माँ की चिट्ठी ने खोला अस्पताल का काला सच
“तुम्हें कितनी बार समझाऊँ? यहाँ बिना पैसे के किसी का इलाज नहीं होता। अपनी बहन को उठाओ और अस्पताल के बाहर जाओ!”
अस्पताल के स्वागत कक्ष में बैठे कर्मचारी महेश ने ग्यारह साल की गौरी से कठोर आवाज़ में कहा।
गौरी ने अपनी गोद में सोई हुई छोटी बहन परी को और कसकर पकड़ लिया। परी की उम्र केवल चार साल थी। उसका चेहरा बुखार से तप रहा था और साँसें भी ठीक से नहीं चल रही थीं।
गौरी के पैरों में टूटी हुई चप्पलें थीं। उसके कपड़े पुराने थे और बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ में उसने कपड़े का छोटा थैला पकड़ रखा था, जिसमें दो सूखी रोटियाँ और एक पुरानी चिट्ठी रखी थी।
गौरी ने काँपती आवाज़ में कहा, “साहब, मेरे पास पैसे नहीं हैं। लेकिन मेरी बहन बहुत बीमार है। आप बस एक बार डॉक्टर को दिखा दीजिए। मैं काम करके आपके पैसे चुका दूँगी।”
महेश ने बिना उसकी तरफ ठीक से देखे जवाब दिया, “यह कोई धर्मशाला नहीं है। यहाँ रोज तुम्हारे जैसे लोग आते हैं। पहले पैसे जमा करो, फिर डॉक्टर मिलेगा।”
गौरी की आँखों में आँसू भर आए।
“साहब, मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। मेरी बहन ने दो दिन से कुछ नहीं खाया है। वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही। अगर उसे कुछ हो गया, तो मैं अकेली रह जाऊँगी।”
महेश ने चिढ़कर कहा, “मुझे तुम्हारी कहानी सुनने का समय नहीं है। सामने से हटो।”
गौरी पीछे हट गई, लेकिन वह अस्पताल से बाहर नहीं गई। वह दीवार के पास बैठकर अपनी बहन का सिर सहलाने लगी।
“परी, तुम चिंता मत करो। दीदी तुम्हें कुछ नहीं होने देगी। डॉक्टर अंकल तुम्हें ठीक कर देंगे।”
परी ने मुश्किल से आँखें खोलीं।
“दीदी, मुझे घर जाना है। मुझे माँ के पास जाना है।”
यह सुनकर गौरी का दिल टूट गया।
उनकी माँ को गुजरे दो साल हो चुके थे। पिता की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हुई थी। माता-पिता के जाने के बाद दोनों बहनें कुछ समय तक अपनी मौसी के घर रहीं, लेकिन मौसी के पति ने उन्हें बोझ समझकर घर से निकाल दिया था।
तब से गौरी कभी किसी मंदिर के बाहर, कभी बस अड्डे के पास और कभी किसी दुकान की छत के नीचे रात बिताती थी।
वह अपनी छोटी बहन को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी। इसलिए जहाँ भी जाती, परी को अपने साथ लेकर जाती।
पिछले दो दिनों से परी को तेज बुखार था। गौरी ने एक छोटी दुकान से पानी माँगकर उसे पिलाया था, लेकिन उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी।
आखिरकार एक रिक्शा चालक की मदद से वह इस बड़े अस्पताल तक पहुँची थी।
उसे अपनी माँ की एक पुरानी चिट्ठी याद थी। माँ ने मरने से कुछ दिन पहले वह चिट्ठी उसके हाथ में रखकर कहा था, “गौरी, अगर कभी ऐसी मुसीबत आए कि तुम्हें कोई रास्ता न दिखाई दे, तो इस चिट्ठी को लेकर सिटी सेवा अस्पताल जाना। वहाँ तुम्हारी मदद जरूर होगी।”
गौरी ने उस समय माँ से पूछा था, “माँ, वहाँ कौन मिलेगा?”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा था, “वहाँ एक ऐसा इंसान है, जो तुम्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटाएगा।”
गौरी ने उस बात का मतलब कभी नहीं समझा था।
लेकिन आज उसके पास वही आखिरी उम्मीद थी।
उसने थैले से चिट्ठी निकाली और महेश के सामने रख दी।
“साहब, मेरी माँ ने यह चिट्ठी दी थी। उन्होंने कहा था कि यहाँ मेरी मदद होगी। आप इसे एक बार पढ़ लीजिए।”
महेश ने चिट्ठी को देखा और हँस पड़ा।
