अन्नपूर्णा के हाथ और समाज का आईना
गाँव का नाम था सोनपुर।
छोटा-सा गाँव,
जहाँ सुबह मुर्गे की बाँग से शुरू होती
और शाम ढलते ही
चूल्हों की आँच से पूरा गाँव महक उठता।
उसी गाँव में रहती थी जुम्की।
रंग साँवला,
कद साधारण,
पर आँखों में सच्चाई
और हाथों में ऐसा स्वाद
कि जिसने एक बार खा लिया,
वो दोबारा माँगे बिना रह न पाए।
उसकी माँ महेश्वरी अक्सर कहा करती—
“मेरी बिटिया के हाथ में
अन्नपूर्णा देवी का वास है।
भगवान ने रूप कम दिया
तो हुनर पूरा दिया है।”
रिश्ता देखने का दिन...
एक दिन पास के गांव से
सुजाता अपने बेटे विक्रम को लेकर
जुम्की को देखने आई।
घर में साफ़-सफ़ाई हो रही थी।
चूल्हे पर पराठे सिक रहे थे।
घी की खुशबू
पूरा आँगन भर चुकी थी।
महेश्वरी बोली—
“बहन जी, मेरी बिटिया
सब कुछ बहुत अच्छा बनाती है,
पर इसके हाथ के पराठे
तो पूरे गाँव में मशहूर हैं।”
सुजाता हँसकर बोली—
“अच्छा!
तो फिर ज़रा लड़की को बुलाइए।”
महेश्वरी ने आवाज़ दी—
“अरे ओ जुम्की,
बाहर आओ,
अपने होने वाली ससुराल वालों के पाँव छुओ।”
जुम्की घूँघट डालकर बाहर आई।
उसके पाँव छूते ही
विक्रम उसे ऊपर से नीचे तक देखने लगा।
उसकी आँखों में
नफ़रत और घमंड साफ़ झलक रहा था।
विक्रम फुसफुसाकर बोला—
“मा… आपने तो कहा था
लड़की सुंदर होगी,
ये तो काले कोयले जैसी है।”
महेश्वरी ने सुन लिया।
उसका दिल काँप उठा।
विक्रम ने ज़ोर से कहा—
“मुझे इसके हाथ से कुछ नहीं खाना।
मैं इस लड़की से शादी नहीं करूँगा।”
इतना कहकर
वो माँ को लेकर उठ गया।
जुम्की की आँखें भर आईं,
पर उसने खुद को सँभाल लिया।
बेटी का सवाल...
रात को जुम्की बोली—
“मा…
अगर कोई मेरे रंग से परेशान है
तो मैं उससे शादी क्यों करूँ?”
महेश्वरी चुप रही।
माँ की चुप्पी
सबसे बड़ा दर्द थी।
अगले दिन
जुम्की पानी भरने नदी गई।
वहीं उसने
एक ज़ख़्मी लड़के को देखा
जो दर्द से कराह रहा था।
जुम्की उसे पीठ पर लादकर
अस्पताल ले गई।
डॉक्टर बोले—
“वक़्त पर लाए हो,
वरना बचना मुश्किल था।”
लड़के का नाम था विशाल।
वो शहर में
मैगी बेचकर गुज़ारा करता था।
जुम्की रोज़
उसके लिए घर से पराठे लाती।
विशाल बोला—
“इतना स्वाद
मैंने कभी नहीं खाया।”
दिन बीतते गए।
दोनों के बीच
इज़्ज़त और अपनापन बढ़ता गया।
एक दिन विशाल बोला—
“जुम्की,
मैं गरीब हूँ,
पर दिल से तुम्हें चाहता हूँ।
क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”
जुम्की की आँखों में
पहली बार खुशी चमकी।
नई ज़िंदगी...
दोनों की शादी धूमधाम से हो गई।
विदाई के बाद जुम्की जब ससुराल पहुँची,
तो घर में नई बहू के स्वागत की तैयारियाँ चल रही थीं।
कुछ ही दिनों बाद
उसकी पहली रसोई की रस्म रखी गई।
सास ने प्यार से पूछा—
“बहू, आज क्या बनाना चाहोगी?”
जुम्की ने संकोच से मुस्कुराते हुए कहा—
“माँ जी,
मुझे पराठे बनाना सबसे अच्छा लगता है।”
फिर जुम्की रसोई में गई।
चूल्हा जला,
आटा गूँथा,
और उसने पूरे मन से
गोभी के पराठे,
आलू के पराठे,
मेथी के पराठे
और प्याज़ के पराठे बनाए।
रसोई से उठती खुशबू
पूरे घर में फैल गई।
सबने जब पराठे खाए
तो तारीफ़ किए बिना रह नहीं पाए।
सास ने स्नेह से कहा—
“बहू,
आज समझ में आया
क्यों लोग कहते हैं
कि तेरे हाथों में
अन्नपूर्णा का वास है।”
“बहू भले गोरी न मिली हो,
पर अन्नपूर्णा जैसी बहू मिली है।”
सब कुछ कुछ दिनों तक ठीक-ठाक चलता रहा।
विशाल रोज़ मैगी बेचने जाता,
और जुम्की घर-संसार संभालती।
लेकिन धीरे-धीरे
काम में गिरावट आने लगी।
पहले जहाँ रोज़ अच्छी बिक्री हो जाती थी,
वहीं अब लोग रुककर देखने लगे,
पर खरीदने कम लगे।
“आजकल हर गली में
मैगी बिकने लगी है,”
विशाल उदास स्वर में कहता।
दिन-भर धूप में खड़े रहने के बाद भी
कभी-कभी
आधे पैसे भी हाथ नहीं आते।
घर लौटते समय
उसका चेहरा बुझा-बुझा रहता।
जुम्की सब समझती थी,
पर कुछ कहती नहीं थी।
काम की चिंता
धीरे-धीरे विशाल के मन पर
भारी पड़ने लगी।
रात को नींद नहीं आती,
भूख कम हो गई,
और हर समय
चुप-चुप रहने लगा।
इसी चिंता और थकान के बीच
एक सुबह
विशाल बिस्तर से उठा ही नहीं।
उसका बदन तप रहा था,
तेज़ बुखार,
और शरीर में बिल्कुल जान नहीं थी।
जुम्की घबरा गई—
“अरे ये क्या हो गया
आपको इतना तेज़ बुखार कैसे?”
