सर्द रात की रोशनी

 

Ultra-realistic of a poor Indian couple helping a shivering child during a cold winter night in a rural village, showing kindness, compassion, and humanity.


जनवरी की शुरुआत थी।

ठंड अपने पूरे ज़ोर पर थी।

हवा ऐसे चुभ रही थी जैसे सुइयाँ चुभो रही हों।


छोटे-से गाँव के बाहर, कच्चे रास्ते के किनारे,

एक टूटी-फूटी झोपड़ी में रहता था मोहन।

साथ में थी उसकी पत्नी सरला।


काम कई दिनों से बंद था।

ईंट-भट्ठे पर काम ठंड की वजह से रुक गया था।

जो थोड़े-बहुत पैसे थे,

वो दवाई और उधार चुकाने में खत्म हो गए।


सरला की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी।

लगातार ठंड, अधपेट खाना और कमजोरी—

बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था।



“मोहन…”

सरला ने काँपती आवाज़ में कहा—

“आज फिर चूल्हा नहीं जलेगा क्या?”


मोहन ने नजरें झुका लीं।

“कोशिश की थी…

पूरा गाँव घूम आया।

कहीं एक दिन का काम भी नहीं मिला।”


“मेरी दवाई भी खत्म हो गई है,”

सरला की आँखें भर आईं।

“कब तक ऐसे ही चलेगा?”


मोहन कुछ नहीं बोला।

उसके पास जवाब नहीं था।


कुछ देर बाद सरला बोली—

“एक बात कहूँ?”


“कहो…”


“जो दो ऊनी शॉल मेरी माँ ने शादी में दी थीं…

उन्हें बेच देते हैं।”


मोहन चौंक गया।

“वो? वही तो हमारी आख़िरी पूँजी हैं।

इस ठंड में हम कैसे रहेंगे?”


“जान रहेगी तो सब आ जाएगा,”

सरला ने धीमे से कहा।

“आज अगर उन्हें बेच दिया,

तो दवाई और थोड़ा राशन आ जाएगा।”


मोहन ने भारी दिल से सिर हिला दिया।



अगली सुबह

मोहन शॉल लेकर सड़क किनारे बैठ गया।


दिन भर लोग आते-जाते रहे,

पर किसी ने रुककर देखा तक नहीं।


शाम होने लगी।

हवा और तेज़ हो गई।


तभी एक बहुत बूढ़ा आदमी

काँपते कदमों से पास आया।


“बेटा…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी—

“शॉल दिखाना ज़रा…”


मोहन ने शॉल आगे बढ़ाई।


“अच्छी है बेटा,”

बूढ़े ने कहा,

“पर मेरे पास पैसे नहीं हैं।

आज रात ठंड बहुत ज़्यादा है।”


मोहन के सामने

सरला का चेहरा घूम गया—

बुखार, खाली बर्तन, बुझा चूल्हा।


फिर उसने बूढ़े आदमी के काँपते हाथ देखे।


कुछ पल चुप रहने के बाद

मोहन बोला—


“बाबा, ये शॉल आप रख लो।”


“पैसे…?”

बूढ़ा हक्का-बक्का रह गया।


“कोई पैसे नहीं,”

मोहन ने कहा।

“आज आप बच जाएँ,

बस यही बहुत है।”


बूढ़े की आँखों से आँसू बह निकले।

“भगवान तुझे कभी खाली हाथ नहीं रखेगा बेटा।”



मोहन खाली हाथ घर लौटा।


सरला ने पूछा—

“शॉल बिकी?”


“हाँ… एक चली गई।”


“पैसे कहाँ हैं?”


मोहन चुप रहा।


“तुमने फिर किसी को मुफ्त दे दी ना?”

सरला ने थकी हुई आवाज़ में कहा।


“हाँ…”

मोहन ने सच कह दिया।


सरला कुछ देर चुप रही,

फिर बोली—


“भूख बुरी होती है मोहन,

पर किसी को ठंड में मरता देखना उससे भी बुरा।”



अगली रात

ठंड और बढ़ गई।


मोहन आख़िरी बची शॉल लेकर

फिर बैठा था।


तभी एक छोटा-सा बच्चा

रोता हुआ पास आया।


“अंकल…”

“घर से भाग आया हूँ।

बहुत ठंड लग रही है।”


मोहन ने उसे देखा—

पतले कपड़े, नीले होंठ, डर से भरी आँखें।


उसने शॉल बच्चे को ओढ़ा दी।


“चल, मेरे साथ घर चल।”


उस रात

मोहन और सरला ने

बच्चे को अपने बीच सुलाया।



सुबह गाँव में हंगामा मच गया।

एक अमीर आदमी का बेटा

गुम हो गया था।


ढूँढते-ढूँढते

वो लोग मोहन की झोपड़ी तक पहुँचे।


बच्चे को देखते ही

माँ-बाप फूट-फूट कर रो पड़े।


“तुमने हमारी जान बचा ली,”

आदमी ने कहा।

“बताओ, क्या चाहिए?”


मोहन ने सिर झुका लिया।

“कुछ नहीं…

बस इंसानियत निभाई।”


उस आदमी ने ज़बरदस्ती

मोहन के हाथ में पैसे रख दिए।


“ये एहसान नहीं,

ये तुम्हारे कर्मों का फल है।”



उस दिन के बाद

मोहन को काम मिला।

सरला की दवाई आई।

घर में फिर चूल्हा जला।


ठंड अभी भी थी,

पर झोपड़ी में

अब उम्मीद की आग जल रही थी।


क्योंकि—

अच्छाई कभी ठंड में नहीं जमती,

वो देर से सही,

पर लौटकर ज़रूर आती है।


संदेश:

जब इंसान के पास देने को कुछ नहीं बचता,

तब भी अगर वह इंसानियत बाँटता है,

तो ज़िंदगी किसी न किसी रूप में

उसे खाली हाथ नहीं लौटाती।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.