आख़िरी चिट्ठी

 

Elderly Indian father and his beautiful adult daughter sharing an emotional reunion at a rural home veranda in soft natural sunlight.


सुबह के साढ़े नौ बजे थे।

बरामदे में धूप अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी।

पीपल के पत्तों से छनकर आती रोशनी आँगन की मिट्टी पर टुकड़ों में बिखरी हुई थी।


कमरे के कोने में रखी पुरानी मेज़ पर डाक का ढेर पड़ा था।

अख़बार, बिजली का बिल, पानी का नोटिस और दो-तीन सरकारी लिफ़ाफ़े।

उनके बीच एक हल्के पीले रंग का साधारण-सा लिफ़ाफ़ा भी था।


शिवनाथ प्रसाद ने चश्मा ठीक किया और वही लिफ़ाफ़ा उठाया।

हाथ कुछ देर काँपे।

लिफ़ाफ़े पर बेटी का नाम लिखा था — सरिता।


सरिता शहर में रहती थी।

तीन साल हो गए थे उसे गए।

सरकारी दफ्तर में छोटी-सी नौकरी लग गई थी, इसलिए गाँव छोड़ना पड़ा।


शिवनाथ ने धीरे-धीरे लिफ़ाफ़ा खोला।


पत्र छोटा था, पर शब्द भारी थे।


> “बाबूजी,

अब मैं रोज़ पत्र नहीं लिख पाती।

नौकरी, घर, सब कुछ साथ-साथ संभालना पड़ता है।

आप चिंता मत किया कीजिए।

मैं ठीक हूँ।”




बस इतना ही।


न कोई हाल-चाल,

न कोई अपनापन,

न वह पुराने दिनों की ‘बाबूजी, आप कैसे हैं?’


शिवनाथ ने पत्र मोड़कर मेज़ पर रख दिया।

नज़र सामने लगी सरिता की पुरानी तस्वीर पर चली गई।


तस्वीर तब की थी जब वह बारहवीं में पढ़ती थी।

चोटी, सादी सलवार, आँखों में सपने।

तब वह कहा करती थी —

“बाबूजी, मैं नौकरी करूंगी, आपको शहर ले जाऊँगी।”


आज वह नौकरी कर रही थी,

पर बाबूजी वहीं थे —

उसी मिट्टी के घर में।


गाँव के लोग अक्सर ताना-सा देकर पूछ लेते —

“अब तो बिटिया शहर में नौकरी करती है,

आपको अपने पास क्यों नहीं बुला लेती?”


शिवनाथ हल्की-सी मुस्कान ओढ़ लेते।

न कोई शिकायत, न कोई सफ़ाई।

बस इतना ही कहते —

“अभी समय नहीं आया।”


असल बात यह थी कि

शहर में उनके लिए जगह नहीं थी।


सरिता का कमरा छोटा था,

किराए का था,

और ज़िंदगी तेज़ थी।


शाम को शिवनाथ खेत से लौटे।

थकान शरीर में थी,

पर मन में उससे ज़्यादा।


दरवाज़े पर बैठी पड़ोसन रमा बोली —

“भइया, आज बिटिया का कोई फोन आया?”


“नहीं,”

उन्होंने सिर हिलाया।


रमा ने सांत्वना दी —

“अब बच्चे अपने में ही उलझे रहते हैं।”


रात को खाना बनाते हुए

शिवनाथ को सरिता की माँ याद आई।

वह होती तो कहती —

“बच्ची है, काम में फँसी होगी।”


लेकिन माँ अब नहीं थी।


खाना आधा ही खाया गया।

रात लंबी लगी।


अगले दिन शिवनाथ ने तय किया —

वह सरिता को चिट्ठी लिखेंगे।


काफी देर सोचते रहे,

फिर लिखा —


> “बिटिया,

मैं ठीक हूँ।

खेत भी ठीक हैं।

तू चिंता मत करना।

जब समय मिले,

दो पंक्ति लिख देना।

तेरी माँ की याद आती है।”




पत्र भेज दिया गया।


फिर दिन बीतते चले गए।


एक दिन, दो दिन,

तीन हफ्ते पूरे हो गए —

लेकिन कोई उत्तर नहीं आया।


न डाकिए की साइकिल रुकी,

न दरवाज़े पर कोई आहट हुई।


दोपहर का समय था।

धूप आँगन में ठहरी हुई-सी लग रही थी।


अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई।


शिवनाथ चौंके।

धीमे क़दमों से जाकर दरवाज़ा खोला।


सामने सरिता खड़ी थी।


चेहरा थकान से बुझा हुआ,

आँखों में अपराध-बोध की नमी।


कुछ कहने की कोशिश की,

पर शब्द साथ नहीं दे पाए।


“बाबूजी…”

बस इतना ही निकल सका उसके होंठों से।


और अगला ही पल —

वह रो पड़ी।


शिवनाथ कुछ नहीं बोले।

बस उसका सिर सहला दिया।


सरिता भर्राए स्वर में बोली—

“बाबूजी… मुझसे भूल हो गई।

मैं यह समझ ही नहीं पाई

कि किसी अपने का इंतज़ार

कितना बोझिल और कितना थकाने वाला होता है।”


शिवनाथ ने उसकी ओर देखा,

आँखों में कोई शिकायत नहीं थी—

बस वर्षों का धैर्य और अपनापन था।

वे बहुत धीमे स्वर में बोले—


“बिटिया,

पत्र भले ही छोटे हों,

पर जब वे न आएँ…

तो उनकी ख़ामोशी

बहुत दूर तक चुभती है।”


उस दिन दोनों ने साथ खाना खाया।

बातें कम हुईं,

पर अपनापन बहुत था।


शाम को सरिता बोली —

“बाबूजी,

मैं आपको शहर ले जाना चाहती हूँ।”


शिवनाथ मुस्कुराए —

“नहीं बिटिया,

अब मुझे यहीं अच्छा लगता है।

बस इतना कर देना

कि कभी-कभी

दो शब्द लिख दिया करना।”


सरिता ने सिर हिलाया।


उस रात शिवनाथ ने चैन की नींद सोई।

क्योंकि उन्हें समझ आ गया था —


रिश्तों को बड़ी-बड़ी बातों की नहीं,

बस थोड़े-से समय और दो सच्चे शब्दों की ज़रूरत होती है।





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