बदली हुई आदत
सुबह का समय था।
आँगन में हल्की धूप उतर रही थी।
पीपल के पेड़ के नीचे से ठंडी हवा आ रही थी,
लेकिन घर के भीतर माहौल भारी था।
सरोजा देवी चूल्हे के पास बैठी सब्ज़ी काट रही थीं।
बार-बार उनकी नज़र सामने वाले कमरे की ओर जा रही थी।
उनकी बहू किरण अभी तक सोकर नहीं उठी थी।
“आजकल की बहुएँ…”
सरोजा देवी मन ही मन बड़बड़ाईं,
“न समय की परवाह, न घर की।”
किरण की शादी को अभी डेढ़ साल ही हुआ था।
वह पढ़ी-लिखी थी,
लेकिन लापरवाही उसकी सबसे बड़ी आदत थी।
कमरा बिखरा हुआ,
बिस्तर पर कपड़े,
फर्श पर चिप्स के पैकेट,
और कोने में पड़े जूठे बर्तन।
सरोजा देवी रोज़ कुछ न कुछ कहतीं,
लेकिन किरण हर बात को मज़ाक में टाल देती।
पहला झगड़ा...
दोपहर को किरण उठी।
“माँ जी, चाय बना दूँ?”
किरण ने ऊँघते हुए पूछा।
“पहले हाथ-मुँह तो धो ले बहू।”
सरोजा देवी बोलीं।
“अरे माँ जी, हाथ तो साफ़ हैं।”
किरण ने बिना धोए ही चाय बना दी।
जब ससुर रघुनाथ जी ने चाय पी,
तो कप के अंदर चाय की परत जमी हुई थी।
“ये क्या है?”
उन्होंने कप दिखाते हुए कहा।
किरण झुंझला गई—
“पुराना कप ही तो है, रोज़ नया कहाँ से लाएँ?”
सरोजा देवी चुप रहीं,
लेकिन दिल बहुत दुखा।
पड़ोसियों का आना...
एक दिन पड़ोस की दो महिलाएँ—
शांति और कमला—
सरोजा देवी के घर आईं।
उन्हें देखते ही सरोजा देवी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उन्होंने प्यार से कहा—
“आज तो आप लोग आई हैं,
चलो कुछ अच्छा बना लेते हैं।
गरम-गरम पकौड़े बनवाती हूँ।”
किरण रसोई में गई।
उसके बाल खुले हुए थे,
कपड़े मैले-से लग रहे थे,
और हाथों में झाड़ू के पुराने रेशे चिपके थे।
बिना ध्यान दिए
वह पकौड़े तलने लगी।
थोड़ी देर बाद
जब पकौड़े परोसे गए,
तो कमला की प्लेट में
एक बाल साफ़ दिखाई दे गया।
“हे भगवान!”
कमला घबरा कर बोली।
शांति ने भी
चुपचाप अपनी प्लेट रख दी।
“अब हमारा मन नहीं है,
फिर कभी आएँगे।”
कहकर दोनों उठ खड़ी हुईं।
यह सब देखकर
सरोजा देवी की आँखों में आँसू आ गए।
पति की नाराज़गी...
शाम को किरण का पति मोहन घर लौटा।
दिनभर की थकान उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।
जैसे ही उसने थाली से सब्ज़ी उठाई,
नाक सिकुड़ गई।
“किरण, आज सब्ज़ी से अजीब-सी बदबू क्यों आ रही है?”
उसने शांत स्वर में पूछा।
किरण को उसकी बात बुरी लग गई।
वह झुंझलाकर बोली—
“हर बात में कमी ही निकालनी होती है क्या?
इतने नखरे मत किया करो।”
मोहन कुछ कहता,
लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।
वह चुपचाप थाली सरका कर उठ खड़ा हुआ।
उस रात उसने खाना नहीं खाया।
घर में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई।
जो बात कभी मुस्कान से सुलझ जाती थी,
वह अब चुप्पियों में बदलने लगी।
धीरे-धीरे
दोनों के बीच की नज़दीकियाँ
दूरी में बदलने लगीं।
बड़ी गलती...
एक रात अचानक रघुनाथ जी और सरोजा देवी की तबीयत बिगड़ गई।
पेट में तेज़ मरोड़ उठने लगे।
बार-बार उल्टियाँ होने लगीं।
चक्कर और भारी कमजोरी से
दोनों ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।
यह देखकर मोहन घबरा गया।
बिना देर किए उसने
दोनों को तुरंत अस्पताल पहुँचाया।
डॉक्टर ने जाँच करने के बाद गंभीर स्वर में कहा—
“यह फूड पॉइज़निंग का मामला है।
लगता है खाना साफ़-सफाई का ध्यान रखे बिना बनाया गया है।”
डॉक्टर की ये बातें सुनते ही
किरण का सिर शर्म से झुक गया।
उसे अपनी लापरवाही का
पहली बार गहरा अहसास हुआ।
पछतावे का पल...
अस्पताल के बाहर की बेंच पर
किरण अकेली बैठी थी।
आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
उसका दिल बार-बार खुद को कोस रहा था।
“मैंने ही सबको दुख दिया…
मेरी वजह से यह घर, घर जैसा नहीं रहा…”
आज उसे माँ की हर सीख याद आ रही थी,
सास के बार-बार समझाने के शब्द कानों में गूँज रहे थे,
और पति की वह खामोशी
जो बहुत कुछ कहकर भी कुछ नहीं कहती थी।
अब उसे साफ़ दिखने लगा था—
जो कुछ भी हुआ,
वह किसी और की नहीं,
उसकी अपनी लापरवाही का ही नतीजा था।
अगले दिन की सुबह
किरण ने चुपचाप एक नया निर्णय लिया।
उसने सबसे पहले
पूरा घर अच्छी तरह साफ़ किया।
कमरा चमक उठा,
रसोई में ताज़गी और सुकून की महक फैल गई।
अब वह रोज़ समय पर नहाने लगी,
साफ़ और सलीके वाले कपड़े पहनने लगी।
खाना भी पहले से कहीं ज़्यादा
ध्यान और प्यार से बनाने लगी।
दोपहर के भोजन के समय
सरोजा देवी ने पहली बार
मन से मुस्कराते हुए कहा—
“आज की रोटी में अलग ही स्वाद है, बहू।”
यह सुनकर
मोहन की आँखों में
संतोष और सुकून उतर आया।
घर में फिर से
अपनापन लौट आया था।
अब किरण
सिर्फ नाम की नहीं,
वाकई घर की किरण बन गई थी।
वह समझ गई थी—
> सफाई सिर्फ आदत नहीं,
सम्मान और प्यार की नींव होती है।
सीख:
**“लापरवाही भले ही छोटी लगे,
लेकिन उसके परिणाम अक्सर बहुत बड़े होते हैं।
और यदि बदलाव देर से भी आए,
तो भी जब आता है—
ज़िंदगी को सही दिशा दे ही देता है।”**

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