मिट्टी की सौगंध
सुबह का समय था।
गाँव की कच्ची सड़क पर धूल उड़ रही थी।
एक बस आकर रुकी।
बस से उतरी काव्या—
हाथ में ब्रांडेड बैग,
पैरों में महंगे जूते,
आँखों पर बड़ा सा चश्मा।
बस के पीछे से आवाज आई—
“अरे बहू, संभल के उतरना, ये कोई एयरपोर्ट नहीं है।”
काव्या ने चप्पल उतारी और नंगे पैर जमीन पर रख दिए।
पैरों के नीचे कंकड़ चुभे,
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
यही उसका नया घर था।
घर के नाम पर
सिर्फ़ दो छोटे कमरे थे,
ऊपर टीन की छत
और आँगन में
एक टूटा-सा हैंडपंप।
सास शांति देवी ने सहज स्वर में कहा—
“बहू, यहाँ AC की उम्मीद मत रखना,
पंखा भी कभी चलता है,
कभी जवाब दे देता है।”
काव्या के होंठों पर
हल्की-सी मुस्कान आ गई।
वह बोली—
“माँ जी, चल जाएगा।”
लेकिन मन के भीतर
एक सवाल चुपचाप उठ खड़ा हुआ—
चल जाएगा…
या मैं ही चल जाऊँगी?
पहली ही रात
मच्छरों ने मानो युद्ध छेड़ दिया।
काव्या पूरी रात
कभी एक करवट,
कभी दूसरी करवट बदलती रही।
नींद आँखों से दूर रही।
अभी अँधेरा पूरी तरह छँटा भी नहीं था
कि सास की आवाज़ गूँज उठी—
“बहू, उठ जा।
भैंस को चारा डालना है,
और पानी भी भर लाना है।”
काव्या ने
आँखें मसलते हुए
घड़ी की ओर देखा—
सुबह के
ठीक पाँच बज रहे थे।
ताने और तजुर्बे...
ननद पिंकी हँसते हुए बोली—
“भाभी, आपके हाथों से तो लैपटॉप उठता था,
अब उन्हीं हाथों से बाल्टी उठेगी क्या?”
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
चुपचाप झुकी,
और पानी से भरी बाल्टी उठा ली।
भारी वजन से हाथ काँप गए।
उँगलियों की त्वचा छिल गई।
दर्द तेज़ था,
और आँखों में अनायास पानी भर आया।
मोहन यह सब देख रहा था।
उसका दिल चाहा कुछ कहे,
लेकिन शब्द गले में अटक गए।
रात को, जब सब सो गए,
वह धीमे स्वर में बोला—
“काव्या…
अगर मन करे तो
अपने पापा से बात कर लो।”
काव्या ने उसकी ओर देखा।
फिर धीरे से सिर हिला दिया—
“नहीं मोहन,
मैं यहाँ सहारा लेने नहीं,
साथ निभाने आई हूँ।
मैं यहाँ से भागने नहीं आई हूँ।”
भूख और बेबसी...
कुछ दिन बीत गए।
काम कहीं नहीं मिला।
घर में आटे का एक दाना भी नहीं बचा था।
सास ने भारी आवाज़ में कहा—
“आज बस नमक-रोटी है बहू।”
काव्या ने चुपचाप रोटी उठाई।
उसने आधी रोटी खाई
और बाकी आधी थाली में ही छोड़ दी।
मोहन ने देखा तो बोला—
“पूरी खा लो काव्या।”
काव्या हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली—
“नहीं, मुझे भूख नहीं है।”
लेकिन रात आते-आते
उसका पेट दर्द से ऐंठने लगा।
भूख उसकी आँतों को मरोड़ रही थी।
वो करवटें बदलती रही,
छत को ताकती रही—
पर आँखों से एक भी आँसू नहीं गिरा।
क्योंकि वो जानती थी,
अगर आज रो पड़ी
तो खुद को कमजोर मान लेगी।
और काव्या
कमज़ोर बनने यहाँ नहीं आई थी।
सोच बदलने की शुरुआत...
एक दिन काव्या खेत के किनारे खड़ी थी।
चारों तरफ़ सूखी, फटी हुई ज़मीन पड़ी थी।
मेड़ें टूटी हुई थीं, जैसे बरसों से किसी ने उन्हें छुआ ही न हो।
लेकिन थोड़ी दूरी पर
एक पतला सा नाला बह रहा था।
पानी की हल्की-सी आवाज़
उसके कानों में नहीं,
सीधे दिल में उतर गई।
काव्या की आँखों में अचानक चमक आ गई—
जैसे अँधेरे में कोई दीया जल उठा हो।
वह धीरे से बोली,
“माँ जी…
अगर हम यहाँ सब्ज़ी उगाएँ तो?”
उसकी बात सुनते ही पिंकी ठहाका मारकर हँस पड़ी—
“अरे वाह!
शहर की मैडम को अब खेती सूझ गई।
इसे लगता है सब्ज़ी मोबाइल ऐप से उगती है!”
