखती रही।
उसके चेहरे पर पछतावा नहीं...
बल्कि जीत का अहसास था।
उसे लगा...
अब घर फिर से सिर्फ उसी का हो गया है।
लेकिन वह नहीं जानती थी...
झूठ से जीती हुई लड़ाइयाँ ज़्यादा दिन तक नहीं टिकतीं।
नीलिमा और अमित ने नए शहर में अपनी ज़िंदगी फिर से शुरू की।
शुरुआत आसान नहीं थी।
किराए का छोटा-सा घर, सीमित आमदनी और टूटे हुए रिश्तों का दर्द...
लेकिन नीलिमा ने कभी शिकायत नहीं की।
वह पास के एक स्कूल में पढ़ाने लगी।
अमित ने भी नौकरी के साथ-साथ मेहनत जारी रखी।
धीरे-धीरे दोनों की ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी।
दो साल बाद उनके घर एक बेटी ने जन्म लिया।
उस नन्ही-सी बच्ची ने जैसे उनके जीवन की सारी उदासी कम कर दी।
उधर घर में सब कुछ वैसा नहीं रहा जैसा सोनल ने सोचा था।
महेश जी की तबीयत फिर खराब रहने लगी।
उषा देवी अक्सर चुप-चुप रहने लगीं।
अमित के अलग हो जाने के बाद घर की रौनक जैसे खत्म हो गई थी।
इसी बीच सोनल की शादी एक बड़े कारोबारी परिवार में कर दी गई।
शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसके पति का असली स्वभाव सामने आने लगा।
उसे छोटी-छोटी बातों पर डाँटना, अपमान करना और मायके से पैसे लाने का दबाव बनाना रोज़ की बात हो गई।
सोनल हर बार सोचती—
"काश... मैंने भाभी के साथ ऐसा न किया होता।"
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
एक दिन वह मायके पहुँची तो उसने अपने माता-पिता को पहली बार एक-दूसरे से बहस करते देखा।
महेश जी गुस्से में कह रहे थे,
"अगर उस दिन हमने बहू पर भरोसा किया होता तो आज हमारा बेटा हमसे दूर नहीं होता।"
उषा देवी की आँखों में आँसू थे।
"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।"
सोनल यह सब दरवाज़े के पीछे खड़ी सुन रही थी।
उसकी आँखें भर आईं।
उसी रात उसने अपनी पुरानी अलमारी साफ करनी शुरू की।
एक पुराने बैग से कपड़ों का बंडल नीचे गिरा।
जैसे ही उसने उसे उठाया...
उसके अंदर से एक छोटा डिब्बा बाहर निकल आया।
सोनल ने डिब्बा खोला...
और अगले ही पल उसके हाथ काँपने लगे।
अंदर वही सोने की चेन रखी थी...
जिसके गायब होने का आरोप उसने पाँच साल पहले नीलिमा पर लगाया था।
उसे याद आया...
उस दिन पूजा से पहले उसने जल्दी-जल्दी कपड़े बदलते समय चेन उतारकर इसी बैग में रख दी थी।
बाद में वह पूरी तरह भूल गई।
लेकिन अपनी भूल मानने के बजाय उसने शक, गुस्से और ईर्ष्या में अपनी भाभी का नाम ले दिया।
उस एक झूठ ने...
एक खुशहाल परिवार तोड़ दिया।
सोनल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
वह चेन लेकर माँ के पास पहुँची।
उषा देवी ने जैसे ही चेन देखी, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"यह... यह तो वही चेन है..."
सोनल फूट-फूटकर रोते हुए बोली,
"माँ... भाभी कभी चोर नहीं थीं। गलती मेरी थी... बहुत बड़ी गलती।"
उषा देवी वहीं कुर्सी पर बैठ गईं।
उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
उन्होंने धीमे से कहा,
"बेटी... हमने एक निर्दोष बहू का विश्वास तोड़ दिया।"
महेश जी भी सब सुन चुके थे।
उन्होंने भारी आवाज़ में कहा,
"अब सिर्फ़ एक ही रास्ता है..."
"हमें नीलिमा से माफ़ी माँगनी होगी।"
लेकिन किस्मत ने सोनल को एक और बड़ी परीक्षा के लिए तैयार कर रखा था।
उसी सप्ताह उसके पति का व्यापार पूरी तरह डूब गया...
