परायी होने का सवाल

 

Emotional Indian woman holding a phone by the window, expressing silent pain and strength in soft natural light.


सुबह का समय था।

घर में हलचल नहीं थी, फिर भी रमा के कमरे में अजीब-सी बेचैनी तैर रही थी।


वह अलमारी खोलकर एक-एक कर अपने काग़ज़ निकाल रही थी—

मार्कशीट, प्रमाण-पत्र, कोर्स की फाइलें, कुछ पुराने नोट्स।

सबको बड़े सलीके से लैपटॉप वाले बैग में रखती जा रही थी।


उसके हाथ स्थिर थे,

पर मन…

मन कहीं बहुत दूर भटक रहा था।


दरवाज़े पर खड़ी माँ उसे चुपचाप देख रही थी।

एकलौती बेटी…

जिसे उँगली पकड़कर चलना सिखाया था,

जिसके बुखार में रातें जागी थीं,

आज वही बेटी किसी और के घर की तैयारी कर रही थी।


माँ का कलेजा जैसे धीरे-धीरे चिर रहा था।


अपने आँसू भीतर दबाते हुए वह बोली—

“बेटी… अब तुम ससुराल जा रही हो।

वहाँ सब कुछ नया होगा।

यहाँ जैसा खुलापन… वैसा नहीं मिलेगा।”


रमा ने कुछ नहीं कहा।


माँ ने हिम्मत जुटाकर आगे कहा—

“सबको समझने में समय लगता है।

घबराना मत।

तुम्हारी सास अच्छी हैं…

कहते हैं, बहू को बेटी की तरह रखेंगी।”


थोड़ी देर चुप रहकर माँ ने धीमी आवाज़ में जोड़ा—

“एक बात हमेशा याद रखना…

दोपहर का समय घर में शांत रहता है।

तब फोन कर लिया करना।

कुछ भी छुपाना मत।

मेरा ध्यान हर पल तुम पर ही रहेगा।”


“हूँ…”

बस इतना ही निकला रमा के होंठों से।


वह माँ के सामने अपने डर को उजागर नहीं करना चाहती थी।



विदाई का समय आ गया।


घर में लोगों की आवाज़ें गूंजने लगीं।

हर रस्म, हर मुस्कान, हर आवाज़—

ऐसा लग रहा था जैसे यह सब पहले ही कहीं लिखा जा चुका हो।


आख़िरकार रमा पति के साथ नई कार में बैठ गई।


कार की खिड़की आधी खुली थी।


उस आधी खिड़की से

रमा की भीगी आँखें

अपनी माँ को देख रही थीं—

जो स्थिर खड़ी,

शून्य में ताकती जा रही थी।


मानो रमा की आँखें पूछ रही हों—

“आख़िर…

बेटी परायी क्यों कहलाती है?”


और माँ मन ही मन सोच रही थी—

“मैं भी कभी

इसी तरह

किसी की बेटी थी…”


कार आगे बढ़ गई।

कुछ ही पलों में

रमा आँखों से ओझल हो गई।



शुरुआती दिनों में कभी-कभार फोन आता।

कभी नेटवर्क नहीं,

कभी जल्दी काट देना।


माँ हर बार बेचैन रह जाती।


दोपहर में फोन न आने पर

दिल और ज़्यादा घबराने लगता।


एक शाम अचानक फोन बजा।


माँ ने घबराकर उठा लिया—

“बेटी… सच-सच बता।

तू ठीक तो है ना?

दोपहर में कभी बात ही नहीं करती।”


दूसरी तरफ से रमा की थकी आवाज़ आई—

“माँ… फुर्सत कहाँ मिलती है।

सुबह घर का काम,

फिर जल्दी-जल्दी तैयार होकर

कंप्यूटर क्लास पढ़ाने निकल जाती हूँ।

शाम को लौटते ही

फिर वही रसोई।”


थोड़ा रुककर वह बोली—

“सासू माँ कहती हैं—

पढ़ी-लिखी हो,

इसका मतलब ये नहीं

कि सिर्फ बाहर के काम देखो।

बहू हो,

घर का सब काम भी तुम्हारा है।”


फोन के उस पार सन्नाटा छा गया।


“माँ…

तुम रो रही हो?”

रमा ने घबराकर पूछा।


माँ ने खुद को संभालते हुए कहा—

“नहीं बेटी…

बस समझ गई हूँ।

ज़माना कितना भी बदल जाए,

ससुराल बेटी नहीं देखता,

वहाँ उसे हमेशा बहू ही समझा जाता है।”


फिर उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गई—

जैसे शब्द गले में अटक गए हों।


“बेटी…

‘हमें बहू नहीं, बेटी चाहिए’

ये बातें बस कहने भर की होती हैं।


इन्हीं मीठे शब्दों से

बेटी के माँ–बाप का दिल जीत लिया जाता है…

और बाद में

बेटी से सिर्फ़ बहू होने की उम्मीद की जाती है।”


इतना कहकर

माँ चुप हो गई।


फोन की दूसरी तरफ़

खामोशी थी…

और इस तरफ़

एक माँ का टूटता हुआ विश्वास।


फोन अपने आप कट गया।



माँ ने मोबाइल को

सीने से लगा लिया।


आँसू रुक नहीं रहे थे।


वह खुद से बुदबुदाई—

“सास बनते ही

ममता का रंग

इतना फीका क्यों पड़ जाता है?”


और उसी क्षण

उसे अपनी माँ की चुप्पी याद आ गई…

जो उसने कभी समझने की कोशिश नहीं की थी।



कहानी की आत्मा :


यह कहानी किसी एक रमा या एक माँ की नहीं,

यह हर उस माँ की है

जो बेटी को विदा करते समय मुस्कुराती है,

और हर उस बेटी की

जो कार की खिड़की से

आख़िरी बार पीछे देखती है।




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