जब अपने ही घर ने ठुकराया

 

Indian woman standing confidently in her parental home while her brother and sister-in-law react emotionally during a family confrontation


“जिस घर की चौखट पर मैंने बचपन बिताया था, आज उसी घर में मेरे लिए जगह नहीं है।”


सुमन ने यह बात अपने मन में कही और चुपचाप दरवाजे के पास रखी अपनी छोटी-सी थैली उठाकर अंदर चली गई।


उसकी आँखों के सामने उसका पुराना घर था।


वही आँगन…


वही दीवारें…


वही नीम का पेड़…


जिसके नीचे बैठकर वह अपने भाई के साथ बचपन में खेला करती थी।


लेकिन घर वही था, लोग बदल चुके थे।


सुमन की शादी को सात साल हो चुके थे।


शादी के बाद उसने सोचा था कि उसका अपना घर होगा। पति होगा, परिवार होगा और वह अपनी जिंदगी प्यार और सम्मान के साथ बिताएगी।


लेकिन उसकी उम्मीदें धीरे-धीरे टूटती चली गईं।


उसका पति राकेश छोटी-सी बात पर भी उस पर गुस्सा करता था।


अगर खाना थोड़ा देर से बनता तो ताना मिलता—


“तुम्हें घर चलाना भी नहीं आता।”


अगर सुमन बीमार पड़ जाती तो सास कहती—


“नाटक करने की जरूरत नहीं है। हमारे जमाने में औरतें बीमारी में भी काम करती थीं।”


अगर वह अपने मायके फोन करती तो पति नाराज हो जाता।


“बार-बार मायके जाने की जरूरत क्या है? अब वही तुम्हारा घर नहीं है।”


सुमन हर बार चुप हो जाती।


वह अपने माता-पिता को परेशान नहीं करना चाहती थी।


उसे डर था कि अगर उसने अपनी परेशानी बताई तो माँ-बाप चिंता में बीमार हो जाएंगे।


इसलिए वह हर दुख अपने अंदर दबाती रही।


उसने सोचा था कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।


लेकिन समय के साथ सब ठीक नहीं हुआ।


बल्कि हालात और खराब होते गए।


एक दिन राकेश ने गुस्से में सुमन को घर से निकल जाने के लिए कह दिया।


सुमन ने सोचा था कि शायद वह उसे रोक लेगा।


शायद कहेगा—


“गुस्से में बोल दिया, वापस आ जाओ।”


लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।


सुमन ने अपनी कुछ जरूरी चीजें एक थैले में रखीं और बिना किसी से शिकायत किए घर से निकल गई।


उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे।


न कोई सहारा था।


न कोई ऐसी जगह थी जहाँ जाकर वह निश्चिंत होकर रह सके।


उसने बस एक ही बात सोची—


“मेरा मायका तो है।”


उसे याद था कि उसके पिता हमेशा कहा करते थे—


“बेटी, यह घर जितना बेटों का है, उतना ही तुम्हारा भी है। जब भी जरूरत पड़े, बिना डर के आ जाना।”


लेकिन उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे।


माँ भी कुछ साल पहले गुजर चुकी थीं।


फिर भी सुमन को भरोसा था कि उसका भाई अमित उसे जरूर अपनाएगा।


आखिर वह उसका अपना भाई था।


वह उसी घर में पली-बढ़ी थी।


लेकिन जब सुमन घर पहुँची तो दरवाजा उसकी भाभी कविता ने खोला।


कविता ने सुमन को ऊपर से नीचे तक देखा।


फिर बोली—


“अरे, तुम?”


सुमन ने धीमी आवाज में कहा—


“भाभी… मैं कुछ दिनों के लिए यहाँ रहना चाहती हूँ।”


कविता के चेहरे पर खुशी नहीं आई।


उसने बस इतना कहा—


“अंदर आ जाओ।”


सुमन अंदर आ गई।


उसे लगा कि भाई उसे देखकर खुश होगा।


लेकिन अमित ने भी उसे देखकर सिर्फ इतना पूछा—


“क्या हुआ?”


सुमन ने अपनी आँखें नीचे कर लीं।


“मैं वहाँ वापस नहीं जाना चाहती।”


अमित कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला—


“तुम्हारी और राकेश की लड़ाई हुई है?”


