गरीब भाभी और चार अमीर ननदें
कौशल्या और उसकी बेटी माया सब्ज़ी का ठेला खींचते हुए धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ रही थीं।
धूप ढलने लगी थी, रास्ते में धूल उड़ रही थी और पैरों में चप्पल घिस चुकी थी।
माया ने ठेले की रस्सी कंधे से उतारते हुए कहा—
“मा… आज तो बड़ी सस्ती सब्ज़ियाँ मिलीं।
अगर पहले पता होता कि इस मंडी में इतना सस्ता मिल जाता है, तो मैं रोज़ यहीं से लाती।”
कौशल्या ने पसीना पोंछते हुए हल्की मुस्कान दी—
“पता तो मुझे भी नहीं था बेटा। तेरी सहेली मेनका ने बताया, तभी आई।
थोड़ा दूर ज़रूर है, पर देख—हफ्ते भर की सब्ज़ी ले आई, वो भी आधे पैसों में।”
माया की आँखों में चमक आ गई—
“आज दाल-चावल के साथ थोड़ी मिक्स सब्ज़ी भी बना लूँगी।
बाबा को बहुत पसंद है।”
दोनों माँ-बेटी बातें करती हुई चल ही रही थीं कि सामने से शारदा आंटी आती दिखीं।
चमचमाती साड़ी, मोटी सोने की चेन, हाथों में भारी कंगन।
“अरे शारदा आंटी, नमस्ते,” माया ने आदर से कहा।
शारदा ने ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बोली—
“अरे कौशल्या, तुम लोग अभी तक ऐसे ही हो?
मैं तो आजकल घर पर रहती ही कहाँ हूँ।
पिछले हफ्ते मनाली घूम कर आई हूँ।”
फिर उसने अपने हाथ आगे बढ़ाकर दिखाए—
“देखो, सोने के कंगन हैं। पूरे आठ लाख के।”
कौशल्या की निगाहें अपने आप नीचे झुक गईं।
“बर्थडे गिफ्ट है,” शारदा आगे बोली,
“सोना तो औरतों की शान होती है।
हम जैसे अमीर लोगों को दाम बढ़ने से क्या फर्क पड़ता है।
हर साल कुछ न कुछ लेते ही रहते हैं।”
फिर एक ठंडी हँसी हँसते हुए बोली—
“पर तुम्हारी किस्मत में कहाँ सोना है कौशल्या…
नाक में नथ तक नहीं।
कभी-कभी बड़ा बुरा लगता है मुझे तुम्हारे लिए।”
ये शब्द कौशल्या के दिल में किसी काँटे की तरह चुभ गए।
माया का चेहरा बुझ गया।
बिना कुछ कहे दोनों आगे बढ़ गईं।
घर पहुँचीं तो देखा—
मनोज चारपाई पर लेटे खाँस रहे थे।
“बाबा, आपने दवा नहीं ली?” माया घबरा गई।
“बहुत कड़वी है,” मनोज बोले,
“गले से उतरती ही नहीं।”
माया दवा देने लगी, तो बोतल खाली निकली।
“मा… दवा तो खत्म हो गई।”
कौशल्या बोली—
“तू मेडिकल से दवा ले आ।
मैं काढ़ा बना देती हूँ।”
मनोज धीमी आवाज़ में बोले—
“मेरी दवा में पैसे मत फूँको।
तेरी शादी भी तो करनी है।”
कौशल्या की आँखें भर आईं—
“बचपन से इसके लिए गहने बनवाए थे…
पर बीमारी ने सब बिकवा दिया।”
माया ने दोनों का हाथ पकड़ लिया—
“मुझे सोने का कोई शौक नहीं।
सादगी से शादी कर लूँगी।
और अगर शादी न भी हुई,
तो ज़िंदगी भर आप दोनों की सेवा करूँगी।”
समय बीतता गया।
एक दिन पंडित जी रिश्ता लेकर आए।
लड़के का घर बहुत अमीर था।
दहेज की कोई माँग नहीं।
कौशल्या को यकीन ही नहीं हुआ—
“हम जैसी गरीब लड़की को वो लोग क्यों अपनाएँगे?”
पंडित जी बोले—
“कुंडली में 36 के 36 गुण मिले हैं बहन जी।
और उन्हें बहू चाहिए, सोना नहीं।”
कुछ ही हफ्तों में शादी तय हो गई।
माया की शादी हो गई।
ससुराल बड़ा सा बंगला था—
हर तरफ़ चमक, एसी, झूमर, सोफे, एंटीक सामान।
चारों ननदें—
भावना, शालू, तारा और रुचि—
हर दिन सोने के गहनों में सजी रहतीं।
माया सबसे अलग थी—
सादी, शांत, खाली गले के साथ।
शादी के अगले ही दिन सास ने उसके सारे गहने लॉकर में रख लिए।
माया चुप रही।
उसने खुद से कहा—
“ये गहने मेरे नहीं हैं।”
दिन बीतते गए।
माया ने पूरे घर को अपना बना लिया।
सब उससे प्यार करते थे,
पर उसके पास आज भी सोना नहीं था।
एक दिन अनुराग उसे ज्वेलरी शॉप ले गया।
माया का दिल खुशी से भर गया।
लेकिन घर आकर पता चला—
वो गहने किसी और की शादी के लिए थे।
उस रात माया बहुत रोई।
लेकिन किसी से कुछ नहीं कहा।
फिर आया उसका जन्मदिन।
माया को उम्मीद नहीं थी,
पर दिल के किसी कोने में एक छोटी सी चाह ज़रूर थी।
चारों ननदें उसे शॉपिंग पर ले गईं।
लाखों की खरीदारी हुई।
सुनार की दुकान पर ननदों ने माया को सब गहने पहनाए—
रानी हार, कंगन, बाजूबंद, कमरबंद, नथ।
माया खुद को आईने में देखती रही।
आँखों में चमक थी,
पर दिल जानता था—
ये सब उसका नहीं है।
घर लौटकर माया अकेली कमरे में बैठी रही।
उसे लगा—
गरीबी सिर्फ़ जेब में नहीं होती,
दिल में भी घर बना लेती है।
तभी चारों ननदें कमरे में आईं।
भावना बोली—
“भाभी… ये सब आपके लिए है।”
माया स्तब्ध रह गई।
शालू बोली—
“आपने कभी कुछ माँगा नहीं,
इसलिए हमने खुद फैसला किया।”
तारा ने उसके हाथ में कंगन पहनाया।
रुचि ने नथ।
माया फूट-फूट कर रो पड़ी।
उस दिन माया ने समझा—
सोना अगर दिल से दिया जाए,
तो उसकी चमक ज़िंदगी भर रहती है।
और
गरीबी…
अगर रिश्तों में अमीरी हो,
तो हार मान जाती है। 🥹

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