मायके का सबसे बड़ा शगुन
"भैया... इस बार मेरी बेटी की शादी में ऐसा शगुन लेकर आना कि मेरी ससुराल वालों को शिकायत का एक भी मौका न मिले।"
फोन पर रेखा की आवाज़ में अपनापन कम और उम्मीद ज़्यादा थी।
दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई अजय कुछ पल तक चुप रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे।
"क्या हुआ भैया...? कुछ बोलते क्यों नहीं?" रेखा ने फिर पूछा।
अजय ने हल्की मुस्कान बनाते हुए कहा, "बहन... जितनी हमारी हैसियत होगी, उससे बढ़कर तुम्हारी खुशी की कोशिश करेंगे।"
"कोशिश नहीं भैया... इस बार कमी नहीं रहनी चाहिए। पिछली बार मेरी जेठानी ने सबके सामने ताना मार दिया था कि मायके वालों ने बस रस्म निभा दी। मैं फिर वैसी बेइज्जती नहीं सह सकती।"
इतना कहकर रेखा ने फोन रख दिया।
अजय काफी देर तक मोबाइल हाथ में लिए बैठा रहा। उसके चेहरे की चिंता उसकी पत्नी सविता से छिपी नहीं रही।
सविता रसोई से चाय लेकर आई और बोली, "लगता है दीदी का फोन था।"
अजय ने गहरी सांस ली।
"हां... गुड़िया की शादी तय हो गई है।"
"अरे, यह तो बहुत अच्छी खबर है।" सविता ने मुस्कुराते हुए कहा।
"खबर अच्छी है... लेकिन उसके साथ एक बड़ी चिंता भी आ गई है।" अजय ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया।
सविता चुपचाप उसके सामने बैठ गई।
अजय बोला, "रेखा चाहती है कि इस बार शगुन ऐसा हो कि उसकी ससुराल वाले देखते रह जाएं।"
सविता कुछ पल तक कुछ नहीं बोली।
उसे याद था कि छह महीने पहले ही उन्होंने अपने बेटे रोहित की इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए बैंक से कर्ज लिया था।
उसकी सास शारदा देवी की दवाइयों का खर्च अलग था।
छोटी बेटी पायल अगले साल कॉलेज जाने वाली थी।
घर का हर खर्च बड़ी मुश्किल से चल रहा था।
सविता ने धीरे से कहा, "हम जितना कर सकते हैं, उतना करेंगे। बाकी भगवान पर छोड़ दीजिए।"
अजय की आंखें भर आईं।
"मुझे अपनी बहन की खुशी चाहिए... लेकिन कर्ज लेकर दिखावा करना समझदारी नहीं है।"
उसी समय आंगन में बैठी शारदा देवी ने बेटे की सारी बातें सुन लीं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उन्हें अच्छी तरह याद था कि अपने पति के गुजरने के बाद अजय ने ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली थी।
दोनों बहनों की शादी भी उसी ने अपनी कमाई से की थी।
अपनी जरूरतें छोड़कर हमेशा दूसरों की खुशियां पूरी की थीं।
लेकिन अब हालात बदल चुके थे।
उम्र बढ़ रही थी।
जिम्मेदारियां भी कम नहीं हुई थीं।
दो दिन बाद रेखा का पति संजय खुद अजय के घर पहुंच गया।
बैठते ही उसने कहा, "भाई साहब, शादी बड़े घर में हो रही है। वहां हर रस्म बड़े स्तर पर होती है। आप तो समझदार हैं... हमारी इज्जत आपके हाथ में है।"
अजय मुस्कुराया, लेकिन अंदर से टूट गया।
संजय ने आगे कहा, "बाकी लोग तो गाड़ी, सोने के गहने और बड़े-बड़े उपहार दे रहे हैं। कम से कम मामे की तरफ से कोई कमी नहीं दिखनी चाहिए।"
सविता ने चाय रखते हुए संजय की बात सुनी।
उसने देखा कि अजय का चेहरा उतरता जा रहा था।
संजय चला गया, लेकिन अपने पीछे चिंता का पहाड़ छोड़ गया।
उस रात अजय देर तक जागता रहा।
वह बार-बार डायरी में खर्च लिखता और काटता रहा।
बैंक बैलेंस...
