बहू की बहन ने निभाया रिश्ता, सास को मिला सबक

 

An emotional Indian family moment showing a pregnant daughter-in-law, her husband appreciating her younger sister’s support, and the mother-in-law realizing her mistake.


“बहू, तुम अपनी छोटी बहन को फोन करके बुला लो। तुम्हारी डिलीवरी का समय नजदीक आ गया है। अब घर का काम भी संभालना पड़ेगा और तुम्हारी देखभाल भी करनी होगी। मुझसे अकेले इतना सब नहीं हो पाएगा।”


कमला देवी ने अपनी गर्भवती बहू काव्या से कहा।


काव्या ने अपने पेट पर हाथ रखते हुए धीरे से जवाब दिया, “मम्मी जी, लेकिन रितु की अगले महीने बी.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षाएं हैं। वह अभी अपनी पढ़ाई में लगी हुई है। अगर उसे यहां बुला लिया, तो उसकी तैयारी का नुकसान हो जाएगा।”


कमला देवी ने नाराज होते हुए कहा, “तो क्या हुआ बहू? दो-चार दिन अपनी बहन के लिए काम कर लेगी, तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा? आखिर तुम उसकी बड़ी बहन हो। तुम्हारे मुश्किल समय में वही काम नहीं आएगी, तो कौन आएगा?”


काव्या ने समझाते हुए कहा, “मम्मी जी, मैं यह नहीं कह रही कि रितु मेरी मदद नहीं करेगी। वह तो मेरे एक बार कहने पर सब छोड़कर आ जाएगी। लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उसकी पढ़ाई खराब हो। पापा ने बड़ी मुश्किल से उसे कॉलेज में पढ़ाया है।”


कमला देवी ने मुंह बनाते हुए कहा, “अरे बहू, पढ़ाई तो चलती रहती है। और फिर उसे कौन सा कलेक्टर बनना है? घर के काम करते हुए भी किताबें पढ़ सकती है।”


काव्या को अपनी सास की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


काव्या की शादी को तीन साल हो चुके थे। उसका पति निखिल एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। घर में निखिल, काव्या और कमला देवी रहते थे।


कमला देवी की एक बेटी भी थी, जिसका नाम पूजा था। पूजा की शादी पांच साल पहले एक संपन्न परिवार में हुई थी। उसके दो बच्चे थे और वह अपने ससुराल में आराम से रहती थी।


कमला देवी अपनी बेटी पूजा से बहुत प्यार करती थीं। पूजा की छोटी से छोटी परेशानी भी उन्हें बड़ी लगती थी। लेकिन जब बात बहू काव्या की आती, तो उनका व्यवहार बदल जाता था।


काव्या के माता-पिता में से उसकी मां का निधन सात साल पहले हो चुका था। उसके पिता रामप्रसाद जी ने अपनी दोनों बेटियों को बड़ी मुश्किल से पाला था।


रामप्रसाद जी एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे। आमदनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटियों की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी।


काव्या की शादी के बाद अब उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी छोटी बेटी रितु की पढ़ाई पूरी करवाना थी।


काव्या जानती थी कि रितु अपनी पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर है।


इसीलिए वह उसे परेशान नहीं करना चाहती थी।


उसी समय निखिल कमरे में आया।


निखिल ने अपनी मां से पूछा, “मम्मी, किस बात पर चर्चा हो रही है?”


कमला देवी ने जवाब दिया, “बेटा, मैं काव्या से कह रही हूं कि अपनी बहन को बुला ले। डिलीवरी के समय घर संभालने के लिए कोई तो चाहिए।”


निखिल ने कहा, “लेकिन मम्मी, रितु की परीक्षाएं हैं। मैंने काव्या से पहले ही कहा था कि हम कुछ दिनों के लिए एक सहायिका रख लेंगे। वह घर का काम कर देगी और काव्या की देखभाल के लिए भी किसी अनुभवी महिला की व्यवस्था कर लेंगे।”


कमला देवी ने तुरंत मना करते हुए कहा, “नहीं बेटा, मुझे घर में बाहर के लोगों का आना-जाना पसंद नहीं है। पता नहीं कौन कैसी हो। अपने घर का काम अपने लोग ही करें, तो अच्छा रहता है।”


निखिल ने अपनी मां को समझाया, “मम्मी, लेकिन रितु भी तो अभी बच्ची ही है। उसे नवजात बच्चे को संभालने का अनुभव कहां है?”


कमला देवी ने कहा, “तो सीख जाएगी। क्या लड़कियां ससुराल जाकर सब कुछ पहले से सीखकर आती हैं?”


निखिल कुछ देर अपनी मां को देखता रहा।


फिर उसने पूछा, “मम्मी, पूजा दीदी आने वाली थीं ना? पिछले महीने आपने कहा था कि दीदी डिलीवरी के समय आकर आपकी मदद करेंगी।”


कमला देवी ने नजरें फेरते हुए कहा, “पूजा नहीं आ पाएगी।”


निखिल ने हैरान होकर पूछा, “क्यों मम्मी? सब ठीक तो है?”


कमला देवी ने जवाब दिया, “हां, सब ठीक है। वह अपने पति और बच्चों के साथ दस दिन के लिए घूमने जा रही है। बहुत पहले से उसका कार्यक्रम बना हुआ है।”


निखिल ने पूछा, “लेकिन मम्मी, पिछले हफ्ते तो दीदी ने कहा था कि वह यहां आने की तैयारी कर रही हैं। फिर अचानक घूमने का कार्यक्रम कैसे बन गया?”


कमला देवी ने कहा, “उसके ससुराल वालों ने घूमने का कार्यक्रम बना लिया है। मैंने ही उससे कहा कि वह आराम से घूमकर आए। यहां की चिंता मत करे।”


निखिल ने कुछ सोचते हुए कहा, “मम्मी, दीदी घूमने जाएं, इसमें कोई परेशानी नहीं है। लेकिन आपने खुद उन्हें आने से मना कर दिया और अब रितु की परीक्षा छुड़वाकर उसे बुलाना चाहती हैं?”


कमला देवी ने नाराज होकर कहा, “तू बात को कहां से कहां ले जा रहा है? पूजा शादीशुदा है। उसके पति और बच्चे हैं। उसकी अपनी जिम्मेदारियां हैं। रितु तो अभी अपने पिता के घर रहती है। उसे कौन सा ससुराल संभालना है?”


निखिल ने जवाब दिया, “मम्मी, रितु की पढ़ाई भी उसकी जिम्मेदारी है।”


कमला देवी ने हाथ झटकते हुए कहा, “अच्छा बाबा, अब तुम दोनों ही तय कर लो। मुझसे जितना होगा, मैं कर दूंगी। लेकिन बाद में यह मत कहना कि मैंने तुम्हारी मदद नहीं की।”


इतना कहकर कमला देवी अपने कमरे में चली गईं।


काव्या की आंखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


निखिल ने उसके पास बैठते हुए कहा, “तुम परेशान मत हो। मैं सब संभाल लूंगा। रितु को बुलाने की जरूरत नहीं है।”


काव्या ने धीरे से कहा, “निखिल, मैं जानती हूं कि आप मेरे लिए सब कर रहे हैं। लेकिन मम्मी जी भी उम्र के इस पड़ाव पर अकेले कितना काम करेंगी? अगर रितु कुछ दिनों के लिए आ जाए, तो शायद उन्हें भी सहारा मिल जाएगा।”


निखिल ने पूछा, “लेकिन उसकी परीक्षा?”


काव्या ने जवाब दिया, “मैं उससे बात करूंगी। अगर वह अपनी पढ़ाई के साथ कुछ दिनों के लिए आ सकती है, तभी बुलाएंगे। उसे मजबूर नहीं करेंगे।”


निखिल ने काव्या का हाथ पकड़ते हुए कहा, “ठीक है, लेकिन एक बात याद रखना। तुम्हारी बहन यहां मदद करने आएगी, घर की नौकरानी बनने नहीं।”


काव्या ने सहमति में सिर हिला दिया।


उसे क्या पता था कि आने वाले दिनों में उसकी छोटी बहन को इसी घर में कितनी बातें सुननी पड़ेंगी।



काव्या ने रितु को फोन किया।


रितु ने फोन उठाते ही खुशी से पूछा, “दीदी, कैसी हो? और मेरा छोटा सा भांजा या भांजी कैसा है?”


