❝ शालिनी और देव का साथ ❞

 



यह कहानी है उस समय की, जब ज़िंदगी ने मुझे एक नया मोड़ दिखाया।

मैं देव, उम्र लगभग 47 साल। पिछले 25 सालों से एक सरकारी बैंक में नौकरी कर रहा हूँ। जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन “ठीक-ठाक” भी कभी-कभी बहुत अकेला लगता है।

मेरी पत्नी का देहांत हुए पाँच साल हो चुके थे। कोई बच्चा नहीं था, और अब तो घर की दीवारें भी जैसे मुझसे बातें नहीं करती थीं।


हर दिन सुबह बैंक, शाम को वही चाय का प्याला, वही टीवी की आवाज़, और फिर नींद।

जीवन जैसे रुक-सा गया था।





एक दिन हमारे बैंक में एक नई कर्मचारी आई — शालिनी।

करीब 35 साल की, शांत, सलीकेदार और बहुत ही विनम्र स्वभाव की महिला।

उसकी मुस्कान में एक अजीब सादगी थी, जैसे बहुत कुछ सहकर भी वह मुस्कुरा रही हो।


पहले दिन मैंने सिर्फ सामान्य बातें कीं —

“आपको कोई मदद चाहिए तो बताइएगा।”


वह बोली —

“धन्यवाद सर, मैं संभाल लूंगी।”

उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास था, पर आँखों में हल्का-सा डर भी।





दिन बीतने लगे।

धीरे-धीरे हम दोनों के बीच बातचीत बढ़ी।

कभी चाय के दौरान, कभी किसी काम के बहाने।


एक दिन मैंने पूछा —

“शालिनी जी, आप हमेशा इतनी चुप क्यों रहती हैं?”


वह थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली —

“कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ा जवाब होता है, देव जी।”


उस एक शब्द में जैसे पूरी कहानी छिपी थी।

फिर एक दिन उसने बताया कि वह विधवा है।

उसका पति एक दुर्घटना में गुजर गया था, जब उनकी शादी को सिर्फ तीन साल हुए थे।

वह अपनी सास के साथ रहती थी, पर अब दोनों शहर में किराए के घर में रहते थे।


मैंने देखा — उसके भीतर दर्द था, पर उसने उसे चेहरे पर जगह नहीं दी थी।




समय बीतता गया।

कभी दफ्तर में काम के बीच छोटी-छोटी बातें,

कभी छुट्टी वाले दिन फोन पर जीवन की बातें।


शालिनी को किताबें पढ़ना बहुत पसंद था।

वह कहती —

“किताबों में वो बातें मिलती हैं जो लोग बोल नहीं पाते।”


मुझे उसकी सोच बहुत पसंद आई।

उसका शांत स्वभाव, उसकी ईमानदारी —

धीरे-धीरे मैं उसकी तरफ खिंचता चला गया।





एक शाम ऑफिस के बाद मैंने उसे चाय पीने का निमंत्रण दिया।

पहले तो उसने मना किया, फिर बोली —

“ठीक है, लेकिन आधे घंटे से ज़्यादा नहीं रुक सकती।”


उस दिन हमने पहली बार अपने जीवन की बातें खुलकर कीं।

उसने कहा —

“देव जी, मैंने बहुत कुछ खोया है। अब बस चैन से जीना चाहती हूँ। किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती।”


मैंने कहा —

“और अगर कोई आपको बोझ न समझे, बल्कि अपना सहारा बना ले तो?”


वह मुस्कुराई, पर कुछ नहीं बोली।

बस उस मुस्कान में बहुत गहराई थी।




उसके बाद हमारी मुलाकातें थोड़ी बढ़ने लगीं।

लोग बातें भी करने लगे —

पर मुझे परवाह नहीं थी।

क्योंकि मैं जानता था, हमारी नीयत साफ थी।


शालिनी के घर में उसकी सास बीमार रहती थीं।

कई बार मैं दवाइयाँ दिला देता, या डॉक्टर के पास छोड़ आता।

धीरे-धीरे उनकी भी मुझसे अच्छी पहचान हो गई।




एक दिन शालिनी की सास ने मुझसे कहा —

“बेटा, शालिनी बहुत सह चुकी है।

अगर तुम उसे खुश रख सको, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”


मैं कुछ पल के लिए कुछ बोल ही नहीं पाया।

शायद भगवान ने मेरी खाली ज़िंदगी में एक नई रोशनी भेजी थी।


कुछ दिनों बाद मैंने शालिनी से कहा —

“अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हारे साथ अपना बाकी जीवन बिताना चाहता हूँ... तो?”


वह चुप रही। फिर बोली —

“देव जी, समाज बहुत कुछ कहेगा, आपकी उम्र मुझसे ज़्यादा है...”


मैं मुस्कुराया —

“समाज को तो दो कप चाय भी पसंद नहीं आती अगर चीनी ज़्यादा हो जाए।

लेकिन क्या हमें अपनी ज़िंदगी समाज के हिसाब से जीनी चाहिए?”


शालिनी की आँखों में आँसू थे, पर इस बार वो आँसू दर्द के नहीं, सुकून के थे।





कुछ महीनों बाद हमने सादगी से शादी कर ली।

न कोई शोर, न कोई बैंड-बाजा।

बस हम दोनों और हमारी सास, जिनकी आँखों में आशीर्वाद था।


अब हमें शादी को तीन साल हो चुके हैं।

हम दोनों अब भी उसी बैंक में काम करते हैं।

सुबह एक साथ निकलते हैं, शाम को घर लौटते हैं,

और रात को मिलकर खाना बनाते हैं।


कई बार बस चुपचाप बैठकर एक-दूसरे को देखते रहते हैं —

क्योंकि अब शब्दों की ज़रूरत नहीं रहती।





जीवन ने सिखाया है —

सच्चा रिश्ता उम्र, पैसा या सुंदरता नहीं देखता,

वह बस मन का मेल देखता है।


हर इंसान किसी न किसी मोड़ पर टूटा होता है,

पर अगर उसे कोई ऐसा मिल जाए

जो उसके टूटे हिस्सों को जोड़ दे,

तो वही जीवन की असली ख़ूबसूरती है।



समाप्त 🌷


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