बच्चों की पढ़ाई...
मां की दवा...
घर का राशन...
और अब शादी का शगुन...
कोई हिसाब मेल नहीं खा रहा था।
अचानक उसके सीने में हल्का दर्द उठा।
उसने पानी पिया और खुद को संभाल लिया।
सविता ने देखा तो पूछा, "सब ठीक है ना?"
अजय मुस्कुराकर बोला, "कुछ नहीं... बस थोड़ी थकान है।"
लेकिन सविता समझ गई कि यह थकान शरीर की नहीं, जिम्मेदारियों की थी।
उधर रेखा अपनी ससुराल में शादी की तैयारियों में लगी थी।
उसकी जेठानी बार-बार ताने मारती।
"देखना... इस बार तुम्हारे मायके वाले क्या लेकर आते हैं। बड़े-बड़े दावे तो बहुत करती हो।"
रेखा हर बार मुस्कुरा देती, लेकिन उसके मन में डर बैठ चुका था।
उसे अपने भाई की आर्थिक हालत पता थी।
फिर भी समाज के डर ने उसे भाई से ऐसी उम्मीदें बांधने पर मजबूर कर दिया था।
इधर अजय ने फैसला कर लिया।
वह अगले दिन बैंक जाकर एक और लोन लेने की कोशिश करेगा...
उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह फैसला उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।
"भाई साहब, आपके ऊपर पहले से ही लोन चल रहा है... इस हालत में नया कर्ज मंजूर करना हमारे लिए संभव नहीं है।"
बैंक मैनेजर की बात सुनते ही अजय का चेहरा उतर गया।
उसने एक बार फिर विनती की।
"सर... मेरी बहन की बेटी की शादी है। कुछ दिनों की बात है। मैं हर महीने किस्त समय पर भरता हूं। इस बार भी किसी तरह चुका दूंगा।"
मैनेजर ने फाइल बंद करते हुए कहा,
"मुझे आपकी ईमानदारी पर कोई शक नहीं है, लेकिन नियम सबके लिए एक जैसे हैं। फिलहाल हम नया लोन नहीं दे सकते।"
अजय चुपचाप बैंक से बाहर निकल आया।
धूप कितनी तेज थी, उसे पता ही नहीं चला।
उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
"अब बहन की इज्जत कैसे बचाऊं?"
घर पहुंचा तो सविता दरवाजे पर ही मिल गई।
"क्या हुआ?"
अजय ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
सविता सब समझ गई।
वह रसोई में गई, पानी का गिलास लाकर उसके हाथ में दिया और बोली,
"हर परेशानी का हल पैसे नहीं होते। कभी-कभी सच बोल देना भी सबसे बड़ा समाधान होता है।"
अजय हल्की मुस्कान लाया।
"काश... समाज भी तुम्हारी तरह सोचता।"
उसी समय शारदा देवी कमरे से बाहर आईं।
उन्होंने बेटे को पास बैठाया।
"बेटा, जब तुम्हारे पिता नहीं रहे थे, तब तुमने दोनों बहनों की शादी बिना किसी शिकायत के कराई। किसी को महसूस भी नहीं होने दिया कि घर में कितनी मुश्किलें हैं। अब अगर हालात बदल गए हैं, तो इसमें शर्म कैसी?"
अजय बोला,
"मां, मुझे शर्म अपनी गरीबी की नहीं है... डर इस बात का है कि कहीं रेखा को फिर से ताने न सुनने पड़ें।"
शारदा देवी ने बेटे का हाथ पकड़ लिया।
"जो लोग रिश्तों की कीमत सामान से लगाते हैं, उनके तानों का जवाब सामान नहीं, संस्कार देते हैं।"
अजय चुप हो गया।
उधर रेखा के घर शादी की तैयारियां जोरों पर थीं।
महंगे कपड़े, गहने, सजावट...
हर चीज़ की चर्चा हो रही थी।
इसी बीच उसकी जेठानी नीलम फिर बोली,
"रेखा, इस बार तुम्हारे मायके वाले क्या-क्या भेज रहे हैं?"
