माँ की छाया और बेटी के सपने
कॉलेज का बड़ा सा सभागार फूलों से सजा हुआ था।
मंच पर चमकती लाइटें, सामने कतारों में बैठे छात्र-छात्राएँ और उनके गर्व से भरे माता-पिता।
आज बी.एड. फाइनल ईयर का रिज़ल्ट सम्मान समारोह था।
प्रिंसिपल साहब एक-एक नाम पुकार रहे थे।
“स्वर्णा मिश्रा… गोल्ड मेडल।”
तालियाँ बजतीं, कैमरे चमकते।
फिर आवाज़ आई—
“अनुष्का वर्मा… यूनिवर्सिटी सेकंड रैंक।”
सभागार में हलचल हुई।
एक लड़की व्हीलचेयर पर बैठी, हल्के नीले रंग की साड़ी में, अपनी माँ का हाथ थामे धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ी।
उसकी आँखों में चमक थी, पर चेहरे पर संयम।
मंच पर पहुँचते ही प्रिंसिपल ने सम्मान पत्र, मेडल और मार्कशीट अनुष्का को थमाई।
अनुष्का ने माइक पकड़ा।
उसकी आवाज़ थोड़ी काँप रही थी—
“सर… आज अगर मैं यहाँ खड़ी हूँ, तो इसकी असली हकदार मेरी मम्मी सुनीता जी हैं।
कृपया ये सम्मान उन्हें दीजिए… क्योंकि मैं नहीं, उन्होंने पढ़ाई पूरी की है।”
पूरा सभागार कुछ पल के लिए खामोश हो गया।
प्रिंसिपल साहब ने मुस्कराते हुए कहा—
“सुनीता जी, आइए।
आप जैसी माँ हर बच्चे का सौभाग्य होती है।”
सुनीता मंच पर आईं।
उनके चेहरे पर सादगी थी, आँखों में बरसों का संघर्ष।
उन्होंने माइक लिया।
“आज मैं आपको अपनी बेटी की कहानी नहीं, अपनी हिम्मत की कहानी सुनाना चाहती हूँ।”
लोग ध्यान से सुनने लगे।
“अनुष्का जब आठ साल की थी, तब हम गाँव से शहर जा रहे थे।
बस पलट गई।
सबको मामूली चोट आई… लेकिन मेरी बेटी की रीढ़ की हड्डी को गहरी चोट लगी।
डॉक्टर ने कहा—
‘अब ये कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएगी।’
उस दिन मैं रोई नहीं।
क्योंकि अगर मैं टूट जाती, तो मेरी बेटी भी टूट जाती।”
सभागार में सन्नाटा छा गया।
“अस्पताल, दवाइयाँ, फिज़ियोथैरेपी—
सब चलता रहा।
स्कूल में दाख़िला करवाया तो लोगों ने कहा—
‘क्या फ़ायदा?
ये लड़की क्या करेगी पढ़-लिखकर?’
मैंने कहा—
‘ये वही करेगी, जो इसका मन चाहेगा।’”
सुनीता की आवाज़ अब मज़बूत हो चुकी थी।
“दसवीं पास की।
घर वालों ने फिर रोका—
‘अब बस बहुत हो गया।’
लेकिन अनुष्का ने मुझसे कहा—
‘माँ, मुझे टीचर बनना है।
मैं उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हूँ, जिन्हें लोग कमज़ोर समझते हैं।’”
सुनीता की आँखें भर आईं।
“शहर के कॉलेज में एडमिशन मिला।
वो हॉस्टल में रही।
मैं पास ही एक छोटे से घर में रही और आँगनवाड़ी में काम किया।
दिन में काम,
शाम को इसके नोट्स पढ़ना,
रात को इसके पैरों की मालिश।
आज इसका रिज़ल्ट नहीं,
मेरी तपस्या सफल हुई है।”
सभागार तालियों से गूँज उठा।
सुनीता ने आख़िरी बात कही—
“अब मेरी बेटी स्पेशल एजुकेशन में मास्टर्स करना चाहती है।
वो कहती है—
‘माँ, मैं उन बच्चों की आवाज़ बनूँगी, जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।’
मुझे पूरा विश्वास है—
जिस दिन ये बच्चों के सामने खड़ी होकर पढ़ाएगी,
उस दिन मेरी अनुष्का सच में अपने पैरों पर खड़ी होगी।”
प्रिंसिपल साहब भावुक होकर बोले—
“सुनीता जी,
आज हमें शिक्षा का असली अर्थ समझाने के लिए धन्यवाद।
अनुष्का—
तुम सिर्फ़ टॉपर नहीं,
एक मिसाल हो।”
अनुष्का ने माँ का हाथ पकड़ा।
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
पर वो आँसू कमज़ोरी के नहीं थे—
वो जीत के थे।

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