खामोशी का खेल

 

An emotional scene of an Indian grandmother sitting in a courtyard with prayer beads, watching two young twin girls playing, while a mother stands quietly near the kitchen, reflecting family emotions and childhood innocence.


आँगन के कोने में बैठी दादी सावित्री देवी माला फेर रही थीं।

मुँह से “राम… राम…” निकल रहा था,

पर आँखें बार-बार सामने खेलती दो बच्चियों पर चली जाती थीं।


उनकी पोतियाँ — अनु और मनु,

छह साल की जुड़वाँ बहनें,

कभी गिट्टे खेलतीं,

कभी कंचे,

तो कभी ज़मीन पर लकीर खींचकर एक-टांग खेल खेलतीं।


थोड़ी देर में अनु बोली—

“मनु, अब बोर हो गया। कुछ और खेलते हैं।”


मनु ने चारों ओर देखा,

सोच में डूबी,

फिर अचानक बोली—

“चलो… घर-घर खेलते हैं!”


अनु की आँखें चमक उठीं।


“ठीक है,”

वो दौड़ती हुई रसोई की तरफ गई,

जहाँ माँ शारदा चूल्हे पर सब्ज़ी चला रही थीं।


अनु ने पीछे से माँ का पल्लू खींचा और हँसते हुए बोली—

“ये मेरी साड़ी… मैं मम्मी बनूँगी।”


उधर मनु ने आँगन में टिकी दादी की लकड़ी की छड़ी उठाई और बोली—

“और मैं पापा!”


दादी चौंक गईं।

माला रुक गई।


“अरे… पापा छड़ी लेकर थोड़े घूमते हैं?”

दादी ने हल्की हँसी में कहा।


मनु ने मासूमियत से जवाब दिया—

“हमारे पापा भी तो हाथ में बेल्ट रखते हैं।

छड़ी भी वैसी ही है ना।”


आँगन की हवा जैसे अचानक ठंडी हो गई।


रसोई से शारदा तेज़ कदमों से बाहर आईं।


“बस!”

उनकी आवाज़ में डर भी था, गुस्सा भी।


उन्होंने झट से अनु के हाथ से पल्लू छीना

और बिना कुछ कहे रसोई में वापस चली गईं।


दादी ने भी चुपचाप मनु के हाथ से छड़ी ले ली।


मनु और अनु एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं।


कुछ पल पहले जो खेल था,

अब बोझ बन गया था।


आँगन में अजीब सी खामोशी फैल गई।



खामोशी के पीछे की कहानी...


दादी सावित्री देवी सब समझती थीं।


उन्होंने अपनी बहू को कभी कुछ कहते नहीं देखा,

पर हर शाम

उसकी आँखों में थकान के साथ डर साफ़ झलकता था।


बेटा रमेश

बाहर से सीधा-सादा दिखता,

पर घर के भीतर

उसका गुस्सा बेल्ट की शक्ल ले लेता।


“बच्चों के सामने मत बोलो,”

शारदा ने कई बार कहा था।


पर बच्चे सब देख लेते हैं।

सब समझ लेते हैं।


खेल-खेल में

वही दोहराते हैं

जो उन्होंने रोज़ देखा होता है।



दादी का फैसला...


शाम को

दादी ने दोनों बच्चियों को पास बिठाया।


“आओ… एक नया खेल खेलते हैं,”

उन्होंने प्यार से कहा।


“कौन सा?”

दोनों ने एक साथ पूछा।


“जिसमें कोई डर नहीं होता।

जिसमें पापा मुस्कुराते हैं,

और मम्मी हँसती हैं।”


दादी ने अनु को गोद में लिया

और मनु के सिर पर हाथ फेरा।


“घर वो होता है

जहाँ आवाज़ ऊँची नहीं,

दिल बड़ा होता है।”


बच्चियाँ शायद सब कुछ शब्दों में न समझ पाईं,

पर नानी की आँखों में ठहरी वह नमी

उनके नन्हे दिलों ने चुपचाप महसूस कर ली।



अगले दिन..

आँगन में फिर खेल शुरू हुआ।


इस बार—


मनु बोली—

“मैं पापा बनूँगी,

जो ऑफिस से आते ही

मम्मी के लिए पानी लाते हैं।”


अनु हँसते हुए बोली—

“और मैं मम्मी,

जो कभी डरती नहीं।”


नानी की माला फिर चल पड़ी।


इस बार

मंत्र कम,

दुआ ज़्यादा थी।


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