माँ की ममता और ईश्वर का न्याय

 

Emotional Indian family scene showing a mother realizing her mistake after her daughter sacrifices herself to save her sister


सुबह का समय था।

आँगन में तुलसी के पौधे पर धूप पड़ रही थी।

रसोई से चूल्हे की धीमी-सी आवाज़ आ रही थी।


घर के एक कोने में बैठी थी सीमा —

साधारण कपड़े, थका हुआ चेहरा,

लेकिन आँखों में असीम धैर्य।


सीमा की दो बेटियाँ थीं — रिया और कविता।


रिया रंग-रूप में गोरी, बेहद सुंदर और पढ़ाई में तेज़ थी।

वहीं कविता सांवली, सरल स्वभाव वाली और बेहद शांत रहने वाली लड़की थी।


लेकिन माँ सीमा का सारा स्नेह और ममता

सिर्फ रिया तक ही सिमट कर रह गई थी।

कविता उसके लिए बस एक नाम भर थी,

एक ऐसी बेटी जिसे वह देखकर भी अनदेखा कर देती थी।




माँ का भेदभाव...


“रिया बेटा, आओ… पहले तुम खाना खा लो।”

सीमा प्यार से रिया को अपने हाथों से खाना खिलाने लगी।


कविता चुपचाप कमरे के एक कोने में बैठी सब देखती रही।

उसकी आँखों में भूख से ज़्यादा एक अनकही उम्मीद थी।


“माँ… मुझे भी भूख लगी है,”

कविता ने बहुत धीमे स्वर में कहा,

जैसे डर हो कि उसकी आवाज़ कहीं माँ को बुरी न लग जाए।


सीमा ने उसकी ओर बिना देखे कहा,

“अभी रुको।

पहले रिया खा ले, फिर तू खा लेना।”


यह कोई नई बात नहीं थी।

यह तो रोज़ का नियम बन चुका था।


कविता ने कभी शिकायत नहीं की,

कभी सवाल नहीं उठाया।

वह बस चुपचाप सब सहती रही—

अपने हिस्से का प्यार भी और दर्द भी।




पिता की चुप्पी...


उनके पिता मोहन सब कुछ देखते थे,

हर बात समझते थे,

लेकिन फिर भी कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।


एक दिन मन पर ज़ोर डालकर उन्होंने कहा,

“सीमा, दोनों हमारी ही बेटियाँ हैं…

दोनों को बराबर प्यार मिलना चाहिए।”


सीमा ने बिना भाव बदले,

ठंडे और बेरुखे स्वर में उत्तर दिया,

“रिया मेरी जान है,

और कविता… बस मेरी एक ज़िम्मेदारी।”


मोहन के पास कोई जवाब नहीं बचा।

वो चुप रह गए।


और उनकी यही चुप्पी…

कविता के लिए हर दिन मिलने वाली

सबसे बड़ी सज़ा बन गई।



बचपन की चोट...


एक दिन स्कूल से दोनों बेटियाँ घर लौटीं।


रिया की आँखों में खुशी चमक रही थी।

वह दौड़ती हुई माँ के पास आई और बोली—


“माँ!

आज मेरी कविता को स्कूल में पहला इनाम मिला।”


सीमा का चेहरा खिल उठा।

उसने तुरंत रिया को अपने सीने से लगा लिया।


“वाह मेरी बेटी!

मुझे पता था, मेरी रिया ही जीतेगी।”


कविता थोड़ी झिझक के साथ पास आई।

धीमी आवाज़ में बोली—


“माँ…

मुझे भी इनाम मिला है।”


सीमा ने उसकी ओर देखा तक नहीं।

बिना भाव बदले कठोर स्वर में बोली—


“अपनी शक्ल देखी है?

तेरे जैसे बच्चों को इनाम नहीं मिला करते।”


वे शब्द किसी चाकू की तरह

कविता के नन्हे दिल में उतर गए।


वह कुछ नहीं बोली,

बस सिर झुकाकर चुपचाप अपने कमरे की ओर चली गई।


उस दिन के बाद

इनाम से ज़्यादा

माँ के वो शब्द

हमेशा उसके दिल में गूंजते रहे।



समय बीत गया...


