उसने खुद को चुन लिया
रीमा की शादी को अठारह साल हो चुके थे।
इन अठारह वर्षों में उसने अपने घर को सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि अपनी पूरी दुनिया समझकर संभाला था।
पति निखिल की पसंद का खाना बनाना हो, बच्चों की पढ़ाई देखनी हो, सास की दवाइयों का ध्यान रखना हो या घर के छोटे-बड़े खर्चों को संभालना हो—रीमा हर जिम्मेदारी बिना किसी शिकायत के निभाती थी।
घर में किसी को कोई चीज चाहिए होती, तो सबसे पहले रीमा का नाम लिया जाता।
“रीमा, मेरी फाइल कहां रखी है?”
“रीमा, बच्चों का टिफिन तैयार हुआ?”
“रीमा, मां की दवा दे देना।”
“रीमा, घर में सब्जी नहीं है।”
हर किसी की जरूरत के बीच रीमा कहीं पीछे छूट गई थी।
लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।
उसे लगता था कि परिवार को संभालना ही उसका प्यार है।
उसके लिए रिश्ते निभाने का मतलब था—अपनी खुशी को थोड़ा पीछे रखकर अपनों की खुशी को आगे रखना।
लेकिन निखिल के लिए रीमा की मेहनत धीरे-धीरे उसकी आदत बन चुकी थी।
उसे रीमा की मौजूदगी की कीमत महसूस नहीं होती थी।
वह यह मान बैठा था कि रीमा जो कुछ करती है, वह उसका कर्तव्य है।
एक दिन रीमा ने रसोई में खाना बनाते हुए अपनी बेटी काव्या से कहा,
“काव्या, तुम्हारी कॉलेज की फीस जमा करने की आखिरी तारीख कब है?”
काव्या ने किताब बंद करते हुए जवाब दिया,
“मां, अगले हफ्ते है।”
रीमा ने मुस्कुराकर कहा,
“चिंता मत करो। पापा से मैं बात कर लूंगी।”
काव्या कुछ पल अपनी मां को देखती रही।
फिर उसने धीरे से पूछा,
“मां, आप हमेशा पापा से ही क्यों पूछती हैं? आपने कभी अपने लिए कुछ मांगा है?”
रीमा के हाथ कुछ पल के लिए रुक गए।
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“मेरे लिए क्या चाहिए बेटा? तुम दोनों खुश रहो, यही मेरे लिए काफी है।”
काव्या ने अपनी मां की आंखों में देखते हुए कहा,
“लेकिन मां, आपकी खुशी का क्या?”
रीमा कुछ जवाब नहीं दे पाई।
उस सवाल का जवाब शायद उसके पास खुद भी नहीं था।
उसने शादी के बाद अपनी इच्छाओं को इतना पीछे छोड़ दिया था कि अब उसे अपनी पसंद तक ठीक से याद नहीं थी।
उसे किताबें पढ़ना पसंद था।
उसे सिलाई करना पसंद था।
कभी वह चाहती थी कि अपनी पढ़ाई पूरी करके बच्चों को पढ़ाए।
लेकिन शादी के बाद घर की जिम्मेदारियां इतनी बढ़ती चली गईं कि उसके सारे सपने अलमारी में रखे पुराने कपड़ों की तरह बंद होकर रह गए।
निखिल का मानना था कि पत्नी को घर से बाहर निकलकर काम करने की कोई जरूरत नहीं है।
एक बार रीमा ने हिम्मत करके कहा भी था,
“निखिल, मैंने सोचा है कि पास के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की नौकरी कर लूं। घर के काम भी संभाल लूंगी।”
निखिल ने अखबार से नजर हटाए बिना जवाब दिया,
“तुम्हें नौकरी करने की जरूरत क्या है?”
रीमा ने धीरे से कहा,
“मुझे बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगता है। अपनी थोड़ी कमाई भी होगी तो अच्छा लगेगा।”
निखिल ने हंसते हुए कहा,
“इतने साल घर बैठकर अब अचानक नौकरी करने का शौक जाग गया?”
