सास नहीं, माँ मिली
“माँ जी, ये कागज आप मुझे क्यों दे रही हैं? इसमें लिखा क्या है?”
नैना ने हाथ में पकड़े लिफाफे को देखते हुए अपनी सास सरोज देवी से पूछा।
सरोज देवी ने शांत स्वर में कहा, “पहले बैठ जा बहू। कागज पढ़ने से पहले मेरी एक बात सुन ले।”
नैना ने कुर्सी खींचकर उनके सामने बैठते हुए कहा, “आपने मुझे इतना गंभीर होकर बुलाया है, इसलिए मैं डर गई हूँ। सब ठीक तो है न?”
सरोज देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “सब ठीक है। बल्कि शायद पहले से भी बेहतर होने वाला है।”
नैना ने लिफाफा फिर से उनकी ओर बढ़ाते हुए पूछा, “फिर इसमें क्या है?”
सरोज देवी ने धीरे से कहा, “तेरे नाम का एक बैंक खाता है। उसमें मैंने कुछ पैसे जमा किए हैं।”
नैना हैरान रह गई।
उसने तुरंत कहा, “माँ जी, मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए। आपने हमेशा मुझे अपनी बेटी की तरह रखा है, वही मेरे लिए बहुत है।”
सरोज देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “इसीलिए तो ये पैसे तुझे दे रही हूँ।”
नैना कुछ समझ नहीं पाई।
सरोज देवी ने आगे कहा, “तू पिछले तीन साल से इस घर के लिए बहुत कुछ कर रही है। लेकिन अब मैं चाहती हूँ कि तू अपने लिए भी कुछ करे।”
नैना की आँखें नम हो गईं।
उसने धीरे से पूछा, “अपने लिए?”
सरोज देवी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, अपने लिए। क्योंकि बहू बनकर घर संभालना तेरी जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन अपने सपनों को जिंदा रखना भी तेरा अधिकार है।”
नैना कुछ बोल नहीं पाई।
उसने सरोज देवी के हाथों को दोनों हथेलियों में थाम लिया।
नैना ने भावुक होकर कहा, “माँ जी, आपने मुझे कभी बहू जैसा महसूस ही नहीं होने दिया।”
सरोज देवी मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों में पुराने दिनों की एक कहानी छिपी थी।
उन्होंने कहा, “क्योंकि मैंने खुद बहू बनकर बहुत कुछ सहा है। मैं नहीं चाहती कि मेरी बहू वही सब दोबारा सहे।”
यहीं से उस रिश्ते की असली कहानी शुरू होती थी।
नैना की शादी राघव से हुई थी।
राघव एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। वह जिम्मेदार और शांत स्वभाव का युवक था। उसके पिता का कुछ वर्ष पहले निधन हो चुका था। घर में उसकी माँ सरोज देवी ही थीं।
नैना शादी से पहले एक स्कूल में पढ़ाती थी।
उसे बच्चों के साथ रहना बहुत पसंद था। वह चाहती थी कि कुछ वर्षों की नौकरी के बाद अपनी खुद की छोटी-सी कोचिंग और पुस्तकालय शुरू करे, जहाँ आसपास के गरीब बच्चों को कम फीस में पढ़ाया जा सके।
लेकिन शादी के बाद उसे लगा कि शायद उसके सारे सपने धीरे-धीरे पीछे छूट जाएंगे।
जिस दिन वह पहली बार इस घर में आई थी, उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह ससुराल में किसी को शिकायत का मौका नहीं देगी।
उसे डर था कि कहीं लोग यह न कहें कि नई बहू नौकरी के बहाने घर की जिम्मेदारियों से बचती है।
लेकिन सरोज देवी ने शादी के कुछ ही दिनों बाद उसकी सोच बदल दी।
एक दिन नैना रसोई में लगातार काम कर रही थी।
सरोज देवी ने उसे देखते हुए कहा, “नैना, तू कब से रसोई में लगी है?”
