बहन की जगह दुल्हन

 

Emotional Indian wedding scene with a tearful bride sitting beside a calm groom under a beautifully decorated wedding mandap, surrounded by worried family members.


जिस लड़की की शादी होनी थी, वह मंडप तक पहुंची ही नहीं थी। उसकी जगह उसकी छोटी बहन दुल्हन बनकर बैठी थी। चेहरा घूंघट से ढका था, आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे और सामने बैठा दूल्हा चुपचाप उसे देख रहा था।


किसी को अंदाजा नहीं था कि उस मंडप में सिर्फ एक शादी नहीं हो रही थी, बल्कि दो परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।


ईशानी की उंगलियां कांप रही थीं।


उसके हाथों में सान्वी की मेहंदी थी।


उसके गले में सान्वी के गहने थे।


और उसकी मांग में भरने वाला सिंदूर भी उस लड़की के नाम का था, जो कुछ ही घंटे पहले घर से गायब हो चुकी थी।


ईशानी ने घूंघट के भीतर से सामने बैठे अथर्व को देखा।


अथर्व बिल्कुल शांत था।


उसके चेहरे पर न खुशी थी, न गुस्सा।


जैसे उसे इस शादी में कुछ भी असामान्य नहीं लग रहा हो।


लेकिन ईशानी जानती थी कि वह झूठ बोल रही थी।


वह खुद को दुल्हन बनाकर उस आदमी के सामने बैठी थी, जिसकी पत्नी बनने का फैसला उसने अपनी जिंदगी में कभी नहीं किया था।


तभी पंडित जी ने कहा—


"बेटी, अब हाथ आगे कीजिए। कन्यादान का समय हो गया है।"


ईशानी का दिल बैठ गया।


उसने धीरे से अपना हाथ आगे कर दिया।


शंकर जी ने बेटी का हाथ अथर्व के हाथ में रख दिया।


उनकी आंखों में आंसू थे।


ईशानी ने अपने पिता की ओर देखा।


शंकर जी नजरें नहीं उठा पा रहे थे।


उन्हें अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए था, लेकिन आज उनके चेहरे पर सिर्फ अपराधबोध था।


उन्हें पता था कि उन्होंने अपनी बेटी को एक ऐसे रिश्ते में धकेल दिया है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा तक नहीं था।


कुछ ही देर बाद फेरे पूरे हुए।


मंगलसूत्र उसके गले में पड़ गया।


सिंदूर उसकी मांग में भर दिया गया।


और देखते ही देखते ईशानी, सान्वी की जगह अथर्व की पत्नी बन गई।


लेकिन इस शादी के पीछे छिपा सच अभी किसी को नहीं पता था।



कुछ घंटे पहले...


सान्वी अपनी शादी के जोड़े में तैयार होकर कमरे में बैठी थी।


कमरे में फूलों की खुशबू थी।


बिस्तर पर उसका लाल लहंगा रखा था।


टेबल पर गहनों के डिब्बे खुले हुए थे।


लेकिन सान्वी के चेहरे पर शादी की खुशी नहीं थी।


वह बार-बार खिड़की की तरफ देख रही थी।


उसकी आंखों में बेचैनी थी।


तभी दरवाजा खुला।


ईशानी अंदर आई।


"दीदी, आप तैयार नहीं हुईं? सब लोग आपको बुला रहे हैं।"


सान्वी ने पलटकर देखा।


उसकी आंखें लाल थीं।


ईशानी तुरंत उसके पास पहुंची।


"दीदी, आप रो रही हैं?"


सान्वी ने कुछ नहीं कहा।


ईशानी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"क्या हुआ?"


सान्वी ने कांपती आवाज में कहा—


"ईशानी... अगर मैं आज शादी नहीं करूं तो?"


ईशानी हंस पड़ी।


"आप मजाक कर रही हैं?"


