दो घर, दो सोच
शाम का वक्त था।
डाइनिंग टेबल पर खाना लगा हुआ था,
लेकिन घर में सन्नाटा नहीं—
तनाव पसरा हुआ था।
अनुज की थाली सामने रखी थी,
पर निवाला गले से उतर नहीं रहा था।
उसकी माँ गुस्से में बोलीं—
“देख रहे हो जी,
कैसे उस चुड़ैल ने इसे अपने ही परिवार के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया है।
अभी से ही हमारे सामने ज़बान चलाने लगा है।
कल को अगर वो इस घर में बहू बनकर आ गई,
तो हमें ही बाहर कर देगी।”
पिता ने भारी आवाज़ में कहा—
“हम इस उम्र में कहाँ जाएंगे अनुज?
ज़िंदगी भर इस घर को खड़ा किया है।”
अनुज ने पहली बार आवाज़ ऊँची की—
“माँ! पापा!
आप लोग बिना जाने किसी को गलत कैसे ठहरा सकते हो?
सोनाक्षी बहुत अच्छी लड़की है।
वो आप सबका ख्याल रखेगी।”
माँ तुनक गईं—
“हमने भी बहुत लड़कियाँ देखी हैं।
सब शुरू में बहुत अच्छी लगती हैं।”
अनुज बोला—
“तो बुआ की बेटी की लव मैरिज में क्या दिक्कत नहीं थी?
तब तो सबने ताली बजाई थी!”
माँ ने तुरंत जवाब दिया—
“हाँ!
और देख लिया उसका नतीजा भी।
साल भर में तलाक लेकर बैठी है घर में।
अब क्या उसी रास्ते पर तू भी चलना चाहता है?”
कमरे में चुप्पी छा गई।
अनुज की आँखें भर आईं,
लेकिन उसने सिर झुका लिया।
पड़ोस का घर में...
उसी समय, ठीक बगल वाले घर में
हॉल में चाय की खुशबू फैल रही थी।
कुर्सी पर बैठे ज्योती पंडित जी
हल्की मुस्कान के साथ सबको देख रहे थे,
मानो उन्हें पूरा भरोसा हो
कि आज की यह मुलाक़ात सफल ही रहेगी।
“देखिए बहन जी,”
उन्होंने आत्मविश्वास से कहा,
“जैसी लड़की ढूँढने को कहा था,
बिलकुल वैसी ही लेकर आया हूँ।”
संध्या चुपचाप सोफे के किनारे बैठी थी।
साधारण सूट-सलवार,
दुपट्टा ठीक से सिर पर,
नज़र झुकी हुई।
“नाम है संध्या,”
पंडित जी बोले,
“बहुत संस्कारी है।
आपके घर को स्वर्ग बना देगी।”
माँ ने गौर से लड़की को देखा—
“लड़की तो सुंदर है जी।”
फिर आवाज़ लगाई—
“विनोद!”
विनोद अंदर आया।
“बता बेटा,
तुझे कैसी लगी लड़की?”
विनोद ने तुरंत कहा—
“माँ,
आपको जो पसंद हो,
वही मुझे भी पसंद है।”
माँ की आँखें चमक उठीं—
“हाय मेरा राजा बेटा!
कलियुग में भी श्रवण कुमार जैसा बेटा मिला है।”
पंडित जी खुश हो गए—
“तो फिर मैं इसके माँ-बाप से बात आगे बढ़ा दूँ?”
पिता बोले—
“हाँ,
बाकी सब हम देख लेंगे।”
संध्या चुप थी।
नज़रें झुकी हुईं,
चेहरा शांत।
उसकी खामोशी को
सबने संस्कार समझ लिया,
पर किसी ने यह नहीं पूछा
कि उस चुप्पी के पीछे
क्या चल रहा है।
एक ही रात, दो अलग सच्चाइयाँ...
एक घर में
माँ-बाप की मर्ज़ी को ही संस्कार कहा जाता था।
दूसरे घर में
बेटे की अपनी पसंद को बग़ावत समझा गया।
एक घर में
लड़की की चुप्पी को
उसका सबसे बड़ा गुण मान लिया गया।
दूसरे घर में
लड़की की आवाज़
डर और खतरे का नाम बन गई।
अनुज देर रात
अपने कमरे में अकेला बैठा था।
कमरे की लाइट बुझी हुई थी,
बस मोबाइल की हल्की रोशनी
उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
स्क्रीन पर सोनाक्षी का संदेश चमक रहा था—
“सब ठीक हो जाएगा ना?”
अनुज देर तक उसी शब्दों को देखता रहा।
जैसे जवाब नहीं,
हिम्मत ढूँढ रहा हो।
आख़िरकार उसने
सिर्फ़ इतना लिखा—
“मैं कोशिश कर रहा हूँ।”
उधर विनोद गहरी नींद में सो रहा था।
उसके कमरे में कोई सवाल नहीं थे,
कोई डर नहीं था।
क्योंकि उसने
कभी सवाल करने की
हिम्मत ही नहीं की थी।
कहानी का सच...
समस्या लव मैरिज नहीं थी।
समस्या सोच की थी।
जहाँ लड़का चुप रहे,
उसे संस्कारी कहा गया।
जहाँ लड़की अपनी बात रखे,
उसे चुड़ैल बना दिया गया।
जहाँ माँ-बाप फैसला करें,
वह परंपरा कहलाती है।
और जहाँ कोई बच्चा
अपनी ज़िंदगी का फैसला
ख़ुद करना चाहे,
वही बगावत बन जाती है।
यही दोहरी सोच
हर रोज़, हर घर में,
किसी न किसी अनुज
और किसी न किसी सोनाक्षी
को बिना आवाज़ किए
अंदर ही अंदर तोड़ती रहती है।

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