नैना ने जवाब दिया, “माँ जी, बस खाना बना रही हूँ। अभी दाल और सब्जी बाकी है।”
सरोज देवी ने कहा, “तू जाकर आराम कर। दाल मैं बना देती हूँ।”
नैना ने तुरंत मना करते हुए कहा, “नहीं माँ जी, आप रहने दीजिए। मैं कर लूँगी।”
सरोज देवी ने थोड़ा सख्त होकर कहा, “मैंने पूछा नहीं है, कहा है। जा, अपने कमरे में बैठ।”
नैना घबरा गई।
उसे लगा कि शायद उसकी कोई गलती हो गई है।
वह कमरे में जाकर चुपचाप बैठ गई।
कुछ देर बाद सरोज देवी उसके कमरे में आईं।
नैना ने डरते हुए पूछा, “माँ जी, मुझसे कोई गलती हो गई क्या?”
सरोज देवी उसके पास बैठ गईं।
उन्होंने कहा, “गलती हुई है, लेकिन तेरी नहीं।”
नैना ने हैरानी से पूछा, “फिर किसकी?”
सरोज देवी ने मुस्कुराकर कहा, “मेरी। मैंने तुझे बहू समझकर रसोई में खड़ा कर दिया। मुझे पहले दिन ही समझ लेना चाहिए था कि तू मेरी बेटी जैसी है।”
नैना की आँखें भर आईं।
उसने पूछा, “लेकिन माँ जी, घर का काम तो मुझे भी करना चाहिए।”
सरोज देवी ने कहा, “बिल्कुल करना चाहिए। लेकिन घर का काम सिर्फ बहू का नहीं होता। इस घर में जो रहता है, उसकी जिम्मेदारी होती है।”
उसी समय राघव कमरे में आया।
उसने पूछा, “क्या बात हो रही है?”
सरोज देवी ने राघव की तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हारी पत्नी सुबह से काम कर रही है और तुम आराम से घूम रहे हो। आज से ऐसा नहीं चलेगा।”
राघव ने हँसते हुए कहा, “ठीक है माँ, बताइए मुझे क्या करना है?”
सरोज देवी ने कहा, “रात के बर्तन तुम साफ करोगे।”
राघव ने तुरंत कहा, “जी माँ।”
नैना ने पहली बार महसूस किया कि शायद यह घर बाकी घरों से अलग है।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
शादी के लगभग एक साल बाद नैना को उसके स्कूल की तरफ से एक बड़ा अवसर मिला।
उसे शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में वरिष्ठ शिक्षिका के पद के लिए आवेदन करने का मौका मिला था।
वहाँ वेतन भी ज्यादा था और आगे बढ़ने की संभावना भी।
लेकिन इंटरव्यू की तारीख ऐसी थी कि उसी दिन घर में रिश्तेदार आने वाले थे।
नैना ने सोचा कि वह इंटरव्यू छोड़ देगी।
उसने सरोज देवी से कुछ नहीं कहा।
लेकिन राघव ने उसकी चुप्पी देखकर पूछ लिया, “नैना, तुम इतनी परेशान क्यों हो?”
नैना ने कहा, “कुछ नहीं।”
राघव ने कहा, “तुम्हारे चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा है कि कुछ है। बताओ।”
नैना ने धीरे-धीरे पूरी बात बता दी।
राघव ने पूछा, “इंटरव्यू कब है?”
नैना ने तारीख बता दी।
राघव कुछ कह पाता, उससे पहले सरोज देवी ने दरवाजे से ही सब सुन लिया।
उन्होंने अंदर आते हुए कहा, “तो इसमें परेशान होने वाली क्या बात है?”