सान्वी ने सिर हिला दिया।


"नहीं। मैं सच कह रही हूं।"


ईशानी का चेहरा गंभीर हो गया।


"लेकिन क्यों?"


सान्वी ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—


"मैं अथर्व से शादी नहीं कर सकती।"


ईशानी ने हैरानी से पूछा—


"लेकिन आप तो उसे पहले से जानती हैं।"


सान्वी ने उदास होकर कहा,

"जानती हूं। इसलिए तो डरती हूं।"


ईशानी ने बेचैनी से पूछा,

"लेकिन डर किस बात का है?"


सान्वी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसने सिर्फ टेबल पर रखा एक पत्र ईशानी की ओर बढ़ा दिया।


"इसे मम्मी-पापा को दे देना।"


ईशानी ने पत्र लिया।


"दीदी, आप कहां जा रही हैं?"


सान्वी की आंखों से आंसू निकल आए।


सान्वी ने कहा, "जहां मुझे अपनी जिंदगी अपनी पसंद से जीने का मौका मिलेगा।"


ईशानी घबराकर बोली, "दीदी!"


लेकिन सान्वी दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई।


ईशानी उसके पीछे भागी।


लेकिन गलियारा खाली था।


वह वापस कमरे में आई।


टेबल पर रखा पत्र खोला।


उसमें लिखा था—


"मम्मी-पापा, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपकी बेटी हूं, इसलिए जानती हूं कि आप मेरी खुशी चाहते हैं। लेकिन मैं इस शादी के लिए तैयार नहीं हूं। मैं किसी और से प्यार करती हूं और उसी के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहती हूं। मुझे पता है कि मेरे इस फैसले से आपको बहुत दुख होगा, लेकिन अगर आज मैं अपनी इच्छा के खिलाफ शादी कर लूंगी तो जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी।"


ईशानी के हाथ कांपने लगे।


वह तुरंत अपने माता-पिता के पास पहुंची।


पत्र पढ़ते ही शीतल जी के हाथ से कागज गिर गया।


शंकर जी कुर्सी पर बैठ गए।


कुछ क्षण तक कमरे में किसी की आवाज नहीं आई।


फिर शीतल जी ने ईशानी की ओर देखा।


उनकी आंखों में ऐसी बेबसी थी, जिसे देखकर ईशानी का दिल टूट गया।


"ईशानी..."


ईशानी ने अपनी मां की ओर देखते हुए धीरे से जवाब दिया—

ईशानी: "जी मम्मी।"


शीतल जी ने उसकी आंखों में देखते हुए उम्मीद भरी आवाज़ में पूछा—

शीतल जी: "क्या तुम हमारी मदद करोगी?"


ईशानी को कुछ समझ नहीं आया।


"कैसी मदद?"


शीतल जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"तुम्हें सान्वी की जगह मंडप में बैठना होगा।"


ईशानी पीछे हट गई।


"क्या?"


"बेटा, हमारी मजबूरी समझो।"


"लेकिन मम्मी, मैं ये नहीं कर सकती!"


शंकर जी ने पहली बार सिर उठाया।


"बेटा, हमें पता है कि हम तुमसे बहुत बड़ी बात कह रहे हैं। लेकिन बारात रास्ते में है। अगर अभी सबको सच्चाई पता चल गई तो..."


ईशानी ने बीच में कहा—


"तो शादी रोक दीजिए!"


शीतल जी की आंखों से आंसू बहने लगे।


"काश, बात इतनी आसान होती।"


ईशानी ने हैरानी से पूछा,

"तो क्या मुश्किल है?"


