दो बहुएँ, एक घर और सच का आईना
गृह प्रवेश...
“चलो… कलश गिराओ।”
सास सुरेखा की आवाज़ में वर्षों का अधिकार और घर की मुखिया होने का गर्व साफ़ झलक रहा था।
सबकी नज़रें दरवाज़े पर थीं।
पहले आगे बढ़ी रिद्धि—
भारी कढ़ाई वाला लहंगा पहने,
जिसकी चमक उसके आत्मविश्वास से होड़ कर रही थी।
गले में झिलमिलाते आभूषण,
चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान,
और उसके पीछे-पीछे
नौकरों की कतार—
मानो दहेज नहीं,
पूरी शान-ओ-शौकत घर में प्रवेश कर रही हो।
कलश गिरा।
चावल बिखरे।
और साथ ही बिखर गई सबकी सोच—
“कितना दहेज!”
ननद श्रिया ने फुसफुसाया—
“ओहो… रिद्धि भाभी तो सच में अमीर हैं।”
अब आगे आई चंदा।
साधारण लाल साड़ी में सिमटी हुई,
सिर हल्का-सा झुका हुआ,
आँखों में संकोच और अनकही उम्मीदें।
दोनों हाथों से उसने एक छोटी-सी पुरानी पेटी थाम रखी थी—
जैसे उसी पेटी में उसका पूरा संसार,
उसका आत्मसम्मान
और इस घर से जुड़ी सारी आशाएँ बंद हों।
कलश गिरा…
पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।
सुरेखा ने बस इतना कहा—
“ठीक है, अंदर आओ।”
चंदा का दिल बैठ गया।
पेटी खोलने की रस्म हुई।
रिद्धि का सूटकेस खुलते ही
ननदें उछल पड़ीं।
श्रिया ने हार उठाकर आँखों के सामने किया—
“भाभी… ये हार तो सच में कमाल का है!”
पल्लवी ने सूटकेस में झाँकते हुए कहा—
“अरे वाह! इतने सारे गहने!”
दोनों की आँखों में चमक थी,
पर वही चमक अचानक सवाल में बदल गई।
पल्लवी ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा—
“लेकिन… भाभी, इसमें सोने का कोई गहना नहीं है क्या?”
कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।
रिद्धि ने गर्दन सीधी की, आवाज़ में हल्का घमंड था—
“ये सब डिज़ाइनर ज्वेलरी है।
आजकल सोना कौन पहनता है?
सोना अब पुराना हो चुका है।”
उसके शब्द हवा में तैरते रह गए।
कोई कुछ नहीं बोला।
सब चुप थे…
जैसे बात सिर्फ़ गहनों की नहीं,
सोच की भी हो गई हो।
चंदा ने हिम्मत जुटाकर बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“माजी… मेरी पेटी भी…”
उसकी बात पूरी होने से पहले ही
सुरेखा ने पलटकर एक नज़र डाली और बेरुख़ी से बोली—
“रहने दे।
पहले बड़ी बहु का सामान देख लेते हैं।”
इतना कहकर वह दूसरी ओर मुड़ गई।
वो कुछ शब्द—
कोई ताना नहीं थे,
पर चंदा के लिए
पत्थर से भारी थे।
उस पल
उसकी आँखें झुक गईं,
हाथ कसकर पेटी पर सिमट आए
और दिल के भीतर
कुछ ऐसा टूट गया
जिसकी आवाज़ कोई नहीं सुन सका।
पहली रसोई का दिन...