सुमन ने सिर हिला दिया।


“मैं बहुत परेशान हो चुकी हूँ भैया।”


अमित ने गहरी साँस ली।


“कुछ दिन रह लो।”


सुमन के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी राहत दिखाई दी।


उसे लगा कि शायद उसका घर अभी भी उसका है।


लेकिन वह राहत ज्यादा दिनों तक नहीं रही।


कविता को सुमन का घर में रहना पसंद नहीं था।


वह छोटी-छोटी बातों पर ताने देने लगी।


कविता (भाभी) ने ताना मारते हुए कहा—

“इतने लोगों का खर्च पहले ही मुश्किल से चलता है।”


कविता ने नाराज़गी भरे स्वर में कहा—

“तुम्हें भी समझना चाहिए कि घर में खर्च बढ़ जाता है।”


कुछ देर बाद कविता ने फिर पूछा—

“कब तक रहोगी यहाँ?”


सुमन हर बात सुनकर चुप रहती।


वह घर के काम में हाथ बँटाती।


सुबह उठकर खाना बनाती।


बर्तन साफ करती।


कपड़े धोती।


बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती।


फिर भी कविता को शिकायत रहती।


एक दिन कविता ने कहा—


“तुम यहाँ रहने आई हो या घर की मालकिन बनने?”


सुमन चुप हो गई।


उसने सिर्फ इतना कहा—


“भाभी, मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती।”


कविता हँसकर बोली—


“तो फिर चली क्यों नहीं जाती?”


यह बात सुमन के दिल में तीर की तरह लगी।


लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।


वह जानती थी कि उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी।


ससुराल में उसका सम्मान नहीं था।


मायके में अपनापन नहीं था।


उसकी जिंदगी जैसे दो दरवाजों के बीच फँस गई थी।


एक तरफ वह घर था जहाँ उसे बहू होने के नाम पर हर दिन अपमान मिलता था।


दूसरी तरफ वह घर था जहाँ बेटी होने के बावजूद उसे बोझ समझा जा रहा था।


सुमन कई रातों तक अपने कमरे में बैठकर सोचती रही—


“क्या सच में मेरा कोई घर नहीं है?”


“क्या शादी के बाद बेटी का अपने मायके पर कोई अधिकार नहीं रहता?”


“क्या बेटी सिर्फ तब तक अपनी होती है, जब तक वह अपने माता-पिता के घर में रहती है?”


उसके मन में बहुत सारे सवाल थे।


लेकिन जवाब कोई नहीं था।


एक दिन सुमन ने पुराने संदूक को साफ करते हुए अपने पिता की कुछ चीजें देखीं।


एक पुरानी घड़ी…


कुछ कागज…


और एक पुरानी डायरी।


उसने डायरी खोली।


उसमें उसके पिता ने परिवार की संपत्ति और घर से जुड़ी कई बातें लिखी थीं।


सुमन पढ़ती गई।


उसे पता चला कि उसके पिता ने अपनी संपत्ति में बच्चों के अधिकार को लेकर कागज बनवाए थे।


सुमन को अपने पिता की एक बात याद आ गई—


“बेटी को सिर्फ विदा करने से पिता का फर्ज खत्म नहीं होता। बेटी का सम्मान और उसका अधिकार भी उतना ही जरूरी है।”


सुमन की आँखें भर आईं।


उसे पहली बार समझ आया कि पिता ने उसे सिर्फ प्यार ही नहीं दिया था।


उन्होंने उसके भविष्य के बारे में भी सोचा था।


अगले दिन सुमन ने अपने पिता के पुराने परिचित वकील शर्मा जी से मिलने का फैसला किया।


उसने उनसे सारी बात बताई।


शर्मा जी ने उसके कागज देखे और बोले—


“बेटी, अपने अधिकार के बारे में जानकारी रखना गलत नहीं है। अधिकार माँगना भीख माँगना नहीं होता।”


सुमन ने पूछा—


“लेकिन अगर मेरा भाई नाराज हो गया तो?”


शर्मा जी ने शांत आवाज में कहा—


“रिश्ता बचाने के लिए अपने अधिकार छोड़ देना हमेशा समझदारी नहीं होती। कभी-कभी सच बोलना ही रिश्ते की असली परीक्षा होती है।”


सुमन घर लौट आई।


उसने किसी से कुछ नहीं कहा।


वह अब भी पहले की तरह घर के काम करती रही।


लेकिन उसके अंदर कुछ बदल चुका था।


अब वह डरती नहीं थी।


उसे अपने अधिकार का मतलब समझ आने लगा था।


कुछ दिनों बाद कविता ने फिर वही बात शुरू कर दी।


“सुमन, अब बहुत हो गया। कब तक यहाँ बैठकर खाओगी?”