और कुछ दिनों बाद वही घटना हुई जिसने उसे बरसात की उस शाम नीलिमा के दरवाज़े तक पहुँचा दिया।
बरसात की वही शाम...
सोनल चुपचाप सोफ़े पर बैठी थी। उसकी नज़रें ज़मीन पर थीं और हाथ लगातार काँप रहे थे।
नीलिमा रसोई से चाय लेकर आई। उसने बिना कुछ कहे कप सोनल के सामने रख दिया।
कुछ देर तक दोनों के बीच सन्नाटा छाया रहा।
आख़िरकार सोनल ने अपने पर्स से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला और मेज़ पर रख दिया।
"भाभी... इसे खोलिए।"
नीलिमा ने डिब्बा खोला।
अंदर वही सोने की चेन थी...
जिसकी चोरी का आरोप पाँच साल पहले उसी पर लगाया गया था।
एक पल के लिए नीलिमा की साँसें जैसे थम गईं।
सोनल रोते हुए बोली,
"भाभी... चेन कभी चोरी हुई ही नहीं थी। गलती मेरी थी। मैंने ही इसे अपने पुराने बैग में रख दिया था और भूल गई। लेकिन अपनी गलती मानने की हिम्मत नहीं हुई। उस दिन गुस्से और ईर्ष्या में मैंने आपका नाम ले लिया।"
यह कहते-कहते वह नीलिमा के पैरों में बैठ गई।
"मैंने आपका सम्मान छीना... आपका घर टूटने की वजह बनी... मुझे जो सज़ा मिले, मैं स्वीकार करूँगी।"
नीलिमा की आँखों में भी आँसू आ गए।
उसे उन पाँच वर्षों की हर रात याद आने लगी, जब उसने बिना किसी गलती के अपमान सहा था।
तभी अमित भी ऑफिस से घर लौट आया।
सोनल को देखकर वह चौंक गया।
सारी बात सुनने के बाद वह कुछ देर तक बिल्कुल शांत रहा।
फिर उसने गहरी साँस लेकर कहा,
"सोनल... तुमने सिर्फ़ नीलिमा का नहीं, पूरे परिवार का विश्वास तोड़ा था।"
सोनल सिर झुकाकर रोती रही।
कुछ देर बाद उसने काँपती आवाज़ में कहा,
"भैया... मैं माफ़ी माँगने नहीं आई हूँ। मुझे पता है, मैं उस लायक नहीं हूँ। मैं तो इसलिए आई हूँ क्योंकि मेरे पति आकाश पर झूठा धोखाधड़ी का केस दर्ज हो गया है। उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया, लेकिन जिन लोगों पर उन्होंने भरोसा किया, उन्हीं ने उन्हें फँसा दिया। वकील ने कहा है कि अगर दो दिन में कुछ ज़रूरी कागज़ और गवाही नहीं मिली, तो उनकी ज़मानत भी मुश्किल हो जाएगी।"
अमित ने पूछा,
"और तुम्हारे ससुराल वाले?"
सोनल कड़वी हँसी हँस पड़ी।
"जब तक पैसे थे, सब अपने थे। अब सबने मुँह मोड़ लिया।"
नीलिमा ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
वहाँ अब घमंड नहीं था...
सिर्फ़ पछतावा और बेबसी थी।
रात को सोनल के जाने के बाद अमित ने नीलिमा से पूछा,
"क्या करना चाहिए?"
नीलिमा कुछ देर खिड़की के बाहर बरसती बारिश को देखती रही।
फिर बोली,
"अगर आज मैंने भी उसका साथ छोड़ दिया... तो मुझमें और उसमें क्या फर्क रह जाएगा?"
अगली सुबह अमित अपने पुराने मित्र, जो एक ईमानदार वकील थे, उनसे मिलने गया।
नीलिमा ने सोनल के लिए खाना बनाया और उसके बच्चों को अपने घर बुला लिया ताकि वह अदालत और अस्पताल के चक्कर बिना चिंता के लगा सके।
उधर पहली बार सोनल को महसूस हुआ...
जिस भाभी को उसने कभी अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझा था, वही आज बिना किसी शिकायत के उसके साथ खड़ी थी।
उसकी आँखों से बार-बार आँसू बह रहे थे।
उसे समझ आ चुका था...