“आजकल हर कोई कोई न कोई कागज लेकर आ जाता है। इससे अस्पताल का बिल नहीं भरेगा।”
उसने चिट्ठी उठाकर मेज के एक कोने पर रख दी।
गौरी ने हाथ जोड़ दिए।
“साहब, इसे फाड़िए मत। यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है।”
महेश ने गुस्से में कहा, “मैंने इसे फाड़ा नहीं है। अब यहाँ से जाओ।”
उसी समय अस्पताल के गलियारे से सफेद कोट पहने एक महिला डॉक्टर गुजर रही थीं। उनका नाम डॉ. सान्या राव था। वह बाल रोग विभाग की वरिष्ठ चिकित्सक थीं।
उन्होंने बच्ची की आवाज़ सुनी और रुक गईं।
“क्या बात है? यह बच्ची इतनी परेशान क्यों है?” डॉ. सान्या ने महेश से पूछा।
महेश ने तुरंत जवाब दिया, “मैम, इसके पास पैसे नहीं हैं। यह अपनी बहन को भर्ती करवाना चाहती है।”
डॉ. सान्या ने गौरी की गोद में पड़ी परी को देखा। बच्ची की हालत ठीक नहीं लग रही थी।
उन्होंने तुरंत कहा, “पहले बच्ची को जाँच कक्ष में ले जाइए। इसकी हालत गंभीर हो सकती है।”
महेश ने धीमे स्वर में कहा, “लेकिन मैम, बिना पंजीकरण और जमा राशि के—”
डॉ. सान्या ने उसकी बात बीच में रोक दी।
“आपात स्थिति में पहले मरीज की जाँच होती है। कागजी कार्रवाई बाद में पूरी की जा सकती है।”
उन्होंने पास खड़े वार्ड सहायक को बुलाया।
“इन दोनों बच्चियों को तुरंत बाल रोग विभाग में ले जाइए।”
गौरी की आँखों में पहली बार उम्मीद दिखाई दी।
“डॉक्टर मैम, क्या मेरी बहन ठीक हो जाएगी?” गौरी ने पूछा।
डॉ. सान्या ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “हम पूरी कोशिश करेंगे। तुम घबराओ मत।”
गौरी अपनी बहन को लेकर उनके पीछे चल पड़ी।
लेकिन जाते-जाते उसने मेज पर रखी चिट्ठी उठाई और अपने थैले में रख ली।
उसे नहीं पता था कि उस कागज में ऐसा क्या लिखा है, जिससे उसकी माँ को इतनी उम्मीद थी।
उसे सिर्फ इतना पता था कि उसकी माँ ने उस चिट्ठी पर भरोसा किया था।
और वह अपनी माँ का भरोसा टूटने नहीं देना चाहती थी।
डॉ. सान्या ने परी की जाँच की। बच्ची के शरीर में पानी की कमी थी और उसे तेज बुखार भी था। उन्होंने तुरंत जरूरी उपचार शुरू करवाया और अस्पताल की सामाजिक सहायता इकाई को सूचना भेजी।
गौरी कमरे के बाहर बेंच पर बैठी अपनी बहन का इंतजार कर रही थी।
कुछ देर बाद डॉ. सान्या बाहर आईं।
“गौरी, तुम्हारी बहन को इलाज की जरूरत है। हमने उपचार शुरू कर दिया है। अभी उसे निगरानी में रखना होगा।”
गौरी ने राहत की साँस ली।
“धन्यवाद, डॉक्टर मैम। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है।”
डॉ. सान्या ने प्यार से जवाब दिया, “तुम्हें अभी किसी पैसे की चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी बहन का इलाज जरूरी है।”
गौरी ने अपने आँसू पोंछे।
“मैम, मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूँ। ताकि कोई गरीब बच्चा अपनी बहन को लेकर दर-दर न भटके।”
डॉ. सान्या कुछ पल उसे देखती रहीं।
“तुम जरूर पढ़ना, गौरी। मुश्किलें तुम्हारे रास्ते में आ सकती हैं, लेकिन उन्हें अपने सपनों का अंत मत बनने देना।”
गौरी ने सिर हिलाया।
उसी समय अस्पताल की सामाजिक सहायता अधिकारी, नीलिमा, वहाँ पहुँचीं। उन्होंने गौरी से परिवार के बारे में पूछा। गौरी ने अपने माता-पिता की मृत्यु और मौसी के घर से निकाले जाने की पूरी बात बता दी।
नीलिमा ने दुखी होकर कहा, “तुम दोनों को बच्चों की सुरक्षा सेवा की मदद मिलनी चाहिए। हम तुम्हारे रहने और पढ़ाई की व्यवस्था करने की कोशिश करेंगे।”
गौरी ने तुरंत पूछा, “क्या मुझे अपनी बहन से अलग तो नहीं किया जाएगा?”
