अधूरा पायल का सपना

 

Elderly Indian couple celebrating their wedding anniversary with family inside a warm and traditional Indian home


“अजी सुनते हो… मेरी वो चांदी की पायल अब बिल्कुल ढीली हो गई है।” सरोज ने रसोई में बेलन रखते हुए सहज-सी आवाज़ में कहा।


मोहनलाल अख़बार के पीछे छिपते हुए बोले, “हां… देखेंगे किसी दिन।”


सरोज मुस्कुरा दी। “अरे, मैं कोई शिकायत नहीं कर रही। यूँ ही कह दिया। अब उम्र भी तो हो गई है, सजने-सँवरने का शौक भी कब का छूट गया।”


मोहनलाल ने कुछ नहीं कहा, पर दिल के किसी कोने में बात चुभ गई।



उस रात मोहनलाल को नींद नहीं आई।

छत का पंखा घूम रहा था, पर उनके मन में बीते साल घूम रहे थे।


तीस साल पहले, जब सरोज दुल्हन बनकर आई थी, पैरों में चमकती चांदी की पायल पहने। तब उन्होंने कहा था— “सरोज, पहली तनख़्वाह से तुम्हारे लिए नई पायल लाऊँगा।”


पहली तनख़्वाह आई…

फिर बच्चों की पढ़ाई आई…

फिर बीमारी…

फिर ज़िम्मेदारियाँ…


और पायल…

वो बस वादा बनकर रह गई।



सुबह सरोज पूजा कर रही थी। मोहनलाल बिना कुछ बताए तैयार हुए।


“इतनी सुबह कहां?” सरोज ने पूछा।


“बैंक का काम है।” कहकर वे निकल गए।


सरोज जानती थी—

जब भी मोहनलाल ऐसे जवाब देते हैं, कोई न कोई बात ज़रूर होती है।



मोहनलाल सीधे गली के पुराने जौहरी शंकरलाल की दुकान पहुंचे।


“अरे मोहन भैया, आज बड़े दिनों बाद?” शंकरलाल ने चश्मा ठीक करते हुए कहा।


मोहनलाल ने जेब से एक पुरानी पायल निकाली। “इसी नाप की नई पायल बनानी है… चांदी की।”


शंकरलाल मुस्कुरा दिया। “भाभीजी के लिए?”


मोहनलाल हल्के से हंसे। “हां… बहुत देर हो गई।”



घर लौटते समय उन्होंने डाकघर में रखा अपना पुराना रिकरिंग अकाउंट तुड़वा दिया। वो खाता, जिसके बारे में सरोज को कभी बताया ही नहीं था।


“शौक़ ज़रूरी नहीं होते… पर वादे ज़रूरी होते हैं।” उन्होंने खुद से कहा।



कुछ दिन बाद घर में हलचल थी। बेटे ने अचानक घोषणा कर दी— “मां-पापा, आपकी शादी की 30वीं सालगिरह है, इस बार घर पर ही छोटा-सा कार्यक्रम करेंगे।”


सरोज घबरा गई। “अरे नहीं-नहीं, इसकी क्या ज़रूरत है?”


मोहनलाल चुपचाप मुस्कुरा रहे थे।



शाम को जब सब इकट्ठा हुए,

सरोज हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में बिल्कुल वैसी ही लग रही थी— जैसी तीस साल पहले।


केक कटा। तालियां बजीं।


तभी मोहनलाल उठे। उन्होंने जेब से छोटा-सा डिब्बा निकाला।


“सरोज… ज़रा बैठो।”


सरोज हड़बड़ा गई। “ये क्या है?”


मोहनलाल ने डिब्बा खोला। अंदर नई चमचमाती चांदी की पायल थी।


उन्होंने झुककर खुद सरोज के पैरों में पहनाई।


“अब मत कहना… कि मैंने वादा पूरा नहीं किया।”


सरोज की आंखें भर आईं। वो कुछ बोल नहीं पाई।


बस इतना ही कह सकी— “इतनी देर क्यों लगा दी जी…?”


मोहनलाल मुस्कुरा दिए। “क्योंकि ज़िंदगी पहले ज़िम्मेदारी मांगती है… और प्यार, थोड़ा सब्र।”


बच्चे खुश होकर ताली बजाने लगे।

बहू ने आगे बढ़कर सरोज के पैर छुए और बोली,

“मां, आज आपने हमें भी प्यार का मतलब सिखा दिया।”


सरोज चुपचाप पायल की छन-छन सुनती रही। उसे लगा— आज उसके पैरों में नहीं, उसके सालों पुराने सपने झनक रहे हैं।



सीख :

> प्यार दिखाने के लिए बड़े तोहफ़ों की नहीं,

निभाए गए वादों की ज़रूरत होती है।

देर हो जाए तो भी,

वादा निभाना कभी पुराना नहीं होता।


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