नैना ने घबराकर कहा, “माँ जी, उसी दिन घर में रिश्तेदार आ रहे हैं।”
सरोज देवी ने कहा, “रिश्तेदार दो घंटे देर से आएँगे तो उनका सम्मान कम नहीं हो जाएगा। लेकिन अगर तू अपना मौका छोड़ देगी, तो शायद ये मौका फिर न मिले।”
नैना ने कहा, “लेकिन घर की जिम्मेदारी भी तो है।”
सरोज देवी ने मुस्कुराकर कहा, “घर की जिम्मेदारी तू अकेली नहीं उठाएगी।”
राघव ने तुरंत कहा, “मैं नैना को इंटरव्यू के लिए लेकर जाऊँगा।”
सरोज देवी ने कहा, “और घर में आने वाले रिश्तेदारों को मैं संभाल लूँगी।”
नैना ने भावुक होकर कहा, “माँ जी, अगर इंटरव्यू अच्छा नहीं गया तो?”
सरोज देवी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “तब हम दूसरा मौका ढूँढेंगे। लेकिन बिना कोशिश किए हार मानने की इजाजत मैं तुझे नहीं दूँगी।”
नैना इंटरव्यू देने गई।
उसका चयन हो गया।
वह दिन नैना के जीवन के सबसे खुश दिनों में से एक था।
लेकिन खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी।
नए स्कूल में नौकरी शुरू करने के कुछ ही समय बाद नैना पर काम का बोझ बढ़ गया।
वह सुबह जल्दी निकलती और लौटते-लौटते थक जाती।
एक दिन घर लौटकर उसने देखा कि सरोज देवी चुपचाप रसोई में खाना बना रही थीं।
नैना ने तुरंत बैग नीचे रखा और कहा, “माँ जी, आपने मुझे बुलाया क्यों नहीं?”
सरोज देवी ने कहा, “तू थकी हुई आई है। पहले कपड़े बदल और आराम कर।”
नैना ने कहा, “लेकिन आप अकेले क्यों कर रही हैं?”
सरोज देवी ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि आज मेरी बहू को मेरी जरूरत है, रसोई को नहीं।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा, “माँ जी, मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि मैं अच्छी बहू नहीं बन पा रही।”
सरोज देवी ने तुरंत उसका चेहरा अपनी ओर किया।
उन्होंने कहा, “ऐसा दोबारा मत कहना।”
नैना चुप रही।
सरोज देवी ने कहा, “अच्छी बहू वही नहीं होती जो हर समय रसोई में खड़ी रहे। अच्छी बहू वह भी होती है जो अपने परिवार को सम्मान दे, जिम्मेदार बने और अपने पैरों पर खड़ी हो।”
फिर उन्होंने प्यार से कहा, “और याद रख, मुझे ऐसी बहू नहीं चाहिए जो अपनी पहचान खोकर सिर्फ मेरी सेवा करती रहे। मुझे ऐसी बहू चाहिए जिसे देखकर मुझे गर्व हो।”
नैना ने उसी दिन सरोज देवी के पैर छू लिए।
लेकिन घर की शांति को कुछ लोगों की नजर लग गई।
सरोज देवी की छोटी बहन विमला देवी अक्सर उनके घर आती थीं।
उन्हें नैना का नौकरी करना पसंद नहीं था।
एक दिन उन्होंने सरोज देवी से कहा, “दीदी, तुमने बहू को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है।”
सरोज देवी ने पूछा, “क्यों?”
विमला देवी ने कहा, “नौकरी भी करती है, घर के काम भी अपनी मर्जी से करती है और ऊपर से तुम उसकी तारीफ करती रहती हो। हमारे जमाने में बहुएँ ऐसी नहीं होती थीं।”
सरोज देवी ने शांत स्वर में कहा, “हमारे जमाने में बहुत कुछ ऐसा भी था जो सही नहीं था।”
विमला देवी ने कहा, “तुम्हें डर नहीं लगता कि कल को यही बहू तुम्हारे ऊपर हुक्म चलाएगी?”