शीतल जी कुछ बोलने ही वाली थीं कि बाहर से आवाज आई—


"शंकर जी, अथर्व के परिवार की गाड़ियां आ गई हैं।"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


ईशानी ने अपने माता-पिता की ओर देखा।


उसे लगा जैसे उसके सामने कोई रास्ता ही नहीं बचा।


शीतल जी ने हाथ जोड़ दिए।


"बेटा, आज अपनी मां की लाज रख लो।"


ईशानी ने आंखें बंद कर लीं।


उसके भीतर बहुत कुछ टूट रहा था।


लेकिन माता-पिता की आंखों में आंसू देखकर वह कुछ नहीं कह सकी।


उसने धीरे से सिर झुका दिया।


"ठीक है..."



मंडप में बैठे अथर्व ने जब पहली बार दुल्हन का हाथ पकड़ा, तो उसे कुछ अलग महसूस हुआ।


सान्वी के हाथ की उंगलियां लंबी थीं।


लेकिन इस लड़की की उंगलियां छोटी और कांपती हुई थीं।


अथर्व की नजर कुछ पल उसके हाथों पर रुकी।


फिर उसने दुल्हन के चेहरे की ओर देखा।


घूंघट गहरा था।


लेकिन उसकी आंखों से गिरते आंसू साफ दिखाई दे रहे थे।


अथर्व के मन में एक सवाल उठा—


"ये सान्वी नहीं है।"


लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


क्योंकि वह जानना चाहता था कि आखिर इस घर में चल क्या रहा है।


शादी पूरी हो गई।


लोग बधाई देने लगे।


ईशानी चुप बैठी रही।


अथर्व भी चुप था।


फिर दोनों को कमरे में भेज दिया गया।



कमरे में पहुंचकर ईशानी बिस्तर के एक कोने पर बैठ गई।


उसके हाथ लगातार कांप रहे थे।


कुछ देर बाद दरवाजा खुला।


अथर्व अंदर आया।


ईशानी ने घबराकर उसकी ओर देखा।


अथर्व कुछ दूर बैठ गया।


उसने ईशानी को ध्यान से देखा।


"तुम्हें लगता है मैं तुम्हें कुछ नुकसान पहुंचाऊंगा?"


ईशानी ने कोई जवाब नहीं दिया।


"डरने की जरूरत नहीं है।"


ईशानी ने धीरे से पूछा—


"आपको पता है कि मैं सान्वी नहीं हूं?"


अथर्व ने शांत स्वर में कहा—


"हां।"


ईशानी के चेहरे का रंग उड़ गया।


"आपको कब पता चला?"


अथर्व ने शांत स्वर में जवाब दिया—

"मंडप में।"


ईशानी ने घबराते हुए पूछा—

"फिर आपने शादी क्यों की?"


अथर्व कुछ पल चुप रहा।


"क्योंकि मुझे सच्चाई जाननी थी।"


ईशानी की आंखों में हैरानी थी।


"कौन सी सच्चाई?"


अथर्व ने उसकी ओर देखा।


"सान्वी मुझसे शादी क्यों नहीं करना चाहती थी?"


ईशानी चुप हो गई।


"क्या उसने तुम्हें बताया?"


ईशानी ने धीरे से सिर हिलाया।


"वह किसी और से प्यार करती है।"


अथर्व की आंखों में पहली बार हल्की-सी उदासी दिखाई दी।


"तो फिर उसे मुझसे सीधे बात करनी चाहिए थी।"


ईशानी ने धीमे स्वर में कहा—


"उसे आपसे डर लगता था।"


अथर्व कुछ पल उसे देखता रहा।


फिर अचानक हंस पड़ा।


"मुझसे?"


ईशानी ने नजरें झुका लीं।


"हां।"


अथर्व ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर पूछा—

"और तुम्हें?"


ईशानी ने कोई जवाब नहीं दिया।


अथर्व समझ गया।


"तुम्हें भी डर लगता है।"


ईशानी ने धीरे से कहा—


"थोड़ा।"


अथर्व ने गहरी सांस ली।


"ईशानी, मेरी एक बात याद रखना। तुम्हारी बहन ने जो फैसला लिया, उसकी सजा तुम्हें नहीं मिलेगी।"


ईशानी ने पहली बार उसकी तरफ सीधा देखा।


"लेकिन अब मैं आपकी पत्नी हूं।"


अथर्व ने शांत स्वर में जवाब दिया—

"हां।"


ईशानी ने घबराते हुए पूछा—

"तो क्या होगा?"