रेखा ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"अभी तो कुछ तय नहीं है।"
नीलम हंस पड़ी।
"अरे, इतना बड़ा रिश्ता है। मामे की तरफ से कार नहीं तो कम से कम सोने का सेट तो आएगा ही।"
पास बैठी कुछ रिश्तेदार भी बातें सुनने लगीं।
रेखा का दिल बैठ गया।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसने अपने भाई पर कितना बड़ा बोझ डाल दिया है।
इधर अजय खर्चों का हिसाब देख रहा था।
सविता अलमारी से एक छोटा डिब्बा लेकर आई।
उसने डिब्बा अजय के सामने रख दिया।
"ये क्या है?" अजय ने हैरानी से पूछा।
"मेरे गहने।" सविता ने शांत स्वर में जवाब दिया।
अजय चौंक गया।
"नहीं... ऐसा कभी नहीं होगा।"
सविता मुस्कुराई।
"शादी के बाद से ये गहने अलमारी में ही पड़े हैं। अगर इन्हें बेचकर किसी अपने का काम आ जाए, तो इससे बड़ी खुशी क्या होगी?"
अजय ने तुरंत डिब्बा बंद कर दिया।
"तुम्हारे गहने नहीं बिकेंगे।"
"फिर घर का खर्च और शादी का इंतज़ाम कैसे होगा?" सविता ने चिंता से पूछा।
"जो होगा, अपनी हैसियत से होगा।"
सविता ने कुछ नहीं कहा।
उसे अपने पति पर गर्व था।
उसी रात शारदा देवी ने अपनी पुरानी संदूकची खोली।
उसमें उनके पति की दी हुई एक पुरानी सोने की चेन रखी थी।
वह उसे हाथ में लेकर काफी देर तक देखती रहीं।
उनकी आंखें भर आईं।
अगले ही पल उन्होंने चेन अजय के हाथ में रख दी।
"इसे बेच दो।"
अजय घबरा गया।
"मां! ये पिताजी की आखिरी निशानी है।"
शारदा देवी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"निशानी दिल में रहती है बेटा... संदूक में नहीं। अगर इस चेन से तुम्हारी परेशानी कम हो जाए, तो यही तुम्हारे पिता की सबसे बड़ी याद होगी।"
"नहीं मां... मैं इसे कभी नहीं बेचूंगा।"
शारदा देवी ने सख्त आवाज़ में कहा,
"अगर मेरे रहते मेरा बेटा चिंता में घुलता रहे, तो इस निशानी का क्या फायदा?"
अजय ने मां के पैर पकड़ लिए।
"आप मुझे मजबूर मत कीजिए।"
शारदा देवी की आंखों से भी आंसू बह निकले।
इसी बीच रेखा का फोन आया।
"भैया... तैयारियां कैसी चल रही हैं?"
अजय ने खुद को संभालते हुए कहा,
"सब ठीक है बहन।"
"देखना... इस बार कोई कमी नहीं होनी चाहिए।"
अजय कुछ पल चुप रहा।
वह सच बताना चाहता था...
लेकिन बहन की खुशी देखकर उसकी जुबान रुक गई।
"तुम बस शादी की तैयारी करो।"
इतना कहकर उसने फोन रख दिया।
दो दिन बाद अचानक अजय को दफ्तर में तेज चक्कर आ गया।
साथ काम करने वाले लोग उसे तुरंत अस्पताल ले गए।
डॉक्टर ने जांच के बाद कहा,
"दिल की बीमारी तो नहीं है, लेकिन तनाव बहुत ज्यादा है। अगर आपने चिंता कम नहीं की, तो हालत बिगड़ सकती है।"
सविता और शारदा देवी अस्पताल पहुंचीं।
डॉक्टर की बात सुनकर दोनों की आंखें भर आईं।
अजय पहली बार खुद से डर गया था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी सेहत बचाए या समाज की बनाई हुई रस्म निभाए।
उधर रेखा को भी अपने भाई की तबीयत खराब होने की खबर मिल चुकी थी।
फोन उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा।
उसके मन में पहली बार एक सवाल उठा—
"क्या मेरी जिद ही मेरे भाई की इस हालत की वजह तो नहीं?"
यही सवाल अब उसके दिल को अंदर ही अंदर कचोटने लगा...
"भैया... आपकी तबीयत कैसी है?"