रीमा चुप हो गई।
निखिल ने आगे कहा,
“घर संभालना आसान काम नहीं है, लेकिन तुम घर संभाल रही हो, यही काफी है। बाहर जाकर नौकरी करने की कोई जरूरत नहीं।”
रीमा ने उस दिन भी कोई बहस नहीं की।
उसने अपनी इच्छा फिर मन में दबा दी।
लेकिन एक इच्छा दबाने से इंसान की इच्छाएं खत्म नहीं होतीं।
वे बस भीतर जमा होती रहती हैं।
और एक दिन वही जमा हुआ दर्द आवाज बन जाता है।
रीमा के जीवन में भी वह दिन आने वाला था।
कुछ महीनों बाद निखिल के छोटे भाई की पत्नी ने एक नया व्यवसाय शुरू किया।
घर में उसकी खूब तारीफ हुई।
निखिल की मां ने खुशी से कहा,
“बहू ने कितना अच्छा किया है। घर भी संभालती है और अपना काम भी करती है।”
रीमा पास बैठी सब सुन रही थी।
निखिल ने भी मुस्कुराकर कहा,
“आजकल की लड़कियां बहुत समझदार हैं। अपने पैरों पर खड़ा होना जानती हैं।”
रीमा ने निखिल की तरफ देखा।
उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी।
बस आंखों में एक सवाल था।
जिस बात को दूसरी महिला के लिए निखिल समझदारी कह रहा था, वही बात जब रीमा ने कही थी, तब वह उसे शौक कहकर टाल गया था।
लेकिन रीमा ने उस दिन भी कुछ नहीं कहा।
कुछ समय बाद घर में एक और समस्या खड़ी हो गई।
निखिल की नौकरी में परेशानी चल रही थी।
उसका वेतन समय पर नहीं आया था और वह पहले से तनाव में था।
रीमा ने घर के खर्च को संभालने के लिए अपने पुराने गहनों में से एक छोटी सी चेन बेचने का फैसला किया।
उसने निखिल को बताए बिना ऐसा नहीं किया।
उसने चेन उसके सामने रखते हुए कहा,
“यह बेच देते हैं। बच्चों की फीस और घर के जरूरी खर्च निकल जाएंगे।”
निखिल ने चेन देखते हुए पूछा,
“यह क्यों बेच रही हो?”
रीमा ने शांत स्वर में कहा,
“घर के खर्च में थोड़ी मदद हो जाएगी।”
निखिल ने कहा,
“रहने दो। जरूरत पड़ेगी तो मैं देख लूंगा।”
रीमा ने कहा,
“आप पर पहले ही बहुत जिम्मेदारियां हैं। अगर इससे कुछ मदद हो सकती है तो इसमें बुरा क्या है?”
निखिल ने चेन वापस उसकी हथेली पर रख दी।
“तुम्हारा काम घर संभालना है। पैसों की चिंता करना मेरा काम है।”
रीमा ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसके मन में एक बात पहली बार बहुत साफ हुई—
निखिल उसे जीवनसाथी नहीं, सिर्फ जिम्मेदारी निभाने वाली पत्नी समझता था।
कुछ दिनों तक सब सामान्य चलता रहा।
फिर एक दिन बच्चों के सामने निखिल और रीमा के बीच छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई।
रीमा ने कहा,
“काव्या की फीस अगले महीने फिर जमा करनी है। हमें अभी से थोड़ा पैसा अलग रख देना चाहिए।”
निखिल ने नाराज होकर कहा,
“तुम्हें हर समय पैसे की ही चिंता क्यों रहती है?”
रीमा ने समझाते हुए कहा,
“मैं चिंता नहीं कर रही हूं। बस घर का हिसाब बता रही हूं।”
निखिल ने आवाज ऊंची करते हुए कहा,
“तुम घर चलाती हो या घर पर हुक्म चलाती हो?”
कमरे में बैठे दोनों बच्चे चुप हो गए।
रीमा ने बच्चों की तरफ देखा और बात वहीं खत्म कर दी।
लेकिन उस रात काव्या अपनी मां के पास आई।
उसने मां का हाथ पकड़कर कहा,
“मां, आप पापा से डरती क्यों हैं?”