काव्या हंसते हुए बोली, “अभी तो आया ही नहीं है। तू पहले ही इतनी उत्साहित हो रही है।”


रितु ने कहा, “दीदी, मैं तो बस उस दिन का इंतजार कर रही हूं जब उसे पहली बार गोद में लूंगी।”


काव्या कुछ देर चुप रही।


रितु ने पूछा, “क्या हुआ दीदी? तुम कुछ परेशान लग रही हो।”


काव्या ने उसे घर की सारी बात बता दी।


फिर उसने कहा, “रितु, मैं तुझे बुलाना नहीं चाहती थी। तेरी परीक्षाएं नजदीक हैं। लेकिन यहां मम्मी जी अकेले काम नहीं संभाल पाएंगी। निखिल भी नौकरी पर जाते हैं। इसलिए समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं।”


रितु ने तुरंत कहा, “बस इतनी सी बात है? दीदी, मैं आ जाऊंगी।”


काव्या ने समझाया, “लेकिन तेरी पढ़ाई?”


रितु ने जवाब दिया, “दीदी, मेरी तैयारी काफी हद तक हो चुकी है। मैं अपनी किताबें लेकर आ जाऊंगी। जब समय मिलेगा, पढ़ लूंगी। और परीक्षा से पहले वापस लौट आऊंगी।”


काव्या ने कहा, “लेकिन तू अपने भविष्य के साथ समझौता मत करना।”


रितु ने प्यार से जवाब दिया, “दीदी, तुमने मेरे लिए कितना कुछ किया है। जब मम्मी चली गई थीं, तब तुमने ही तो मुझे संभाला था। अब तुम्हें मेरी जरूरत है, तो मैं कैसे मना कर सकती हूं?”


रितु की बात सुनकर काव्या की आंखें भर आईं।


मां के निधन के समय काव्या केवल उन्नीस साल की थी और रितु बारह साल की।


उस छोटी सी उम्र में काव्या ने अपनी पढ़ाई के साथ घर की जिम्मेदारियां भी संभाली थीं।


रितु को स्कूल के लिए तैयार करना, उसके बाल बनाना, खाना खिलाना और उसकी पढ़ाई में मदद करना, यह सब काव्या ही करती थी।


रितु के लिए काव्या केवल बड़ी बहन नहीं, मां जैसी भी थी।


काव्या ने भावुक होकर कहा, “ठीक है रितु, लेकिन एक शर्त है। तू अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ेगी।”


रितु ने हंसकर कहा, “पक्का वादा।”


तीन दिन बाद रितु अपनी किताबों और कपड़ों का बैग लेकर काव्या के ससुराल पहुंच गई।


दरवाजा खोलते ही कमला देवी ने कहा, “अच्छा हुआ बेटी, तू आ गई। अब मेरी भी थोड़ी परेशानी कम होगी।”


रितु ने उनके पैर छूते हुए कहा, “नमस्ते आंटी जी। आप चिंता मत कीजिए। मुझसे जितना हो पाएगा, मैं कर दूंगी।”


कमला देवी ने कहा, “अरे, अब यहां आई है तो घर का काम भी सीख लेना। कल को तेरी शादी होगी, तो ससुराल में काम आएगा।”


रितु मुस्कुरा दी।


वह अपनी दीदी के कमरे में पहुंची।


काव्या को देखते ही उसने उसे गले लगा लिया।


रितु ने कहा, “दीदी, अब तुम्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी है। मैं आ गई हूं।”


काव्या ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगली, तू मेरी मदद करने आई है, अपनी पढ़ाई छोड़ने नहीं। याद रखना।”


रितु ने कहा, “हां दीदी, मुझे सब याद है।”


लेकिन घर में आने के अगले ही दिन से रितु की दिनचर्या बदल गई।


कमला देवी उसे कभी रसोई में बुला लेतीं, कभी कपड़े तह करने को कहतीं, तो कभी घर की सफाई करवाने लगतीं।


रितु को काम करने में कोई परेशानी नहीं थी। वह अपने पिता के घर में भी घर के काम करती थी।


लेकिन यहां समस्या यह थी कि उसे पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिल रहा था।


जब भी वह किताब लेकर बैठती, कमला देवी की आवाज आ जाती।


“रितु, जरा रसोई में आकर सब्जियां काट दे।”


रितु किताब बंद करके चली जाती।


कुछ देर बाद वह दोबारा पढ़ने बैठती, तो कमला देवी कहतीं, “रितु, जरा अलमारी के कपड़े ठीक कर दे।”


रितु फिर उठ जाती।


एक दिन काव्या ने अपनी बहन को किताब लेकर बैठे देखा।


उसने पूछा, “रितु, कितनी पढ़ाई हुई?”


रितु ने मुस्कुराकर कहा, “दीदी, अभी तो बस दो अध्याय ही पढ़ पाई हूं।”


काव्या ने हैरान होकर पूछा, “पूरे दिन में सिर्फ दो अध्याय?”


रितु ने बात संभालते हुए कहा, “अरे दीदी, अभी बहुत समय है। तुम चिंता मत करो।”


लेकिन काव्या समझ गई कि रितु कुछ छिपा रही है।


उसी समय कमला देवी कमरे में आईं।


उन्होंने रितु को किताब के साथ देखकर कहा, “अरे, तू फिर पढ़ने बैठ गई? रसोई में बर्तन रखे हैं। पहले उन्हें साफ कर दे। फिर जितना मन करे, पढ़ती रहना।”


काव्या ने कहा, “मम्मी जी, बर्तन तो बाद में भी हो सकते हैं। रितु की परीक्षा है।”


कमला देवी ने जवाब दिया, “बहू, मैं उसे पढ़ने से मना थोड़ी कर रही हूं। बस थोड़ा सा काम बता रही हूं। घर में रहकर इतना भी नहीं करेगी क्या?”


रितु तुरंत उठते हुए बोली, “कोई बात नहीं दीदी, मैं कर देती हूं।”


काव्या ने अपनी बहन को जाते हुए देखा।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसने रितु को बुलाकर शायद गलती कर दी है।



रितु के आने के पांच दिन बाद काव्या को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।


निखिल तुरंत उसे अस्पताल लेकर गया।


कमला देवी और रितु भी साथ गए।


अस्पताल में डॉक्टर ने काव्या की जांच की और बताया कि प्रसव में कुछ समय लग सकता है।


निखिल अपनी पत्नी के पास बना रहा।


रितु बाहर बैठकर बार-बार भगवान से प्रार्थना करती रही।


कई घंटों बाद काव्या ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया।


डॉक्टर ने निखिल को खुशखबरी देते हुए कहा, “बधाई हो, आपके घर बेटी आई है। मां और बच्ची दोनों ठीक हैं।”


निखिल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।


उसने तुरंत रितु से कहा, “रितु, तू मासी बन गई!”


रितु खुशी से उछल पड़ी।


उसने कहा, “जीजू, सच में? दीदी ठीक हैं ना?”


निखिल ने जवाब दिया, “हां, दोनों बिल्कुल ठीक हैं।”


कमला देवी भी पोती के जन्म से खुश थीं।


उन्होंने कहा, “चलो, भगवान ने घर में लक्ष्मी भेज दी।”


अस्पताल में तीन दिन रहने के बाद काव्या अपनी बेटी के साथ घर आ गई।


डॉक्टर ने उसे आराम करने, पौष्टिक भोजन लेने और ज्यादा मेहनत से बचने की सलाह दी थी।


घर आने के बाद निखिल ने अपनी बेटी का नाम अन्वी रखा।


काव्या को भी यह नाम बहुत पसंद आया।


लेकिन अब घर में जिम्मेदारियां पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थीं।


अन्वी रात में कई बार दूध पीने के लिए उठती थी।


काव्या को भी प्रसव के बाद कमजोरी महसूस होती थी।


रितु अपनी दीदी के पास बैठकर बच्ची के कपड़े बदलने और दूसरी छोटी-मोटी जरूरतों में मदद करती थी।


लेकिन उसे नवजात बच्चे की देखभाल का अनुभव नहीं था।


एक रात अन्वी लगातार रो रही थी।


काव्या उसे दूध पिलाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बच्ची शांत नहीं हो रही थी।


रितु घबराकर बोली, “दीदी, इसे क्या हो गया? कहीं इसे कोई परेशानी तो नहीं है?”