नीलिमा ने समझाया, “हमारी पहली कोशिश यही होगी कि तुम दोनों सुरक्षित रहो और साथ रह सको। तुम्हारी स्थिति के अनुसार उचित व्यवस्था की जाएगी।”
गौरी ने अपने थैले को सीने से लगा लिया।
“मैं अपनी बहन को नहीं छोड़ सकती। वह मेरे बिना सो भी नहीं पाती।”
नीलिमा ने उसे भरोसा दिलाया कि उसकी बात को गंभीरता से लिया जाएगा।
इसी बीच डॉ. सान्या की नजर गौरी के थैले से बाहर निकलती पुरानी चिट्ठी पर पड़ी।
“गौरी, क्या यह वही चिट्ठी है जिसके बारे में तुमने स्वागत कक्ष में बताया था?”
गौरी ने तुरंत चिट्ठी निकाल दी।
“जी मैम। मेरी माँ ने कहा था कि इसे यहाँ किसी ऐसे इंसान को दिखाना, जो हमारी मदद कर सके।”
डॉ. सान्या ने चिट्ठी को सावधानी से खोला।
कागज पीला पड़ चुका था। उसके किनारे मुड़े हुए थे और स्याही कई जगह हल्की हो गई थी।
चिट्ठी में लिखा था—
“जिस दिन मेरी बेटियों को दुनिया में कोई अपना दिखाई न दे, उस दिन उन्हें सिटी सेवा अस्पताल के पुराने अभिलेख कक्ष तक पहुँचने में मदद करना। वहाँ रखी नीली फाइल में एक ऐसी सच्चाई है, जिसे वर्षों से छिपाया गया है। मेरी बेटियों का किसी से धन माँगने का हक नहीं, बल्कि सच जानने का हक है। अगर यह चिट्ठी डॉ. देवेंद्र सेन तक पहुँचे, तो उनसे कहना कि कमला ने अपना वादा याद दिलाया है।”
नीचे केवल एक हस्ताक्षर था—कमला।
डॉ. सान्या का चेहरा गंभीर हो गया।
उन्होंने चिट्ठी दोबारा पढ़ी।
“डॉ. देवेंद्र सेन…” वह धीरे से बुदबुदाईं।
अस्पताल के पुराने कर्मचारियों के बीच यह नाम जाना-पहचाना था। डॉ. देवेंद्र सेन इस अस्पताल के संस्थापक चिकित्सकों में से एक थे। कई साल पहले वह अचानक अपने पद से हट गए थे। उनके बारे में अस्पताल में बहुत कम चर्चा होती थी।
डॉ. सान्या ने गौरी से पूछा, “बेटा, तुम्हारी माँ का पूरा नाम क्या था?”
गौरी ने जवाब दिया, “कमला देवी।”
“क्या तुम्हारी माँ कभी इस अस्पताल में काम करती थीं?”
गौरी ने कुछ सोचकर कहा, “माँ ने बताया था कि वह बहुत साल पहले अस्पताल में मरीजों की मदद करती थीं। लेकिन उन्होंने कभी ज्यादा कुछ नहीं बताया।”
डॉ. सान्या ने चिट्ठी को ध्यान से मोड़ा।
“गौरी, क्या तुम चाहोगी कि मैं इस चिट्ठी के बारे में पता करूँ?”
