खामोश आंगन

 

A young woman standing at a bus station during evening, looking emotional as dry leaves lie scattered on the ground.


शाम ढलने लगी थी।

आसमान पर बादल इस तरह फैले थे,

मानो किसी ने बहुत हल्के हाथों से स्लेटी रंग घोल दिया हो।


बस स्टैंड के बाहर नीम के पत्ते ज़मीन पर बिखरे पड़े थे।

कुछ टूटे हुए, कुछ पूरी तरह सूखे,

और कुछ ऐसे, जैसे अभी गिरने का उनका मन ही न हुआ हो।


अनु स्टेशन के अंदर पहुँच चुकी थी।

घड़ी में साढ़े पाँच बज रहे थे।

उसकी बस सात बजे चलनी थी।


वह हमेशा की तरह जल्दी पहुँच गई थी।

उसे आदत थी—समय से पहले पहुँचने की, जैसे देर हो जाने का डर उसके भीतर कहीं गहराई तक बैठा हो।


अनु धीरे-धीरे महिला प्रतीक्षालय की ओर बढ़ी।

चलते हुए उसके दिमाग़ में एक ही तस्वीर बार-बार उभर रही थी—

माँ का सूना आंगन।


पिताजी को गुज़रे आज पूरे दो साल हो गए थे।

पहले साल माँ ने जैसे-तैसे काट लिया था,

लेकिन अब…

अब घर सच में खाली हो गया था।


घर शहर के बाहरी हिस्से में था।

सामने टूटी-फूटी सड़क,

एक पुराना खंभा,

और उसके आगे खेत,

जहाँ अब कोई फसल नहीं उगती थी।


दोपहर में वहाँ सन्नाटा इतना गहरा हो जाता था कि लगता,

आवाज़ भी डर कर लौट जाती होगी।


माँ की आवाज़ फोन पर पहले जैसी नहीं रही थी।

पहले हर छोटी बात बताती थी—

आज क्या बनाया,

पड़ोस में कौन आया,

सब्ज़ी कितने की मिली।


अब बस इतना कहती—

“सब ठीक है।”


आज जब अनु निकल रही थी,

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया था।


“अगली बार जल्दी आना,”

इतना कह कर माँ की आँखें भर आई थीं।


अनु कुछ नहीं बोल पाई थी।

वह जानती थी—

जल्दी आना अब वादे जैसा नहीं,

एक अपराध जैसा लगने लगा है।


जब अनु छोटी थी,

माँ ही सब कुछ थीं।


पिताजी अक्सर बाहर रहते थे।

घर, स्कूल, बीमारी, त्योहार—

सब माँ के सहारे चलता था।


अनु को याद है,

एक बार रात को तेज़ बुखार चढ़ गया था।

बारिश हो रही थी।

आने-जाने का कोई साधन नहीं मिला था।


माँ ने उसे पीठ पर बाँधा

और दो किलोमीटर दूर अस्पताल तक ले गई थी।


उस रात माँ की साड़ी भीग गई थी,

चप्पल टूट गई थी,

लेकिन उसकी पकड़ नहीं छूटी थी।


आज वही माँ…

अकेली थी।


अनु वेटिंगरूम के बाहर लगी बेंच पर बैठ गई।

एक चाय ली।

चाय ठंडी हो गई,

पर उसने ध्यान नहीं दिया।


उसके दिमाग़ में घूम रहा था—

क्या माँ ने दवा ली होगी?

क्या समय पर खाया होगा?


माँ अब एक ही बार खाना बनाती थी।

बर्तन धोने का मन नहीं करता,

ऐसा वह हँसते हुए कहती थी।


अनु जानती थी—

यह हँसी अब थकान से भरी होती है।


भीड़ अचानक बढ़ गई।

कोई बस आकर रुकी थी।


लोग उतर रहे थे,

भाग रहे थे,

चिल्ला रहे थे।


तभी अनु का ध्यान नीचे गया।


एक बूढ़ी औरत ज़मीन पर बैठी थी।

सिर पर फटा दुपट्टा,

हाथ में कटोरा।


आँखें…

आँखें कुछ माँ जैसी थीं।


थकी हुई,

उम्मीद से भरी,

और बेहद अकेली।


अनु के हाथ काँपने लगे।

उसे लगा जैसे कोई उसके भीतर कुछ तोड़ रहा हो।


वह वहीं बैठ गई।

साँस तेज़ हो गई।


बस के आने की घोषणा हुई।

लोग हड़बड़ी में उठे,

कोई सामान समेटने लगा,

कोई दरवाज़े की ओर भागा।


कुछ ही पलों में बस चल पड़ी।


अनु अपनी जगह से नहीं उठी।

वह वहीं बैठी रही—

जैसे उसके भीतर कोई निर्णय अभी पूरा न हुआ हो।


थोड़ी देर बाद उसने धीरे से फोन निकाला।

स्क्रीन पर एक नया संदेश चमक रहा था।


उसने पढ़ा—

अगली सुबह की बस में दो सीटें कन्फर्म हो चुकी थीं।

अनु ने आँखें बंद कीं

और एक गहरी साँस ली।


घर का दरवाज़ा खुला।


“अरे… तुम?”

माँ एक पल को जैसे विश्वास ही नहीं कर पाईं।


“हाँ माँ,”

अनु हल्की सी मुस्कान के साथ बोली,

“बहुत भूख लगी है।”


माँ कुछ नहीं बोलीं।

बस उसकी ओर देखती रहीं।


फिर उनकी आँखें भर आईं—

चुपचाप, बिना किसी शब्द के।


उसने कुछ भी कहे बिना

चुपचाप रसोई की ओर कदम बढ़ा दिए।


अनु पास आकर माँ के बगल में बैठ गई,

और अपना सिर

धीरे से उसकी गोद में रख दिया।


वहाँ अब कोई सन्नाटा नहीं था,

कोई खालीपन नहीं था।


वह आंगन,

जो कब से सूना पड़ा था,

फिर से भर गया था।


अगली सुबह

बस में दो औरतें सवार थीं—


एक माँ,

और एक बेटी।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.