काव्या ने थकी हुई आवाज में कहा, “पता नहीं रितु। तू जरा निखिल को बुला दे।”


रितु ने निखिल को जगाया।


निखिल तुरंत आया और बच्ची को गोद में लेकर शांत कराने लगा।


कुछ देर बाद बच्ची शांत हो गई।


निखिल ने काव्या से कहा, “तुम परेशान मत हो। जरूरत पड़ेगी, तो डॉक्टर से बात कर लेंगे।”


अगले दिन निखिल ने अपनी मां से कहा, “मम्मी, काव्या को अभी ज्यादा आराम की जरूरत है। रितु भी अकेले सब नहीं संभाल सकती। मैं एक अनुभवी सहायिका रख रहा हूं, जो दिन में आकर काव्या और बच्ची की देखभाल में मदद करेगी।”


कमला देवी ने तुरंत कहा, “क्यों? रितु किसलिए आई है?”


निखिल ने जवाब दिया, “मम्मी, रितु यहां अपनी बहन का साथ देने आई है। उसे बच्चे की देखभाल का अनुभव नहीं है। और उसकी परीक्षाएं भी हैं।”


कमला देवी ने कहा, “हमारे जमाने में तो औरतें अकेले चार-चार बच्चे पाल लेती थीं। तब कौन सी सहायिका आती थी?”


निखिल ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी, पहले औरतें बहुत परेशानियां सहती थीं। इसका मतलब यह नहीं कि आज भी उन्हें वही परेशानियां सहनी चाहिए।”


कमला देवी को बेटे की बात पसंद नहीं आई।


उन्होंने कहा, “अच्छा, अब तू मुझे सिखाएगा कि बच्चे कैसे पाले जाते हैं?”


निखिल ने जवाब दिया, “नहीं मम्मी, मैं बस इतना चाहता हूं कि काव्या को आराम मिले और रितु अपनी पढ़ाई कर सके।”


इसके बाद निखिल ने एक अनुभवी महिला, सरिता, को काम पर रख लिया।


सरिता दिन में आकर घर के जरूरी काम करती थी और काव्या को बच्ची की देखभाल में मदद करती थी।


निखिल ने यह भी साफ कर दिया कि बच्ची की मालिश या किसी विशेष देखभाल की जरूरत होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही काम किया जाएगा।


सरिता के आने से रितु को थोड़ी राहत मिली।


लेकिन कमला देवी को यह बात अच्छी नहीं लगी।


एक दिन उन्होंने रितु से कहा, “वाह बेटी, तेरे तो मजे हो गए। घर का काम करने के लिए दूसरी औरत आ गई और तू आराम से किताबें लेकर बैठ गई।”


रितु ने विनम्रता से कहा, “आंटी जी, मेरी परीक्षा नजदीक है। इसलिए थोड़ा पढ़ रही हूं। कोई काम हो, तो बता दीजिए।”


कमला देवी ने ताना मारते हुए कहा, “हां, हां, पढ़ ले। आजकल की लड़कियों को घर के काम से ज्यादा किताबों की चिंता रहती है।”


रितु ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उसकी आंखों में उदासी उतर आई।



रितु को काव्या के ससुराल आए लगभग पंद्रह दिन हो चुके थे।


इन दिनों उसने अपनी दीदी और नन्ही अन्वी की देखभाल में जितना संभव था, उतना सहयोग किया।


लेकिन कमला देवी उसके हर काम में कमी निकालती रहती थीं।


एक दिन रितु ने सब्जी बनाई।


कमला देवी ने पहला निवाला खाते ही कहा, “यह क्या बनाया है? सब्जी में स्वाद ही नहीं है। तेरी मां होती, तो तुझे कुछ खाना बनाना सिखाती।”


रितु का हाथ वहीं रुक गया।


अपनी मां का नाम सुनते ही उसका चेहरा उतर गया।


उसने धीरे से कहा, “आंटी जी, मम्मी तो बहुत पहले चली गई थीं। दीदी ने ही मुझे जितना हो सका, सब सिखाया है।”


कमला देवी ने कहा, “तो तेरी दीदी ने भी ठीक से नहीं सिखाया। अब शादी के बाद क्या करेगी?”


रितु की आंखें भर आईं।


लेकिन उसने सिर झुकाकर कहा, “अगली बार ध्यान रखूंगी।”


उसी समय काव्या कमरे से बाहर आई।


उसने अपनी सास की बात सुन ली थी।


काव्या ने कहा, “मम्मी जी, रितु अभी पढ़ रही है। उसे सब कुछ आना जरूरी नहीं है। और खाना तो अच्छा बना है।”


कमला देवी ने नाराज होकर कहा, “हां, अब मैं कुछ कह भी नहीं सकती। तुम्हारी बहन है, इसलिए उसकी गलती भी तुम्हें दिखाई नहीं देगी।”


काव्या ने जवाब दिया, “मम्मी जी, गलती बताने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन उसकी मम्मी को बीच में लाने की क्या जरूरत थी?”


कमला देवी ने कुछ नहीं कहा और खाना छोड़कर उठ गईं।


रितु ने काव्या से कहा, “दीदी, तुम मेरी वजह से परेशान मत हुआ करो।”


काव्या ने पूछा, “रितु, तू इतनी बातें चुपचाप क्यों सुनती है?”


रितु ने धीरे से कहा, “क्योंकि यह तुम्हारा ससुराल है दीदी। मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण तुम्हारे घर में कोई परेशानी हो।”


काव्या ने अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया।


उसने कहा, “लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई तुझे कुछ भी कहता रहे।”


रितु ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “बस कुछ दिन की बात है। फिर मैं अपने घर चली जाऊंगी।”


काव्या को अपनी बहन की यह बात भीतर तक चुभ गई।


जिस लड़की ने अपनी पढ़ाई छोड़कर उसका साथ दिया, वह अब दिन गिन रही थी कि कब यहां से वापस जाएगी।


उसी रात निखिल ने देखा कि रितु अपने कमरे में किताब खोलकर बैठी है, लेकिन पढ़ नहीं रही।


निखिल ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा, “रितु, क्या हुआ? पढ़ाई नहीं हो रही?”


रितु ने जल्दी से किताब उठाते हुए कहा, “नहीं जीजू, बस थोड़ा थक गई थी।”


निखिल ने पूछा, “मम्मी ने कुछ कहा क्या?”


रितु ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं जीजू, ऐसी कोई बात नहीं है।”


निखिल ने कहा, “देख रितु, मैं जानता हूं कि तू अपनी दीदी की वजह से यहां आई है। लेकिन तेरी पढ़ाई भी बहुत जरूरी है। अगर तुझे वापस जाना है, तो मुझे बता देना। मैं तुझे घर छोड़ आऊंगा।”


रितु ने कहा, “जीजू, बस तीन-चार दिन और रुक जाऊंगी। फिर पापा के पास चली जाऊंगी।”


निखिल ने सिर हिलाते हुए कहा, “ठीक है। लेकिन अब घर के काम की चिंता मत करना। सरिता आ रही है। तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”


रितु ने पहली बार राहत महसूस की।


लेकिन उसे यह नहीं पता था कि उसकी विदाई के समय एक नई बात सामने आने वाली थी।



अन्वी के जन्म के अठारह दिन बाद पूजा अपने मायके आई।


वह अपने पति और बच्चों के साथ घूमकर लौटी थी।


घर में आते ही उसने मां को गले लगाया।


पूजा ने खुशी से कहा, “मम्मी, इस बार तो घूमने में बहुत मजा आया। इतनी सुंदर जगहें देखीं कि वापस आने का मन ही नहीं कर रहा था।”


कमला देवी ने प्यार से पूछा, “अच्छा बेटी, सफर में ज्यादा थकान तो नहीं हुई?”


पूजा ने कहा, “बहुत थक गई हूं मम्मी। बच्चों को संभालना भी पड़ा। अभी तो दो-तीन दिन आराम करूंगी।”


कमला देवी ने तुरंत कहा, “हां बेटी, तू आराम कर। घर की चिंता मत करना।”


रितु रसोई से पानी लेकर आई।


उसने पूजा को नमस्ते किया।


पूजा ने कहा, “अरे रितु, तू अभी तक यहीं है?”