सुबह से ही घर में असामान्य हलचल थी।
रसोई में बर्तनों की खनक गूँज रही थी,
आँगन में रिश्तेदारों की आवाजाही थी।
रिद्धि ने अपनी साड़ी का पल्लू सँभालते हुए आत्मविश्वास से कहा—
“आज पहली रसोई है,
मैं शाही खाना बनाऊँगी।”
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि
श्रिया उत्साह से बोल पड़ी—
“भाभी, हमें आपके हाथ का पास्ता चाहिए।”
पल्लवी ने भी तुरंत जोड़ दिया—
“और ग्रिल्ड सैंडविच भी।
आप बनाओगी तो मज़ा आ जाएगा।”
रिद्धि का चेहरा तमतमा गया।
उसने हल्की झुँझलाहट के साथ कहा—
“मैं रसोई के लिए नहीं बनी हूँ।
मेरे घर में ये सब काम नौकर करते थे।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
तभी सुरेखा ने ताने भरे स्वर में कहा—
“हूँ…
आजकल की लड़कियाँ भी अजीब हैं।
ससुराल आए हैं या होटल में ठहरी हैं—
समझ ही नहीं आता।”
रिद्धि चुप हो गई,
और उसी चुप्पी में
घर के रिश्तों की पहली दरार साफ़ सुनाई देने लगी।
चंदा धीरे-धीरे आगे आई।
उसकी आँखों में संकोच था, लेकिन आवाज़ में अपनापन।
“माजी… अगर आप इजाज़त दें तो
मैं पहली रसोई का खाना बना दूँ।”
रिद्धि ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
होठों पर हल्की-सी मुस्कान थी,
पर लहज़े में चुभन—
“हाँ… तुम तो इसी काम के लिए आई हो न।
तुम्हारी हैसियत भी तो बस रसोई तक ही है।”
कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।
चंदा की उँगलियाँ साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ गईं।
आँखें भर आईं,
पर उसने सिर झुका लिया।
वो कुछ बोली नहीं।
बस चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गई—
क्योंकि उसे जवाब शब्दों से नहीं,
अपने हाथों के स्वाद से देना था।
जब खाना परोसा गया,
तो पूरे कमरे में खुशबू फैल गई।
ससुर ने पहला कौर मुँह में रखा
और अपने-आप बोल पड़े—
“वाह बहु!
इतना स्वाद…
बहुत दिनों बाद ऐसा खाना खाया है।”
चंदा ने झुकी नज़रों से देखा,
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
सुरेखा भी चुपचाप सब देख रही थीं।
मन ही मन सोचने लगीं—
“इतना बढ़िया खाना…
बिना शिकायत, बिना थके…
ये लड़की सच में मेहनती है।”
पर सास का दिल अभी भी
अहम और भेदभाव से बंधा था।
उन्होंने जानबूझकर चेहरा सख़्त किया
और सूखे स्वर में बोलीं—
“हाँ…
ठीक ही है।”
इतना कहकर
उन्होंने नज़रें फेर लीं।
चंदा समझ गई—
तारीफ़ अभी रास्ते में है,
मंज़िल तक नहीं पहुँची।
उसने कुछ नहीं कहा,
बस चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गई।
दिन बीतते चले गए।
सुबह होते ही घर में आवाज़ गूँजती—
“चंदा! झाड़ू लग गई या नहीं?”
“चंदा! कपड़े धो दिए?”
“चंदा! ज़रा ये सिलाई भी कर देना।”
काम खत्म होने से पहले
दूसरा हुक्म तैयार रहता।
और उसी घर में…
रिद्धि के लिए आवाज़ का लहजा अलग होता—
“बहु, ज़्यादा मत करो, थक जाओगी।”
“रहने दे, बाद में हो जाएगा।”
“तुम आराम कर लो।”
एक ही घर,
एक ही छत—
लेकिन बहुओं के लिए
दो अलग-अलग दुनिया।
चंदा चुपचाप सब सुनती,
काम करती,
और हर रात खुद से पूछती—
“क्या मैं सच में सिर्फ़ काम करने के लिए ही आई हूँ?”
उस रात चंदा अपने आँसू रोक न सकी।
दिन भर की थकान,
अपमान और चुप्पी—
सब एक साथ टूट पड़े।
वह धीरे-धीरे सास के सामने आकर खड़ी हुई।
“माजी…”
आवाज़ काँप रही थी,
“मैंने क्या गलती की है?
अगर मुझसे कोई भूल हो गई हो,
तो आप बता दीजिए…
मैं सुधार लूँगी।”
सुरेखा ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
तकिये को ठीक करते हुए
बिलकुल ठंडी आवाज़ में बोली—
“गलती-वग़लती कुछ नहीं है।
बस तुम्हारी हैसियत ही ऐसी है।”
ये शब्द नहीं थे,
जैसे किसी ने सीने में
कील ठोंक दी हो।
चंदा की आँखें भर आईं।
होंठ काँपने लगे।
वह कुछ कहना चाहती थी,
पर आवाज़ गले में ही अटक गई।
वह चुपचाप सिर झुकाकर
वहीं खड़ी रही,
और उसकी आँखों से
आँसू लगातार गिरते रहे—
बिना किसी आवाज़ के।
उस पल चंदा समझ गई—
इस घर में
उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं,
जब तक उसकी “हैसियत”
दिल से बड़ी नहीं मानी जाएगी।
ननदों की लालच...