रेखा की आवाज़ इस बार पहले जैसी नहीं थी। उसमें घबराहट और पछतावा साफ महसूस हो रहा था।
अजय ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"मैं बिल्कुल ठीक हूं बहन। डॉक्टर ने बस थोड़ा आराम करने को कहा है।"
"भैया... मेरी वजह से तो आपको इतना तनाव नहीं हुआ?"
अजय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
"पगली... भाई अपनी बहन के लिए अगर थोड़ा-बहुत सोच भी ले तो उसे तनाव नहीं कहते।"
रेखा की आंखें भर आईं।
उसे लगा जैसे उसका भाई आज भी उसकी हर चिंता अपने सिर पर लेने को तैयार है।
लेकिन उसने यह नहीं समझा था कि अब वही भाई पहले जैसा मजबूत नहीं रहा।
अस्पताल से घर लौटने के बाद डॉक्टर ने साफ हिदायत दी थी।
"इन्हें किसी भी तरह का मानसिक तनाव मत दीजिए। समय पर दवा, पूरा आराम और खुशहाल माहौल बहुत जरूरी है।"
सविता ने अजय के सामने शादी या पैसों की कोई बात करना बंद कर दिया।
शारदा देवी भी हर समय बेटे का ध्यान रखतीं।
लेकिन अजय के मन में वही चिंता घूम रही थी—
"अगर मैं बहन की उम्मीद पूरी नहीं कर पाया तो?"
उधर रेखा अपनी बेटी गुड़िया के कपड़े देख रही थी।
तभी उसकी सास कमरे में आईं।
"रेखा, सुनो... बारातियों के स्वागत की तैयारी पूरी हो गई?"
रेखा ने कपड़ों को तह करते हुए जवाब दिया,
"जी मांजी, लगभग सारी तैयारी हो चुकी है।"
कमला देवी ने फिर पूछा,
"और तुम्हारे मायके वालों से बात हुई?"
"जी..."
कमला देवी ने सहज भाव से अगला सवाल किया,
"इस बार तो अच्छा-खासा शगुन आएगा ना?"
रेखा ने नजरें झुका लीं। कुछ पल चुप रहने के बाद धीमे से बोली,
"जी... देखिए, भैया अपनी हैसियत के अनुसार जो भी करेंगे, वही हमारे लिए बहुत है।"
सास ने मुस्कुराकर कहा,
"अरे, हमें किसी चीज़ की लालच नहीं है। लेकिन समाज भी तो देखता है कि लड़की के ननिहाल से क्या आया।"
रेखा ने सिर्फ "जी" कहा।
लेकिन उसका दिल बैठ गया।
इसी बीच उसकी बेटी गुड़िया वहां आ गई।
उसने मां का उदास चेहरा देखा।
"मम्मी, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं बेटा।" रेखा ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा।
"आप मुझसे छिपा रही हैं। आपके चेहरे से साफ लग रहा है कि कोई बात आपको परेशान कर रही है।" गुड़िया ने मां का हाथ पकड़ते हुए कहा।
रेखा ने पहली बार अपनी बेटी को सारी बात बता दी।
गुड़िया चुपचाप सुनती रही।
फिर उसने मां का हाथ पकड़ लिया।
"मम्मी... क्या मामा जी हमारे लिए कर्ज लेंगे?"
रेखा ने कुछ नहीं कहा।
आंखों से आंसू बह निकले।
गुड़िया बोली,
"अगर ऐसा है, तो मुझे ऐसा शगुन बिल्कुल नहीं चाहिए।"
रेखा ने हैरानी से बेटी की तरफ देखा।
"बेटा... लोग क्या कहेंगे?"
गुड़िया मुस्कुराई।
"लोग तो कुछ भी कहेंगे। लेकिन अगर मेरी शादी की वजह से मामा जी की तबीयत खराब हो गई, तो मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी।"
रेखा पहली बार अपनी बेटी की बात सुनकर सोच में पड़ गई।
उसी रात वह बहुत देर तक सो नहीं सकी।
उसे एक-एक बात याद आने लगी।
जब उसकी शादी हुई थी...
अजय ने अपनी नई मोटरसाइकिल बेच दी थी ताकि उसकी विदाई अच्छे से हो सके।
जब उसके बेटे का जन्म हुआ था...
अजय सबसे पहले खिलौने और कपड़े लेकर पहुंचा था।
जब उसके पति का व्यापार घाटे में चला गया था...