रीमा ने तुरंत कहा,
“ऐसा कुछ नहीं है बेटा।”
काव्या ने कहा,
“है मां। आप हर बार अपनी बात बीच में रोक देती हैं।”
रीमा ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“हर रिश्ते में समझौता करना पड़ता है।”
काव्या ने धीरे से कहा,
“समझौता दोनों लोग करते हैं मां। सिर्फ एक इंसान करता रहे, तो वह समझौता नहीं रहता।”
रीमा बेटी की तरफ देखती रह गई।
उसे लगा जैसे उसकी बेटी ने उसके मन की वह बात कह दी थी जिसे वह खुद वर्षों से समझ नहीं पा रही थी।
फिर वह घटना हुई जिसने सब बदल दिया।
निखिल किसी जरूरी काम को लेकर परेशान था।
घर आते ही उसने अपना बैग सोफे पर फेंका और चुपचाप बैठ गया।
रीमा उसके पास पानी लेकर आई।
उसने चिंता से पूछा,
“क्या हुआ? आप बहुत परेशान लग रहे हैं।”
निखिल ने रूखे स्वर में कहा,
“कुछ नहीं हुआ। मुझे अकेला छोड़ दो।”
रीमा वापस जाने लगी।
लेकिन उसे लगा कि शायद निखिल ने खाना भी नहीं खाया होगा।
कुछ देर बाद उसने फिर कहा,
“मैंने खाना लगा दिया है। आप खा लीजिए।”
निखिल अचानक उठ खड़ा हुआ।
उसने गुस्से में कहा,
“तुम्हें एक बार में बात समझ नहीं आती?”
रीमा चुप रही।
निखिल का गुस्सा बढ़ता गया।
उसने कहा,
“पूरे दिन घर में बैठी रहती हो और फिर भी तुम्हें चैन नहीं मिलता। तुम्हें पता भी है बाहर कितनी परेशानियां हैं?”
रीमा ने शांत स्वर में कहा,
“मैं आपकी परेशानी समझती हूं। इसलिए तो पूछ रही थी।”
निखिल ने गुस्से में कहा,
“तुम मेरी परेशानी समझती हो? तुमने जिंदगी में किया ही क्या है?”
रीमा के चेहरे का रंग बदल गया।
उसने बहुत धीमे स्वर में पूछा,
“क्या मतलब?”
निखिल ने बिना सोचे कह दिया,
“तुमने मेरे लिए किया ही क्या है? खाना बनाना और घर संभालना कोई बहुत बड़ा काम नहीं है।”
रीमा की आंखें भर आईं।
उसने पहली बार अपने जीवन के अठारह सालों को एक साथ याद किया।
बीमार होने के बावजूद बच्चों को स्कूल भेजना।
अपनी जरूरतें रोककर बच्चों की फीस भरना।
निखिल के कपड़े तैयार करना।
सास की दवाइयां समय पर देना।
घर के खर्च में बचत करना।
त्योहारों पर सबके लिए कपड़े लेना और अपने लिए कुछ न खरीदना।
निखिल की हर परेशानी में उसके साथ खड़ा होना।
और आज वही आदमी कह रहा था कि उसने किया ही क्या है।
रीमा ने अपनी आंखों के आंसू पोंछे।
उसने कहा,
“अगर आपको लगता है कि मैंने कुछ नहीं किया, तो शायद आज मुझे आपको समझाने की जरूरत भी नहीं है।”
निखिल ने गुस्से में कहा,
“अब भाषण मत दो।”
रीमा ने शांत स्वर में कहा,
“मैं भाषण नहीं दे रही हूं। बस पहली बार अपनी बात पूरी कर रही हूं।”
निखिल कुछ कह पाता, उससे पहले रीमा अपने कमरे में चली गई।
उसने अलमारी खोली।
उसने कोई कीमती चीज नहीं उठाई।
सिर्फ अपने जरूरी कपड़े, कुछ दस्तावेज, अपनी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और अपनी मां की दी हुई पुरानी सिलाई मशीन के कागज निकाले।
काव्या दरवाजे पर खड़ी सब देख रही थी।
उसने घबराकर पूछा,
“मां, आप कहां जा रही हैं?”
