सब्ज़ी की दुकान और संस्कार
सुबह का समय था।
बाज़ार में हलचल शुरू हो चुकी थी।
कहीं तराज़ू खनक रहा था,
कहीं हरी सब्ज़ियों पर पानी के छींटे पड़ रहे थे।
तभी एक चमचमाती बड़ी गाड़ी आकर सब्ज़ी मंडी के किनारे रुकी।
गाड़ी में बैठी एक महिला मोबाइल पर व्यस्त थीं।
उन्होंने बिना बाहर देखे अपनी बेटी से कहा—
“जा, उस सब्ज़ी वाली से पूछ आ, सब्ज़ी कितने की है।”
बच्ची कार से उतरी।
आवाज़ में न शिष्टता थी, न नम्रता।
“ए बुढ़िया! ये सब्ज़ी कितने की है?”
सब्ज़ी बेच रही महिला ने कोई बुरा शब्द नहीं कहा।
सिर्फ हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“चालीस रुपये किलो है, बेटा।”
सब्ज़ी तौल दी गई।
बच्ची ने सौ रुपये का नोट हवा में उछालते हुए दिया
और बिना पीछे देखे गाड़ी में जाकर बैठ गई।
गाड़ी आगे बढ़ ही रही थी कि
किसी ने शीशे पर हल्की-सी दस्तक दी।
बाहर एक छोटी-सी लड़की खड़ी थी।
उसके हाथ में साठ रुपये थे।
बड़ी सभ्यता से बोली—
“आंटी जी, ये आपके पैसे वापस हैं।
आपकी बेटी गलती से ले जाना भूल गई।”
महिला ने चौंककर कहा—
“अरे नहीं बेटी, तुम ही रख लो, तुम तो छोटी हो।”
लड़की ने तुरंत सिर हिलाया—
“नहीं आंटी जी, जितने पैसे बनते थे, उतने हमने ले लिए।
हम किसी का हक़ नहीं रख सकते।”
फिर उसने हाथ जोड़कर कहा—
“धन्यवाद, आप हमारी दुकान पर आईं।
आशा है सब्ज़ी अच्छी लगेगी,
और आप फिर से आएँगी।”
यह कहकर वह अपनी दुकान की ओर लौट गई।
कार में बैठी महिला का मन अजीब-सा हो गया।
दिल भारी हो गया।
उन्होंने गाड़ी रुकवाई और खुद उतरकर
सब्ज़ी की दुकान की ओर चल पड़ीं।
वहाँ उन्होंने देखा—
सब्ज़ी वाली अपनी बेटी से पूछ रही थी—
“बेटा, तुमने तमीज़ से बात की ना?
किसी को बुरा तो नहीं लगा?”
लड़की बोली—
“हाँ माँ, आपने जो सिखाया है, वही किया।
बड़ों से हमेशा आदर से बात करनी चाहिए।
किसी को छोटा समझना गलत है।
यही आपने मुझे सिखाया है।”
फिर वह बोली—
“माँ, अब मैं स्कूल जा रही हूँ।
शाम को छुट्टी के बाद दुकान पर आ जाऊँगी।”
यह सब सुनकर
कार वाली महिला की आँखें झुक गईं।
उन्हें एहसास हुआ—
जहाँ साधन कम थे,
वहीं संस्कार बहुत बड़े थे।
वह सोचने लगी—
मैं अपनी बेटी को क्या सिखा रही हूँ?
रुतबा, गाड़ी, पैसा…
या इंसानियत?
सीख:
दोस्तों,
बच्चों को सिर्फ पढ़ाना ही काफी नहीं,
उन्हें इंसान बनाना ज़रूरी है।
बोलचाल में मिठास,
बड़ों का सम्मान,
हर इंसान की कद्र—
यही वो शिक्षा है
जो आने वाले समय में
सबसे ज़्यादा काम आएगी।
क्योंकि
जो इंसान ज़मीन से जुड़ा रहता है,
वही सच में ऊँचा उड़ पाता है।

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