गौरी ने तुरंत कहा, “जी मैम। लेकिन मेरी माँ ने किसी का बुरा नहीं किया था। अगर उन्होंने कोई गलती की थी, तो आप मुझे बता दीजिएगा।”
डॉ. सान्या ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बिना सच जाने किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता। हम पता करेंगे कि इस चिट्ठी का क्या मतलब है।”
उन्होंने अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड विभाग में फोन किया और नीली फाइल के बारे में पूछा।
फोन पर मौजूद कर्मचारी ने कहा, “मैम, पुराने अभिलेखों में ऐसी कई फाइलें हैं। लेकिन अगर आप किसी खास मामले की जानकारी चाहती हैं, तो आपको प्रशासन की अनुमति लेनी होगी।”
डॉ. सान्या ने चिट्ठी में लिखे नाम का उल्लेख किया।
दूसरी तरफ कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गई।
फिर कर्मचारी ने धीमी आवाज़ में कहा, “मैम, डॉ. देवेंद्र सेन से जुड़े रिकॉर्ड प्रशासन की अनुमति के बिना नहीं खोले जा सकते।”
“क्यों?” डॉ. सान्या ने पूछा।
कर्मचारी ने जवाब दिया, “मुझे इसकी जानकारी नहीं है। यह आदेश बहुत पहले जारी किया गया था।”
डॉ. सान्या को अब यकीन हो गया था कि चिट्ठी किसी साधारण मामले से जुड़ी नहीं है।
उन्होंने तय किया कि वह अस्पताल के निदेशक से बात करेंगी।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उनके फोन करने से पहले ही किसी ने इस चिट्ठी की खबर निदेशक तक पहुँचा दी थी।
अस्पताल के निदेशक डॉ. महेंद्र सूद अपने कार्यालय में बैठे थे, जब प्रशासनिक अधिकारी उनके पास पहुँचा।
“सर, बाल रोग विभाग में एक बच्ची आई है। उसके पास एक पुरानी चिट्ठी है, जिसमें डॉ. देवेंद्र सेन और पुराने अभिलेख कक्ष का उल्लेख किया गया है।”
डॉ. सूद ने तुरंत सिर उठाया।
“किस बच्ची की बात कर रहे हो?”
अधिकारी ने कहा, “उसका नाम गौरी है। उसकी माँ का नाम कमला देवी बताया गया है।”
डॉ. सूद के हाथ में पकड़ी कलम रुक गई।
“क्या कहा तुमने? कमला देवी?”
“जी सर।”
डॉ. सूद कुछ क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने कहा, “उस चिट्ठी को किसने देखा?”
अधिकारी ने जवाब दिया, “डॉ. सान्या राव ने।”
डॉ. सूद कुर्सी से उठ खड़े हुए।
“डॉ. सान्या को मेरे कार्यालय में भेजो। और उस बच्ची की चिट्ठी की प्रति मुझे चाहिए।”
अधिकारी ने पूछा, “सर, क्या बच्ची के इलाज में कोई समस्या है?”
डॉ. सूद ने कठोर स्वर में कहा, “इलाज की व्यवस्था विभाग देखेगा। मुझे केवल पुराने रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी चाहिए।”
अधिकारी बाहर चला गया।
डॉ. सूद ने अपनी मेज की दराज खोली। उसमें एक पुरानी फाइल रखी थी, जिस पर लिखा था—‘विशेष प्रशासनिक समीक्षा: वर्ष 2009।’
उन्होंने फाइल खोली और कुछ पन्ने पलटे।
एक पन्ने पर कमला देवी का नाम दर्ज था।
उसके सामने लिखा था—‘सेवा समाप्त। अभिलेख संबंधी अनियमितता के आरोप।’
डॉ. सूद ने फाइल बंद कर दी।
उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उसी समय डॉ. सान्या उनके कार्यालय में पहुँचीं।
“सर, मुझे आपसे गौरी नाम की बच्ची के बारे में बात करनी है। वह अपनी बीमार बहन के साथ आई है। उसके पास एक चिट्ठी है, जिसमें डॉ. देवेंद्र सेन का नाम है।”
डॉ. सूद ने कहा, “मैंने उस मामले के बारे में सुन लिया है। चिट्ठी मुझे दे दीजिए।”
डॉ. सान्या ने जवाब दिया, “सर, यह चिट्ठी बच्ची की माँ की निजी निशानी है। मैं इसे बिना उचित कारण किसी को नहीं दे सकती। अगर इसकी जाँच जरूरी है, तो बच्ची की सुरक्षा और अनुमति का ध्यान रखना होगा।”
डॉ. सूद की आवाज़ सख्त हो गई।
“डॉ. राव, आप डॉक्टर हैं। प्रशासनिक मामलों में दखल देना आपका काम नहीं है।”
डॉ. सान्या ने शांत स्वर में कहा, “सर, बच्ची मेरे विभाग में इलाज के लिए आई है। उसकी माँ ने किसी पुराने मामले की जानकारी छोड़ी है। मैं केवल यह चाहती हूँ कि बच्ची के अधिकार सुरक्षित रहें और सच्चाई की जाँच हो।”
डॉ. सूद ने मेज पर हाथ रखते हुए कहा, “इस चिट्ठी के आधार पर कोई जाँच नहीं होगी। पुराने रिकॉर्ड खोलने की अनुमति नहीं है।”
डॉ. सान्या ने पूछा, “लेकिन सर, अगर उस फाइल में किसी अन्याय का प्रमाण हुआ तो?”
