बंद दरवाजा, खुला रिश्ता
"जिस बहन के लिए मायके का दरवाजा बंद किया था, उसी ने मुसीबत में भाई का घर बचा लिया"
गाँव की पुरानी हवेली में रिश्तों को लेकर ऐसा तनाव पैदा हो गया था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
हवेली बहुत बड़ी थी। आँगन के बीचों-बीच एक पुराना नीम का पेड़ था, जिसकी छाँव में बैठकर परिवार के लोग सालों से अपने सुख-दुख बाँटते आए थे। इसी हवेली में रघुवीर सिंह अपने दोनों बेटों—सुमित और समीर—के साथ रहते थे।
रघुवीर सिंह की पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था।
उस समय समीर बहुत छोटा था और सुमित भी अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। घर की जिम्मेदारी अचानक बड़ी बेटी नंदिनी के कंधों पर आ गई थी।
नंदिनी की शादी हो चुकी थी, लेकिन शादी के बाद भी उसने मायके से अपना रिश्ता कभी कम नहीं होने दिया।
वह जब भी आती, सबसे पहले पिता के कमरे में जाती, फिर रसोई में जाकर कुछ बना देती और आखिर में अपने दोनों भाइयों से बैठकर देर तक बातें करती।
समीर तो अपनी बहन को माँ जैसा ही मानता था।
उसे आज भी याद था कि जब वह बचपन में बीमार पड़ा था, तब नंदिनी पूरी रात उसके सिरहाने बैठी रही थी।
जब स्कूल की फीस भरने के लिए पैसे कम पड़ गए थे, तब नंदिनी ने अपनी पसंद की साड़ी तक नहीं खरीदी थी।
लेकिन शादी के बाद घर में आई नई बहू काव्या इन बातों को उस नजर से नहीं देखती थी।
काव्या को लगता था कि नंदिनी जरूरत से ज्यादा मायके आती है।
शुरुआत में उसने अपनी बात सीधे नहीं कही।
वह छोटी-छोटी बातों पर नाराज होने लगी।
नंदिनी अपने बच्चों के साथ आती तो काव्या का चेहरा उतर जाता।
नंदिनी रसोई में कुछ बनाने लगती तो काव्या कहती,
“दीदी, रहने दीजिए, मैं कर लूँगी।”
लेकिन उसकी आवाज में अपनापन नहीं होता था।
एक दिन नंदिनी ने हँसते हुए कहा,
“काव्या, तुम अकेली इतना काम क्यों करोगी? मैं भी तो घर की बेटी हूँ।”
काव्या मुस्कुराई जरूर, लेकिन उसके मन में बात चुभ गई।
उसने मन ही मन सोचा,
“शादी हो जाने के बाद भी इन्हें यह घर अपना ही लगता है।”
धीरे-धीरे काव्या ने समीर के कान भरने शुरू कर दिए।
वह कहती,
“तुम्हारी बहन जब आती हैं तो घर का पूरा माहौल बदल जाता है।”
समीर समझाता,
“काव्या, वह मेरी बहन हैं। माँ के जाने के बाद उन्होंने ही मुझे संभाला है।”
काव्या चुप हो जाती।
लेकिन उसके मन की नाराजगी कम नहीं होती।
कुछ महीनों बाद नंदिनी अपने बच्चों के साथ कई दिनों के लिए मायके आई।
उसके बच्चे आँगन में खेल रहे थे।
नंदिनी पिता के लिए दवा लेकर आई थी और रसोई में जाकर खाना बनाने लगी।
काव्या ने समीर को अलग बुलाकर कहा,
“अब यह रोज-रोज का सिलसिला बंद होना चाहिए।”
समीर ने हैरानी से पूछा,
“क्या हुआ?”