सरोज देवी ने हँसते हुए कहा, “जो बहू मेरे दर्द में मेरे सिर पर तेल लगाए, मेरी दवाइयों का समय याद रखे और मेरी पसंद की चाय बिना पूछे बना दे, उससे मुझे हुक्म का डर नहीं लगता।”
विमला देवी चुप हो गईं।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ महीनों बाद सरोज देवी की तबीयत अचानक खराब रहने लगी।
डॉक्टर ने कुछ जांच कराने की सलाह दी।
नैना ने स्कूल से छुट्टी ले ली।
राघव ने कहा, “नैना, तुम अपनी नौकरी का नुकसान मत करो। मैं माँ को लेकर चला जाऊँगा।”
नैना ने कहा, “माँ सिर्फ आपकी नहीं हैं। मेरी भी हैं।”
सरोज देवी ने यह बात सुन ली।
उन्होंने नैना को पास बुलाकर कहा, “बहू, मेरी बीमारी को अपनी जिम्मेदारी मत बना लेना। मुझे इलाज चाहिए, तेरी जिंदगी की कुर्बानी नहीं।”
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, आपकी देखभाल करना मेरे लिए बोझ नहीं है।”
सरोज देवी ने कहा, “मुझे पता है। लेकिन प्यार का मतलब यह नहीं कि इंसान अपनी पूरी जिंदगी रोक दे।”
नैना ने जवाब दिया, “और परिवार का मतलब यह भी नहीं कि मुश्किल समय में एक-दूसरे को अकेला छोड़ दिया जाए।”
सरोज देवी ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में गर्व था।
उन्होंने कहा, “तूने आज मेरी बात मुझसे ही बेहतर समझा दी।”
कुछ समय बाद सरोज देवी की तबीयत ठीक हो गई।
लेकिन एक दिन नैना के जीवन में ऐसा मोड़ आया, जिसने पूरे परिवार को हिला दिया।
नैना के स्कूल में एक महत्वपूर्ण पद खाली हुआ था।
प्रधानाचार्य ने उसे बुलाकर कहा, “नैना, हम चाहते हैं कि आप अकादमिक कोऑर्डिनेटर का पद संभालें।”
नैना ने खुशी से पूछा, “सर, लेकिन इसके लिए मुझे अतिरिक्त प्रशिक्षण लेना होगा।”
प्रधानाचार्य ने कहा, “हाँ। प्रशिक्षण के लिए आपको तीन महीने के लिए दूसरे शहर जाना होगा।”
नैना के चेहरे की खुशी अचानक गायब हो गई।
उसने कहा, “तीन महीने?”
प्रधानाचार्य ने कहा, “हाँ। यह आपके करियर के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। लेकिन फैसला आपका है।”
नैना घर लौटी तो उसके हाथ में नियुक्ति संबंधी पत्र था।
सरोज देवी ने पूछा, “क्या हुआ?”
नैना ने चुपचाप कागज उनके हाथ में रख दिया।
सरोज देवी ने पढ़कर कहा, “तू जाएगी।”
नैना ने तुरंत कहा, “लेकिन माँ जी, आपको छोड़कर?”
सरोज देवी ने कहा, “तू नौकरी करने नहीं, अपने भविष्य को मजबूत करने जा रही है।”
नैना ने कहा, “लेकिन घर?”
सरोज देवी ने कहा, “घर यहाँ रहेगा। राघव रहेगा। मैं रहूँगी। तू वापस आएगी। तीन महीने से घर नहीं टूटता।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा, “मुझे डर लगता है।”
सरोज देवी ने पूछा, “किस बात का?”
नैना ने कहा, “कहीं मैं स्वार्थी तो नहीं हो जाऊँगी?”
सरोज देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “अपने सपने पूरे करना स्वार्थ नहीं है। दूसरों के अधिकार छीनना स्वार्थ है। तू ऐसा कुछ नहीं कर रही।”
राघव ने भी कहा, “नैना, जाओ। मैं चाहता हूँ कि जब तुम वापस आओ तो तुम्हें लगे कि तुमने सही फैसला लिया था।”
नैना प्रशिक्षण के लिए चली गई।
तीन महीने उसने खूब मेहनत की।
वह हर रात सरोज देवी से फोन पर बात करती।
एक रात उसने पूछा, “माँ, मेरी बहुत याद आती है?”