डॉ. सूद ने कठोरता से कहा, “मैंने अपना फैसला बता दिया है।”
डॉ. सान्या समझ गईं कि मामला सामान्य नहीं है।
वह कार्यालय से बाहर आ गईं।
गलियारे में उनकी मुलाकात नीलिमा से हुई।
“क्या हुआ, मैम?” नीलिमा ने पूछा।
डॉ. सान्या ने धीमे स्वर में कहा, “निदेशक पुराने रिकॉर्ड खोलने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। लेकिन चिट्ठी में जो लिखा है, उसे नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं होगा।”
नीलिमा ने कहा, “मैम, अगर बच्ची की माँ के साथ अन्याय हुआ था, तो इसकी जाँच होनी चाहिए। हम कानूनी प्रक्रिया के अनुसार शिकायत दर्ज कर सकते हैं।”
डॉ. सान्या ने सहमति में सिर हिलाया।
उन्होंने अस्पताल की शिकायत समिति से संपर्क करने का निर्णय लिया।
उधर, गौरी अपनी बहन के पास बैठी थी। परी का बुखार कुछ कम हुआ था, लेकिन उसे अभी भी अस्पताल में निगरानी की जरूरत थी।
गौरी ने बहन के माथे पर हाथ रखा।
“परी, तुम ठीक हो जाओगी तो मैं तुम्हारे लिए लाल रंग की गुड़िया खरीदूँगी।”
परी ने कमजोर आवाज़ में पूछा, “दीदी, हमारे पास पैसे कहाँ हैं?”
गौरी मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोली, “मैं काम करूँगी। खूब पढ़ूँगी। फिर हमारे पास इतने पैसे होंगे कि हमें कभी किसी से डरना नहीं पड़ेगा।”
परी ने आँखें बंद कर लीं।
“दीदी, मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है।”
गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम साथ रहेंगे, परी। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।”
उसे अभी तक पता नहीं था कि उसकी माँ की चिट्ठी ने अस्पताल के उन दरवाजों को खोलने की कोशिश शुरू कर दी थी, जिन्हें वर्षों से बंद रखा गया था।
और उन दरवाजों के पीछे सिर्फ उसकी माँ की कहानी नहीं, बल्कि कई दूसरे लोगों का दर्द भी छिपा था।
अस्पताल की शिकायत समिति ने मामले की प्रारंभिक समीक्षा शुरू की। डॉ. सान्या ने चिट्ठी की प्रति और बच्ची की स्थिति से संबंधित जानकारी समिति को दी। नीलिमा ने यह भी दर्ज कराया कि गौरी और परी को सुरक्षित रहने की व्यवस्था की आवश्यकता है।
समिति ने पुराने रिकॉर्ड खोलने के लिए औपचारिक अनुमति माँगी।
डॉ. महेंद्र सूद ने पहले तो इस अनुरोध का विरोध किया, लेकिन समिति के अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया कि किसी पुराने मामले में अनियमितता की शिकायत मिलने पर रिकॉर्ड की समीक्षा करना अस्पताल की जिम्मेदारी है।
आखिरकार अभिलेख कक्ष खोलने की अनुमति मिल गई।
अभिलेख कक्ष अस्पताल की पुरानी इमारत के एक हिस्से में था। वहाँ लोहे की अलमारियों में वर्षों पुराने कागजात रखे थे।
रिकॉर्ड अधिकारी ने कर्मचारियों की मदद से नीली फाइल खोजनी शुरू की।
कुछ समय बाद उसे एक पुराना बक्सा मिला। उसमें अस्पताल के पुराने कर्मचारियों और मरीजों से जुड़े रिकॉर्ड थे।
बक्से के नीचे एक नीली फाइल रखी थी।
फाइल पर लिखा था—‘बाल सहायता कोष और अनाथ बच्चों की चिकित्सा योजना।’
डॉ. सान्या ने फाइल खोली।
पहले कुछ पन्नों में अस्पताल की एक पुरानी योजना का विवरण था। इस योजना के तहत उन बच्चों को मुफ्त इलाज और शिक्षा सहायता दी जाती थी, जिनके माता-पिता नहीं थे या जो गंभीर आर्थिक संकट में थे।
योजना की शुरुआत डॉ. देवेंद्र सेन और कमला देवी ने मिलकर की थी।
कमला देवी उस समय अस्पताल में सामाजिक सहायता कर्मचारी थीं। उनका काम जरूरतमंद बच्चों को उपचार दिलाना और उनके परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना था।