अथर्व ने शांत स्वर में कहा—


"वही होगा जो तुम्हारी इच्छा होगी।"


ईशानी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।


"मतलब?"


"मतलब ये कि ये शादी तुम्हारे लिए कैद नहीं बनेगी।"


ईशानी की आंखों में आंसू आ गए।


"लेकिन परिवार?"


"परिवार को मैं संभाल लूंगा।"


अथर्व उठकर खिड़की के पास चला गया।


कुछ देर बाद उसने कहा—


"और एक बात। अगर तुम चाहो तो हम कुछ समय तक सिर्फ पति-पत्नी के नाम से रहेंगे। तुम्हें मुझे समझने का समय मिलेगा। मुझे तुम्हें समझने का समय मिलेगा।"


ईशानी ने पहली बार राहत की सांस ली।


लेकिन तभी अथर्व का फोन बजा।


उसने फोन उठाया।


दूसरी तरफ उसका दोस्त और बिजनेस पार्टनर आरव था।


"अथर्व, हमें तुरंत बात करनी है।"


अथर्व ने पूछा, "क्या हुआ?"


आरव ने गंभीर आवाज में कहा, "सान्वी के बारे में पता चला है।"


अथर्व की आंखें गंभीर हो गईं।


"कहां है वह?"


"वो अकेली नहीं गई है।"


अथर्व कुछ क्षण चुप रहा।


"क्या मतलब?"


आरव ने कहा—


"जिस लड़के के साथ वह गई है, उसके बारे में हमने जांच की है। मामला उतना सीधा नहीं है जितना लग रहा था।"


अथर्व ने फोन कसकर पकड़ लिया।


"साफ-साफ बोलो।"


आरव ने कहा—


"जिस लड़के के साथ सान्वी गई है, वह वही इंसान है जिसके कारण पिछले साल तुम्हारे बिजनेस में करोड़ों का नुकसान हुआ था।"


अथर्व का चेहरा बदल गया।


ईशानी ने उसकी आंखों में पहली बार डर जैसा कुछ देखा।


अथर्व ने गंभीर आवाज़ में पूछा, "तुम पक्के हो?"


आरव ने तुरंत जवाब दिया, "हां, बिल्कुल पक्का हूं।"


अथर्व ने कुछ पल सोचने के बाद पूछा, "सान्वी को ये बात पता है?"


आरव ने धीमे स्वर में कहा, "नहीं, सर। उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं है।"


अथर्व ने तुरंत फोन काट दिया।


ईशानी घबराकर उठी।


"क्या हुआ?"


अथर्व ने उसकी ओर देखा।


"तुम्हारी बहन खतरे में हो सकती है।"


ईशानी के पैरों तले जमीन खिसक गई।


"नहीं..."


अथर्व ने तुरंत कहा—


"हमें उसे ढूंढना होगा।"



अगले दिन पूरा घर तनाव में था।


शीतल जी रो-रोकर बेहाल थीं।


शंकर जी लगातार फोन कर रहे थे।


ईशानी चुप बैठी थी।


उसे बार-बार सान्वी का चेहरा याद आ रहा था।


तभी अथर्व कमरे में आया।


उसने कहा—


"ईशानी, मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।"


"जी।"


"सान्वी ने जिस लड़के के साथ जाने का फैसला किया है, उसका नाम कबीर है।"


ईशानी चौंक गई।


"कबीर?"


अथर्व ने शांत स्वर में जवाब दिया, "हां।"


ईशानी कुछ पल चुप रही, फिर बोली, "मैंने उसे एक बार देखा है।"


अथर्व ने तुरंत पूछा—


"कहां?"


