तुलना से समझ तक
शाम का समय था।
घर में हल्की-हल्की रौनक थी।
रसोई में चाय की खुशबू फैल रही थी और टीवी पर कोई सीरियल चल रहा था।
अचानक छोटी बहू कविता के कमरे से तेज़ आवाज़ सुनाई दी।
आवाज़ में गुस्सा भी था और दर्द भी।
सासु माँ चौंक गईं।
“अरे! ये क्या हो गया?”
वे जल्दी-जल्दी कविता के कमरे की ओर बढ़ीं।
उनके पीछे-पीछे बड़ा बेटा रमेश और उसकी पत्नी रीमा भी आ गए।
सबके मन में एक ही सवाल था—
इतनी शांति से रहने वाली कविता आज इतना ऊँचा क्यों बोल रही है?
अभी तो कविता को इस घर में आए तीन महीने ही हुए थे।
कविता एक पढ़ी-लिखी, समझदार और आत्मसम्मान वाली लड़की थी।
घर के हर सदस्य से प्यार और आदर से बात करती थी।
घर के काम भी मन लगाकर करती और किसी से कोई शिकायत नहीं करती।
जब सब कमरे में पहुँचे, तो देखा—
कविता अपने पति अमित से कह रही थी—
“मैं क्यों हर बार रीमा भाभी जैसी बनूं?
मैं कविता हूँ, और मुझे कविता ही रहने दो।”
सासु माँ ने प्यार से पूछा—
“क्या हुआ बेटा?
इतना परेशान क्यों हो?”
कविता ने थोड़ी देर चुप रहकर गहरी साँस ली और बोली—
“माँ जी,
मैं किसी से शिकायत नहीं करना चाहती थी।
लेकिन हर बात की एक हद होती है।”
उसकी आँखों में नमी थी।
“अमित हर छोटी बात में कहते हैं—
‘रीमा भाभी ऐसा करती हैं’,
‘भाभी ऐसे उठती हैं’,
‘भाभी तो कभी जवाब नहीं देतीं’।
अब आप ही बताइए,
क्या मैं रीमा भाभी बन सकती हूँ?”
फिर उसने रीमा की ओर देखकर कहा—
“भाभी,
क्या आप कविता बन सकती हो?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कविता आगे बोली—
“हर इंसान अलग होता है।
हर किसी का स्वभाव, सोच और तरीके अलग होते हैं।
जो गुण भाभी में हैं, जरूरी नहीं वो मुझमें भी हों।
और जो मुझमें हैं, जरूरी नहीं वो भाभी में हों।
तुलना करके किसी को अच्छा नहीं बनाया जा सकता,
बस उसका मन तोड़ा जा सकता है।”
रीमा आगे आई और कविता का हाथ पकड़कर बोली—
“तुम बिल्कुल सही कह रही हो कविता।
मैं जो हूँ, अपने तरीके से हूँ।
और तुम अपने तरीके से सही हो।”
बड़े भाई रमेश ने भी कहा—
“अमित,
तुम्हारी यही गलती है।
पत्नी को उदाहरण देकर नहीं,
समझ और प्यार देकर संभाला जाता है।”
सासु माँ ने सख़्त लेकिन प्यार भरे स्वर में कहा—
“बेटा,
दोनों बहुएँ हमारी बेटियों जैसी हैं।
एक की तारीफ करने के लिए
दूसरी को छोटा करना गलत है।”
अमित को अपनी गलती का एहसास हो गया।
उसने कविता से कहा—
“मुझे माफ कर दो।
मैं समझ नहीं पाया कि मेरी बातें तुम्हें इतना दुख पहुँचा रही थीं।”
कविता का मन हल्का हो गया।
आँखों में आँसू थे,
लेकिन चेहरे पर सुकून।
उस रात कविता देर तक सोचती रही—
अगर आज मैंने चुप्पी नहीं तोड़ी होती,
तो शायद मैं कब तक खुद को किसी और से तुलना होते देखती रहती।
उसने मन ही मन तय किया—
सम्मान माँगना नहीं पड़ता,
उसे सही समय पर जताना पड़ता है।
उस दिन के बाद
घर में न तुलना रही,
न शिकायत।
बस
समझ,
इज़्ज़त
और रिश्तों में सच्ची मिठास।

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