जब माँ ने बहू खो दी
नीरजा की शादी को अभी दो ही साल हुए थे।
वह पढ़ी-लिखी, शांत स्वभाव की लड़की थी।
एम.ए. करके वह कॉलेज में पढ़ाना चाहती थी,
लेकिन शादी के बाद उसकी ज़िंदगी
रसोई, झाड़ू और चूल्हे के बीच सिमट गई।
उसकी सास, विमला देवी,
हर बात में कमी निकालती थीं।
“हमारे ज़माने में बहुएँ इतना आराम नहीं करती थीं,”
यह शब्द उनके मुँह से दिन में कई बार निकलता।
पति अमित पास के ही शहर में प्राइवेट नौकरी करता था।
सुबह निकल जाता, रात को थका-हारा लौटता।
घर के भीतर नीरजा क्या झेल रही है,
वह पूरी तरह समझ ही नहीं पाता था।
पहली बार जब नीरजा गर्भवती हुई,
तो विमला देवी ने साफ कह दिया—
“मैं बच्चे की देखभाल नहीं कर सकती।
मेरे घुटनों में दर्द रहता है।”
अमित ने बहुत कहा,
“माँ, यह हमारा पहला बच्चा है…”
लेकिन जवाब वही—
“मायके भेज दो। वहाँ उनकी माँ देख लेगी।”
नीरजा चुपचाप चली गई।
मायके में उसने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया।
विमला देवी सिर्फ एक बार आईं,
बच्ची को देखा,
नाम पूछा
और बिना बहू की तरफ़ देखे लौट गईं।
उस दिन नीरजा के मन में
कुछ टूट गया था।
कुछ महीनों बाद नीरजा वापस ससुराल लौटी।
इस बार वह मन में एक पक्का फैसला लेकर आई थी—
अब वह कॉलेज में नौकरी करेगी।
कम से कम दिन के कुछ घंटे
इस घर की घुटन भरी हवा से दूर रह पाएगी।
नौकरी जॉइन करते ही
विमला देवी ने बिना कुछ सोचे
घर की कामवाली को हटा दिया।
उनका साफ़ कहना था—
“घर की बहू बाहर जाकर पढ़ाए
और घर का काम कोई और करे,
यह मुझे मंज़ूर नहीं।”
नीरजा की दिनचर्या और भी कठिन हो गई।
वह रोज़ सुबह पाँच बजे उठती,
खाना बनाती,
बच्ची को संभालती,
फिर कॉलेज जाती
और लौटकर फिर वही काम—
रसोई, झाड़ू, बर्तन, थकान।
धीरे-धीरे
उसकी आँखों की चमक फीकी पड़ने लगी,
और मुस्कान
जिम्मेदारियों के बोझ तले
कहीं खो-सी गई।
दूसरी बार नीरजा फिर गर्भवती हुई।
डॉक्टर ने जाँच के बाद साफ़ शब्दों में कहा—
“इन्हें अब ज़्यादा काम नहीं करना चाहिए।
इन्हें आराम की ज़रूरत है।”
लेकिन विमला देवी ने डॉक्टर की बात को
हल्के में ले लिया।
वे बोलीं—
“हमारे ज़माने में औरतें
खेतों में काम करती थीं,
फिर भी बच्चे ठीक-ठाक पैदा होते थे।”
ठंड की कड़ाके वाली रातों में भी
नीरजा रसोई में खड़ी रहती।
ठंडे पानी से बर्तन धोते हुए
वह कभी-कभी पेट पर हाथ रख लेती,
मानो अपने बच्चे को
चुपचाप सहला रही हो।
उसके मन में बस एक ही सवाल घूमता रहता—
“क्या मेरा कसूर सिर्फ़ इतना ही है
कि मैं इस घर की बहू हूँ?”
जब प्रसव का समय नज़दीक आया,
तो फिर वही पुराना फ़ैसला दोहराया गया।
“इसे मायके भेज दो,”
विमला देवी ने बिना कोई हिचक कहा।
इस बार अमित ने कोई विरोध नहीं किया।
वह जानता था कि
कम से कम मायके में
नीरजा सुरक्षित रहेगी,
उसे आराम मिलेगा,
और कोई उस पर बोझ नहीं डालेगा।
नीरजा चुपचाप मायके चली गई।
वहीं उसने एक बेटे को जन्म दिया।
उस दिन, अस्पताल के कमरे में
अपने नवजात को सीने से लगाए हुए
उसने मन ही मन एक निर्णय ले लिया—
अब वह उस घर में
कभी वापस नहीं लौटेगी,
जहाँ एक माँ बनने से पहले ही
उसे अकेला छोड़ दिया गया था।
साल बीतते चले गए।
बच्चे धीरे-धीरे बड़े होने लगे।
नीरजा कॉलेज में स्थायी नौकरी पर लग गई।
अब वह केवल घर संभालने वाली बहू नहीं थी,
बल्कि अपने पैरों पर खड़ी एक आत्मनिर्भर स्त्री बन चुकी थी।
अमित हर महीने मिलने आता था।
उसका मन दो हिस्सों में बँटा रहता—
एक ओर माँ की ज़िम्मेदारी,
दूसरी ओर पत्नी और बच्चों का भविष्य।
वह दोनों के बीच फँसकर भी
किसी को पूरा नहीं दे पा रहा था।
एक दिन अचानक फोन आया—
“माँ बाथरूम में गिर गई हैं।
कमर की हड्डी टूट गई है।
अब बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही हैं।”
नीरजा कुछ पल चुप रही।
आँखें भर आईं,
लेकिन दिल में कोई हलचल नहीं हुई।
दर्द तो था…
पर अब वह दर्द
उसका अपना नहीं रहा था।
अमित ने भारी आवाज़ में कहा—
“माँ, आपने नीरजा को खो दिया है।
वह बहुत अच्छी बहू थी…
लेकिन आपने ही उसे अपने से दूर कर दिया।
आज अगर आप अकेली हैं,
तो यह किसी और की गलती नहीं,
यह आपके अपने फैसलों का नतीजा है।”
विमला देवी बिस्तर पर निश्चल पड़ी
छत की ओर ताकती रहीं।
आँखों से आँसू बह रहे थे,
लेकिन अब उन्हें रोकने वाला
कोई नहीं था।
पहली बार उनके दिल ने यह सच स्वीकारा—
बहू नौकरानी नहीं होती,
और माँ का अहंकार
पूरे परिवार को
खंडहर बना सकता है।
अमित ने माँ की देखभाल के लिए
एक नर्स रख दी।
नीरजा अपने बच्चों के साथ
अब एक शांत और सम्मानजनक जीवन जी रही है।
कुछ रिश्ते
माफ़ी माँग लेने से नहीं,
बल्कि सही समय पर समझ लेने से
बचे रहते हैं।
और जब समझ
देर से आती है,
तो हाथ में
सिर्फ़ पछतावा ही रह जाता है।

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