तब भी अजय ने बिना किसी को बताए अपनी बचत उसे दे दी थी।
और आज...
वही भाई उसकी वजह से चिंता में बीमार पड़ गया था।
रेखा फूट-फूटकर रो पड़ी।
अगली सुबह उसने अपने पति राजेश से कहा,
"मुझे मायके जाना है।"
"अभी? शादी सिर पर है।" राजेश ने हैरानी से पूछा।
"हां... अभी जाना जरूरी है।" रेखा ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया।
राजेश ने उसकी आंखों में आंसू देखे तो कुछ नहीं पूछा।
रेखा सीधे अजय के घर पहुंची।
दरवाजा सविता ने खोला।
रेखा ने अंदर आते ही देखा—
अजय दवाइयों के साथ बैठा था।
चेहरा पहले से कमजोर लग रहा था।
उसे देखकर रेखा की आंखें भर आईं।
वह दौड़कर भाई के पास गई और उसके पैरों में बैठ गई।
"मुझे माफ कर दो भैया..."
अजय घबरा गया।
"अरे... ये क्या कर रही हो?"
रेखा रोते हुए बोली,
"मैंने अपनी झूठी इज्जत बचाने के लिए तुम्हें चिंता में डाल दिया।"
"ऐसी बात मत कर।"
"नहीं भैया... गलती मेरी थी। मुझे पता था कि तुम्हारे ऊपर पहले से जिम्मेदारियां हैं। फिर भी मैं समाज के डर से तुम्हारे सामने ऐसी बातें करती रही।"
शारदा देवी भी बाहर आ गईं।
उन्होंने बेटी को उठाया।
रेखा मां के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।
"अम्मा... मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी।"
शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
"गलती मान लेना ही सबसे बड़ी समझदारी है बेटी।"
रेखा ने अपने पर्स से एक लिफाफा निकाला।
उसमें शादी का निमंत्रण था।
उसने अजय के हाथ में देते हुए कहा,
"भैया... शादी में तुम बस अपने परिवार के साथ आना।"
अजय ने हैरानी से बहन की ओर देखा।
"और शगुन?" अजय ने धीमे स्वर में पूछा।
रेखा मुस्कुराई।
"मुझे कोई शगुन नहीं चाहिए।"
अजय ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
रेखा बोली,
"मेरी बेटी को उसके मामा का प्यार चाहिए... सामान नहीं।"
सविता की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।
लेकिन रेखा ने अभी तक अपनी ससुराल में यह फैसला नहीं बताया था।
उसे पता था...
असली परीक्षा अब शुरू होने वाली है।
"क्या मतलब... मायके से मामेरा नहीं आएगा?"
रेखा की जेठानी सुनीता ने हैरानी से पूछा।
बैठक में शादी की तैयारियों को लेकर सभी लोग बैठे थे।
रेखा ने शांत स्वर में कहा,
"शगुन आएगा... लेकिन हमारी जरूरत और उनकी हैसियत के अनुसार। दिखावे के लिए किसी पर बोझ नहीं डालेंगे।"
सुनीता हंस पड़ी।
"वाह! अब नई-नई बातें भी होने लगीं। लोग क्या कहेंगे कि लड़की के मामा खाली हाथ आ गए?"
रेखा ने पहली बार बिना घबराए जवाब दिया,
"जो लोग सामान देखकर रिश्तों की कीमत लगाते हैं, उन्हें कुछ भी कहने दीजिए।"
इतने में उसकी सास भी वहां आ गईं।
उन्होंने पूछा,
"क्या बात हो रही है?"
सुनीता ने तुरंत कहा,
"मांजी, रेखा कह रही है कि उसके मायके से इस बार कोई बड़ा शगुन नहीं आएगा।"
सास ने रेखा की ओर देखा।
"क्या यह सच है?"
रेखा ने बिना झिझक कहा,
"जी मांजी।"
"लेकिन क्यों?"