रितु ने जवाब दिया, “जी दीदी, बस कुछ दिन में चली जाऊंगी।”


पूजा ने हंसते हुए कहा, “अच्छा है। कम से कम मम्मी को सहारा मिल गया। वरना भाभी की डिलीवरी के बाद अकेले सब कैसे संभालतीं?”


रितु ने कुछ नहीं कहा।


पूजा ने आगे कहा, “वैसे मैं तो बहुत थक गई हूं। जरा मेरे लिए अदरक वाली चाय बना देना।”


रितु ने कहा, “जी दीदी, अभी बनाती हूं।”


पूजा अपने कमरे में चली गई।


कमला देवी उसके पीछे-पीछे गईं।


उन्होंने पूछा, “बेटी, घूमने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? खाना-पीना ठीक से मिला ना?”


पूजा ने जवाब दिया, “सब बहुत अच्छा था मम्मी। बस पैदल बहुत चलना पड़ा।”


कमला देवी ने कहा, “कोई बात नहीं। अब यहां आराम कर लेना।”


दरवाजे के पास खड़ी काव्या यह सब सुन रही थी।


उसे अपनी सास का बेटी के लिए प्यार देखकर कोई परेशानी नहीं थी।


लेकिन उसे यह सोचकर दुख हो रहा था कि जो आराम पूजा को घूमकर आने के बाद मिल रहा था, वही आराम रितु को इतने दिन काम करने के बाद भी नहीं मिला था।


दो दिन बाद काव्या ने निखिल से कहा, “अब रितु को घर छोड़ आइए। उसकी परीक्षाओं में ज्यादा समय नहीं बचा है।”


निखिल ने कहा, “हां, मैं कल ही छोड़ आऊंगा।”


उसी समय कमला देवी कमरे में आईं।


उन्होंने कहा, “कल क्यों? चार दिन बाद बच्ची के जन्म की खुशी में छोटी सी पूजा रखी है। उस दिन काव्या के पापा भी आएंगे। रितु उनके साथ चली जाएगी।”


निखिल ने कहा, “मम्मी, रितु की परीक्षा है। उसे अब पढ़ाई के लिए समय चाहिए।”


कमला देवी ने जवाब दिया, “चार दिन में कौन सी दुनिया बदल जाएगी? इतने दिन रह गई, तो चार दिन और सही।”


निखिल ने कहा, “मम्मी, हर दिन जरूरी है। मैं उसे कल ही छोड़ आऊंगा।”


कमला देवी नाराज होकर बोलीं, “तुझे तो मेरी कोई बात माननी ही नहीं है।”


निखिल ने जवाब नहीं दिया।


फिर उसने कहा, “मम्मी, रितु के लिए कोई अच्छा सा उपहार भी ले लेना। इतने दिनों तक उसने काव्या और बच्ची की मदद की है।”


कमला देवी ने हैरानी से पूछा, “उपहार? किस बात का उपहार?”


निखिल ने कहा, “मम्मी, वह पहली बार मासी बनी है। और उसने यहां आकर हमारी इतनी मदद भी की है। उसके लिए कुछ अच्छा लेना चाहिए।”


कमला देवी ने कहा, “अरे, अपनी बहन की सेवा की है। कौन सा किसी दूसरे के घर काम करने आई थी? पांच सौ रुपये दे देना और एक सूट दे देना। बहुत है।”


निखिल ने पूछा, “मम्मी, क्या आपको लगता है कि उसकी मेहनत और प्यार की कीमत सिर्फ पांच सौ रुपये है?”


कमला देवी ने कहा, “मैंने कब कहा कि उसकी मेहनत की कीमत लगा रही हूं? लेकिन हमारे यहां बहू की बहन को ज्यादा नेग देने का रिवाज नहीं है।”


तभी पूजा भी वहां आ गई।


उसने कहा, “भैया, मम्मी ठीक ही तो कह रही हैं। रितु कोई मेहमान थोड़ी है। अपनी बहन की मदद करने आई थी।”


निखिल ने पूजा की तरफ देखा।


फिर उसने पूछा, “दीदी, जब अन्वी पैदा हुई थी, तब आप नहीं आ पाईं। कोई बात नहीं। लेकिन अब आप आई हैं, तो क्या आपने सोचा कि रितु ने इतने दिन कैसे संभाला होगा?”


पूजा ने जवाब दिया, “अरे भैया, मैं तो घूमने गई थी। और वैसे भी घर में मम्मी थीं ना।”


निखिल ने कहा, “हां दीदी, मम्मी थीं। लेकिन ज्यादातर जिम्मेदारी रितु पर आ गई थी।”


पूजा ने कहा, “तो क्या हुआ? परिवार में एक-दूसरे के काम आना ही पड़ता है।”


निखिल ने शांत स्वर में कहा, “बिल्कुल दीदी। लेकिन परिवार में एक-दूसरे के काम आने वालों की कद्र करना भी जरूरी है।”


पूजा ने कोई जवाब नहीं दिया।


कमला देवी ने बात बदलते हुए कहा, “अच्छा, अब इस बात को यहीं खत्म करो। पूजा, तेरे लिए मैंने एक साड़ी रखी है। चल, दिखाती हूं।”


पूजा खुशी से मां के साथ चली गई।


निखिल उन्हें जाते हुए देखता रहा।


उसके मन में अब एक बात साफ हो चुकी थी।


रिश्तों की अहमियत केवल इस बात से नहीं होती कि कौन किसका क्या लगता है।


असली अहमियत इस बात से होती है कि जरूरत पड़ने पर कौन किसके साथ खड़ा रहता है।



चार दिन बाद घर में अन्वी के जन्म की खुशी में छोटी सी पूजा रखी गई।


काव्या के पिता रामप्रसाद जी भी उसमें शामिल होने आए।


वह अपनी नातिन के लिए छोटे-छोटे कपड़े, एक चांदी की पायल, काव्या के लिए साड़ी और घर के सदस्यों के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार लेकर आए थे।


रामप्रसाद जी ने अन्वी को गोद में लेते हुए कहा, “मेरी प्यारी नातिन। भगवान तुझे हमेशा खुश रखे।”


उनकी आंखें खुशी से भर आईं।


काव्या ने अपने पिता से कहा, “पापा, आपने इतना सामान क्यों लिया? मैंने तो मना किया था।”


रामप्रसाद जी मुस्कुराकर बोले, “बेटी, पहली बार नाना बना हूं। इतना तो करने दे।”


काव्या ने कहा, “लेकिन पापा, आपकी दुकान का काम भी तो ठीक नहीं चल रहा है।”


रामप्रसाद जी ने प्यार से जवाब दिया, “तू मेरी चिंता मत कर। मैं अपनी हैसियत देखकर ही सब लाया हूं।”


पूजा समाप्त होने के बाद रामप्रसाद जी ने सबको उपहार दिए।


कमला देवी को साड़ी मिली।


पूजा को भी एक सुंदर साड़ी और उसके बच्चों के लिए कपड़े मिले।


पूजा ने साड़ी खोलकर देखी।


उसने कहा, “अच्छी है। लेकिन इसका रंग थोड़ा हल्का है।”


कमला देवी ने भी साड़ी देखते हुए कहा, “हां, रंग तो हल्का है। खैर, कोई बात नहीं।”


रामप्रसाद जी ने विनम्रता से कहा, “बहन जी, दुकान पर मुझे यही अच्छी लगी थी। अगर पसंद नहीं आई, तो बदलवा दूंगा।”


कमला देवी ने कहा, “नहीं-नहीं, रहने दीजिए। अब जो ले आए हैं, वही ठीक है।”


काव्या को अपने पिता का उतरा हुआ चेहरा देखकर दुख हुआ।


वह जानती थी कि पापा ने ये उपहार खरीदने के लिए कितनी बचत की होगी।


निखिल भी सब देख रहा था।


उसने तुरंत कहा, “पापा जी, आपने इतना सब क्यों लिया? आपका आना ही हमारे लिए बहुत है।”


रामप्रसाद जी ने कहा, “बेटा, बेटी के घर खाली हाथ थोड़ी आया जाता है।”


निखिल ने जवाब दिया, “पापा जी, यह आपकी बेटी का घर है। यहां आने के लिए आपको कभी कुछ लाने की जरूरत नहीं है।”


रामप्रसाद जी ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।


पूजा के बाद सभी ने खाना खाया।


फिर रामप्रसाद जी ने कहा, “अच्छा बहन जी, अब हमें चलना चाहिए। रितु की परीक्षा भी नजदीक है। उसे घर जाकर तैयारी करनी है।”


कमला देवी ने कहा, “हां, ले जाइए। अब पूजा भी हो गई है।”


रितु अपना बैग लेकर आ गई।


उसने सबसे पहले काव्या को गले लगाया।


काव्या की आंखों में आंसू आ गए।


काव्या ने कहा, “रितु, तूने मेरे लिए बहुत कुछ किया। अगर तू नहीं आती, तो पता नहीं मैं कैसे संभालती।”


रितु ने प्यार से कहा, “दीदी, तुम ऐसा क्यों कह रही हो? मैं तुम्हारी छोटी बहन हूं। तुम्हारे काम नहीं आऊंगी, तो किसके काम आऊंगी?”