रिश्ते खून से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं।
अगले दस दिन पूरे परिवार के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थे।
अमित के वकील मित्र ने पूरी ईमानदारी से आकाश का केस देखा।
जाँच के दौरान धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी।
आकाश के बिज़नेस पार्टनर ने अपने फायदे के लिए सारे फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए थे और आरोप आकाश पर डाल दिया था।
सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और कुछ पुराने ईमेल अदालत में पेश किए गए।
आख़िरकार अदालत ने साफ़ कहा कि आकाश के खिलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं है।
उन्हें सम्मान के साथ रिहा कर दिया गया।
अदालत से बाहर निकलते ही आकाश सीधे अमित और नीलिमा के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसकी आँखें नम थीं।
"भाभी... मुझे आज समझ आया कि इंसान की असली पहचान उसके बुरे समय में होती है। आपने हमारा साथ तब दिया, जब आपको सबसे पहले हमें ठुकरा देना चाहिए था।"
नीलिमा हल्का-सा मुस्कुराई।
"गलतियाँ इंसान से होती हैं। लेकिन अगर गलती मान ली जाए, तो रिश्ते फिर से बन सकते हैं।"
कुछ दिनों बाद सोनल अपने मायके पहुँची।
इस बार वह किसी अधिकार से नहीं, बल्कि सिर झुकाकर आई थी।
बैठक में उषा देवी, महेश जी, अमित और नीलिमा सब बैठे थे।
सोनल सबके सामने खड़ी हो गई।
उसने काँपती आवाज़ में कहा,
"आज मैं एक सच सबके सामने कहना चाहती हूँ।"
उसने पाँच साल पुरानी पूरी घटना एक-एक शब्द बताई।
कैसे उसने ईर्ष्या में आकर बिना सोचे-समझे नीलिमा पर चोरी का आरोप लगा दिया था।
कैसे चेन उसके अपने बैग से मिली।
कैसे उसके एक झूठ ने पूरे परिवार को तोड़ दिया।
घर में सन्नाटा छा गया।
उषा देवी रोते हुए नीलिमा के पास आईं।
उन्होंने उसके हाथ पकड़ लिए।
"बहू... हमें माफ़ कर दो। हमने तुम्हें सुने बिना तुम्हें दोषी मान लिया।"
महेश जी की आँखों में भी आँसू थे।
"बेटी... तुम इस घर की इज़्ज़त थीं। गलती हमारी थी कि हम उसे पहचान नहीं सके।"
नीलिमा ने दोनों के चरण छुए।
"माँजी, बाबूजी... अगर हम हमेशा पुरानी गलतियाँ पकड़कर बैठ जाएँ, तो कोई रिश्ता कभी नहीं बच पाएगा।"
फिर वह सोनल की ओर बढ़ी।
सोनल की आँखें झुकी हुई थीं।
नीलिमा ने उसका हाथ पकड़कर उसे गले लगा लिया।
सोनल फूट-फूटकर रो पड़ी।
"भाभी... मैं इस माफ़ी के लायक नहीं हूँ।"
नीलिमा ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा,
"माफ़ी हमेशा लायक इंसान को नहीं दी जाती... माफ़ी इसलिए दी जाती है ताकि रिश्ते फिर से जी सकें।"
उस दिन पाँच साल बाद पूरा परिवार एक ही खाने की मेज़ पर बैठा।
हँसी लौट आई।
रिश्तों की गर्माहट लौट आई।
और सबसे बड़ी बात...
विश्वास लौट आया।
रक्षाबंधन के दिन सोनल ने पहले अपने भाई अमित को राखी बाँधी।
फिर उसने नीलिमा के हाथ पकड़कर कहा,
"आज से आप सिर्फ़ मेरी भाभी नहीं... मेरी बड़ी बहन हैं।"
नीलिमा मुस्कुराई।
"यह रिश्ता तो मैंने शादी वाले दिन ही बना लिया था... बस तुम्हें समझने में थोड़ा समय लग गया।"
सब लोग हँस पड़े।
आँगन में तुलसी के पास जलता हुआ दीपक हवा में हल्का-सा डोल रहा था।
मानो वह भी कह रहा हो—
रिश्ते टूटते नहीं हैं, उन्हें हमारा अहंकार तोड़ता है।
और उन्हें जोड़ती है... एक सच्ची माफ़ी और एक बड़ा दिल।

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