रेखा की आंखें नम हो गईं।
"क्योंकि मेरी जिद की वजह से मेरे भाई की तबीयत बिगड़ गई थी। डॉक्टर ने साफ कहा है कि उन्हें तनाव से दूर रखना होगा। मैं अपनी बेटी की शादी की खुशी किसी अपने की परेशानी पर खड़ी नहीं कर सकती।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
रेखा ने आगे कहा,
"मेरे भाई ने बचपन से लेकर आज तक मेरी हर खुशी का ध्यान रखा है। अब मेरी बारी है कि मैं उनकी मजबूरी समझूं।"
उसकी सास कुछ देर तक चुप रहीं।
फिर धीरे से बोलीं,
"हमें तो किसी सामान की जरूरत नहीं है, रेखा। हमें तो सिर्फ अपनी बेटी की खुशी चाहिए। अगर तुम्हारे भाई अपनी क्षमता के अनुसार कुछ लाएंगे, वही हमारे लिए सम्मान की बात होगी।"
सुनीता को अपनी बात पर शर्म आने लगी।
उसने नजरें झुका लीं।
उधर अजय के घर भी शादी की तैयारी शुरू हो गई थी।
सविता ने बड़े प्यार से एक सुंदर साड़ी खरीदी।
शारदा देवी ने अपनी नातिन के लिए चांदी की छोटी-सी पायल निकलवाई।
अजय ने अपनी बचत में से एक साधारण-सा लिफाफा तैयार किया।
वह उसे देखते हुए बोला,
"काश... थोड़ा और कर पाता।"
सविता मुस्कुराई।
"जो प्यार से दिया जाए, वही सबसे बड़ा उपहार होता है।"
शारदा देवी ने भी कहा,
"बेटा, देने वाले की नीयत बड़ी होनी चाहिए, रकम नहीं।"
अजय के चेहरे पर महीनों बाद सुकून दिखाई दिया।
शादी का दिन आ गया।
अजय, सविता, शारदा देवी और दोनों बेटियां सादे लेकिन साफ-सुथरे कपड़ों में विवाह स्थल पहुंचे।
रेखा दूर से ही उन्हें देखकर दौड़ पड़ी।
उसने सबसे पहले मां के पैर छुए।
फिर भाई के गले लग गई।
"भैया... अब मेरी शादी पूरी हुई है।"
अजय मुस्कुराया।
"अरे पगली, शादी तो गुड़िया की है।"
रेखा की आँखें भर आईं। उसने अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराकर कहा,
"नहीं... आज मुझे अपना मायका फिर से मिल गया।"
इतने में गुड़िया भी आ गई।
उसने अपने मामा के पैर छुए और बोली,
"मामा जी, आपके आने से मुझे दुनिया का सबसे बड़ा आशीर्वाद मिल गया।"
अजय की आंखें भर आईं।
उसने अपनी जेब से छोटा-सा लिफाफा निकाला।
"बेटी, यह हमारी तरफ से छोटा-सा आशीर्वाद है।"
गुड़िया ने बिना खोले ही दोनों हाथों से लिफाफा अपने माथे से लगा लिया।
"मेरे लिए यह अनमोल है।"
यह दृश्य देखकर आसपास खड़े कई रिश्तेदार भावुक हो गए।
लेकिन तभी एक रिश्तेदार ने धीरे से कहा,
"बस... इतना ही शगुन लाए हैं?"
उसकी आवाज़ अजय के कानों तक पहुंच गई।
वह एक पल के लिए असहज हो गया।
रेखा ने भी वह बात सुन ली...
और उसने वहीं सबके सामने ऐसा जवाब दिया कि पूरा मंडप तालियों से गूंज उठा।
"बस... इतना ही शगुन लाए हैं?"