काव्या ने नाराज होकर कहा,
“तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता? जब दीदी आती हैं तो हमारा कमरा और रसोई बच्चों से भर जाती है।”
समीर ने समझाते हुए कहा,
“काव्या, कुछ दिनों की ही तो बात है।”
काव्या ने कहा,
“नहीं समीर, मुझे अपना अलग संसार चाहिए।”
समीर ने समझाने की कोशिश की, लेकिन काव्या ने इस बार साफ कह दिया,
“अगर इस घर में मेरी कोई बात नहीं मानी जाएगी, तो मैं अपने मायके चली जाऊँगी।”
रघुवीर सिंह ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने काव्या को समझाया।
“बेटी, घर दीवारों से नहीं चलता। तुम नई हो, धीरे-धीरे सब समझ जाओगी।”
काव्या ने सिर झुका लिया।
लेकिन कुछ दिनों बाद उसने एक नई मांग रख दी।
“हवेली के बीच में दीवार बनवा दीजिए।”
रघुवीर सिंह जैसे पत्थर के हो गए।
“दीवार?”
“हाँ। हर किसी को अपनी जगह मिल जाएगी।”
सुमित ने कहा,
“काव्या, यह घर हमारे माता-पिता ने बनाया था। इसे इस तरह मत बाँटो।”
काव्या बोली,
“मैं किसी का हिस्सा नहीं छीन रही। बस अपना हिस्सा अलग चाहती हूँ।”
समीर अब भी असमंजस में था।
एक तरफ बहन थी, दूसरी तरफ पत्नी।
आखिरकार उसने पत्नी की बात मान ली।
मिस्त्री बुलाए गए।
जिस आँगन में कभी पूरा परिवार साथ बैठता था, उसी आँगन के बीच ईंटें रखी जाने लगीं।
नंदिनी चुपचाप खड़ी सब देखती रही।
उसकी आँखें भर आईं।
उसने समीर से सिर्फ इतना पूछा,
“भैया, सच में यह जरूरी है?”
समीर उसकी आँखों में नहीं देख पाया।
उसने धीरे से कहा,
“दीदी, बस कुछ समय के लिए सब ठीक हो जाएगा।”
नंदिनी मुस्कुरा दी।
“ठीक है भैया। अगर तुम्हें यही सही लगता है, तो मैं कुछ नहीं कहूँगी।”
दीवार बन गई।
हवेली दो हिस्सों में बँट गई।
कुछ समय बाद काव्या ने मुख्य दरवाजे पर भी अपना ताला लगवा लिया।
अब नंदिनी को उस हिस्से में जाने के लिए पहले अनुमति लेनी पड़ती थी।
एक बार भाई दूज पर नंदिनी राखी और मिठाई लेकर आई।
वह पुराने दरवाजे तक पहुँची तो वहाँ नया ताला लगा था।
वह कुछ पल तक उस ताले को देखती रही।
फिर उसने आवाज लगाई,
“समीर भैया!”
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
उसने फिर पुकारा,
“भैया, मैं हूँ।”
काव्या अंदर खड़ी थी।
उसने समीर की ओर देखा और कहा,
“आज अगर दरवाजा खोल दिया तो फिर रोज यही होगा।”
समीर चुप रहा।
नंदिनी को आखिर समझ आ गया कि उसके लिए दरवाजा नहीं खोला जाएगा।
उसने मिठाई का डिब्बा दरवाजे के पास रखा और बोली,
“भैया, भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।”
इतना कहकर वह लौट गई।
समीर खिड़की के पीछे खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।
उसके भीतर कुछ टूट रहा था।
लेकिन उसने पत्नी के डर के कारण बहन को रोकने की हिम्मत नहीं की।
समय गुजरता गया।
नंदिनी ने मायके आना लगभग बंद कर दिया।
वह पिता से फोन पर बात कर लेती थी।
सुमित से भी कभी-कभी बात होती थी।
लेकिन समीर से उसका रिश्ता जैसे किसी अनकही दीवार के पीछे चला गया था।
उधर काव्या को लगता था कि उसने घर में अपनी जगह बना ली है।
कुछ वर्षों में उनके बेटे आरव का जन्म हुआ।
आरव बहुत चंचल बच्चा था।
लेकिन जन्म के बाद काव्या की दुनिया पूरी तरह बदल गई।