फाइल में कई बच्चों के नाम और उपचार का विवरण दर्ज था।
लेकिन कुछ पन्नों के बाद रिकॉर्ड बदलने लगा।
कई बच्चों की सहायता राशि जारी दिखाई गई थी, जबकि उनके उपचार के बिलों में भुगतान का कोई प्रमाण नहीं था।
कुछ मामलों में बच्चों को सहायता देने की स्वीकृति दर्ज थी, लेकिन बाद के रिकॉर्ड में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
एक पन्ने पर कमला देवी की लिखित शिकायत थी।
उन्होंने आरोप लगाया था कि जरूरतमंद बच्चों के लिए निर्धारित सहायता राशि का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा था। कुछ मामलों में बच्चों के नाम पर रकम जारी की गई थी, लेकिन उन्हें उपचार या दूसरी सहायता नहीं मिली थी।
शिकायत के नीचे डॉ. देवेंद्र सेन के हस्ताक्षर थे।
उन्होंने मामले की जाँच कराने की सिफारिश की थी।
लेकिन अगला पन्ना पढ़ते ही डॉ. सान्या रुक गईं।
उसमें लिखा था कि कमला देवी पर रिकॉर्ड में अनियमितता करने का आरोप लगाकर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी। उनकी शिकायत की अंतिम जाँच का कोई स्पष्ट विवरण फाइल में मौजूद नहीं था।
डॉ. सान्या ने रिकॉर्ड अधिकारी से पूछा, “इस मामले की जाँच का अंतिम परिणाम कहाँ है?”
रिकॉर्ड अधिकारी ने फाइल के पन्ने पलटते हुए कहा, “मैम, यहाँ अंतिम रिपोर्ट नहीं है। केवल सेवा समाप्ति का आदेश है।”
डॉ. सान्या ने कहा, “और डॉ. देवेंद्र सेन की सिफारिश का क्या हुआ?”
अधिकारी ने जवाब दिया, “इसका भी कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।”
तभी फाइल में एक लिफाफा मिला। उसके ऊपर लिखा था—‘कमला देवी के व्यक्तिगत अभिलेख।’
लिफाफे के अंदर कुछ पुराने कागजात थे। उनमें एक पत्र भी था, जिसे डॉ. देवेंद्र सेन ने लिखा था।
पत्र में उन्होंने कहा था कि सहायता कोष के हिसाब में गंभीर विसंगतियाँ दिखाई दी हैं और मामले की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा था कि कमला देवी को दोषी ठहराने से पहले उनके आरोपों की निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए।
पत्र के अंत में एक वाक्य था—
“यदि इस मामले की सच्चाई सामने नहीं आती, तो उन बच्चों के साथ अन्याय होगा, जिनके नाम पर यह सहायता कोष बनाया गया था।”
डॉ. सान्या ने पत्र की प्रति सुरक्षित कर ली।
अब यह स्पष्ट था कि कमला देवी ने किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि जरूरतमंद बच्चों की सहायता के लिए आवाज उठाई थी। हालांकि फाइल में दर्ज आरोपों की पूरी सच्चाई जानने के लिए स्वतंत्र जाँच आवश्यक थी।
समिति ने आगे की जाँच के लिए पुराने वित्तीय रिकॉर्ड, भुगतान रजिस्टर और संबंधित कर्मचारियों के बयान माँगे।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभी भी बाकी था—कमला देवी को दोषी ठहराने का फैसला किस आधार पर लिया गया था?
इसका उत्तर फाइल के आखिरी हिस्से में छिपा था।
वहाँ एक अधूरा दस्तावेज मिला, जिस पर तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी के हस्ताक्षर थे। दस्तावेज में लिखा था कि कमला देवी की शिकायत पर आगे की कार्रवाई रोक दी गई है।
कारण के स्थान पर केवल इतना लिखा था—
“मामले को संस्थान की प्रतिष्ठा के हित में बंद रखा जाए।”
डॉ. सान्या ने यह पंक्ति पढ़ी तो उनके चेहरे पर गहरी चिंता उभर आई।
किसी संस्थान की प्रतिष्ठा बचाने के लिए क्या एक कर्मचारी को दोषी ठहरा दिया गया था? क्या बच्चों के लिए रखी गई सहायता राशि का गलत इस्तेमाल हुआ था? और अगर ऐसा हुआ था, तो जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश किसने की थी?