काव्या ने कहा, “बस अब घर जाकर मन लगाकर पढ़ना।”


रितु ने जवाब दिया, “हां दीदी, और तुम अपना और अन्वी का ध्यान रखना।”


फिर रितु ने कमला देवी के पैर छुए।


कमला देवी ने उसे एक सूट का पैकेट और पांच सौ रुपये का लिफाफा देते हुए कहा, “ले बेटी, यह हमारी तरफ से तेरा नेग है। इतने दिनों तक तूने अपनी बहन की सेवा की है।”


रितु ने दोनों हाथों से उपहार ले लिया।


उसने कहा, “धन्यवाद आंटी जी।”


रितु को उपहार से कोई शिकायत नहीं थी।


वह तो अपनी दीदी की मदद करने आई थी।


लेकिन तभी निखिल वहां आया।


उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा और एक लिफाफा था।


निखिल ने रितु से कहा, “एक मिनट रितु। यह भी तेरे लिए है।”


रितु ने हैरानी से पूछा, “जीजू, यह क्या है?”


निखिल ने मुस्कुराकर कहा, “खोलकर देख।”


रितु ने डिब्बा खोला।


उसमें एक सुंदर सी घड़ी थी।


रितु को वह बहुत पसंद आई।


निखिल ने कहा, “तूने एक बार काव्या से कहा था ना कि तुझे परीक्षा के लिए अच्छी घड़ी चाहिए? इसलिए मैंने सोचा, तुझे यही दे दूं।”


रितु की आंखें चमक उठीं।


उसने कहा, “जीजू, यह तो बहुत सुंदर है। लेकिन इसकी क्या जरूरत थी?”


निखिल ने जवाब दिया, “जरूरत थी। और यह लिफाफा भी रख ले। इसमें तेरी आगे की पढ़ाई के लिए कुछ पैसे हैं। अपनी जरूरत की किताबें खरीद लेना।”


रितु ने तुरंत लिफाफा वापस करते हुए कहा, “नहीं जीजू, मैं पैसे नहीं ले सकती। आपने पहले ही इतना कुछ किया है।”


निखिल ने कहा, “रितु, यह कोई मजदूरी नहीं है। यह हमारी तरफ से तेरे लिए प्यार और आशीर्वाद है। तूने हमारे मुश्किल समय में साथ दिया है। अब तेरी पढ़ाई में हम थोड़ा सहयोग कर दें, तो क्या गलत है?”


रितु कुछ बोल नहीं पाई।


काव्या ने भी कहा, “ले ले रितु। यह हम दोनों की तरफ से है।”


रितु ने भावुक होकर उपहार स्वीकार कर लिया।


रामप्रसाद जी की आंखें भर आईं।


उन्होंने निखिल से कहा, “बेटा, तुमने मेरी बेटी को इतना सम्मान दिया, यही मेरे लिए बहुत है।”


निखिल ने उनके पैर छूते हुए कहा, “पापा जी, रितु मेरी भी छोटी बहन जैसी है। उसका ध्यान रखना मेरी भी जिम्मेदारी है।”


लेकिन यह सब देखकर कमला देवी और पूजा के चेहरे उतर गए।


उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा।


रितु अपने पिता के साथ घर चली गई।


लेकिन उसके जाते ही घर में एक ऐसी बात शुरू हुई, जिसने वर्षों से चले आ रहे भेदभाव को सबके सामने ला दिया।



रितु और रामप्रसाद जी के जाने के बाद कमला देवी ने निखिल को अपने कमरे में बुलाया।


पूजा भी वहीं बैठी थी।


कमला देवी ने नाराज होकर पूछा, “निखिल, यह सब क्या था?”


निखिल ने पूछा, “क्या हुआ मम्मी?”


कमला देवी ने कहा, “जब मैंने रितु को सूट और पांच सौ रुपये दे दिए थे, तो तुझे अलग से महंगी घड़ी और पैसे देने की क्या जरूरत थी?”


निखिल ने शांत स्वर में जवाब दिया, “मम्मी, मैंने अपनी इच्छा से दिया है। इसमें गलत क्या है?”


कमला देवी ने कहा, “गलत यह है कि तू फालतू में पैसे खर्च कर रहा है। हमारे यहां बहू की बहन को इतना नेग देने का रिवाज नहीं है।”


पूजा ने भी कहा, “हां भैया, तुमने जरूरत से ज्यादा कर दिया। अब आगे भी काव्या के मायके वालों को ऐसी उम्मीद रहेगी।”


निखिल ने अपनी बहन की तरफ देखते हुए पूछा, “दीदी, आपसे एक बात पूछूं?”


पूजा ने कहा, “हां, पूछो।”


निखिल ने पूछा, “जब अन्वी के जन्म की पूजा हुई, तब पापा जी आपके लिए भी साड़ी लेकर आए थे। क्या आपने उनसे कहा कि इसकी जरूरत नहीं है?”


पूजा चुप हो गई।


निखिल ने आगे पूछा, “मम्मी, आपने भी उनसे साड़ी ली। क्या आपने कहा कि बहू के पिता को इतना खर्च करने की जरूरत नहीं है?”


कमला देवी ने कहा, “अरे, वह तो रिवाज है।”


निखिल ने जवाब दिया, “तो मम्मी, जब बहू के मायके से कुछ लेना होता है, तब रिवाज याद आ जाता है। लेकिन जब उसी मायके की बेटी को कुछ देना होता है, तब रिवाज बीच में आ जाता है?”


कमला देवी ने नाराज होकर कहा, “तू अपनी मां से बहस कर रहा है?”


निखिल ने कहा, “नहीं मम्मी, मैं सिर्फ एक बात समझना चाहता हूं।”


फिर उसने पूजा की तरफ देखा।


निखिल ने पूछा, “दीदी, आप घूमने गई थीं। इसमें कोई गलत बात नहीं है। हर इंसान को अपनी जिंदगी में खुश रहने और घूमने का अधिकार है। लेकिन क्या रितु को अपनी परीक्षा की तैयारी करने का अधिकार नहीं था?”


पूजा ने धीरे से कहा, “मैंने कब मना किया कि वह पढ़ाई न करे?”


निखिल ने जवाब दिया, “आपने मना नहीं किया दीदी। लेकिन आपने यह जरूर कहा कि वह अपनी बहन की मदद करने आई थी, इसलिए उसे कुछ देने की जरूरत नहीं है।”


पूजा ने कहा, “तो क्या मैंने गलत कहा? आखिर वह अपनी बहन ही तो है।”


निखिल ने पूछा, “दीदी, अगर आपकी ससुराल में कोई जरूरी काम होता और आप अपनी छोटी ननद को उसकी परीक्षा छोड़कर बुलातीं, तो क्या आप उसकी मेहनत की कद्र नहीं करतीं?”