उसका अधिकांश समय बच्चे की देखभाल में बीतने लगा।
समीर नौकरी के कारण अक्सर बाहर रहता था।
रघुवीर सिंह और सुमित अपने हिस्से में रहते थे।
नंदिनी दूर होकर भी आरव के लिए कपड़े, खिलौने और किताबें भेजती रहती थी।
काव्या उन चीजों को देखकर भी कुछ नहीं कहती।
वह मन ही मन सोचती,
“दिखावा है। जब जरूरत थी तब तो दरवाजा बंद कर दिया था।”
फिर एक दिन ऐसा आया, जब समीर की जिंदगी अचानक संकट में फँस गई।
समीर बाजार से लौट रहा था कि रास्ते में उसकी बाइक फिसल गई।
वह बुरी तरह घायल हो गया।
लोगों ने उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया।
काव्या को खबर मिली तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह बच्चे को लेकर अस्पताल पहुँची।
डॉक्टरों ने बताया कि समीर की हालत गंभीर है और उसे तुरंत बड़े शहर के अस्पताल ले जाना होगा।
काव्या के हाथ-पाँव फूल गए।
बारिश के कारण सड़कें खराब थीं।
गाँव से शहर जाने वाला रास्ता भी कई जगह बंद था।
जिस व्यक्ति को उसने सबसे अपना माना था, वही जिंदगी और मौत के बीच था।
काव्या अस्पताल के बाहर बैठकर रो रही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।
तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
काव्या ने पीछे मुड़कर देखा।
वह नंदिनी थी।
उसकी आँखों में चिंता थी।
उसने बिना कुछ पूछे कहा,
“समीर कहाँ है?”
काव्या कुछ बोल नहीं पाई।
उसने सिर्फ सामने इशारा कर दिया।
नंदिनी तुरंत डॉक्टरों के पास गई।
उसने सारी जानकारी ली।
फिर उसने अपने परिचित डॉक्टर को फोन किया और समीर के इलाज की व्यवस्था कराने लगी।
काव्या हैरान होकर उसे देखती रही।
जिस बहन को उसने घर से दूर किया था, वही आज उसके पति के लिए सबसे ज्यादा भाग-दौड़ कर रही थी।
नंदिनी ने काव्या से कहा,
“तुम बच्चे को संभालो। भैया की चिंता मत करो। मैं यहाँ हूँ।”
काव्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई।
पूरी रात नंदिनी अस्पताल में रही।
कभी डॉक्टर से बात करती, कभी दवा लाती, कभी समीर के पास बैठती।
आरव रोता तो उसे गोद में उठा लेती।
काव्या ने देखा कि नंदिनी ने एक बार भी पुराने झगड़े का जिक्र नहीं किया।
न कोई ताना।
न कोई शिकायत।
न कोई बदला।
बस भाई की चिंता।
काव्या के मन में जैसे वर्षों से जमा पत्थर धीरे-धीरे टूटने लगा।
उसने नंदिनी से धीमे स्वर में पूछा,
“दीदी, आपने मुझे माफ कर दिया?”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
“किस बात के लिए?”
काव्या रोते हुए बोली,
“जिस दरवाजे पर मैंने ताला लगाया था... उसी दरवाजे के पीछे मैंने आपको जाने से रोका था।”
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“काव्या, घर का दरवाजा बंद हुआ था, रिश्ता नहीं।”
काव्या फूट-फूटकर रोने लगी।
“मैंने आपको बहुत गलत समझा।”
नंदिनी ने कहा,
“गलतियाँ सभी से होती हैं। लेकिन अगर गलती समझ में आ जाए, तो उसे सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए।”
कुछ दिनों बाद समीर की हालत ठीक होने लगी।
जब उसे होश आया तो उसने सबसे पहले अपनी बहन को अपने पास बैठे देखा।
उसकी आँखें भर आईं।
“दीदी...”