सुमन ने शांत आवाज में कहा—


“भाभी, मैं घर के काम में पूरा हाथ बँटाती हूँ।”


कविता बोली—


“काम करने से क्या होता है? आखिर खर्च तो बढ़ता ही है।”


सुमन चुप रही।


कविता ने गुस्से में कहा—


“तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारे लिए क्या छोड़ा है? कुछ है भी या बस भाई के घर पर अधिकार जमाने चली आई हो?”


इस बार सुमन ने सिर नहीं झुकाया।


उसने धीरे से कहा—


“मेरे माता-पिता ने मुझे बेटी बनाया था। यही सबसे बड़ा हिस्सा है।”


कविता हँसने लगी।


“बड़ी आई हिस्सा माँगने वाली।”


फिर उसने ऐसी बात कह दी जिसे सुनकर सुमन का दिल टूट गया।


“यह घर तुम्हारे बाप का नहीं है।”


सुमन कुछ क्षण तक उसे देखती रही।


फिर उसने बहुत शांत आवाज में कहा—


“भाभी, यही बात आपने गलत कही है।”


कविता चुप हो गई।


सुमन ने आगे कहा—


“यह घर सच में मेरे पिता का था।”


“मैंने इस घर में बचपन बिताया है।”


“मेरे पिता ने मुझे कभी यह नहीं कहा था कि शादी के बाद तुम इस घर की बेटी नहीं रहोगी।”


अमित भी वहाँ आ चुका था।


वह दोनों की बात सुन रहा था।


सुमन ने भाई की तरफ देखा।


उसकी आँखों में शिकायत नहीं थी।


सिर्फ दर्द था।


“भैया, मैं तुम्हारा घर छीनने नहीं आई हूँ।”


“मैं तुम्हारे हिस्से पर कब्जा करने नहीं आई हूँ।”


“मैं सिर्फ अपने पिता के उस अधिकार की बात कर रही हूँ, जिसे उन्होंने अपनी बेटी होने के नाते मेरे लिए छोड़ा था।”


अमित कुछ नहीं बोला।


सुमन ने कहा—


“जब मेरी शादी हुई थी, तब आपने कहा था कि अब मेरा घर मेरा ससुराल है।”


“मैंने आपकी बात मान ली।”


“मैंने अपने ससुराल को अपना घर बनाने की पूरी कोशिश की।”


“लेकिन जब वहाँ मुझे सम्मान नहीं मिला, तो मैं अपने मायके आई।”


“और यहाँ भी मुझे कहा गया कि यह मेरा घर नहीं है।”


उसकी आवाज काँपने लगी।


“भैया, अगर बेटी का मायका उसके दुख में उसके साथ नहीं खड़ा होगा तो वह कहाँ जाएगी?”


घर में सन्नाटा छा गया।


कविता पहली बार कुछ नहीं बोल पाई।


अमित की आँखें नीचे झुक गईं।


उसे बचपन की सारी बातें याद आने लगीं।


वही बहन जो उसके लिए स्कूल की कॉपी सँभालकर रखती थी।


वही बहन जो उसके लिए राखी बाँधती थी।


वही बहन जो पिता से उसकी गलती छिपा देती थी।


वही बहन जो अपनी पसंद की चीज छोड़कर उसके लिए मिठाई बचाकर रखती थी।


अमित को अचानक महसूस हुआ कि उसकी बहन आज भी वही है।


बस जिंदगी ने उसे बहुत थका दिया है।


अमित धीरे से बोला—


“सुमन…”


सुमन ने उसकी तरफ देखा।


“मुझे माफ कर दे।”


सुमन की आँखों से आँसू निकल पड़े।


अमित ने कहा—


“तू मेरे लिए कभी बोझ नहीं थी।”


“मैं बस अपनी जिंदगी और घर के झगड़ों में इतना उलझ गया कि तेरी परेशानी देख ही नहीं पाया।”


कविता भी चुप खड़ी थी।


कुछ देर बाद उसने भी कहा—


“सुमन… मैंने गुस्से में बहुत कुछ कह दिया।”


सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया।


कविता ने आगे कहा—


“मुझे डर था कि तुम्हारे आने से घर का खर्च बढ़ जाएगा। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि तुम किस हालत में यहाँ आई हो।”