अब इन सवालों के जवाब देना अस्पताल प्रशासन के लिए जरूरी हो गया था।
जाँच की प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार होने के बाद अस्पताल की विशेष बैठक बुलाई गई। बैठक में निदेशक डॉ. महेंद्र सूद, शिकायत समिति के सदस्य, वित्त विभाग के अधिकारी और डॉ. सान्या मौजूद थीं।
डॉ. सूद ने कहा, “पुराने रिकॉर्ड में कुछ कमियाँ हैं, लेकिन केवल अधूरे कागजात के आधार पर किसी पर आरोप लगाना सही नहीं होगा।”
समिति के अध्यक्ष ने जवाब दिया, “हम किसी को दोषी घोषित नहीं कर रहे हैं। हम यह पता लगा रहे हैं कि कमला देवी की शिकायत की जाँच क्यों रोकी गई और सहायता कोष का पैसा कहाँ खर्च हुआ।”
वित्त अधिकारी ने पुराने भुगतान रजिस्टर सामने रखे।
उनमें कई ऐसी रकम दर्ज थीं, जिनका भुगतान तो दिखाया गया था, लेकिन संबंधित बच्चों के उपचार का प्रमाण नहीं मिल रहा था। कुछ भुगतान सही भी थे, इसलिए सभी मामलों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता था।
समिति ने तय किया कि पुराने बैंक रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों की स्वतंत्र जाँच कराई जाएगी। जिन परिवारों का पता लगाया जा सकता था, उनसे भी संपर्क किया जाएगा।
तभी डॉ. सान्या ने एक और दस्तावेज बैठक में रखा।
वह कमला देवी की शिकायत का मूल पत्र था, जिसमें उन्होंने उन बच्चों के नाम लिखे थे, जिन्हें सहायता नहीं मिली थी।
सूची में कुल सत्रह बच्चों के नाम थे।
समिति ने उन नामों की तुलना पुराने रिकॉर्ड से की। जाँच में पता चला कि कुछ बच्चों को सहायता मिली थी, जबकि कई मामलों में भुगतान और वास्तविक उपचार के बीच अंतर था। कुछ रिकॉर्ड इतने पुराने और अधूरे थे कि उनके आधार पर तुरंत निष्कर्ष निकालना संभव नहीं था।
लेकिन एक बात साफ थी—कमला देवी की शिकायत की पूरी जाँच कभी हुई ही नहीं थी।
डॉ. सूद ने दस्तावेजों को देखते हुए कहा, “यह मामला गंभीर है। इसकी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।”
समिति के अध्यक्ष ने कहा, “और जब तक जाँच पूरी नहीं होती, तब तक इस मामले से जुड़े पुराने रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएँगे। किसी भी दस्तावेज में बदलाव नहीं किया जाएगा।”
बैठक के बाद डॉ. सान्या गौरी से मिलने गईं।
गौरी अपनी बहन के पास बैठी थी। परी की हालत में सुधार हो रहा था और डॉक्टरों को उम्मीद थी कि उचित देखभाल से वह जल्द स्वस्थ हो जाएगी।
डॉ. सान्या ने गौरी के पास बैठकर कहा, “बेटा, तुम्हारी माँ की चिट्ठी से हमें एक पुराने मामले की जानकारी मिली है। अस्पताल में उनकी शिकायत की पूरी जाँच नहीं हुई थी। अब इसकी निष्पक्ष जाँच होगी।”
गौरी ने पूछा, “क्या मेरी माँ चोर थीं, डॉक्टर मैम?”