ईशानी ने बताया—


"सान्वी की दोस्त की पार्टी में। वह बहुत शांत था।"


अथर्व ने कहा—


"शांत दिखने वाला हर इंसान अच्छा नहीं होता।"


ईशानी ने उसकी ओर देखा।


"क्या आपको लगता है कि उसने दीदी को धोखा दिया है?"


अथर्व ने जवाब नहीं दिया।


उसने सिर्फ कहा—


"मैं उसे ढूंढकर रहूंगा।"



अथर्व ने अपने लोगों को अलग-अलग जगह भेजा।


कबीर का फोन बंद था।


सान्वी का फोन भी बंद था।


लेकिन एक छोटी-सी गलती ने उन्हें रास्ता दिखा दिया।


सान्वी ने अपने जाने से पहले ईशानी के फोन पर एक तस्वीर भेजी थी।


तस्वीर में वह और कबीर एक पुराने पुल के पास खड़े थे।


ईशानी ने तस्वीर देखते ही कहा—


"ये जगह..."


अथर्व ने पूछा—


"तुम पहचानती हो?"


"हां। ये हमारे शहर से बाहर पुरानी हवेली के पास वाला पुल है।"


अथर्व ने तुरंत गाड़ी निकलवाई।


ईशानी भी उसके साथ जाने लगी।


अथर्व ने उसे रोकना चाहा।


"तुम घर पर रहो।"


ईशानी ने दृढ़ आवाज में कहा—


"नहीं। अगर मेरी बहन वहां है तो मैं भी जाऊंगी।"


अथर्व ने कुछ क्षण उसे देखा।


फिर पहली बार उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।


"ठीक है। लेकिन मेरे पास रहना।"


ईशानी ने सिर हिला दिया।



पुरानी हवेली के पास पहुंचते ही उन्हें एक कार दिखाई दी।


अथर्व ने गाड़ी रोकी।


दोनों नीचे उतरे।


हवेली के अंदर अजीब सन्नाटा था।


ईशानी ने डरते हुए अथर्व का हाथ पकड़ लिया।


अथर्व ने उसकी ओर देखा।


उसने कुछ नहीं कहा।


बस उसका हाथ मजबूती से पकड़ लिया।


अंदर से आवाज आई—


"ईशानी!"


ईशानी की आंखें फैल गईं।


"दीदी!"


वह आवाज की तरफ दौड़ने लगी, लेकिन अथर्व ने उसे रोक लिया।


"रुको।"


अंदर से सान्वी की आवाज फिर आई—


"ईशानी, मुझे बचा लो!"


अथर्व ने कमरे का दरवाजा खोला।


सान्वी वहां बैठी थी।


उसके पास कबीर भी था।


लेकिन कबीर के चेहरे पर घबराहट नहीं थी।


वह शांत खड़ा था।


अथर्व ने उसे देखते ही कहा—


"तो तुम हो।"


कबीर मुस्कुराया।


"आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।"


ईशानी ने सान्वी को गले लगा लिया।


"दीदी, आपने हमें इतना परेशान क्यों किया?"


सान्वी रोते हुए बोली—


"मुझे लगा था कबीर मुझे तुमसे दूर ले जाएगा और हम नई जिंदगी शुरू करेंगे। लेकिन मुझे नहीं पता था कि..."


कबीर ने बीच में कहा—


"बस सान्वी।"


अथर्व आगे बढ़ा।


"अब तुम्हारी कहानी खत्म हो गई।"


कबीर हंसा।


"तुम्हें लगता है कि तुम जीत गए?"


अथर्व ने शांत स्वर में कहा—


"नहीं। मैं जीतने नहीं आया हूं। मैं अपनी पत्नी की बहन को घर ले जाने आया हूं।"


ईशानी ने अथर्व की तरफ देखा।


"अपनी पत्नी..."