सरोज देवी ने हँसते हुए कहा, “बहुत।”
नैना ने पूछा, “फिर आप मुझे वापस क्यों नहीं बुलातीं?”
सरोज देवी ने कहा, “क्योंकि मैं तुझे अपनी कमी पूरी करने के लिए नहीं, अपना जीवन बनाने के लिए बहू बनाकर लाई हूँ।”
नैना हँस पड़ी।
लेकिन उसी रात सरोज देवी के हाथ से फोन छूट गया।
उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी।
राघव उन्हें अस्पताल ले गया।
डॉक्टर ने बताया कि ब्लड प्रेशर काफी बढ़ गया था, लेकिन समय पर इलाज मिल जाने के कारण खतरा टल गया।
राघव ने नैना को फोन करने के लिए मोबाइल उठाया।
सरोज देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उन्होंने कमजोर आवाज में कहा, “नैना को मत बताना।”
राघव ने कहा, “माँ, उसे पता होना चाहिए।”
सरोज देवी ने कहा, “अगर उसे पता चला तो वह अपना प्रशिक्षण छोड़कर वापस आ जाएगी। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उसका भविष्य रुके।”
राघव चुप हो गया।
लेकिन संयोग से नैना ने उसी समय अस्पताल से आने वाली एक कॉल देख ली।
उसने तुरंत राघव को फोन किया।
नैना ने घबराकर पूछा, “राघव, माँ को क्या हुआ?”
राघव कुछ बोल नहीं पाया।
नैना ने फिर पूछा, “मुझे सच बताओ।”
राघव ने कहा, “माँ अस्पताल में हैं, लेकिन अब खतरा नहीं है।”
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने कहा, “मैं अभी वापस आ रही हूँ।”
तभी सरोज देवी ने राघव से फोन ले लिया।
उन्होंने सख्त आवाज में कहा, “नैना, अगर तूने अपना प्रशिक्षण बीच में छोड़ा तो मैं तुझसे बात नहीं करूँगी।”
नैना रोते हुए बोली, “माँ, आप अस्पताल में हैं और मैं वहाँ नहीं हूँ। मैं कैसे रहूँ?”
सरोज देवी ने कहा, “जैसे मैं रह रही हूँ। मजबूत बनकर।”
नैना ने कहा, “माँ, मुझे आपकी चिंता हो रही है।”
सरोज देवी ने जवाब दिया, “और मुझे तेरे भविष्य की चिंता हो रही है। इसलिए मेरी बात मान।”
नैना चुप हो गई।
सरोज देवी ने कहा, “तूने मुझसे एक वादा किया था।”
नैना ने पूछा, “कौन-सा?”
