जब सोच साथ नहीं चली

 

Young Indian woman sitting by a window with a book, thinking deeply in soft morning light


सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी।

अनन्या बिस्तर पर बैठी किताब के पन्ने पलट रही थी, लेकिन शब्द उसकी आँखों में उतर ही नहीं पा रहे थे।

दिमाग कहीं और अटका था।


आज उसका इंटरव्यू था।


अनन्या समाजशास्त्र में एमए कर चुकी थी और एक एनजीओ में काम करना चाहती थी—महिलाओं के अधिकारों पर, खासकर शादी और रिश्तों में होने वाले मानसिक उत्पीड़न पर।


उसकी माँ रसोई से आवाज़ दे रही थीं—

“अनन्या, नाश्ता कर लो, देर हो जाएगी।”


“आ रही हूँ, मम्मी,”

कहते हुए भी अनन्या की आवाज़ में उत्साह नहीं था।


माँ ने गौर किया, लेकिन कुछ कहा नहीं।


अनन्या के घर का माहौल पढ़ा-लिखा और खुला था।

पिता बैंक में अधिकारी थे, माँ कॉलेज में हिंदी पढ़ाती थीं।

घर में बहसें होती थीं—धर्म, समाज, राजनीति, रिश्ते—सब पर।

अनन्या को अपनी बात रखने की आदत थी, डर नहीं लगता था।


इंटरव्यू अच्छा गया।

एनजीओ की डायरेक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा,

“आपकी सोच स्पष्ट है। हमें ऐसे ही लोग चाहिए।”


अनन्या के चेहरे पर सुकून फैल गया।


शाम को घर लौटी तो माँ ने बताया—

“रविवार को लड़का देखने आ रहा है।”


अनन्या चौंकी नहीं।

उम्र पच्चीस हो चुकी थी।

उसे पता था यह दिन आएगा।


“लड़का कैसा है?” उसने पूछा।


“इंजीनियर है, पुणे में जॉब करता है। परिवार संस्कारी है,”

माँ ने सहजता से कहा।


अनन्या मुस्कुराई—

“संस्कारी शब्द बड़ा भारी होता है, मम्मी।”


माँ हँस दीं—

“तू मिल लेना, खुद समझ जाएगी।”


रविवार आया।


लड़के का नाम था—अक्षय।


दिखने में साधारण, बातों में आत्मविश्वास।

उसकी माँ बार-बार अनन्या को सिर से पैर तक देख रही थीं।


चाय के बाद बातचीत शुरू हुई।


“अनन्या क्या करती हो?”

अक्षय ने पूछा।


“एनजीओ में काम करना चाहती हूँ,”

अनन्या ने साफ कहा।


“शादी के बाद?”

अक्षय की माँ बीच में बोल पड़ीं।


“शादी के बाद भी,”

अनन्या ने आँखों में आँखें डालकर कहा।


कमरे में एक पल को चुप्पी छा गई।


अक्षय ने बात संभालते हुए कहा—

“मैं मॉडर्न सोच रखता हूँ, लेकिन परिवार की भी कुछ अपेक्षाएँ होती हैं।”


अनन्या समझ गई थी—

यह ‘लेकिन’ आगे चलकर भारी पड़ेगा।


फिर बात व्रत-त्योहारों पर आई।


“करवाचौथ तो ज़रूरी होता है,”

अक्षय की माँ बोलीं,

“बहू के बिना घर सूना लगता है।”


अनन्या ने शांत स्वर में कहा—

“मैं परंपराओं के खिलाफ नहीं हूँ,

लेकिन जबरदस्ती के खिलाफ हूँ।”


अक्षय चुप रहा।


शाम को जब वे लोग चले गए,

माँ ने पूछा—

“कैसा लगा?”


अनन्या ने थोड़ा सोचकर कहा—

“अच्छे लोग हैं,

लेकिन हमारी सोच अलग है।”


पिता ने अख़बार रखते हुए कहा—

“बेटा, शादी दो लोगों की होती है,

पर निभती सोच से है।”


कुछ दिन बाद रिश्ता तय कर दिया गया।


अनन्या ने विरोध नहीं किया,

उसे लगा—

शायद बातचीत से रास्ता निकल आए।


शादी सादगी से हुई।


शुरुआती महीने ठीक रहे।

अक्षय काम में व्यस्त रहता,

अनन्या अपने एनजीओ में।


लेकिन धीरे-धीरे बातें बदलने लगीं।


“इतना बाहर रहना ठीक नहीं,”

अक्षय ने एक दिन कहा।


“ये मेरा काम है,”

अनन्या ने उत्तर दिया।


“घर भी ज़रूरी है,”

अक्षय बोला।


करवाचौथ आया।


“व्रत रख लो,”

अक्षय ने कहा,

“माँ की बहुत इच्छा है।”


“मैं नहीं रख सकती,”

अनन्या ने स्पष्ट कहा।


“एक दिन से क्या फर्क पड़ता है?”

अक्षय की आवाज़ सख्त हो गई।


“फर्क सोच का पड़ता है,”

अनन्या बोली।


उस रात पहली बार

दोनों के बीच दीवार खड़ी हो गई।


धीरे-धीरे ताने बढ़ने लगे।

फोन चेक होना,

समय का हिसाब,

काम पर सवाल।


अनन्या घुटने लगी।


एक रात उसने कहा—

“अक्षय, मैं शादी में कैद होने नहीं आई थी।”


अक्षय चुप रहा।


अगले हफ्ते

अनन्या अपने मायके चली गई।


माँ ने उसे गले लगाया,

पिता ने कुछ नहीं पूछा।


कई महीने बीते।

काउंसलिंग हुई।

समझौते की कोशिशें हुईं।


लेकिन सोच नहीं बदली।


आख़िरकार

अनन्या ने कहा—

“मैं बोझ बनकर नहीं जी सकती।”


तलाक आसान नहीं था।

समाज ने सवाल उठाए।

रिश्तेदारों ने उंगलियाँ।


लेकिन अनन्या ने राहत की साँस ली।


एक दिन एनजीओ के सेमिनार में

उसने मंच से कहा—


“रिश्ते तभी टिकते हैं

जब सोच साथ चले।

वरना

शादी एक सुंदर पिंजरा बन जाती है

और इंसान

उड़ना भूल जाता है।”


तालियों की गूंज में

अनन्या मुस्कुरा रही थी।


इस बार

मुस्कान में डर नहीं था।

सिर्फ़ सुकून था।





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