हमें दहेज नहीं, बेटी चाहिए

An emotional moment in an Indian family home where wedding invitation cards lie scattered as a father and future father-in-law share a heartfelt conversation.


शाम ढल रही थी।

आँगन में पड़ी कुर्सियों पर शादी के कार्ड बिखरे थे।

कुछ कार्डों के कोने मुड़ गए थे —

जैसे घर की हालत खुद उन पर छप गई हो।


हर बार कार्ड उठाते हुए

विनोद जी का हाथ थोड़ा काँप जाता था।


“इतना सब कैसे होगा…”

यह सवाल वो किसी से नहीं,

खुद से पूछते थे।


उसी वक्त दरवाज़े पर दस्तक हुई।


विनोद जी ने दरवाज़ा खोला —

सामने रमेश जी खड़े थे।


एक पल के लिए

विनोद जी का कलेजा बैठ गया।


“अरे… समधी जी?”

हाथ अपने-आप जुड़ गए।


चेहरे पर मुस्कान थी,

लेकिन आँखों में डर साफ़ था।

माथे पर पसीने की धार

बिना मौसम उतर आई।


“क्यों विनोद जी,”

रमेश जी हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले,

“क्या समधी यूँ ही अपने समधी से मिलने नहीं आ सकता?

या फिर लड़के वाले हैं, इसलिए डर कुछ ज़्यादा ही लग रहा है?”


विनोद जी हँसने की कोशिश करते रहे,

पर हँसी टूटकर ज़मीन पर गिर गई।


अंदर से सुधा जी आ गईं।

समधी जी को देखते ही

उनके सीने में भी धुकधुकी बढ़ गई।


“आइए… आइए,”

कहते हुए आवाज़ थोड़ा काँप गई।


रमेश जी के बैठते ही

घर की हवा बदल गई।

शादी की बातें जैसे

कोने में दुबक गईं।


सुधा जी बेटी निधि के कमरे में गईं।


“बेटा,”

धीमे से बोलीं,

“तेरे ससुर आए हैं…

ज़रा ठीक से आ जा।”


निधि बिस्तर पर बैठी थी।

आँखें लाल थीं।

तकिए का एक कोना

अब भी गीला था।


वो बिना कुछ बोले उठी।

आईने में खुद को देखा —

और नज़र झुका ली।


रसोई में सुधा जी चाय चढ़ाने लगीं।

हाथ काँप रहे थे।

उबलता दूध बाहर गिर गया,

पर उन्हें दिखा तक नहीं।


बैठक में रमेश जी ने

शांत आवाज़ में पूछा,


“शादी की तैयारी कैसी चल रही है?”


“जी… सब ठीक है,”

विनोद जी ने जल्दी से कहा,

जैसे देर हुई तो सच बाहर आ जाएगा।


रमेश जी कुछ पल चुप रहे।

फिर बोले,


“विनोद जी,

मैं आज तैयारी पूछने नहीं आया।”


यह सुनते ही

विनोद जी की साँस रुक गई।


“आपकी निधि मेरे लिए बहू नहीं, बेटी जैसी है,”

रमेश जी ने भारी आवाज़ में कहा।

“कल उसने मेरे बेटे से कहा —

‘अगर मेरी शादी की कीमत

मेरे पिता की पूरी ज़िंदगी का कर्ज़ है,

तो मैं ऐसी शादी नहीं चाहती।

मैं अपने पापा को टूटते हुए नहीं देख सकती।’”


विनोद जी की आँखें भर आईं।

सुधा जी ने आँचल से मुँह ढक लिया।


“उसने कहा,”

रमेश जी की आवाज़ भारी हो गई,

“अगर मेरी शादी से

मेरे पिता टूट जाएँ,

तो ऐसी शादी मुझे मंज़ूर नहीं।”


कमरे में सिर्फ़

घड़ी की टिक-टिक बची थी।


“समधी जी,”

रमेश जी अचानक हाथ जोड़कर खड़े हो गए,

“मैं आपसे भीख माँगने आया हूँ।”


विनोद जी घबरा गए।


“नहीं-नहीं… आप ऐसा मत कहिए।”


“हमारी तरफ़ से एक विनती है,”

रमेश जी की आँखें नम थीं,

“हमें आपकी बेटी चाहिए —

कर्ज़ में डूबी विदाई नहीं।”


“हम दहेज से घर नहीं भरते,”

उन्होंने कहा,

“घर तो

बेटी की हँसी से भरता है।”


अब विनोद जी खुद को रोक न सके।

उन्होंने आगे बढ़कर

रमेश जी के हाथ थाम लिए।


“समधी जी,”

आवाज़ भर्रा गई,

“आपने आज

मेरे कंधों से

ज़िंदगी का सबसे भारी बोझ उतार दिया।”


उसी वक्त

दरवाज़े के पास खड़ी निधि

फूट-फूटकर रो पड़ी।


वो दौड़कर आई

और रमेश जी के पैरों में गिर गई।


“पापा…”

शब्द खुद ही निकल गया।


रमेश जी ने उसे उठाया,

सीने से लगाया।


“बेटा,”

भराई हुई आवाज़ में बोले,

“अब डर मत रखना।

हम तुम्हें

घर की बहू नहीं,

घर की रौनक बनाकर ले जाएँगे।”


निधि की सिसकियाँ

धीरे-धीरे थम गईं।


उस शाम

पहली बार

शादी की तारीख

किसी बोझ जैसी नहीं लगी।


विनोद जी ने

आँगन में पड़े कार्ड उठाए।


इस बार

उनके हाथ नहीं काँपे।





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