नान की खुशबू
गाँव के आख़िरी छोर पर एक टूटा-सा कच्चा मकान था।
मिट्टी की दीवारें, टीन की छत और सामने एक सूखा-सा आँगन।
उसी घर में रहते थे मोहन, उसकी पत्नी सरला, और उनके दो बच्चे —
बारह साल का अमन और 19 साल की पायल।
घर में रोज़ दाल-रोटी बनती थी।
दाल भी ऐसी कि ज़्यादातर पानी और थोड़ा-सा स्वाद।
रोटी सूखी होती, पर पेट भरने के लिए वही सहारा थी।
उस दिन भी चूल्हे पर वही दाल चढ़ी थी।
सरला रोटी सेंक रही थी और बच्चे थाली लेकर बैठ गए।
पहला कौर मुँह में डालते ही अमन का चेहरा उतर गया।
“माँ… रोज़ वही दाल-रोटी।
दाल के साथ तो नान अच्छी लगती है ना…”
पायल भी धीरे से बोली—
“पाँच साल हो गए, हमने नान नहीं खाई।”
सरला का हाथ रुक गया।
उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप रोटी पलट दी।
अमन को याद आ गया—
“जब दीदी के लिए रिश्ता आया था,
तब पापा बाहर के होटल से नान लाए थे।
तब भी मुझे नहीं मिली थी…”
पायल ने उसकी ओर देखा,
“उस दिन मेहमान ज़्यादा थे अमन…
बड़े लोग कह रहे थे कि
पहले मेहमान खा लें,
बच्चों को बाद में दे देंगे।”
अमन ने कड़वी हँसी के साथ कहा—
“बाद में…
लेकिन वो ‘बाद’ कभी आया ही नहीं।”
सरला चूल्हे के पास खड़ी थी।
उसने कुछ नहीं कहा,
बस आँचल से आँखें पोंछ लीं।
मोहन, जो कोने में बैठा था, धीमी आवाज़ में बोला—
“बच्चो, फिक्र मत करो।
जब अगली बार गाँव से बाहर जाऊँगा,
तो नान ज़रूर लाऊँगा।”
उसकी आवाज़ में भरोसा कम,
मजबूरी ज़्यादा थी।
फिर भी…
बस उसके यही शब्द
अमन और पायल के चेहरे पर
कुछ पल के लिए
एक सच्ची मुस्कान ले आए।
मोहन की नौकरी छूट चुकी थी।
अब वह शहर के पास एक ढाबे पर काम करता था—
कभी बर्तन माँजता, कभी झाड़ू लगाता।
एक महीना बीत गया।
फिर उसी दिन दाल-रोटी बनी।
इस बार दाल और भी पतली थी।
अमन झुँझला गया—
“माँ, आज तो बस पानी है इसमें।”
फिर अचानक बोला—
“अच्छा है नान नहीं है,
वरना ऐसी दाल के साथ मैं नान नहीं खाता।”
मोहन की आँखें झुक गईं।
पायल ने पूछा—
“पापा, आप दो दिन पहले शहर गए थे।
नान क्यों नहीं लाए?”
मोहन ने जबरन मुस्कराकर कहा—
“पैसे खत्म हो गए थे बेटा।
अगली बार पक्का।”
बच्चों ने फिर भरोसा कर लिया।
एक दिन मोहन शहर से देर शाम लौटकर आया।
कपड़े फटे हुए थे,
शरीर पर जगह-जगह चोटों के निशान थे,
और जेब… पूरी तरह खाली।
उसे इस हाल में देख पड़ोसन घबरा गई।
वह दौड़ती हुई पास आई—
“अरे मोहन भैया!
ये हालत कैसे हो गई आपकी?”
मोहन ने भारी साँस लेते हुए कहा—
“बच्चों के लिए नान खरीदी थी बहन…
रास्ते में कुछ लोगों ने घेर लिया।
नान भी छीन ली…
और ये हालत बना दी।”
इतना कहकर वह चुप हो गया।
उस रात सरला ने चुपचाप खिचड़ी बना दी।
जब अमन और पायल ने थाली में खिचड़ी देखी,
तो दोनों का चेहरा उतर गया।
अमन धीरे से बोला—
“आज तो पापा नान लाने वाले थे…”
सरला का सब्र टूट गया।
वह वहीं बैठकर फूट-फूटकर रो पड़ी—
“अगर आज तुम्हारे पापा को कुछ हो जाता,
तो ये खिचड़ी भी नसीब नहीं होती बच्चों।
पेट से पहले
पापा की जान ज़रूरी है।”
माँ को रोते देख
अमन और पायल दोनों की आँखें भर आईं।
बिना कुछ बोले
उन्होंने आँसू के साथ
खिचड़ी खा ली।
सच का सामना...
कुछ दिन बाद दोनों बच्चों ने फैसला कर लिया—
“हम खुद नान लाएँगे।”
सौ रुपये लेकर वे गाँव से बाहर निकले।
थोड़ी दूर जाते ही उनकी आँखें फटी रह गईं।
वहीं…
उनके अपने गाँव में,
नई लाइन से कई ढाबे खुले थे।
और एक ढाबे में…
वे अपने पापा को बर्तन माँजते देख रहे थे।
ढाबे का मालिक चिल्ला रहा था—
“जल्दी कर!
काम पूरा होगा तो ही नान मिलेगा!”
मोहन की आवाज़ काँप रही थी—
“साहब, मेरे बच्चे रोज़ नान की बात करते हैं…”
अमन और पायल की आँखें भर आईं।
उन्हें सब समझ आ गया—
पापा झूठ नहीं बोलते थे,
बस सच छुपा रहे थे।
वे बिना नान लिए लौट आए।
नान का असली स्वाद...
रात को मोहन घर आया।
हाथ में कुछ लपेटा हुआ था।
“देखो बच्चो…
आज नान लाया हूँ।”
अमन ने थाली नहीं बढ़ाई।
पायल बोली—
“पापा, अब नान ज़रूरी नहीं।
हमें आपकी मेहनत का स्वाद समझ आ गया है।”
मोहन की आँखों से आँसू बह निकले।
उस रात
नान ने सिर्फ भूख नहीं मिटाई,
उसने दिल को भी भर दिया।
अगले दिन मोहन ने ढाबा छोड़ दिया।
एक फैक्ट्री में काम मिल गया—
कम पैसा,
पर इज़्ज़त के साथ।
अब घर में कभी-कभी नान आती है।
लेकिन बच्चों को सबसे ज़्यादा स्वाद
पापा की मुस्कान में मिलता है।
सिख:
ज़िंदगी में हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती, पर माता-पिता हर हाल में बच्चों को
खुश देखने की कोशिश करते हैं। कई बार उनकी चुप्पी झूठ नहीं, मजबूरी
होती है। जब बच्चे उस मजबूरी को समझ लेते हैं, तभी असली समझदारी
और परिवार का सच्चा प्यार जन्म लेता है।

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