श्रिया ने झिझकते हुए कहा—
“भाभी… थोड़े पैसे चाहिए थे।”
पल्लवी तुरंत बोल पड़ी—
“और मुझे एक ड्रेस भी दिला दीजिए ना।
आपके रहते हमें किस बात की चिंता?”
रिद्धि ने मोबाइल से नज़र हटाए बिना जवाब दिया—
“अभी मेरे पास समय नहीं है।
किसी और से पूछ लो।”
दोनों की निगाहें अपने आप चंदा पर टिक गईं।
चंदा ने एक पल कुछ सोचा,
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“ठीक है, चलो।
मैं दिला देती हूँ।”
बाज़ार में
कभी ड्रेस,
कभी मेकअप,
कभी चप्पल—
एक के बाद एक चीज़ें खरीदी जाती रहीं।
शाम ढलते-ढलते
चंदा के पर्स में रखे आख़िरी नोट भी ख़त्म हो गए।
घर लौटते समय
वो कुछ पल के लिए रुकी,
आसमान की ओर देखा
और होंठों ही होंठों में बुदबुदाई—
“हे भगवान…
बस इतनी ताक़त देना
कि सब सह सकूँ।”
ननदों की शादी...
ननदें रिद्धि के सामने आकर रुक गईं।
चेहरे पर बनावटी मुस्कान, आवाज़ में लालच—
“भाभी… बस एक डायमंड नेकलेस दे दो।
हमारी शादी है।”
रिद्धि का चेहरा तुरंत बदल गया।
वो झल्लाकर बोली—
“मेरे पैसे पेड़ों पर नहीं उगते।
हर किसी की माँग मैं पूरी नहीं कर सकती।”
कमरे में कुछ पल की खामोशी छा गई।
तभी चंदा धीरे से आगे बढ़ी।
आवाज़ में न शिकायत थी, न घमंड—
बस अपनापन—
“अगर आपको ऐतराज़ न हो माजी…
तो मैं इनके लिए लहंगे सिल दूँगी।”
सुरेखा ने चौंककर उसकी ओर देखा।
उस दिन से
चंदा की सिलाई मशीन
सुबह से देर रात तक चलती रही।
सुई उँगलियों में चुभती,
धागा बार-बार उलझता,
हथेलियाँ छिल जातीं—
पर चंदा रुकी नहीं।
शादी के दिन
जब दोनों ननदें
चंदा के सिले लहंगे पहनकर
मंडप में पहुँचीं,
तो हर तरफ से आवाज़ें आने लगीं—
“वाह! कपड़े कितने सुंदर हैं!”
“ऐसा काम तो आजकल मिलता ही नहीं!”
तालियों की गूँज में
सुरेखा बस चुपचाप खड़ी
चंदा को देखती रही—
पहली बार
बिना भेदभाव,
बिना तुलना के—
और उसकी आँखों में
धीरे-धीरे
पछतावे की नमी उतर आई।
असली पल...
शादी से एक रात पहले—
पूरा घर सो चुका था,
लेकिन सास सुरेखा की आँखों में नींद नहीं थी।
वह कमरे के एक कोने में बैठी
अपनी साड़ी का पल्लू बार-बार मरोड़ रही थीं।
अचानक उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े—
“हे भगवान…
कल बेटी विदा होगी
और उसके लिए ढंग के गहने भी नहीं हैं…”
आवाज़ काँप गई।
तभी दरवाज़े पर हल्की-सी आहट हुई।
चंदा बिना कुछ कहे भीतर आई।
उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी,
बस एक गहरी शांति थी।
वह चुपचाप अपनी छोटी-सी पेटी लेकर आई,
धीरे से ढक्कन खोला।
उसमें रखे थे—
उसकी माँ के दिए हुए
पुराने, लेकिन शुद्ध सोने के कंगन।
चंदा ने उन्हें दोनों हथेलियों में रखा
और सास के सामने बढ़ा दिए—
“माजी…
ये रख लीजिए।”
सुरेखा जैसे सन्न रह गईं।
उनके हाथ काँपने लगे—
“तू…
ये क्या कर रही है बहु?