पूजा ने कोई जवाब नहीं दिया।


निखिल ने आगे कहा, “मम्मी, जब दीदी के पहले बच्चे का जन्म हुआ था, तब आप पूरे एक महीने उनके पास रही थीं। आपने उनके लिए खाना बनाया, कपड़े संभाले और रात में बच्चे को भी देखा।”


कमला देवी ने तुरंत कहा, “तो क्या गलत किया? वह मेरी बेटी है।”


निखिल ने कहा, “बिल्कुल सही किया मम्मी। एक मां अपनी बेटी की मदद करेगी ही। लेकिन काव्या भी तो किसी की बेटी है।”


कमला देवी की नजरें झुक गईं।


निखिल ने कहा, “काव्या की मां नहीं हैं। अगर उनकी मां होतीं, तो शायद वह भी अपनी बेटी के लिए दौड़ी चली आतीं। लेकिन उनकी जगह रितु आई। वह अभी खुद पढ़ रही है। उसे बच्चे संभालने का अनुभव भी नहीं था। फिर भी उसने अपनी दीदी को अकेला नहीं छोड़ा।”


कमरे में खामोशी छा गई।


निखिल ने आगे कहा, “मम्मी, आपने कई बार रितु को कहा कि उसे घर का काम नहीं आता। लेकिन आपने कभी यह सोचा कि उसकी उम्र ही कितनी है? वह पढ़ाई कर रही है। उसे सब कुछ आना जरूरी क्यों है?”


कमला देवी ने धीमी आवाज में कहा, “मैं तो बस उसे सिखा रही थी।”


निखिल ने जवाब दिया, “मम्मी, सिखाने और ताना मारने में फर्क होता है। अगर आप उसे प्यार से समझातीं, तो वह खुशी से सीखती। लेकिन जब आप उसकी मां को याद दिलाकर उसकी कमी निकालती थीं, तब उसे कितना दुख होता होगा?”


कमला देवी ने चौंककर पूछा, “तुझे यह सब किसने बताया?”


निखिल ने कहा, “मम्मी, कुछ बातें मैंने खुद सुनी हैं। और कुछ काव्या ने बताई हैं। लेकिन रितु ने कभी आपकी शिकायत नहीं की।”


यह सुनकर कमला देवी कुछ देर चुप रहीं।


निखिल ने कहा, “रितु ने अपनी पढ़ाई का समय दिया, अपनी नींद छोड़ी और अपनी दीदी के साथ खड़ी रही। अगर मैंने उसके लिए एक घड़ी और कुछ पैसे दे दिए, तो मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ गलत किया।”


पूजा ने धीरे से कहा, “भैया, लेकिन हर काम के बदले उपहार देना भी तो जरूरी नहीं है।”


निखिल ने जवाब दिया, “बिल्कुल जरूरी नहीं है दीदी। लेकिन किसी की मदद को अपना अधिकार समझ लेना भी सही नहीं है।”


फिर उसने कहा, “और एक बात। अगर रितु को उपहार नहीं भी मिलता, तो शायद उसे कोई दुख नहीं होता। लेकिन अगर उसके साथ प्यार से व्यवहार किया जाता, उसकी पढ़ाई का ध्यान रखा जाता और उसे बार-बार ताने नहीं सुनने पड़ते, तो वह यहां से कहीं ज्यादा खुशी लेकर जाती।”


कमला देवी की आंखों में पहली बार पछतावे की झलक दिखाई दी।


लेकिन निखिल की बात अभी पूरी नहीं हुई थी।



निखिल की बातें सुनकर काव्या भी कमरे में आ गई।


उसने दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “मम्मी जी, मैं भी कुछ कहना चाहती हूं।”


कमला देवी ने उसकी तरफ देखा।


उन्होंने कहा, “हां बहू, बोल।”


काव्या ने धीरे से कहा, “मम्मी जी, मैंने कभी आपसे यह उम्मीद नहीं की कि आप मेरी मां की जगह ले लें। क्योंकि मां की जगह कोई नहीं ले सकता। लेकिन मैंने इतना जरूर सोचा था कि जब मैं मां बनने वाली हूं, तब आप मुझे थोड़ा सहारा देंगी।”


कमला देवी चुपचाप सुनती रहीं।


काव्या ने आगे कहा, “मम्मी जी, मुझे पूजा दीदी के घूमने जाने से कोई परेशानी नहीं थी। वह अपनी जिंदगी में खुश रहें, यही मैं चाहती हूं। लेकिन जब आपने कहा कि उनकी खुशी खराब नहीं होनी चाहिए, इसलिए उन्हें नहीं बुलाएंगी, तब मुझे लगा कि मेरी परेशानी शायद उतनी जरूरी नहीं है।”


पूजा ने कहा, “भाभी, मैंने तो पहले ही कहा था कि मैं घूमने जा रही हूं।”


काव्या ने उसकी तरफ देखकर जवाब दिया, “दीदी, मैं आपसे नाराज नहीं हूं। आपको कहीं भी जाने का पूरा अधिकार है। लेकिन रितु को भी अपनी पढ़ाई करने का उतना ही अधिकार था।”


पूजा चुप हो गई।


काव्या ने कमला देवी से कहा, “मम्मी जी, जब रितु आई थी, तब उसने मुझसे कहा था कि वह मेरी मदद करेगी। उसने कभी नहीं कहा था कि वह पूरे घर की जिम्मेदारी उठाएगी।”


काव्या की आवाज भर्रा गई।


उसने आगे कहा, “कई बार मैं कमरे में लेटी हुई आपकी बातें सुनती थी। जब आप उसे कहती थीं कि उसकी मां ने उसे कुछ नहीं सिखाया, तब मेरा दिल बहुत दुखता था।”


कमला देवी ने धीरे से कहा, “बहू, मेरा ऐसा मतलब नहीं था।”


काव्या ने जवाब दिया, “हो सकता है मम्मी जी, आपका ऐसा मतलब न रहा हो। लेकिन रितु के लिए अपनी मां का नाम सुनना ही बहुत बड़ी बात है। उसे आज भी मम्मी की बहुत याद आती है।”


काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।


उसने कहा, “मम्मी जी, जब हमारी मां गई थीं, तब रितु बहुत छोटी थी। वह रात को रोते हुए मुझसे पूछती थी कि मम्मी कब आएंगी। मैं उसे क्या जवाब देती? मैं खुद बच्ची थी, लेकिन उसके सामने मजबूत बनने की कोशिश करती थी।”


निखिल ने काव्या के कंधे पर हाथ रखा।


काव्या ने आगे कहा, “मैंने उसे जितना हो सका, पढ़ाया और संभाला। लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि वह इतनी छोटी उम्र से ही जिम्मेदारियों में दब जाए। इसलिए मैं हमेशा उसे कहती हूं कि पहले अपनी पढ़ाई पूरी करे।”


कमला देवी की आंखें भी नम हो गईं।


काव्या ने कहा, “जब रितु यहां आई, तब उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया। लेकिन मैं हर दिन उसे थकते हुए देखती रही। उस समय मैं खुद इतनी कमजोर थी कि उसकी मदद भी नहीं कर पाती थी।”


फिर उसने अपनी सास की तरफ देखते हुए कहा, “मम्मी जी, मुझे उपहार या पैसों की कोई शिकायत नहीं है। लेकिन मैं चाहती थी कि रितु यहां से जाते समय यह महसूस करे कि उसकी दीदी का ससुराल भी उसका अपना घर है।”


कमला देवी ने सिर झुका लिया।


काव्या ने धीरे से कहा, “लेकिन वह यहां से जाते समय सिर्फ यही कह रही थी कि अब घर जाकर आराम से पढ़ पाएगी।”


यह बात सुनकर कमला देवी का दिल भर आया।


उन्हें याद आया कि जब रितु पहली बार आई थी, तब कितनी खुशी से कह रही थी कि वह अपनी दीदी का ध्यान रखेगी।


और आज वही लड़की घर जाने के लिए दिन गिन रही थी।


कमला देवी को पहली बार अपनी गलती का एहसास हुआ।


उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “बहू, मैंने शायद सच में रितु के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।”


काव्या ने तुरंत कहा, “मम्मी जी, मैं आपको दोष देने नहीं आई हूं। बस चाहती हूं कि आगे से किसी की मदद को उसकी मजबूरी मत समझिएगा।”


कमला देवी की आंखों से आंसू निकल आए।


उन्होंने कहा, “तू ठीक कह रही है बहू। मैंने अपनी बेटी की परेशानी तो समझी, लेकिन तेरी बहन की पढ़ाई और थकान को उतना महत्व नहीं दिया।”


निखिल ने कहा, “मम्मी, गलती किसी से भी हो सकती है। जरूरी यह है कि हम उसे समझकर बदलें।”


कमला देवी ने सहमति में सिर हिला दिया।


लेकिन उनके मन में अभी भी एक बात खटक रही थी।


उन्होंने काव्या से पूछा, “बहू, क्या रितु मुझसे बहुत नाराज होकर गई है?”