रीमा ने बेटी को गले लगाते हुए कहा,
“कुछ दिनों के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना सीखने जा रही हूं।”
काव्या की आंखों में आंसू आ गए।
उसने कहा,
“मैं आपके साथ हूं मां।”
रीमा ने बेटी के माथे को चूमा और कहा,
“मुझे किसी के खिलाफ तुम्हें खड़ा नहीं करना। तुम बस सही और गलत को समझना।”
रीमा घर से निकल गई।
इस बार वह किसी से नाराज होकर नहीं गई थी।
वह खुद को समझने के लिए गई थी।
वह अपनी छोटी बहन के घर पहुंची।
बहन ने दरवाजा खोलते ही पूछा,
“दीदी, इतनी रात को क्या हुआ?”
रीमा ने कुछ नहीं कहा।
वह बस अपनी बहन के गले लगकर रो पड़ी।
बहन ने उसे संभालते हुए कहा,
“दीदी, आप इतने सालों से सबके लिए मजबूत बनी रहीं। आज रो लीजिए।”
अगले कुछ दिनों में रीमा ने अपने पुराने प्रमाणपत्र निकाले।
उसने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया।
एक छोटे स्कूल में उसे बच्चों को पढ़ाने का अवसर मिल गया।
वेतन बहुत ज्यादा नहीं था।
लेकिन पहली बार उसकी कमाई उसके अपने हाथ में थी।
पहली तनख्वाह मिलने पर उसने नोटों को हाथ में लेकर बहुत देर तक देखा।
उसकी आंखों में आंसू थे।
स्कूल की प्रधानाचार्या ने पूछा,
“रीमा जी, आप रो क्यों रही हैं?”
रीमा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“ये खुशी के आंसू हैं। बहुत सालों बाद मुझे लग रहा है कि मेरी भी अपनी कोई पहचान है।”
उधर निखिल को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि घर में रीमा की मौजूदगी कितनी बड़ी थी।
बच्चों की पढ़ाई अस्त-व्यस्त हो गई।
घर का सामान समय पर नहीं आता।
मां की दवाइयां भूल जातीं।
कपड़े समय पर नहीं धुलते।
खाने के लिए बाहर का सहारा लेना पड़ता।
लेकिन सबसे बड़ी परेशानी घर के काम नहीं थे।
सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि घर में वह इंसान नहीं था जो बिना कहे सबकी जरूरत समझ लेता था।
निखिल ने एक दिन काव्या से पूछा,
“तुम्हारी मां कब वापस आएगी?”
काव्या ने शांत स्वर में जवाब दिया,
“पापा, मुझे नहीं पता।”
निखिल ने कहा,
“तुम अपनी मां से कह सकती हो कि मैं उसे वापस बुला रहा हूं।”
काव्या ने पिता की तरफ देखते हुए कहा,
“पापा, मां को सिर्फ घर वापस नहीं आना है। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि घर में उनकी इज्जत भी होगी।”
निखिल के पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ दिनों बाद वह रीमा से मिलने स्कूल पहुंचा।
रीमा बच्चों को पढ़ा रही थी।
कक्षा खत्म होने के बाद निखिल उसके सामने खड़ा था।
उसने कहा,
“रीमा, घर चलो।”
रीमा ने शांत स्वर में पूछा,
“क्यों?”
निखिल ने कहा,
“क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो।”
रीमा ने कुछ पल उसे देखा।
फिर कहा,
“मैं आपकी पत्नी हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरी कोई अपनी पहचान नहीं है।”
निखिल ने धीमे स्वर में कहा,
“मुझसे गलती हो गई।”
रीमा ने पूछा,
“एक गलती?”