नंदिनी ने उसका हाथ दबाया।
“चुप रह। पहले ठीक हो जा।”
समीर की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने कहा,
“मैं बहुत कमजोर निकला दीदी।”
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा।
समीर ने उसकी हथेली पकड़ ली।
“जब तुम दरवाजे पर खड़ी थीं, तब मैं तुम्हारे सामने नहीं आया। आज मुझे उसी बात का सबसे ज्यादा पछतावा है।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,
“भैया, बीती बातों को वहीं रहने दो।”
लेकिन समीर जानता था कि बहन ने उसे माफ कर दिया है, जबकि वह खुद को माफ नहीं कर पा रहा था।
समीर के घर लौटने के बाद काव्या ने सबसे पहला काम वही किया, जिसे देखकर रघुवीर सिंह की आँखें भर आईं।
उसने हवेली के बीच बनी दीवार हटवाने का फैसला किया।
मजदूर बुलाए गए।
ईंटें टूटने लगीं।
जिस दीवार को खड़ा करने में परिवार के रिश्ते टूटे थे, उसे गिरते हुए देखकर काव्या की आँखों में आँसू आ गए।
फिर वह मुख्य दरवाजे के पास गई।
उसने अपने हाथों से ताला खोला।
ताला जमीन पर रखकर बोली,
“यह ताला आज से कभी नहीं लगेगा।”
नंदिनी सामने खड़ी थी।
काव्या उसके पास गई और उसके पैर पकड़ लिए।
“दीदी, मुझे माफ कर दीजिए।”
नंदिनी ने तुरंत उसे उठाया और गले लगा लिया।
आरव दौड़कर नंदिनी से लिपट गया।
“बुआ, आप अब यहीं रहेंगी ना?”
नंदिनी हँसते हुए बोली,
“हाँ, लेकिन तुम मुझे परेशान करोगे तो मैं चली जाऊँगी।”
आरव ने मासूमियत से कहा,
“मैं आपको कभी परेशान नहीं करूँगा।”
सब हँस पड़े।
रघुवीर सिंह दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे।
उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्होंने कहा,
“जिस घर को ईंटों ने बाँट दिया था, उसे आज रिश्तों ने फिर से जोड़ दिया।”
सुमित ने आगे बढ़कर कहा,
“बाबा, दीवार हमने बनाई थी, लेकिन उसे गिराने की हिम्मत काव्या ने दिखाई है।”
काव्या ने सिर झुका लिया।
उसने नंदिनी की ओर देखा और कहा,
“मुझे लगता था कि मायके में बेटी का बार-बार आना किसी बहू के अधिकार को कम कर देता है। लेकिन आज समझ आया कि बेटी घर में हिस्सा लेने नहीं, अपना प्यार लेने आती है।”
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,
“और बहू भी पराई नहीं होती। बस उसे अपनापन चाहिए।”
उस दिन हवेली में फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई।
आँगन में बच्चे खेलने लगे।
रसोई से खाने की खुशबू आने लगी।
रघुवीर सिंह अपनी कुर्सी पर बैठे मुस्कुरा रहे थे।
समीर अपनी बहन के बच्चों के साथ बैठा था।
और काव्या पहली बार नंदिनी के साथ रसोई में खड़ी होकर खाना बना रही थी।
जिस दरवाजे पर कभी ताला लटका था, वही दरवाजा अब दिनभर खुला रहता था।
काव्या ने उस पुराने ताले को उठाकर हवेली के एक कोने में रख दिया।
उसने उसे फेंका नहीं।
क्योंकि वह चाहती थी कि वह ताला हमेशा उसे एक बात याद दिलाता रहे—
रिश्तों में दूरी कभी-कभी छोटी-सी बात से शुरू होती है, लेकिन अगर समय रहते उसे रोका न जाए तो वह दीवार बन जाती है। और जब अपने लोग मुसीबत में साथ खड़े हों, तब समझ आता है कि घर ईंटों से नहीं, रिश्तों से बनता है।
सीख:
किसी रिश्ते को अपने रास्ते की रुकावट समझकर दूर मत कीजिए। हो सकता है, जिस इंसान को आप अपने जीवन से बाहर करना चाहते हैं, वही किसी दिन आपके सबसे कठिन समय में आपका सबसे बड़ा सहारा बन जाए।

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