दो आँगन, दो दुनिया

 

A warm Indian family scene showing parents, children, and grandfather sharing a simple meal together in a small home, highlighting love, togetherness, and happiness despite limited resources.


शहर के एक साधारण से मोहल्ले में एक पुराना-सा मकान था।

मकान के नीचे के हिस्से में एक छोटा परिवार किराए पर रहता था।

कुल सात लोग —

मां, पिता, पाँच बच्चे।


गांव छोड़कर शहर आए थे।

न जमीन, न जमा पूंजी।

बस मेहनत और आपसी साथ।


पिता सुबह-सुबह सड़क किनारे अपनी चौकी लगाते।

कपड़े टांगते, आवाज़ लगाते।

शाम तक जो कमाई होती,

उसमें से पहले पुलिस का हिस्सा निकलता,

फिर घर का राशन।


कभी-कभी पैसे इतने कम होते

कि सब्जी और आटे के अलावा

कुछ बचता ही नहीं।


लेकिन उस घर में

कभी भूख की आवाज़ बाहर नहीं जाती थी।


बच्चे बेहद सलीकेदार थे।

भूखे हों तो भी

पड़ोस को भनक तक न लगे।

पढ़ाई में तेज़,

और बातों में मीठे।


मां के लिए

बच्चे और पति ही पूरी दुनिया थे।

साधारण साड़ी,

सादा चप्पल,

लेकिन चेहरे पर हमेशा संतोष।


जाड़े की रातों में

आंगन में आग जलती।

मां आटे की लोई बनाती,

पिता चोखा कूटते।

लिट्टी की सोंधी खुशबू

पूरे कमरे में फैल जाती।


पहले बच्चे खाते।

उनके पेट भरने के बाद

मां-बाप एक ही थाली में

खाना खाकर

मुस्कुरा लेते।


उनके चेहरे की खुशी

किसी त्योहार से कम नहीं लगती।


हर सुबह

मां पति के बाल संवारती।

कंधे पर गमछा रखती,

हाथ में टिफिन थमाती,

और गेट तक छोड़ने जाती।


कभी नई साड़ी की ज़िद नहीं।

लेकिन साल में एक बार

पति के लिए

नई शर्ट-पैंट ज़रूर सिलवाती।

गांव में शादी-ब्याह हो

तो वही कपड़े निकालकर

प्यार से पहनने को देती।


कुछ दिन पहले

बच्चों के दादाजी भी गांव से आ गए।


गांव में

चाचा-चाची के झगड़ों के बीच

दादा कई बार भूखे रह जाते थे।

ये बात

सबसे छोटे बच्चे ने

मासूमियत से बता दी थी।


यहाँ आते ही

दादा जैसे जी उठे।


सुबह धूप में कुर्सी डाल दी जाती।

बहू सरसों तेल से

पैर और पीठ की मालिश करती।

गरम-गरम रोटियाँ

एक-एक कर थाली में रखती।


गांव से आई

गंदी धोती-कुर्ता

सर्फ डालकर ऐसे धोती

जैसे किसी अपने का हो।


रात में

बच्चे दादा के पैर दबाते।

दादा गांव की कहानियाँ सुनाते।

कभी अपने बेटे का बचपन,

कभी खेत,

कभी बरसात।


छोटा सा कमरा,

नन्हा सा बरामदा,

और तंग रसोई —

फिर भी

आठ लोगों की हँसी

उस घर को बड़ा बना देती।


दादा को यहाँ अच्छा लगने लगा।

एक दिन बोले —

“थोड़े पैसे जोड़कर

एक गाय ले लें।

दूध भी मिलेगा,

बच्चों को ताकत भी।”


सब मुस्कुरा दिए।



उसी मकान के

पहले तल्ले पर

एक और परिवार रहता था।


चार कमरों का फ्लैट।

बढ़िया फर्नीचर।

बालकनी में

सजे-संवरे पौधे।

हफ्ते में दो दिन

माली आता।


पिता बैंक में बड़े पद पर।

मां कॉलेज में पढ़ाने वाली।

दो बच्चे —

महंगे स्कूल में पढ़ते।


घर में

खाना बनाने वाली अलग,

सफाई वाली अलग।


दादाजी

सरकारी अफसर रह चुके थे।

अब रिटायर होकर

उसी घर में रहते थे।


बच्चे स्कूल से आते ही

मोबाइल में घुस जाते।

कभी पिज्जा,

कभी बर्गर।


दादाजी

कीमती डाइनिंग टेबल पर

अकेले बैठकर

हॉट केस से खाना निकालते।

मन नहीं लगता।


सुबह

“गुड मॉर्निंग”

और रात

“गुड नाइट” —

यही रिश्ता था।


कभी दादाजी

बच्चों के कमरे में जाकर

बात करना चाहते,

तो जवाब मिलता —

“आप बहुत टोकते हैं।”


बेटा-बहू भी कहते —

“बच्चों को स्पेस दीजिए पापा।”


टीवी है,

मोबाइल है,

कमरा है —

पर अपनापन नहीं।


कभी-कभी

पुराने दिनों को याद कर

दादाजी की आंखें भर आतीं।

नौकरी के समय

कितने लोग साथ थे,

आज कोई बात करने वाला नहीं।


बीमारी में

खाना भी मन से नहीं मिलता।

जो मिल जाए

चुपचाप खा लेते।


कहीं और जा भी नहीं सकते थे।

इकलौता बेटा था।




एक ही समाज,

एक ही शहर।


एक घर —

जहाँ अभाव होते हुए भी

चेहरों पर संतोष था,

दिलों में अपनापन था,

और छोटी-छोटी बातों में

खुशियाँ बसती थीं।


दूसरा घर —

हर सुविधा से भरा हुआ,

लेकिन अपनापन से खाली।


असल फर्क

पैसे का नहीं,

रिश्तों का था।


जहाँ

साथ बैठकर

एक थाली में खाना था,

वहीं

अलग-अलग कमरों में

अलग-अलग ज़िंदगी।




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