काव्या ने जवाब दिया, “नहीं मम्मी जी। उसने तो जाते समय भी कहा था कि आप अपना ध्यान रखिएगा।”


कमला देवी की आंखों से फिर आंसू बहने लगे।


उन्होंने कहा, “जिस बच्ची को मैंने इतनी बातें सुनाईं, उसने मेरे बारे में एक गलत शब्द भी नहीं कहा।”


उस दिन कमला देवी को समझ आया कि चुप रहने वाला इंसान हमेशा कमजोर नहीं होता।


कभी-कभी वह केवल रिश्तों की इज्जत बचाने के लिए चुप रहता है।



अगले दिन कमला देवी ने निखिल से कहा, “बेटा, मुझे रितु से बात करनी है।”


निखिल ने पूछा, “किसलिए मम्मी?”


कमला देवी ने कहा, “उससे माफी मांगनी है।”


निखिल ने अपनी मां की तरफ देखा।


उसने कहा, “मम्मी, आप सच में उससे बात करना चाहती हैं?”


कमला देवी ने जवाब दिया, “हां बेटा। कल रात मैं बहुत देर तक सोचती रही। जब पूजा मां बनी थी, तब मैंने उसे एक गिलास पानी तक खुद उठाने नहीं दिया था। लेकिन काव्या की डिलीवरी के समय मैंने उससे ज्यादा रितु से काम करवाने की चिंता की।”


निखिल चुपचाप सुनता रहा।


कमला देवी ने कहा, “मुझे लगता था कि बहू के मायके वाले मदद करेंगे, तो इसमें बड़ी बात क्या है। लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा कि उनकी भी अपनी जिम्मेदारियां और परेशानियां होती हैं।”


निखिल ने कहा, “मम्मी, आपने यह समझ लिया, यही बहुत है।”


कमला देवी ने कहा, “नहीं बेटा, सिर्फ समझ लेना काफी नहीं है। मुझे अपनी गलती सुधारनी भी चाहिए।”


निखिल ने रितु को फोन लगाया।


रितु ने फोन उठाया।


उसने कहा, “नमस्ते जीजू। दीदी और अन्वी कैसी हैं?”


निखिल ने जवाब दिया, “दोनों ठीक हैं। मम्मी तुझसे बात करना चाहती हैं।”


रितु ने कहा, “जी, दीजिए।”


कमला देवी ने फोन लिया।


उन्होंने कहा, “रितु बेटी, कैसी है?”


रितु ने जवाब दिया, “मैं ठीक हूं आंटी जी। आप कैसी हैं?”


कमला देवी कुछ देर चुप रहीं।


फिर उन्होंने कहा, “बेटी, मुझे तुझसे एक बात कहनी है।”


रितु ने पूछा, “जी आंटी जी, कहिए।”


कमला देवी ने कहा, “तू इतने दिन हमारे घर रही। अपनी दीदी और बच्ची की मदद की। लेकिन मैंने तुझे प्यार देने के बजाय कई बार डांट दिया। तेरी पढ़ाई में भी बाधा डाली। मुझे माफ कर दे बेटी।”


रितु घबरा गई।


उसने तुरंत कहा, “अरे आंटी जी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? आप बड़ी हैं। मुझे माफी मांगकर शर्मिंदा मत कीजिए।”


कमला देवी ने जवाब दिया, “नहीं बेटी, बड़ी होने का मतलब यह नहीं कि मैं गलती नहीं कर सकती। मैंने तेरे साथ गलत व्यवहार किया है। और मैं चाहती हूं कि तू यह बात जान ले कि मुझे अपनी गलती का एहसास है।”


फोन के दूसरी तरफ रितु की आंखें भर आईं।


उसने धीरे से कहा, “आंटी जी, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। बस कभी-कभी मम्मी की बहुत याद आ जाती है। इसलिए जब कोई उनकी बात करता है, तो मन दुखी हो जाता है।”


कमला देवी ने भावुक होकर कहा, “बेटी, आगे से मैं कभी ऐसी बात नहीं करूंगी।”


रितु ने कहा, “कोई बात नहीं आंटी जी।”


कमला देवी ने पूछा, “और तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है?”


रितु ने जवाब दिया, “अब अच्छी चल रही है। पापा भी दुकान से जल्दी आकर मेरा ध्यान रख रहे हैं।”


कमला देवी ने कहा, “मन लगाकर पढ़ना बेटी। और जब परीक्षा खत्म हो जाए, तब अपनी खुशी से यहां आना। इस बार तुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा।”


रितु हंस पड़ी।


उसने कहा, “आंटी जी, काम करने से मुझे परेशानी नहीं है। बस परीक्षा की वजह से थोड़ी चिंता थी।”


कमला देवी ने कहा, “हां बेटी, अब मैं समझ गई हूं।”


फोन रखने के बाद कमला देवी ने राहत की सांस ली।


उसी समय पूजा भी वहां आ गई।


उसने अपनी मां से पूछा, “मम्मी, किससे बात कर रही थीं?”


कमला देवी ने कहा, “रितु से। उससे माफी मांगी है।”


पूजा ने हैरान होकर पूछा, “आपने रितु से माफी मांगी? लेकिन क्यों?”


कमला देवी ने कहा, “क्योंकि मैंने उसके साथ गलत व्यवहार किया था।”


पूजा ने कहा, “मम्मी, आप भी भैया की बातों में आ गईं।”


कमला देवी ने अपनी बेटी की तरफ देखा।


फिर उन्होंने कहा, “नहीं पूजा, इस बार तेरे भाई ने मुझे सही बात समझाई है।”


पूजा चुप हो गई।


कमला देवी ने आगे कहा, “बेटी, तू मेरी अपनी है। तेरी खुशी मेरे लिए बहुत जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं दूसरों की परेशानियों को छोटा समझूं।”


पूजा ने धीरे से पूछा, “तो क्या आपको मेरे घूमने जाने से परेशानी है?”


कमला देवी ने जवाब दिया, “बिल्कुल नहीं बेटी। तू जहां चाहे जा सकती है। लेकिन मुझे यह समझना चाहिए था कि काव्या की देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ रितु पर डालना ठीक नहीं था।”


पूजा ने कुछ सोचते हुए कहा, “मम्मी, शायद मैंने भी रितु के बारे में बिना सोचे बहुत कुछ कह दिया।”


कमला देवी ने कहा, “बेटी, रिश्ते तभी अच्छे रहते हैं जब हम दूसरों की जगह खुद को रखकर सोचते हैं।”


उस दिन पूजा ने भी अपनी भाभी से बात की।


उसने कहा, “भाभी, मुझे माफ कर देना। मैं घूमने जाने की खुशी में यह समझ ही नहीं पाई कि आपको कितनी मदद की जरूरत थी।”


काव्या ने मुस्कुराकर कहा, “दीदी, आप माफी मत मांगिए। बस अब अन्वी के साथ थोड़ा समय बिताइए।”


पूजा ने हंसते हुए कहा, “वह तो जरूर करूंगी।”


लेकिन इस बार पूजा ने केवल बच्ची को गोद में लेकर तस्वीरें नहीं खिंचवाईं।


उसने अपनी भाभी के लिए खाना बनाया, घर के कुछ काम संभाले और काव्या को आराम करने का समय भी दिया।


कमला देवी भी अब काव्या की जरूरतों का पहले से ज्यादा ध्यान रखने लगीं।


धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।



समय बीतता गया।


काव्या अब पहले से काफी स्वस्थ हो चुकी थी।


अन्वी भी तीन महीने की हो गई थी।


रितु की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं और वह अपने परिणाम का इंतजार कर रही थी।


एक दिन काव्या के फोन पर रितु का फोन आया।


काव्या ने पूछा, “हां रितु, कैसी है?”


रितु ने खुशी से कहा, “दीदी, मेरा परिणाम आ गया!”


काव्या ने उत्साहित होकर पूछा, “अच्छा! कितने अंक आए?”


रितु ने जवाब दिया, “दीदी, मैंने पूरे कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया है!”