सरोज देवी ने कहा, “कि तू अपने सपनों से कभी भागेगी नहीं।”
नैना ने आँसू पोंछते हुए कहा, “हाँ माँ।”
सरोज देवी ने कहा, “तो फिर अपना वादा निभा।”
फोन कट गया।
नैना उस रात बहुत रोई।
लेकिन अगले दिन उसने प्रशिक्षण पूरा करने का फैसला किया।
तीन महीने बाद जब वह घर लौटी, तो उसके हाथ में प्रमाणपत्र था।
राघव और सरोज देवी दरवाजे पर खड़े उसका इंतजार कर रहे थे।
नैना ने अंदर आते ही सबसे पहले सरोज देवी के पैर छुए।
सरोज देवी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
उन्होंने कहा, “मुझे अपनी बहू पर बहुत गर्व है।”
नैना रोते हुए बोली, “माँ, अगर आपने उस दिन मुझे रोका होता तो मैं कभी यहाँ तक नहीं पहुँच पाती।”
सरोज देवी ने कहा, “और अगर तूने मुझे माँ मानकर मेरी बात पर भरोसा न किया होता, तो मेरा भरोसा अधूरा रह जाता।”
कुछ महीनों बाद नैना को अकादमिक कोऑर्डिनेटर का पद मिल गया।
उसकी जिंदगी बदल रही थी।
लेकिन उसने अपना पुराना सपना नहीं छोड़ा।
उसने घर के पास खाली पड़े एक छोटे से कमरे को किराए पर लिया और वहाँ गरीब बच्चों के लिए शाम की कक्षा शुरू की।
पहले दिन केवल पाँच बच्चे आए।
राघव ने मजाक करते हुए कहा, “मैडम, आपकी क्लास में तो पाँच ही विद्यार्थी हैं।”
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “पाँच भी किसी के भविष्य की शुरुआत हो सकते हैं।”
सरोज देवी ने कहा, “और एक दिन यही पाँच बच्चे पाँच सौ बच्चों का रास्ता बदल सकते हैं।”
धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।
कुछ महीनों में वह कमरा छोटा पड़ गया।
नैना ने दूसरा कमरा लिया।
फिर एक छोटा पुस्तकालय शुरू किया।
उसने उसका नाम रखा—“सरोज ज्ञान केंद्र।”
उद्घाटन के दिन सरोज देवी ने फीता काटा।
नैना ने उनके हाथ में कैंची देते हुए कहा, “माँ, यह आपके नाम पर है।”
सरोज देवी भावुक हो गईं।
उन्होंने कहा, “तूने मेरा नाम क्यों रखा?”
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि अगर आपने मेरे सपनों को सम्मान नहीं दिया होता, तो यह जगह कभी नहीं बनती।”
सरोज देवी की आँखों से आँसू निकल आए।
उन्होंने नैना को गले लगाते हुए कहा, “तू मेरी बहू बनकर इस घर में आई थी। लेकिन आज तू मेरी बेटी से भी बढ़कर है।”
नैना ने कहा, “और आप मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं।”
राघव ने दोनों को देखते हुए कहा, “मुझे लगता है इस घर में मेरी कोई जरूरत ही नहीं बची।”
सरोज देवी ने हँसते हुए कहा, “तू है न, दोनों के बीच चाय बनाने के लिए।”
तीनों हँस पड़े।
लेकिन उस हँसी के पीछे एक बहुत गहरी सच्चाई थी।
परिवार वह नहीं जहाँ केवल रिश्तों के नाम बड़े हों।
परिवार वह है जहाँ किसी के सपनों को दूसरे की जिम्मेदारी समझकर कुचला न जाए।
जहाँ बहू से सिर्फ सेवा की उम्मीद न हो, बल्कि उसकी इच्छाओं को भी समझा जाए।
जहाँ सास अपने पुराने अनुभवों को बहू पर बोझ न बनाए, बल्कि उसके रास्ते की रोशनी बनाए।
और जहाँ बहू भी स्वतंत्रता को अधिकार समझे, लेकिन परिवार के प्रति अपने प्रेम और जिम्मेदारी को कभी न भूले।
सरोज देवी ने अपनी जिंदगी में जो खोया था, उसे नैना में जीतते हुए देखा।
और नैना ने जो सपना शादी के बाद खो देने का डर रखा था, उसे अपनी सास के विश्वास की वजह से पा लिया।
रिश्ता खून से नहीं था।
लेकिन भरोसा इतना गहरा था कि खून के रिश्ते भी उसके सामने छोटे लगते थे।
कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे रिश्ते देती है जिन्हें हम शुरुआत में केवल नाम से पहचानते हैं।
लेकिन समय के साथ वही रिश्ता हमारे जीवन की सबसे मजबूत वजह बन जाता है।
क्योंकि सास और बहू का रिश्ता अगर अधिकार की लड़ाई बन जाए तो घर छोटा पड़ जाता है, लेकिन अगर वही रिश्ता समझदारी और सम्मान पर टिक जाए तो एक घर से कई सपनों को उड़ान मिल सकती है।

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