उसके दिल में कुछ बदलने लगा था।


वह पहली बार उस रिश्ते को सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह महसूस कर रही थी।


लेकिन तभी कबीर ने एक ऐसी बात कही, जिसने सबको चौंका दिया—


"सान्वी ने तुम्हें सब कुछ नहीं बताया।"


अथर्व की आंखें सिकुड़ गईं।


"क्या?"


कबीर ने सान्वी की ओर देखा।


सान्वी का चेहरा सफेद पड़ गया।


अथर्व ने पूछा—


"सान्वी, क्या बात है?"


सान्वी रोते हुए बोली—


"अथर्व... मैंने तुमसे एक बात छुपाई थी।"


"क्या?"


सान्वी ने कांपती आवाज में कहा—


"मैं कबीर से प्यार करती थी, लेकिन उससे मिलने से पहले मैं तुम्हारे बारे में कुछ ऐसा जान गई थी, जिसकी वजह से मुझे लगा कि मैं तुम्हारे साथ शादी नहीं कर सकती।"


ईशानी ने पूछा—


"क्या?"


सान्वी ने अथर्व की ओर देखा।


"मुझे लगा था कि अथर्व ने मेरे पापा का बिजनेस बर्बाद किया है।"


शंकर जी के परिवार और अथर्व के परिवार के बीच वर्षों पुरानी दुश्मनी का रहस्य अब सामने आने वाला था।


अथर्व बिल्कुल शांत खड़ा था।


फिर उसने धीरे से कहा—


"ईशानी, अब तुम्हें भी सच्चाई जाननी होगी।"


ईशानी ने उसकी ओर देखा।


अथर्व ने कहा—


"तुम्हारे पापा का बिजनेस मैंने बर्बाद नहीं किया था।"


ईशानी की आंखें फैल गईं।


"फिर किसने?"


अथर्व ने कबीर की ओर देखा।


कबीर का चेहरा पहली बार बदल गया।


अथर्व बोला—


"जिस इंसान पर सान्वी ने आंख बंद करके भरोसा किया... वही सबके पीछे था।"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


सान्वी ने कबीर की ओर देखा।


"नहीं... ये झूठ है।"


कबीर पीछे हटने लगा।


लेकिन दरवाजे पर अथर्व के लोग खड़े थे।


कबीर के सारे रास्ते बंद हो चुके थे।


सान्वी फूट-फूटकर रोने लगी।


ईशानी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"दीदी, आपने गलती की है। लेकिन अब हम सब मिलकर उसे ठीक करेंगे।"


अथर्व ने ईशानी की ओर देखा।


उसकी आंखों में पहली बार कठोरता नहीं, बल्कि सम्मान था।


उसने धीरे से कहा—


"तुम्हें पता है ईशानी, उस दिन मंडप में मैंने तुम्हें इसलिए नहीं रोका था क्योंकि मैं पहले ही समझ गया था कि तुम्हें मजबूर किया गया है।"


ईशानी की आंखें नम हो गईं।


"और अब?"


अथर्व ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।


"अब मैं चाहता हूं कि आगे की जिंदगी में तुम कोई फैसला मजबूरी में मत लेना।"


ईशानी ने कुछ क्षण उसके हाथ को देखा।


फिर धीरे से अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।


उस पल दोनों के बीच कोई वादा नहीं हुआ।


लेकिन एक रिश्ता जरूर बदल गया।


जो रिश्ता मजबूरी में शुरू हुआ था, उसमें अब भरोसे की पहली सीढ़ी बन चुकी थी।


और ईशानी को पहली बार लगा—


शायद उसकी जिंदगी उस दिन खत्म नहीं हुई थी, जिस दिन उसे अपनी बहन की जगह मंडप में बैठना पड़ा था।


शायद उसी दिन उसकी जिंदगी ने एक ऐसी कहानी शुरू की थी, जिसका अंत उसकी कल्पना से बिल्कुल अलग होने वाला था।



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