सास ने गहरी साँस ली और बोलीं—
“बात तो ठीक है बहू,
पर खेती के लिए पैसा चाहिए।
बीज, खाद…
पैसा कहाँ से आएगा?”
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह चुपचाप अपनी कलाई की ओर देखने लगी।
कुछ पल रुकी,
फिर एक-एक करके
अपनी चूड़ियाँ उतार लीं
और उन्हें सास की हथेली पर रख दिया।
शांत लेकिन पक्की आवाज़ में बोली—
“इसे बेच देते हैं, माँ जी।”
मोहन यह सब देख रहा था।
उसकी आँखें भर आईं।
उसे पहली बार एहसास हुआ—
यह लड़की सिर्फ़ उसकी पत्नी नहीं,
इस घर की उम्मीद बन चुकी है।
संघर्ष का असली रूप...
धूप सिर पर थी,
हाथों में फावड़ा,
और हथेलियों पर उभरे थे
दर्द भरे छाले।
पिंकी कराहते हुए बोली—
“मेरी तो कमर ही टूट गई।”
काव्या हल्की-सी मुस्कुराई—
“कमर नहीं पिंकी,
किस्मत सीधी हो रही है।”
बीज मिट्टी में डाले गए,
दूर से पानी ढोकर लाया गया।
कुछ ही दिनों बाद
उम्मीदें डगमगाने लगीं—
पौधे मुरझा गए,
पत्तियाँ पीली पड़ गईं।
सास की आँखों से आँसू बह निकले—
“सब बर्बाद हो गया बहू…”
काव्या ने मिट्टी को देखा,
फिर सास का हाथ थामकर बोली—
“नहीं माँ,
अब इलाज शुरू होगा।”
घर का कचरा,
गोबर,
चूल्हे की राख—
सब इकट्ठा किया गया।
उसी से बनी खाद,
उसी से मिली नई जान।
धीरे-धीरे
मिट्टी ने साँस ली,
और सूनी ज़मीन पर
हरी पत्तियाँ
फिर से लौट आईं।
जब खेत में
पहली सब्ज़ी तैयार हुई,
काव्या की आँखों में
बरसों बाद उम्मीद चमकी।
उसने मिट्टी से सनी उस ताज़ी सब्ज़ी की
एक तस्वीर खींची
और शहर में बसे
अपने पुराने दोस्तों को भेज दी।
साथ लिखा—
“ताज़ी सब्ज़ी,
सीधे खेत से आपकी रसोई तक।”
कुछ ही देर में
पहला ऑर्डर आ गया।
मोहन पुरानी साइकिल निकालकर
डलिया बाँधता है
और मुस्कुराते हुए
सब्ज़ी पहुँचाने निकल पड़ता है।
आँगन में खड़ी सास
सब कुछ देख रही थी।
आज पहली बार
उसके हाथ अपने आप उठे
और बहू के सिर पर टिक गए।
आवाज़ में अपनापन था—
“तू तो सच में
हमारे घर की लक्ष्मी निकली रे।”
वक्त का पलटाव...
जिस साहूकार ने कभी
घर छीन लेने की धमकी दी थी,
आज वही सिर झुकाए
सब्ज़ी खरीदने आया था।
काव्या ने चुपचाप
उसके हाथ में पैसे रखे—
मूलधन,
पूरा ब्याज,
एक भी पैसा कम नहीं।
साहूकार कुछ कह न सका।
नज़रें झुकाकर
खामोशी से लौट गया।
समय बदला।
कुछ ही वर्षों में
कच्चा घर
पक्के मकान में बदल गया।
सूखी ज़मीन
लहलहाते खेतों में बदल गई।
और वही पिंकी,
जो कभी ताने मारती थी,
आज गर्व से
काव्या को
“भाभी” कहकर बुलाती है।
शाम ढल चुकी थी।
सूरज की आख़िरी किरणें
हरे-भरे खेतों पर
सोने-सी चमक बिखेर रही थीं।
पूरा परिवार
खेत के बीच खड़ा था—
थका हुआ,
लेकिन संतुष्ट।
मोहन ने काव्या की ओर देखा,
उसकी आँखों में
गर्व और अपनापन था।
वह धीमे से बोला—
“तुमने मुझे
सिर्फ़ रोज़ी नहीं दी,
तुमने मुझे
फिर से इज़्ज़त जीना सिखाया है।”
काव्या ने झुककर
मुट्ठी भर मिट्टी उठाई,
उसे माथे से लगाया
और मुस्कुराकर बोली—
“ये मिट्टी
मुझे रानी नहीं बनाती,
ये मुझे
एक बेहतर इंसान बनाती है।”
दूर तक फैली
हरी फसल
हवा के संग लहराई—
मानो ख़ुद ज़िंदगी
मुस्कुरा कर कह रही हो—
“जो हार नहीं मानता,
उसके लिए
बंजर ज़मीन भी
एक दिन सोना उगलती है।”

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