रिश्तेदार की बात सुनते ही कुछ लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
अजय ने शर्मिंदगी में अपनी नजरें झुका लीं।
उसे लगा कि शायद उसकी बहन को फिर से सबके सामने ताने सुनने पड़ेंगे।
लेकिन अगले ही पल रेखा आगे बढ़ी।
उसने उस रिश्तेदार की ओर देखा और शांत आवाज़ में बोली,
"जी नहीं... मेरे मायके से सिर्फ इतना नहीं आया है।"
सभी की नजरें रेखा पर टिक गईं।
रेखा ने अपने भाई का हाथ पकड़ लिया और बोली,
"मेरे मायके से मेरी मां का आशीर्वाद आया है... मेरे भाई का प्यार आया है... मेरी भाभी का स्नेह आया है... और मेरी भतीजियों की शुभकामनाएं आई हैं।"
"अगर इन्हें छोड़कर सिर्फ सोने-चांदी और पैसों को शगुन कहते हैं, तो मुझे ऐसा शगुन कभी नहीं चाहिए।"
पूरा मंडप बिल्कुल शांत हो गया।
रेखा की आंखों से आंसू बह रहे थे।
वह आगे बोली,
"कुछ महीने पहले मैं भी यही सोचती थी कि बड़ा शगुन ही सम्मान दिलाता है। लेकिन जब मेरे भाई की चिंता ने उनकी सेहत छीन ली, तब मुझे समझ आया कि दिखावे की कीमत सबसे पहले अपना परिवार चुकाता है।"
अजय की आंखें भर आईं।
सविता चुपचाप आंसू पोंछ रही थी।
शारदा देवी हाथ जोड़कर भगवान का धन्यवाद कर रही थीं।
उसी समय रेखा की सास अपनी जगह से उठीं।
उन्होंने अजय के पास आकर उसका हाथ थाम लिया।
"बेटा, हमें माफ करना। अगर हमारे घर की किसी बात से तुम्हें यह लगा कि हमें सामान चाहिए, तो यह हमारी गलती है।"
अजय ने तुरंत हाथ जोड़ दिए।
"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।"
सास ने मुस्कुराते हुए कहा,
"आज तुमने नहीं... तुम्हारी बहन ने हम सबको एक बहुत बड़ी सीख दी है।"
उन्होंने वह लिफाफा वापस अजय की ओर बढ़ा दिया।
अजय घबरा गया।
"नहीं... यह तो हमारी तरफ से आशीर्वाद है।"
सास बोलीं,
"आशीर्वाद वापस नहीं कर रही हूं। बस इसमें जितना भी पैसा है, उतना अपनी छोटी बेटी की शादी के लिए बचाकर रखो। हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारे रिश्ते की जरूरत है।"
यह सुनते ही वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए।
गुड़िया भी अपनी नानी के गले लग गई।
"नानी, मुझे गर्व है कि मैं ऐसे परिवार की बेटी हूं जहां रिश्ते पैसों से बड़े हैं।"
इतने में रेखा की जेठानी सुनीता भी आगे आई।
उसकी आंखें झुकी हुई थीं।
"रेखा... मुझे माफ कर दो। मैंने कई बार तुम्हें शगुन को लेकर ताने दिए। आज समझ आया कि इंसान की पहचान उसके लाए हुए सामान से नहीं, उसके संस्कारों से होती है।"
रेखा ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।
"दीदी, गलती हम सबसे होती है। जरूरी यह है कि समय रहते हम उसे समझ लें।"
शादी की सारी रस्में हंसी-खुशी पूरी हुईं।
विदाई का समय आया तो गुड़िया सबसे पहले अपने मामा के पास पहुंची।
उसने अजय के पैर छुए और बोली,
"मामा जी, मैं वादा करती हूं कि अपने नए घर में कभी किसी से उसके मायके की हैसियत के आधार पर सम्मान या अपमान नहीं करूंगी।"
अजय ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बस बेटा, यही हमारी सबसे बड़ी कमाई है।"
विदाई के बाद जब अजय अपने घर लौट रहा था, उसके मन में महीनों से चला आ रहा बोझ पूरी तरह उतर चुका था।
शारदा देवी मुस्कुराते हुए बोलीं,
"देखा बेटा... सच और अपनापन कभी किसी के सामने छोटा नहीं पड़ता।"
अजय ने मां का हाथ पकड़ लिया।
"आपने सही कहा था, मां। रिश्ते निभाने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए, जेब नहीं।"
सविता भी मुस्कुरा रही थी।
उसे लग रहा था कि आज उनका परिवार सिर्फ एक शादी से नहीं लौटा...
बल्कि एक गलत परंपरा के बोझ से भी मुक्त होकर लौटा है।
सीख:
दिखावे के लिए निभाई जाने वाली रस्में कभी भी रिश्तों से बड़ी नहीं हो सकतीं। मायके वालों का प्यार, साथ और आशीर्वाद किसी भी महंगे शगुन से कहीं अधिक अनमोल होता है। रिश्तों की कीमत पैसों से नहीं, संवेदनाओं और सम्मान से तय होती है।

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