सुमन ने धीरे से कहा—


“भाभी, मुझे किसी की दया नहीं चाहिए।”


“मुझे बस सम्मान चाहिए।”


कविता की आँखें भी नम हो गईं।


उसने सुमन का हाथ पकड़ लिया।


“तुम्हें दया नहीं मिलेगी।”


“तुम्हें अपना घर मिलेगा।”


उस दिन घर का माहौल बदल गया।


लेकिन सुमन ने सिर्फ भावनाओं के भरोसे अपना भविष्य नहीं छोड़ा।


उसने अपने अधिकार से जुड़े कागजों की प्रक्रिया पूरी की।


अमित ने भी उसका साथ दिया।


दोनों भाई-बहन ने तय किया कि माता-पिता की छोड़ी हुई संपत्ति का बंटवारा न्याय और कानून के अनुसार होगा।


सुमन ने अपने हिस्से में मिले पैसे से एक छोटा-सा घर किराए पर लिया।


फिर उसने सिलाई का काम शुरू किया।


धीरे-धीरे उसके पास ग्राहक आने लगे।


उसने घर से कपड़े सिलने शुरू किए।


कुछ महीनों में उसने एक छोटी-सी दुकान खोल ली।


जो सुमन कभी अपने जीवन को लेकर दूसरों पर निर्भर थी, वही सुमन अब अपने पैरों पर खड़ी होने लगी।


एक दिन उसकी पुरानी सहेली उससे मिलने आई।


उसने पूछा—


“तू इतनी बदल कैसे गई?”


सुमन मुस्कुराई।


“पहले मुझे लगता था कि कोई मुझे अपनाएगा, तभी मेरी जिंदगी ठीक होगी।”


“अब समझ आया है कि सबसे पहले इंसान को खुद को अपनाना पड़ता है।”


सहेली ने पूछा—


“और राकेश?”


सुमन कुछ देर चुप रही।


फिर बोली—


“उसने वापस आने के लिए कहा था।”


“लेकिन मैंने साफ कह दिया कि मैं उस घर में तभी जाऊँगी जहाँ मेरी इज्जत होगी।”


“मैंने शादी बचाने की कोशिश की थी, लेकिन अपनी जिंदगी खोकर नहीं।”


सुमन ने पीछे मुड़कर अपने सफर को देखा।


वह लड़की जो कभी हर बात पर चुप हो जाती थी…


आज अपने फैसले खुद ले रही थी।


उसे समझ आ चुका था कि घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता।


घर वहाँ होता है जहाँ इंसान को सम्मान मिले।


जहाँ उसके आँसू छिपाने की जरूरत न पड़े।


जहाँ उसे अपने होने के लिए सफाई न देनी पड़े।


और सबसे जरूरी बात—


बेटी शादी के बाद किसी घर से खत्म नहीं हो जाती।


उसका रिश्ता अपने माता-पिता से खत्म नहीं होता।


उसका सम्मान खत्म नहीं होता।


और अपने अधिकार के लिए आवाज उठाना किसी रिश्ते के खिलाफ जाना नहीं है।


कभी-कभी अपने लिए खड़ा होना ही जिंदगी की सबसे बड़ी शुरुआत होती है।


सुमन ने अपने छोटे-से घर की खिड़की खोली।


बाहर हवा चल रही थी।


उसने मन ही मन अपने पिता से कहा—


“बाबा, आपने कहा था कि यह घर मेरा भी है।”


“आज मैंने समझ लिया कि आपका दिया हुआ सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ जमीन या मकान नहीं था…”


“आपने मुझे अपने पैरों पर खड़े होने का हक दिया था।”


उसकी आँखों में आँसू थे।


लेकिन इस बार वे आँसू कमजोरी के नहीं थे।


वे उस बेटी की जीत के आँसू थे जिसने बहुत कुछ खोने के बाद खुद को पा लिया था।


कहते हैं—


औरत को कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल है।


वह बहुत कुछ सह सकती है…


लेकिन जब उसे अपने सम्मान और अधिकार के लिए खड़ा होना पड़ता है,


तो उसकी आवाज सिर्फ एक घर नहीं…


पूरे समाज को आईना दिखा सकती है।


क्योंकि बेटी किसी घर का बोझ नहीं होती।


वह उस घर की बराबर की संतान होती है, जहाँ उसके माता-पिता ने उसे जन्म दिया, प्यार दिया और अपना नाम दिया।



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