डॉ. सान्या ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं, बेटा। अभी तक हमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह कहा जा सके कि तुम्हारी माँ ने चोरी की थी। उन्होंने बच्चों की सहायता में गड़बड़ी होने की शिकायत की थी। उनकी शिकायत की जाँच अधूरी छोड़ दी गई थी।”
गौरी की आँखों में आँसू आ गए।
“मेरी माँ हमेशा कहती थीं कि गरीब होना कोई अपराध नहीं है। वह कहती थीं कि अगर कोई गलत काम करे, तो उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।”
डॉ. सान्या ने उसका हाथ थाम लिया।
“तुम्हारी माँ ने अपनी बात दर्ज कराई थी। अब उस मामले की जाँच होगी। लेकिन हमें हर निष्कर्ष प्रमाणों के आधार पर निकालना होगा।”
गौरी ने सिर हिलाया।
“मैं बस इतना चाहती हूँ कि कोई मेरी माँ को गलत न समझे।”
डॉ. सान्या ने कहा, “यही कोशिश की जा रही है।”
कुछ सप्ताह बाद स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया आगे बढ़ी। पुराने रिकॉर्ड और उपलब्ध वित्तीय दस्तावेजों की समीक्षा की गई। अस्पताल ने बाल सहायता कोष की निगरानी के लिए नई व्यवस्था लागू की और जरूरतमंद बच्चों के इलाज के लिए अलग सहायता कक्ष बनाया।
जाँच में यह भी सामने आया कि पुराने प्रशासन ने कमला देवी की शिकायत को निष्पक्ष रूप से आगे नहीं बढ़ाया था। हालांकि सभी वित्तीय विसंगतियों के लिए जिम्मेदारी तय करने में समय लगा, लेकिन कमला देवी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने वाला पर्याप्त आधार नहीं मिला।
अस्पताल ने उनके परिवार से औपचारिक रूप से माफी माँगी और उनके रिकॉर्ड में दर्ज सेवा समाप्ति संबंधी टिप्पणी की समीक्षा कर उसे उचित रूप से संशोधित किया।
गौरी और परी के लिए बाल कल्याण विभाग की सहायता से सुरक्षित आवास और पढ़ाई की व्यवस्था की गई। दोनों बहनों को साथ रखने की उनकी इच्छा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक प्रक्रिया पूरी की गई।
परी स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर आई तो गौरी ने उसे कसकर गले लगा लिया।
“परी, अब हम फिर से स्कूल जाएँगे। तुम पढ़ना सीखोगी और मैं भी पढ़ूँगी।”
परी ने मुस्कराकर पूछा, “दीदी, क्या तुम सच में डॉक्टर बनोगी?”
गौरी ने उसकी नाक छूते हुए कहा, “हाँ। लेकिन मैं ऐसी डॉक्टर बनूँगी, जो मरीज के पैसे देखने से पहले उसकी तकलीफ समझे।”
डॉ. सान्या पास खड़ी यह बात सुन रही थीं।
उन्होंने कहा, “गौरी, डॉक्टर बनने के लिए मेहनत करनी होगी। पढ़ाई आसान नहीं होगी, लेकिन अगर तुम लगातार कोशिश करोगी, तो अपने सपने के करीब पहुँच सकती हो।”
गौरी ने दृढ़ आवाज़ में कहा, “मैं मेहनत करूँगी, मैम। मैं चाहती हूँ कि कोई बच्चा अस्पताल के दरवाजे से इस डर से वापस न जाए कि उसके पास पैसे नहीं हैं।”
डॉ. सान्या ने उसे गले लगा लिया।
अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार पर अब एक नया सूचना-पट्ट लगाया गया था। उस पर लिखा था कि आपात स्थिति में मरीज को आवश्यक प्राथमिक उपचार देने में आर्थिक असमर्थता बाधा नहीं बनेगी और जरूरतमंद परिवार सहायता कक्ष से संपर्क कर सकते हैं।
गौरी ने उस पट्ट को देखा तो उसे अपनी माँ की याद आ गई।
उसने अपने थैले से पुरानी चिट्ठी निकाली। कागज अब भी पीला था, लेकिन उसके लिए वह दुनिया की सबसे कीमती चीज थी।
उसने चिट्ठी को अपने सीने से लगाकर धीरे से कहा, “माँ, मैं आपकी बात समझ गई। आपने मुझे पैसे माँगने नहीं, सच के लिए खड़े होना सिखाया था।”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में निराशा नहीं थी।
उसे अब भी लंबा रास्ता तय करना था। गरीबी की मुश्किलें एक दिन में खत्म नहीं होतीं और एक शिकायत से हर अन्याय दूर नहीं हो जाता। लेकिन उसकी माँ की चिट्ठी ने कम से कम एक बंद दरवाजा खोल दिया था।
और उस दरवाजे के खुलने से उन बच्चों की आवाज सुनाई देने लगी थी, जिन्हें कभी किसी ने गंभीरता से नहीं सुना था।
कहानी की सीख: किसी इंसान की गरीबी देखकर उसकी बात को झूठा नहीं समझना चाहिए। सच्चाई का फैसला कपड़ों, पैसे या पद से नहीं, बल्कि प्रमाणों और निष्पक्ष जाँच से होना चाहिए। कभी-कभी एक छोटी-सी आवाज भी बड़े संस्थान को अपनी जिम्मेदारी याद दिला सकती है।

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