चूल्हे की आँच से महलों तक
सुबह का समय था।
कच्चे आँगन में चूल्हा जल रहा था।
धुएँ के बीच बैठी थी सरोज,
घर की बड़ी बहू।
“बहु… राकेश के थाली में रोटी कम पड़ गई है,
दो और डाल दे,”
सास धर्मा देवी ने कहा।
“जी माँ,”
सरोज ने तुरंत रोटी उतार दी।
“और सुनीता को भी थोड़ा साग दे देना,
आज खेत में देर तक काम करेगी।”
“अच्छा,”
सरोज ने हाँ में सिर हिलाया।
तभी आँगन में खड़ी सुनीता(ननद) बोली—
“भाभी, रहने दो…
मेरा मन नहीं है खाने का।”
सरोज चौंकी—
“अरे क्यों?
दो रोटी तो ठीक से खा ले।”
सुनीता ने आँखें झुका लीं—
“रोज़ वही साग-रोटी…
अब पेट नहीं,
मन भर गया है।”
इतना कहकर
वो हैंडपंप पर हाथ धोती है
और दरांती उठाकर
खेत की ओर चली जाती है।
कुछ देर बाद
देवर राकेश भी
दिहाड़ी के काम पर निकल जाता है।
घर में रह जाती हैं
सरोज और उसकी सास।
खेत का अपमान...
दोपहर में
सुनीता फसल काट रही होती है
कि उसकी सहेलियाँ
रीना और पूजा आ जाती हैं।
“ए सुनीता,
आज शीतल का छठी कार्यक्रम है,
आएगी ना?”
सुनीता हल्की मुस्कान से बोली—
“नहीं यार…
घर का काम है।”
रीना हँस पड़ी—
“अरे साफ़ बोल ना—
तेरे पास पहनने के कपड़े नहीं हैं।”
पूजा ने उसकी साड़ी की ओर देखा—
“ये तो चार साल पुरानी है,
दाग भी पड़ गए हैं।”
सुनीता ने साड़ी झाड़ते हुए कहा—
“फटी तो नहीं है ना?”
रीना ने ताना मारा—
“इसी को गरीबी कहते हैं।”
दोनों हँसती हुई चली गईं।
सुनीता वहीं
खड़ी-खड़ी
अचानक बहुत छोटी लगने लगी।
भाभी का फैसला...
शाम को
सरोज सास से बोली—
“माँ,
सुनीता ठीक से खा नहीं रही।”
“मैं देख रही हूँ,”
धर्मा देवी ने कहा।
“मैं सोच रही हूँ
आज सब्ज़ी में
आलू-पनीर बना दूँ।”
सास ने चिंता जताई—
“बहु,
पनीर महँगा होता है।”
सरोज मुस्कुराई—
“माँ,
मेरे पास थोड़े पैसे बचे हैं।”
सास की आँखें भर आईं—
“भगवान तुझे खुश रखे।”
पहली खुशबू...
शाम को
घर में खुशबू फैल जाती है।
सुनीता आते ही पूछती है—
“भाभी,
आज क्या बना है?”
“पहले हाथ धो,”
सरोज हँसते हुए बोली।
“अरे,
आज तो पनीर है,”
सास ने बता दिया।
“सच?”
सुनीता की आँखें चमक उठीं।
खाते समय
वो बोली—
“भाभी,
मैं कल सुबह भी यही खाऊँगी।”
सरोज ने सिर सहलाया—
“ज़रूर।”
कुछ हफ्तों बाद
सास बोली—
“बहु,
अब सुनीता की शादी का सोचना चाहिए।”
एक दिन
लड़के वाले आए।
सुनीता सामने आई—
पुरानी साड़ी,
झुकी नज़र।
लड़के की माँ ने सुनीता को ऊपर से नीचे तक देखा।
उसकी नज़र कुछ पल साड़ी पर ठहरी रही—
पुरानी, धुली हुई, जगह-जगह से फीकी।
फिर उसने हल्के ताने भरे स्वर में कहा—
“लड़की ठीक नहीं लगी हमें।
कपड़े ही देख लीजिए…
लगता है घर की हालत भी कुछ खास नहीं है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
लड़के ने भी एक नज़र सुनीता पर डाली—
फिर बेरुखी से बोला—
“माँ सही कह रही है।
हम इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं।”
इतना कहकर
लड़के वाले बिना कुछ और कहे
उठ खड़े हुए।
दरवाज़ा बंद हुआ
और उसी के साथ
सुनीता के सपनों की एक खिड़की
धीरे से बंद हो गई।
सुनीता की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
आवाज़ काँप रही थी, शब्द टूट-टूटकर निकल रहे थे—
“माँ…
मुझे शादी नहीं करनी।
हर बार लोग मेरे कपड़ों को देखते हैं,
मेरे दिल को नहीं…”
यह कहते-कहते वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
सरोज ने कुछ नहीं कहा।
बस उसे अपने सीने से लगा लिया।
अपनी ओढ़नी से उसके आँसू पोंछते हुए
धीरे, बहुत धीरे बोली—
“सुनीता,
हर आँसू तूफ़ान नहीं होता।
कुछ आँसू वो होते हैं
जो इंसान को और मज़बूत बना देते हैं।
आज जो लोग तुम्हें ठुकरा रहे हैं,
कल वही तुम्हारे धैर्य को सलाम करेंगे।
डरो मत…
तुम्हारी किस्मत अभी चुप है,
ख़ामोश नहीं।”
हादसा...
