बोझ नहीं थी वो… सोच थी
महेश और कोकिला देवी एक बड़े संयुक्त परिवार के मुखिया थे।
दो बेटे थे—बड़ा बेटा मोहित, जिसकी पत्नी मीनू थी, और छोटा बेटा, जिसकी पत्नी मीरा।
इसी घर में रहती थी संध्या—महेश के छोटे भाई की अनाथ बेटी। माँ-बाप के गुजर जाने के बाद वही घर उसका सहारा बना, लेकिन यह सहारा कभी अपनापन नहीं बन पाया।
घर बड़ा था, पर सोच छोटी।
खासतौर पर बेटियों को लेकर।
मीनू की पीड़ा
एक दिन मीनू की तबीयत अचानक बिगड़ गई। पेट में तेज़ दर्द से वह कराह उठी।
संध्या ने घबराकर आवाज़ दी—
“मम्मी जी, जल्दी आइए… भाभी को बहुत दर्द हो रहा है।”
घर में अफरा-तफरी मच गई।
महेश जी उत्तेजना में बोले—
“जल्दी करो, हमारे वंश का वारिस आने वाला है।”
किसी ने एक पल के लिए भी यह नहीं पूछा कि मीनू कैसी है, डर रही है या नहीं।
सबकी निगाहें सिर्फ आने वाले बच्चे पर टिकी थीं।
अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते हुए कोकिला देवी बार-बार कहती रहीं—
“इस बार तो पोता ही आएगा… घर का चिराग।”
संध्या चुपचाप बैठी रही।
उसके मन में डर था—
अगर बेटी हुई तो?
दो घंटे बाद नर्स बाहर आई।
“बधाई हो… बेटी हुई है।”
शब्द हवा में तैरकर वहीं गिर गए।
न ताली बजी, न मुस्कान आई।
कोकिला देवी ने मुँह फेर लिया—
“फिर एक बोझ आ गया…”
मीनू अंदर लेबर रूम में थी और बाहर उसकी बेटी को बोझ घोषित कर दिया गया था।
उस दिन न दादा ने बच्ची को गोद में लिया,
न दादी ने माथा चूमा।
सिर्फ़ संध्या थी, जिसने बच्ची को बाहों में भर लिया।
मीनू की आँखों से आँसू बह निकले—
“संध्या… क्या बेटी होना पाप है?”
संध्या के पास जवाब नहीं था, क्योंकि वही सवाल उसकी अपनी ज़िंदगी भी पूछती थी।
दूसरा जन्म, दूसरा व्यवहार
कुछ ही दिनों बाद छोटी बहु मीरा की डिलिवरी हुई।
इस बार नर्स की आवाज़ आई—
“बधाई हो, लड़का हुआ है।”
पूरा माहौल बदल गया।
मिठाइयाँ बँटीं, ढोल बजे, हँसी-ठिठोली हुई।
“मेरा पोता आ गया!”
कोकिला देवी खुशी से रो पड़ीं।
मीरा के कमरे में हीटर लगा, आरती उतरी, हर कोई पूछता रहा—
“कुछ चाहिए?”
और मीनू?
वह अपनी बेटी को गोद में लिए चुपचाप एक कोने में बैठी रही।
एक ही घर, दो बच्चे—
पर किस्मत अलग-अलग।
पाँच साल का भेदभाव
वक़्त बीता।
मीनू की बेटी चीनू और मीरा का बेटा अंशु साथ खेलने लगे।
एक दिन खिलौने को लेकर झगड़ा हुआ।
गलती अंशु की थी, लेकिन डाँट चीनू को पड़ी।
“लड़की है, दबकर रहना सीखो।”
कोकिला देवी के शब्द सीधे दिल में उतर गए।
उस दिन संध्या ने पहली बार साफ़ देखा—
भेदभाव उम्र के साथ नहीं, सोच के साथ चलता है।
संध्या की नई ज़िंदगी
कुछ समय बाद संध्या की शादी अनिकेत से हुई।
वह डर के साथ विदा हुई—
कहीं वही कहानी दोहराई न जाए।
लेकिन ससुराल में उसे अलग दुनिया मिली।
यहाँ बेटी-बेटे में फर्क नहीं था।
यहाँ प्यार बिना शर्त था।
“ठंड है बहु, शॉल ले लो।”
“थक गई होगी, आराम कर लो।”
संध्या पहली बार बिना डर के मुस्कुराई।
बेटी का स्वागत
जब संध्या की जेठानी को बेटी हुई, घर में उत्सव मनाया गया।
“लक्ष्मी आई है!”
दादा-दादी लाइन में खड़े थे बच्ची को गोद में लेने के लिए।
संध्या की आँखें भर आईं।
उसे लगा—
बेटी होना भी गर्व हो सकता है।
सामना
छठी के दिन घर में दीयों की मद्धिम रोशनी फैली हुई थी।
आँगन में हल्की-सी धूप उतर आई थी और नन्ही बच्ची की किलकारियों से माहौल जीवंत हो उठा था।
रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे लोग, पूजा की थालियाँ और मंगल गीत—सब कुछ किसी उत्सव की तरह था।
तभी कोकिला देवी ने चारों ओर नज़र घुमाते हुए, हल्के-से तंज़ के साथ कहा—
“इतनी धूमधाम…?
लड़की के लिए इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत थी?”
उनके शब्द हवा में ठहर गए।
एक पल को जैसे सब कुछ चुप हो गया।
उसी ख़ामोशी को तोड़ते हुए संध्या के ससुर आगे बढ़े।
उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें वर्षों की समझ और दृढ़ता थी—
“क्योंकि हमारे लिए बेटी कोई बोझ नहीं है,
वह हमारे घर का भविष्य है।
जिस घर में बेटियों को सम्मान मिलता है,
वही घर सच-मुच समृद्ध होता है।”
वह एक वाक्य नहीं था,
बल्कि संध्या के भीतर सालों से जमी चुप्पी पर रखा गया मरहम था।
उसकी आँखें भर आईं—
पहली बार उसे लगा कि उसका दर्द सुना गया है,
और बेटी होने का अर्थ भी समझा गया है।
जब जेठानी की बेटी तेजस्वी के नाम ज़मीन रजिस्टर्ड हुई,
तो संध्या अपने ससुराल के आँगन में खड़ी यह दृश्य देख रही थी।
उस घर में कोई भेदभाव नहीं था,
कोई चुप्पी नहीं,
कोई बोझ वाला शब्द नहीं।
वकील काग़ज़ समझा रहे थे,
ससुर जी मुस्कुराते हुए हस्ताक्षर कर रहे थे,
और जेठानी की आँखों में संतोष के आँसू थे।
संध्या को उस पल अपने मायके की तस्वीर याद आ गई—
जहाँ बेटी के जन्म पर चेहरे उतर जाते थे,
और आज वह एक ऐसे घर में खड़ी थी
जहाँ बेटी के नाम ज़मीन होना गर्व की बात थी।
उसी पल संध्या समझ गई कि
घर ईंट-पत्थर से नहीं,
सोच से बनते हैं।
और यह भी कि—
बेटियाँ बोझ नहीं होतीं,
बोझ होती है वह सोच
जो उन्हें कम आँकती है।

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