माँ का साया

Elderly Indian mother-in-law cooking alone in kitchen while daughters-in-law avoid household work, emotional family responsibility scene


सुबह का समय था।

घर के आँगन में धूप फैल रही थी।


घर की मालकिन सरिता देवी रसोई में खड़ी थीं।

एक हाथ में कढ़छी, दूसरे हाथ में परात।

पसीने से उनका माथा भीग चुका था।


“अरे रेखा बहू… सीमा बहू…

कहाँ हो तुम दोनों?

दस बज गए हैं, अभी तक नाश्ता भी नहीं बना।”


सरिता देवी आवाज़ लगाती रहीं।


थोड़ी देर बाद वह बड़ी बहू रेखा के कमरे में गईं।

रेखा रजाई ओढ़े मोबाइल चला रही थी।


“रेखा बहू, मैं कब से आवाज़ दे रही हूँ।

जा, थोड़ा नाश्ता बना दे।

तेरे ससुर और तेरे पति ऑफिस जाने वाले हैं।”


रेखा ने करवट बदली।


“माँजी, आज कमर में बहुत दर्द है।

उठा ही नहीं जा रहा।

आप सीमा से कह दीजिए ना।”


“अच्छा… तू आराम कर।”

सरिता देवी चुपचाप बाहर आ गईं।


रेखा मन ही मन मुस्कुरा दी—

“चलो, आज भी काम बच गया।”


अब सरिता देवी छोटी बहू सीमा के कमरे में पहुँचीं।

सीमा आईने के सामने बैठकर मेकअप कर रही थी।


“सीमा बहू, आज तू ही नाश्ता बना दे।

रेखा की तबीयत ठीक नहीं है।”


सीमा ने माथा पकड़ लिया।


“माँजी, मेरे सिर में बहुत तेज़ दर्द है।

चक्कर आ रहे हैं।

आज मुझसे कुछ नहीं होगा।”


सरिता देवी ने गहरी साँस ली।

“कोई बात नहीं… मैं ही बना लेती हूँ।”




रोज़ का यही हाल...


पिछले पंद्रह दिनों से

यही रोज़ चल रहा था।


दोनों बहुएँ

सुबह उठते ही

या तो दर्द का बहाना बनातीं

या बाहर जाने की तैयारी।


घर का सारा काम

सरिता देवी ही करती थीं।


खाना बनाना

बर्तन धोना

सफाई

यहाँ तक कि कपड़े भी।


उनके पति मोहनलाल कई बार समझाते—


“इतना काम मत किया करो।

बहुओं को ज़िम्मेदारी सिखाओ।”


पर सरिता देवी बस यही कहतीं—


“धीरे-धीरे सीख जाएँगी।

नई हैं…।”




बीमारी का दिन...


एक दिन सरिता देवी को

तेज़ बुखार आ गया।


पूरा शरीर टूट रहा था।

फिर भी वे रसोई में जा पहुँचीं।


सीमा बोली—

“माँजी, हम दोनों मायके जा रहे हैं।

कल लौट आएँगे।”


मोहनलाल बोले—

“आज मत जाओ, माँ की तबीयत ठीक नहीं है।”


रेखा बोली—

“एक रात की ही तो बात है पिताजी।”


और दोनों बहुएँ चली गईं।


सरिता देवी बुखार में भी

खुद खाना बनाती रहीं।



अगला दिन...


सुबह उनकी हालत और बिगड़ गई।

बुखार, चक्कर, कमजोरी।


बहुएँ लौट तो आईं

पर अपने-अपने कमरों में सो गईं।


सरिता देवी उठकर पानी लेने गईं।

रसोई के फर्श पर तेल गिरा था।


पैर फिसला…

और वे ज़मीन पर गिर पड़ीं।


काफी देर तक

वहीं पड़ी रहीं।


शाम को जब बहुएँ बाहर आईं

तो उन्हें बेहोश देख डर गईं।


किसी तरह उठाकर

बिस्तर पर लिटाया।



शाम को बेटे और पति लौटे।


“माँ कैसी हैं?”

बेटों ने पूछा।


सरिता देवी ने धीमी आवाज़ में कहा—


“बहुएँ बहुत ध्यान रख रही थीं।

सारा दिन मेरे पास ही थीं।”


रेखा और सीमा

एक-दूसरे को देखने लगीं।


रात में वे रोते हुए

सरिता देवी के पास आईं।


“माँजी…

हमने आपका ध्यान नहीं रखा।

फिर भी आपने झूठ क्यों कहा?”


सरिता देवी ने उनका सिर सहलाया।


“अगर सच कह देती

तो तुम्हारे घर टूट जाते।

माँ कभी अपनी बेटियों को गिरते नहीं देखती।”



बदलाव...


रेखा और सीमा की आँखें खुल गईं।


दोनों ने पैर पकड़ लिए।


“माँजी, हमें माफ कर दीजिए।

आज से हम कभी काम से नहीं भागेंगे।”


उस दिन के बाद

घर का माहौल बदल गया।


रेखा रसोई संभालने लगी।

सीमा सफाई और देखभाल।


सरिता देवी को

अब आराम मिलने लगा।


घर में

फिर से हँसी लौट आई।



सीख:


👉 माँ का दिल

सबसे बड़ा होता है।

पर उसकी चुप्पी को

कमज़ोरी समझना

सबसे बड़ी गलती है।




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