निखिल चुप रहा।
रीमा ने कहा,
“अठारह सालों में कितनी बार मैंने अपनी इच्छाएं छोड़ीं, कितनी बार आपकी बात के लिए अपनी बात दबाई, कितनी बार बच्चों के सामने मुस्कुराई—क्या आपने कभी गिना?”
निखिल ने सिर झुका लिया।
रीमा आगे बोली,
“मैं आपको दोष देने नहीं बैठी हूं। मैं बस अब अपने जीवन को समझना चाहती हूं।”
निखिल ने कहा,
“क्या तुम मुझे एक मौका नहीं दे सकती?”
रीमा ने जवाब दिया,
“मौका रिश्ते को दिया जा सकता है, लेकिन सम्मान मांगकर नहीं लिया जा सकता।”
निखिल की आंखें नम हो गईं।
उसने कहा,
“मैं तुम्हें वापस लाने नहीं आया हूं। मैं तुम्हें यह बताने आया हूं कि मुझे अपनी गलती समझ आ गई है।”
रीमा ने कुछ नहीं कहा।
निखिल ने आगे कहा,
“तुमने अठारह साल मेरे घर को संभाला, लेकिन मैंने कभी यह नहीं सोचा कि उस घर को संभालने वाले इंसान को भी सहारे की जरूरत होती है।”
रीमा की आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन इस बार उसने तुरंत कोई फैसला नहीं किया।
उसने कहा,
“निखिल, माफी मांगना अच्छी बात है। लेकिन बदलाव सिर्फ शब्दों से साबित नहीं होता।”
निखिल ने सिर हिलाते हुए कहा,
“मैं समझता हूं।”
रीमा ने कहा,
“मुझे समय चाहिए।”
निखिल ने जवाब दिया,
“मैं इंतजार करूंगा।”
निखिल वहां से चला गया।
रीमा ने खिड़की से बाहर देखते हुए लंबी सांस ली।
उसका जीवन अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा था।
लेकिन एक चीज बदल चुकी थी।
अब वह अपने फैसले किसी डर से नहीं ले रही थी।
वह अपने सम्मान और अपनी समझ से फैसला कर रही थी।
कुछ महीनों तक निखिल ने बिना किसी दबाव के रीमा का साथ दिया।
वह बच्चों की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने लगा।
मां की दवाइयों का ध्यान खुद रखने लगा।
रीमा के स्कूल के काम के बारे में पूछता।
और सबसे जरूरी बात—जब रीमा अपनी राय देती, तो वह उसे बीच में रोकने के बजाय सुनता।
एक दिन काव्या ने अपनी मां से पूछा,
“मां, क्या आप पापा के साथ वापस जाएंगी?”
रीमा ने बेटी का हाथ पकड़कर कहा,
“बेटा, मैं अभी कोई फैसला नहीं कर रही हूं।”
काव्या ने पूछा,
“क्यों?”
रीमा ने मुस्कुराकर कहा,
“क्योंकि इस बार मैं सिर्फ यह नहीं देखूंगी कि कोई मुझे कितना चाहता है। मैं यह भी देखूंगी कि वह मेरा सम्मान कितना करता है।”
काव्या ने मां को गले लगा लिया।
रीमा ने मन ही मन सोचा—
“कभी-कभी जिंदगी हमें रिश्ते तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों की असली कीमत समझाने के लिए दूर ले जाती है।”
उसने अठारह साल परिवार को दिए थे।
अब पहली बार उसने अपने जीवन का थोड़ा हिस्सा खुद को दिया था।
और उसे यह समझ आ गया था कि पत्नी होना किसी इंसान की पूरी पहचान नहीं है।
वह पहले एक इंसान है।
उसकी भी इच्छाएं हैं।
उसकी भी भावनाएं हैं।
उसका भी सम्मान है।
और किसी रिश्ते की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि एक व्यक्ति कितना सह सकता है।
रिश्ता तब मजबूत होता है जब दोनों लोग एक-दूसरे की भावनाओं और सम्मान की कद्र करना सीखें।
क्योंकि साथ रहना जरूरी हो सकता है, लेकिन सम्मान के साथ रहना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

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