काव्या खुशी से चिल्ला पड़ी।


उसने कहा, “सच में रितु? मुझे पता था कि तू बहुत अच्छा करेगी!”


रितु ने हंसते हुए कहा, “हां दीदी, पापा भी बहुत खुश हैं।”


काव्या ने तुरंत निखिल को आवाज दी।


निखिल ने फोन लेकर कहा, “वाह रितु! बहुत-बहुत बधाई। तूने तो कमाल कर दिया।”


रितु ने कहा, “धन्यवाद जीजू। आपने जो घड़ी दी थी ना, उसे पहनकर ही मैं परीक्षा देने गई थी।”


निखिल हंस पड़ा।


उसने कहा, “अच्छा, तो फिर अब अगली पढ़ाई के लिए भी तैयारी शुरू कर दे।”


रितु ने जवाब दिया, “जीजू, मैं आगे एम.ए. करना चाहती हूं और साथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करूंगी।”


निखिल ने कहा, “बहुत अच्छी बात है। तू मेहनत कर। जरूरत पड़े, तो हम तेरे साथ हैं।”


कमला देवी भी पास बैठी सब सुन रही थीं।


उन्होंने निखिल से फोन मांगा।


कमला देवी ने कहा, “रितु बेटी, बहुत-बहुत बधाई। तूने अपने पापा और दीदी का नाम रोशन कर दिया।”


रितु ने खुशी से कहा, “धन्यवाद आंटी जी।”


कमला देवी ने कहा, “बेटी, एक बात कहूं?”


रितु ने जवाब दिया, “जी।”


कमला देवी ने कहा, “जब तू यहां थी, तब मैं बार-बार कहती थी कि इतनी पढ़ाई करके कौन सा बड़ा अफसर बन जाएगी। आज मुझे अपनी वही बात याद आ रही है।”


रितु चुप रही।


कमला देवी ने आगे कहा, “बेटी, तू जो भी बनना चाहती है, जरूर बन। मैं भगवान से प्रार्थना करूंगी कि तेरी मेहनत सफल हो।”


रितु की आंखें भर आईं।


उसने कहा, “आंटी जी, आपका आशीर्वाद मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।”


कुछ दिनों बाद निखिल और काव्या ने रितु की सफलता की खुशी में घर पर एक छोटा सा पारिवारिक भोजन रखा।


रामप्रसाद जी और रितु भी आए।


इस बार कमला देवी ने खुद दरवाजे पर जाकर उनका स्वागत किया।


उन्होंने रामप्रसाद जी से कहा, “भाई साहब, आपने अपनी दोनों बेटियों को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। काव्या ने इस घर को संभाला और रितु ने मुश्किल समय में उसका साथ दिया।”


रामप्रसाद जी ने विनम्रता से कहा, “बहन जी, बेटियां तो भगवान का आशीर्वाद होती हैं।”


कमला देवी ने जवाब दिया, “हां भाई साहब, और मैं यह बात अब पहले से ज्यादा अच्छी तरह समझ गई हूं।”


फिर उन्होंने रितु को अपने पास बुलाया।


कमला देवी ने कहा, “रितु, इस बार मैं तेरे लिए एक उपहार लाई हूं।”


रितु ने तुरंत कहा, “आंटी जी, अब फिर उपहार की क्या जरूरत है?”


कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “यह तेरी पढ़ाई के लिए है।”


उन्होंने रितु को एक सुंदर बैग और कुछ किताबें दीं, जिन्हें निखिल ने उसकी आगे की पढ़ाई के अनुसार चुना था।


रितु ने खुशी से कहा, “आंटी जी, यह तो मेरे बहुत काम आएंगी।”


कमला देवी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।


उन्होंने कहा, “बस बेटी, मन लगाकर पढ़ना। और एक बात याद रखना, किसी की मदद करने के लिए अपना भविष्य कभी मत छोड़ना। जरूरत के समय साथ देना अच्छी बात है, लेकिन अपने सपनों की कीमत पर नहीं।”


रितु ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।


काव्या यह सब देखकर भावुक हो गई।


निखिल ने उसके पास आकर धीरे से पूछा, “क्या हुआ? आंखों में आंसू क्यों हैं?”


काव्या ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “आज मुझे लग रहा है कि मेरी छोटी बहन सच में अपने ही घर आई है।”


निखिल ने कहा, “उसे ऐसा पहले दिन से महसूस होना चाहिए था।”


काव्या ने सहमति में सिर हिला दिया।


उसी समय अन्वी रोने लगी।


रितु तुरंत उसकी तरफ बढ़ी।


लेकिन कमला देवी ने हंसते हुए कहा, “अरे रितु, तू बैठकर खाना खा। आज अन्वी को उसकी दादी संभालेगी।”


सब हंस पड़े।


कमला देवी ने अन्वी को गोद में उठाया और प्यार से उसके माथे को चूम लिया।


फिर उन्होंने काव्या की तरफ देखकर कहा, “बहू, एक बात मैं तुझसे भी कहना चाहती हूं।”


काव्या ने पूछा, “जी मम्मी जी?”


कमला देवी ने कहा, “जब तू मां बनी थी, तब मुझे तेरे साथ खड़ा होना चाहिए था। लेकिन मैंने अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी। अब मैं चाहती हूं कि तू इस घर में कभी खुद को अकेला महसूस न करे।”


काव्या ने भावुक होकर कहा, “मम्मी जी, मुझे आपसे बस यही अपनापन चाहिए था।”


कमला देवी ने उसे अपने पास बैठा लिया।


पूजा भी वहीं आकर बैठ गई।


उसने मुस्कुराते हुए कहा, “और भाभी, अब अगली बार किसी मदद की जरूरत हो, तो मुझे भी बताना। इस बार मैं सिर्फ घूमने का कार्यक्रम नहीं बनाऊंगी।”


सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।


निखिल ने अपनी मां, बहन, पत्नी और रितु की तरफ देखा।


उसे खुशी थी कि उसने सही समय पर सही बात कही थी।


क्योंकि कभी-कभी परिवार में रिश्ते बिगाड़ने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर बनाने के लिए भी सच बोलना जरूरी होता है।


उस दिन कमला देवी ने एक बहुत बड़ी बात समझी।


बेटी और बहू के रिश्तों में फर्क हो सकता है, लेकिन उनकी तकलीफ की अहमियत में फर्क नहीं होना चाहिए।


जिस तरह अपनी बेटी की खुशी जरूरी होती है, उसी तरह बहू का आराम और सम्मान भी जरूरी होता है।


और जो लोग मुश्किल समय में हमारा साथ देते हैं, उनकी कद्र केवल पैसों या उपहारों से नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार और सच्चे सम्मान से करनी चाहिए।


रितु ने अपनी बहन के लिए जो किया, वह किसी नेग की लालच में नहीं किया था। उसने ऐसा अपने प्यार और अपनापन के कारण किया था।


लेकिन उस प्यार को सम्मान देना भी परिवार की जिम्मेदारी थी।


काव्या ने भी यह सीख लिया कि अपने मन की बात सम्मान के साथ कहना गलत नहीं है।


और कमला देवी ने समझ लिया कि रिवाज रिश्तों को निभाने के लिए होते हैं, किसी के साथ भेदभाव करने के लिए नहीं।


उस दिन के बाद उस घर में एक नया रिवाज शुरू हुआ।


जहां किसी की मदद को उसका कर्तव्य समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाता था, बल्कि उसके समय, मेहनत और भावनाओं का सम्मान किया जाता था।


कहानी की सीख: जब बहू के मायके से मदद लेने की बात आती है, तब उन्हें अपना समझा जाता है, लेकिन जब उनके सम्मान और अधिकार की बात आती है, तब रिवाज याद दिलाना सही नहीं है। रिश्तों की असली खूबसूरती लेने और देने के हिसाब में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझने में होती है। मां बनने का समय किसी भी महिला के जीवन का बेहद संवेदनशील समय होता है। उस समय उसे तानों और जिम्मेदारियों के बोझ से ज्यादा प्यार, आराम और परिवार के सहयोग की जरूरत होती है।


क्योंकि बहू भी किसी की बेटी होती है, और जिस घर में उसकी तकलीफ को अपनी बेटी की तकलीफ जितना महत्व दिया जाता है, वही घर सच में एक खुशहाल परिवार बनता है।



No comments

Powered by Blogger.