एक दिन
सुनीता खेत से लौट रही थी
कि तेज़ गाड़ी से
टक्कर लग जाती है।
खून बहने लगता है।
गाड़ी से उतरता है
अभय—
“हे भगवान!
इसे अस्पताल ले चलो!”
इलाज के बाद
अभय उसे
अपने घर ले आता है।
बड़ा सा बंगला।
घर की बड़ी बहू
चिल्लाती है—
“इतनी गंदी लड़की
यहाँ क्यों?”
अभय सख़्त आवाज़ में बोला—
“ये इंसान है,
सामान नहीं।”
नई शुरुआत...
जब सच्चाई पता चलती है
तो अभय कहता है—
“मैं इससे शादी करूँगा।”
सब चुप।
माँ बोली—
“अगर तेरी खुशी है,
तो हमें मंज़ूर।”
जब सरोज अपने परिवार के साथ वहाँ पहुँची,
तो दरवाज़े पर खड़ी धर्मा देवी
अपनी बेटी को देखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं।
काँपती आवाज़ में बोलीं—
“बेटा…
मेरी बेटी को कुछ हो गया तो
मैं जी नहीं पाऊँगी…”
यह सुनकर अभय आगे बढ़ा।
उसने आदर से हाथ जोड़ लिए
और गंभीर स्वर में कहा—
“माँजी,
यह हादसा मेरी वजह से हुआ है।
अब यह मेरी ज़िम्मेदारी है।
मैं वादा करता हूँ—
आपकी बेटी को
कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा,
उसका पूरा सम्मान करूँगा
और उसे वही जगह दूँगा
जो एक बेटी और बहू को मिलनी चाहिए।”
अभय की बातों में सच्चाई थी।
उसकी आँखों में दिख रहा था
ईमानदार पश्चाताप और भरोसा।
सरोज ने भी आँसू पोंछते हुए कहा—
“माँ,
अब हमारी बेटी सुरक्षित है।”
यह सुनकर
धर्मा देवी का रोता हुआ दिल
थोड़ा शांत हुआ।
शादी के बाद
सुनीता का स्वभाव बिल्कुल नहीं बदला।
वो अब भी सादे कपड़े पहनती थी—
न ज़्यादा गहने,
न दिखावा।
उसे ऐसे ही रहना अच्छा लगता था।
लेकिन उसकी जेठानी को
ये सादगी खटकती थी।
वो ताना मारकर कहती—
“इतने बड़े घर में आकर भी
भिखारिन जैसी रहती है।”
सुनीता चुप रह जाती।
उसने जवाब देना नहीं सीखा था,
बस सहना जानती थी।
ये सब देखकर
सास का दिल भर आता।
वो एक दिन अलमारी से
नई साड़ी निकालकर
सुनीता के हाथ में रखते हुए बोली—
“बहू,
दिल बड़ा रखो।
कपड़ों से इंसान छोटा या बड़ा नहीं होता।”
सुनीता की आँखें नम हो गईं।
पहली रसोई के दिन
उसने कोई दिखावटी पकवान नहीं बनाए।
सादा खाना बनाया—
दाल, सब्ज़ी और रोटी,
पर हाथों में अपनापन था।
जब सबने खाना चखा
तो एक-एक करके
सबकी ज़ुबान से
तारीफ़ ही निकली—
“बहू,
खाना बहुत स्वादिष्ट है।”
उस दिन
सुनीता के चेहरे पर
एक हल्की-सी मुस्कान आई—
जैसे उसे पहली बार
अपने होने की जगह मिल गई हो।
साजिश और सच...
उस रात की साज़िश
वो रात कुछ अलग थी।
हवेली के गलियारों में सन्नाटा था,
बस दीयों की लौ हल्की-हल्की काँप रही थी।
उसी सन्नाटे में
सुनीता को बदनाम करने की
एक गहरी साज़िश रची जा रही थी।
जेठानी और ननद ने सोचा था—
आज अगर इसकी इज़्ज़त पर दाग लगा दिया,
तो ये खुद ही इस घर से चली जाएगी।
झूठे इल्ज़ाम,
तोड़े-मरोड़े शब्द,
और ग़लतफहमियों का जाल—
सब तैयार था।
लेकिन कहते हैं ना,
सच चाहे जितना दबाया जाए,
उसे रास्ता मिल ही जाता है।
कुछ ही देर में
पूरी सच्चाई सबके सामने आ गई।
जिसे बदनाम किया जाना था,
वही बेगुनाह साबित हुई।
घर का हर सदस्य सन्न रह गया।
जेठानी और ननद की आँखों से
घमंड उतर चुका था,
और उसकी जगह
पछतावे के आँसू बह रहे थे।
वे सुनीता के पैरों में गिर पड़ीं—
“हमें माफ़ कर दो…
हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई।”
सुनीता ने उन्हें रोते हुए देखा,
और धीरे से आगे बढ़ी।
उसने उनके हाथ थाम लिए
और शांत आवाज़ में कहा—
“मैं रिश्ते नहीं तोड़ती,
रिश्तों को जोड़ती हूँ।
नफ़रत से घर नहीं चलते,
घर चलते हैं
प्यार और माफ़ी से।”
उस पल
हवेली की दीवारों में नहीं,
दिलों में रोशनी फैल गई।
जिस लड़की ने
चूल्हे की राख देखी थी,
आज वही
घर की रोशनी बन गई।
क्योंकि
गरीबी कपड़ों में नहीं,
सोच में होती है।
और
सम्मान
पैसे से नहीं,
इंसानियत से मिलता है।

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