सोच की दीवार

 

Elderly Indian woman sitting in a rural government hospital with her daughter-in-law, emotional social awareness story about changing mindset


1994 की बात थी।

मध्यम आकार का गांव —

जहाँ हर गली, हर घर

एक-दूसरे को जानता था।


उसी गांव में रहती थीं

शांता देवी।


कड़क स्वभाव, ऊँची आवाज़

और घर में उनका

अंतिम फैसला ही कानून होता था।


चार बेटे थे उनके।

चारों की शादी हो चुकी थी।

चार बहुएँ —

चुपचाप, सिर झुकाए,

बस आदेश मानने वाली।


घर में एक ही सोच चलती थी —

“परिवार का वंश सिर्फ़ बेटों से आगे बढ़ता है।”


जब पहली बहू ने बेटी को जन्म दिया,

तो घर में मातम-सा छा गया।


“लक्ष्मी नहीं, बोझ आई है,”

शांता देवी ने साफ कह दिया।


उसके बाद

किसी बहू को

लड़की जन्म देने की इजाज़त ही नहीं मिली।


डॉक्टर बदले गए,

इलाज बदले गए,

और हर बार

कोई न कोई बहाना बनाकर

गर्भ गिरवा दिया गया।


चारों बहुओं के

कुल सात बेटे हुए।

एक भी बेटी नहीं।


घर में

हँसी-खुशी तो थी,

पर

ममता नहीं थी।



समय का पलटा...


साल बीते।

बेटे बड़े हो गए।

पोते स्कूल जाने लगे।


और

शांता देवी

धीरे-धीरे

बुढ़ापे की चपेट में आने लगीं।


कमज़ोरी,

पेट में दर्द,

और बार-बार बेहोशी।


पूरा घर

घबरा गया।


बड़े बेटे ने कहा,

“अम्मा को डॉक्टर को दिखाना होगा।”


सबकी नज़र

बड़ी बहू सुमित्रा पर गई।

क्योंकि वही

अब घर की सबसे समझदार मानी जाती थी।


अस्पताल पहुँचे।

सरकारी अस्पताल।


नंबर आया,

डॉक्टर का नाम पुकारा गया।


जैसे ही

शांता देवी ने

डॉक्टर का चेहरा देखा —

वो रुक गईं।


पीछे मुड़कर

बेंच पर बैठ गईं।


ऊँची आवाज़ में बोलीं,

“मैं अंदर नहीं जाऊँगी।”


सब चौंक गए।


“क्यों अम्मा?”

बेटे ने पूछा।


“डॉक्टर मर्द है,”

उन्होंने सख़्त लहजे में कहा।

“मुझे औरत डॉक्टर चाहिए।”


सुमित्रा ने धीरे से कहा,

“अम्मा, यहाँ आज महिला डॉक्टर नहीं है।”


शांता देवी गुस्से में बोलीं,

“तो मैं जाँच नहीं करवाऊँगी।

आज तक किसी पराए मर्द के सामने

मैं खड़ी तक नहीं हुई।”



आईना...


तभी डॉक्टर खुद बाहर आए।


शांत स्वर में बोले,

“माताजी, आपकी तबीयत ठीक नहीं है।

जाँच ज़रूरी है।”


बेटे ने धीरे से

डॉक्टर के कान में

घर की पूरी कहानी कह दी।


डॉक्टर कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला —


“माताजी,

एक बात पूछूँ?”


शांता देवी ने

नज़र झुका ली।


“लोग कहते हैं

आपने घर में

कभी बेटी को स्वीकार नहीं किया।

उसे अशुभ माना।”


शांता देवी कुछ न बोलीं।


डॉक्टर आगे बोला,

“आज आप एक महिला डॉक्टर ढूँढ रही हैं।

अगर हर घर में

बेटियों को जन्म लेने से पहले ही

खत्म कर दिया जाएगा,

तो ये महिला डॉक्टर

कहाँ से आएँगी?”


सन्नाटा छा गया।


सुमित्रा की आँखों में

आँसू भर आए।


डॉक्टर ने कहा,

“बेटी अगर पढ़े-लिखे,

तो वही माँ की सेवा करती है,

वही समाज का सहारा बनती है।”


शांता देवी की

आँखों से

पहली बार

पछतावे के आँसू गिरे।


धीमे स्वर में बोलीं,

“गलती हो गई बेटा…

बहुत बड़ी गलती…”



जाँच हुई।

इलाज शुरू हुआ।


कुछ दिन बाद

घर लौटीं शांता देवी।


अब घर में

उनकी आवाज़ धीमी हो गई थी।


एक दिन

उन्होंने सबको बुलाया।


चारों बहुएँ

डरते-डरते बैठीं।


शांता देवी ने कहा,

“अगर भगवान ने

फिर मौका दिया,

तो मैं बेटी को

घर की रौनक मानूँगी।”


और

कुछ महीनों बाद —


छोटी बहू ने

एक बेटी को जन्म दिया।


इस बार

घर में

मातम नहीं,

मिठाइयाँ बंटी।


शांता देवी ने

नन्ही बच्ची को गोद में लिया

और काँपती आवाज़ में बोलीं —


“मुझे माफ़ कर देना बिटिया…

अब तुझे

कभी बोझ नहीं बनने दूँगी।”



कहानी का सच:


समय

सबको सिखाता है।


पर

काश…

ये सीख

थोड़ी पहले आ जाए।





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