घर के लोग इकट्ठा हो गए।
सास बोलीं—
“काम की चिंता ने
मेरे बेटे को तोड़ दिया है।”
पर परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।
घर में
इतने पैसे भी नहीं थे
कि तुरंत डॉक्टर को दिखाया जा सके।
दवाई तो दूर की बात थी।
चारों ओर
चिंता, डर और बेबसी
छा गई।
जुम्की ने
एक गहरी साँस ली
और मन ही मन ठान लिया—
“अब रोने का नहीं,
कुछ करने का वक़्त है।”
संघर्ष का असली इम्तिहान...
जुम्की बोली—
“मैं लाल किला जाकर
मैगी बेचूँगी।”
लोग ताने मारते—
“इसके काले हाथों की मैगी
कौन खाएगा?”
किसी ने मुँह बनाकर कहा—
“देखो तो सही,
ऐसे हाथों से बना खाना
कौन गले उतारेगा?”
जुम्की चुप रही।
बिना कुछ कहे
वो अपना चूल्हा जलाकर
मैगी बनाती रही।
सुबह से शाम हो गई,
धूप ढल गई,
भीड़ आती-जाती रही,
पर उसकी ठेली पर
एक भी ग्राहक नहीं रुका।
हर ताने के साथ
उसका दिल टूटता गया,
पर हौसला अब भी ज़िंदा था।
शाम की ठंडी हवा चलने लगी।
जुम्की खाली ठेली के पास बैठी
अपने हाथों को देख रही थी।
तभी उसके मन में
एक विचार आया—
“मेरे हाथों के पराठों का स्वाद
तो पूरे गाँव ने चखा है…
क्यों न मैगी और पराठे
दोनों को एक साथ मिला दूँ?”
बस फिर क्या था।
उसने तुरंत आटा गूँथा,
मैगी को मसालों के साथ भूनकर
आटे की लोई में भरा
और तवे पर डाल दिया।
तवे से उठती खुशबू
आस-पास फैलने लगी।
पहला मैगी का पराठा
सिक चुका था—
और जुम्की के संघर्ष की
एक नई शुरुआत
हो चुकी
पहला ग्राहक झिझकते-झिझकते आगे आया।
वो पराठे को देर तक देखता रहा,
फिर बोला—
“अच्छा… एक दे दो,
देखें कैसा होता है।”
जुम्की ने गरम-गरम
मैगी भरा पराठा
उसके हाथ में रख दिया।
उस आदमी ने पहला कौर लिया…
और बस वहीं रुक गया।
आँखें अपने आप बंद हो गईं,
चेहरे पर हैरानी फैल गई।
“अरे बाप रे!”
वो ज़ोर से बोल उठा—
“ये तो गज़ब का स्वाद है!
इतना बढ़िया तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।”
उसने जल्दी-जल्दी पूरा पराठा खाया
और उँगलियाँ चाटते हुए बोला—
“बहन, एक नहीं…
दो और दे दो।
और हाँ…
कल से रोज़ यहीं आऊँगा।”
उसकी आवाज़ सुनकर
आस-पास खड़े लोग रुक गए।
किसी ने पूछा—
“भई, सच में इतना अच्छा है क्या?”
वो मुस्कराकर बोला—
“खाकर देख लो,
खुद बोल उठोगे।”
बस फिर क्या था—
एक के बाद एक
लोग आगे बढ़ने लगे।
कोई बोला—
“मुझे भी देना।”
तो कोई चिल्लाया—
“भाई, लाइन बना लो!”
कुछ ही देर में
जुम्की की छोटी-सी दुकान के सामने
लोगों की कतार लग गई।
जहाँ सुबह तक
कोई खड़ा भी नहीं होता था,
वहीं अब
भीड़ देखकर लोग हैरान थे।
जुम्की के चेहरे पर
थकान नहीं,
सिर्फ़ सुकून था।
क्योंकि आज
उसके हुनर ने
उसके रंग से बड़ा जवाब दे दिया था।
सम्मान की जीत...
कमाई के पैसों से
जुम्की ने सबसे पहले
अपने पति की दवाइयाँ खरीदीं।
जब उसने दवाइयों की पोटली
विशाल के हाथों में रखी,
तो सास की आँखें भर आईं।
काँपती आवाज़ में बोलीं—
“बहू…
आज तूने ये साबित कर दिया
कि इंसान की पहचान
रंग से नहीं,
उसके कर्म से होती है।”
आज जुम्की और विशाल
कंधे से कंधा मिलाकर
“मैगी पराठा” बेचते हैं।
जो लोग कभी
उसके रंग पर ताने मारते थे,
आज वही
उसके हुनर और हौसले की
खुले दिल से तारीफ़ करते हैं।
सीख:
सुंदरता रंग में नहीं होती,
वह इंसान के व्यवहार और गुणों में झलकती है।
इज़्ज़त किसी चेहरे से नहीं,
इंसान के कर्म और मेहनत से मिलती है।
अन्नपूर्णा चेहरे में नहीं बसती,
वह उन हाथों में वास करती है
जो प्रेम, परिश्रम और सच्चाई से
भोजन बनाते हैं।

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