टूटी परंपरा की डोर
“माँ, मुझे एक ज़रूरी बात बतानी है…”
कहते हुए आयुष ने अपने लैपटॉप को बंद किया और सोफे पर बैठ गया।
नीता देवी ने अख़बार से नज़र उठाई —
“क्या हुआ बेटा, ऑफिस में सब ठीक तो है?”
“हाँ माँ, ऑफिस में सब ठीक है… लेकिन मेरी ज़िंदगी में थोड़ा बदलाव आने वाला है। मैं… शादी करना चाहता हूँ।”
“वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है!”
नीता देवी मुस्कुरा पड़ीं, “लड़की कौन है? कब आऊं देखने?”
“वो… स्नेहा…”
आयुष थोड़ा रुक गया, “वो मेरे ऑफिस में काम करती है, और… वो बंगाली है।”
नीता देवी के चेहरे की मुस्कान जैसे वहीं जम गई —
“क्या कहा तुमने? बंगाली?”
“हाँ माँ, लेकिन बहुत संस्कारी है, घर का ख्याल रखती है, परिवार को प्राथमिकता देती है, और—”
“बस आयुष!”
नीता देवी ने अख़बार टेबल पर पटक दिया, “हमारे कुल की परंपरा है कि शादी जाति में ही होती है। तेरे पापा होते तो ये सुनकर बहुत दुखी होते।”
“माँ, पापा होते तो शायद आज खुश होते कि उनका बेटा किसी को उसकी इंसानियत से पसंद करता है, न कि जाति से।”
नीता देवी ने गहरी सांस ली।
उनकी नज़र दीवार पर टंगे अपने पति की तस्वीर पर चली गई।
वो तस्वीर जैसे चुपचाप कुछ कह रही थी।
“बेटा, तू नहीं जानता, जात-पात के बंधन तोड़ने के क्या परिणाम होते हैं। तेरी बड़ी मौसी को याद कर — सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से शादी की थी, आज तक किसी ने बात नहीं की उनसे।”
“माँ, यही तो समस्या है।”
आयुष की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई,
“मौसी ने अपनी खुशी चुनी थी, गुनाह नहीं किया था। अगर आप सबने उन्हें माफ़ किया होता, अपनाया होता, तो शायद आज वो अकेली न होतीं।”
माँ चुप रहीं।
कुछ पल बाद उन्होंने धीरे से कहा,
“तो क्या तू भी वही गलती दोहराएगा?”
“नहीं माँ,” आयुष ने दृढ़ स्वर में कहा,
“मैं गलती नहीं करूँगा, मैं सुधार करूँगा — उस गलती का, जो हमारे परिवार ने मौसी के साथ की थी। स्नेहा से शादी करूँगा, लेकिन उससे पहले… मौसी को इस घर में वापस लाऊँगा।”
नीता देवी ने हैरान होकर बेटे की तरफ देखा —
“क्या मतलब?”
“मतलब ये माँ कि जब तक आप और मैं खुद जाकर मौसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे, उन्हें घर नहीं लाएँगे, मैं शादी की बात आगे नहीं बढ़ाऊँगा।”
नीता देवी की आँखों में आँसू आ गए।
उन्हें याद आया — उस दिन जब उनकी बड़ी बहन मीरा ने मंदिर के बाहर हाथ जोड़कर कहा था,
“छोटी, मुझे बस एक बार माँ से मिलवा दे… मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी…”
और उन्होंने डर के मारे दरवाज़ा बंद कर दिया था।
अब वही आवाज़ उनके कानों में गूंज रही थी।
अगले दिन सुबह —
आयुष ने माँ का हाथ थामा,
“चलो माँ, एक बार चलकर मिल लेते हैं।”
गाड़ी पुराने मोहल्ले की गलियों से गुज़री और एक छोटे से घर के सामने रुक गई।
दरवाज़ा खुला —
बालों में चांदी, चेहरे पर सादगी और आंखों में सैकड़ों सवाल — मीरा मौसी सामने खड़ी थीं।
“आयुष…?” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।
“हाँ मौसी, आयुष… आपकी छोटी बहन का बेटा।”
नीता देवी की आँखें भर आईं —
“दीदी… माफ़ कर दो। बहुत देर कर दी आने में…”
मीरा ने बिना कुछ कहे छोटी बहन को गले से लगा लिया।
बीचोंबीच बेटा खड़ा था, आँखों में संतोष लिए —
“अब शायद पापा भी खुश होंगे।”
कुछ दिन बाद घर में खुशियों का माहौल था।
शादी की तैयारियाँ चल रही थीं — पर इस बार सबसे आगे थीं मीरा मौसी।
रिश्तेदार हैरान थे, पर नीता देवी मुस्कुराकर बस इतना कहतीं,
“कभी-कभी परंपरा तोड़ना जरूरी होता है ताकि रिश्ते जुड़ सकें।”
आयुष ने स्नेहा की तरफ देखा —
“देखा, अब मेरा घर पूरा हो गया।”
और दीवार पर लगी तस्वीर में जैसे नीता देवी के पति मुस्कुरा रहे थे…
जैसे कह रहे हों —
“अब सही किया तुमने।”
संदेश:
कभी-कभी “परंपरा” के नाम पर जो दीवारें हम
खड़ी करते हैं,
वो हमारे ही अपने रिश्तों को कैद कर देती हैं।
समय है — उन्हें गिराने का।
#ParivarKiKahani #RishtonKiSeekh

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