साल बीतते चले गए।

वक़्त के साथ दोनों बेटियाँ बड़ी हो गईं।


रिया का स्वभाव बदल चुका था—

सुंदरता और माँ के अत्यधिक प्यार ने उसे घमंडी बना दिया था।


वहीं कविता…

वो हमेशा दूसरों के लिए जीने वाली बनी रही।

घर की हर ज़िम्मेदारी उसी के कंधों पर थी।


सुबह से रात तक घर का सारा काम वही करती,

फिर भी उसे कभी सराहना नहीं मिली।


उल्टा, हर दिन तानों का सामना करना पड़ता—


“तेरी वजह से ही इस घर में अशांति है।”

“तू तो अभागी है।”

“किस्मत खराब थी जो तू पैदा हो गई।”


हर शब्द कविता के दिल में उतरता चला गया,

लेकिन उसने कभी जवाब नहीं दिया—

बस चुपचाप सब सहती रही।



एक हादसा...


उस रात सब कुछ सामान्य लग रहा था।

रसोई में चूल्हे पर खाना पक रहा था,

कि अचानक गैस सिलेंडर से तेज़ आवाज़ के साथ आग भड़क उठी।


कुछ ही पलों में लपटें चारों ओर फैल गईं।

रसोई धुएँ से भर गई।


रिया आग देखकर घबरा गई।

उसके हाथ काँपने लगे, पैरों ने साथ छोड़ दिया।


“माँ! बचाओ!”

वह डर से चीख उठी।


सीमा यह दृश्य देखकर रोने लगी।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे।


मोहन डर के मारे वहीं खड़े रह गए,

जैसे उनके पैर ज़मीन से चिपक गए हों।


लेकिन कविता—


एक पल भी नहीं रुकी।

बिना अपनी जान की परवाह किए

वह आग की लपटों के बीच दौड़ पड़ी।


उसने रिया का हाथ कसकर पकड़ा

और किसी तरह उसे खींचते हुए बाहर ले आई।


रिया तो सुरक्षित बाहर आ गई,

लेकिन कविता आग की चपेट में आ चुकी थी।


उसके हाथ और कपड़े जल चुके थे।

दर्द से कराहते हुए वह वहीं गिर पड़ी

और उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।




अस्पताल का सच...


अस्पताल के बेड पर कविता बेहोश पड़ी थी।

उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और शरीर पर पट्टियाँ बंधी थीं।


डॉक्टर बाहर आए और गंभीर स्वर में बोले —

“अगर उसे यहाँ लाने में थोड़ी देर और हो जाती,

तो हम उसकी जान नहीं बचा पाते।”


ये शब्द सुनते ही सीमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।


वो कांपते हाथों से दीवार का सहारा लेकर बैठ गई और बुदबुदाई —

“ये मैंने क्या कर दिया…

जिस बेटी को मैंने सबसे ज़्यादा दर्द दिया,

आज उसी ने सबकी जान बचा ली…”


आज पहली बार सीमा का दिल पूरी तरह टूट चुका था।



पछतावे की आग...


कविता को धीरे-धीरे होश आया।

उसने आँखें खोलीं तो सामने माँ को खड़ा पाया।


सीमा ने काँपते हाथों से कविता का हाथ थाम लिया।

उसकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।


“मुझे माफ कर दे बेटा…

मैंने कभी तुझे अपनी बेटी समझा ही नहीं।

मैंने तेरे साथ बहुत अन्याय किया।”


पास खड़ी रिया भी फूट-फूट कर रो रही थी।


“दीदी…

आज अगर तुम नहीं होती,

तो शायद मैं ज़िंदा नहीं बचती।”


कविता ने कमज़ोर-सी मुस्कान के साथ अपनी माँ की ओर देखा और बोली—


“माँ…

माँ तो माँ होती है।

गलतियाँ हो जाती हैं…

मैंने आपको माफ कर दिया।”



कुछ महीनों बाद—


कविता पूरी तरह ठीक हो गई।

अब उस घर में न कोई ताना था, न कोई भेदभाव।


सीमा के मन का अहंकार टूट चुका था।

वह हर सुबह पूरे मन से पूजा करती

और ईश्वर से अपनी भूलों की क्षमा माँगती।


अब उसके व्यवहार में भी बदलाव आ चुका था।

जिस स्नेह और अपनापन से वह रिया को देखती थी,

उसी प्रेम से वह अब कविता को भी गले लगाती थी।


दोनों बेटियाँ अब उसके लिए बराबर थीं—

दोनों उसकी संतान,

दोनों उसके दिल का हिस्सा।




संदेश:


सुंदरता चेहरे में नहीं,

बल्कि त्याग, करुणा और सच्चे प्रेम में बसती है।


जिसे आज ठुकराया जाता है,

वही कल ईश्वर की इच्छा का माध्यम बनकर

दूसरों का जीवन संवार देता है।




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