ये तो तेरी माँ की निशानी है…”
चंदा की आँखें भर आईं,
आवाज़ टूटती हुई बोली—
“माजी…
अब ये घर मेरा है।
और अपने घर की इज़्ज़त बचाने के लिए
अगर मुझे अपनी निशानी भी देनी पड़े,
तो वो सौदा मुझे मंज़ूर है।”
इतना कहकर चंदा फूट-फूट कर रो पड़ी।
और उसी पल—
सुरेखा की आँखों से भी
पछतावे के आँसू बह निकले।
उन्हें पहली बार समझ आया—
बहु वो नहीं होती जो सबसे ज़्यादा लाई हो,
बहु वो होती है
जो सबसे ज़्यादा निभाए।
सच का सामना...
ननदों की विदाई को पंद्रह दिन ही बीते थे।
आज वे पहली बार मायके लौटी थीं।
दरवाज़ा खुलते ही
श्रिया और पल्लवी खुशी से अंदर बढ़ीं।
“भाभी…”
दोनों एक साथ बोलीं और
रिद्धि की ओर हाथ बढ़ाया।
पर रिद्धि के चेहरे पर
न मुस्कान थी, न अपनापन।
वो झल्ला उठी—
“फिर आ गईं तुम दोनों?
अभी ठीक से चैन भी नहीं मिला था!”
इतना कहते ही
उसने झटके से हाथ छुड़ाया।
श्रिया का संतुलन बिगड़ा,
पल्लवी लड़खड़ाई—
और उसी पल
चंदा आगे बढ़ी।
उसने दोनों को थाम लिया।
“धीरे… संभलकर,”
चंदा की आवाज़ काँप रही थी।
श्रिया की आँखें भर आईं—
“भाभी… हमने क्या बिगाड़ा है?”
रिद्धि तमतमाई—
“हर बार कुछ न कुछ चाहिए होता है!
कभी कपड़े, कभी पैसे, कभी गहने!
अब शादी हो गई है,
तो यहाँ क्यों चली आई हो?”
बस फिर क्या था—
सुरेखा अब तक चुप थी,
पर इस बार फट पड़ी।
उसकी आवाज़ में
दर्द भी था, पछतावा भी—
“बस!
आज मेरी आँखें खुल गईं रिद्धि!”
रिद्धि चौंक गई—
“माजी… आप?”
सुरेखा ने काँपते हाथ से
चंदा की ओर इशारा किया—
“ये देख रही है तू?
जिसे तू गरीब कहती रही,
जिसे तू कामवाली समझती रही—
आज उसी ने मेरी बेटियों को संभाला।”
रिद्धि गुस्से से बोली—
“मैं अमीर हूँ माजी!
मैंने दहेज में सब कुछ दिया है!”
सुरेखा की आँखें भर आईं।
उसने भारी स्वर में कहा—
“तू अमीर है पैसों से रिद्धि,
लेकिन ये…”
उसने चंदा का सिर सहलाया—
“ये अमीर है दिल से।
और याद रख—
घर पैसों से नहीं,
दिल से चलता है।”
चंदा की आँखों से
आँसू बहने लगे।
आज पहली बार
उसे लगा—
वो इस घर की
सिर्फ बहु नहीं,
अपनी हो चुकी है।
ननदें अचानक आगे बढ़ीं।
उनकी आँखें भरी हुई थीं, आवाज़ काँप रही थी।
दोनों ने चंदा को कसकर गले लगा लिया।
“भाभी…
हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई।
हमने आपके प्यार को आपकी मजबूरी समझ लिया।
हमें माफ कर दीजिए…”
चंदा ने धीरे से उनकी पीठ सहलाई।
आँखों में न शिकायत थी, न गुस्सा—
बस अपनापन।
वो हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“जब घर अपना लगने लगे न,
तो माफ़ी माँगनी नहीं पड़ती…
वो अपने आप दिल से निकल आती है।”
पास ही रिद्धि खड़ी थी।
चुप।
बिलकुल चुप।
पहली बार उसे एहसास हुआ—
कुछ हारें तिजोरी में नहीं,
दिल में रखी जाती हैं।
अंतिम पंक्तियाँ...
उस घर की चौखट पर
दो बहुएँ आई थीं—
एक अपने साथ
दहेज, गहने और शानो-शौकत लाई थी,
और दूसरी
खामोशी, धैर्य
और सबको जोड़ने का हुनर।
वक़्त ने धीरे-धीरे
सबके सामने सच रख दिया—
कि दौलत अलमारियों में नहीं,
दिलों में बसती है।
और जिसके पास
अपनों को निभाने का साहस हो,
वही इंसान
वाक़ई में सबसे अमीर होता है।

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