छाया में खड़ा आदमी
समय धीरे नहीं चलता—
वह बिना आवाज़ किए सब कुछ बदल देता है।
कभी जिन लोगों के लिए जीवन रोका गया होता है,
एक दिन वही लोग आगे निकल जाते हैं
और पीछे रह जाता है—
बस एक साया।
राजकोट के सरकारी अस्पताल की पुरानी इमारत में उस साल बहुत भीड़ थी।
बरसात का मौसम था और सांस की बीमारियाँ बढ़ गई थीं।
पुरुष वार्ड के आख़िरी कोने में
एक पतला-सा आदमी बिस्तर पर पड़ा था—
नाम था हरिहर।
छाती अंदर धँसी हुई,
साँस लेते समय सीटी-सी आवाज़,
और आँखों में गहरी थकान।
पास ही फर्श पर
उसका अठारह साल का बेटा मोहन बैठा था—
हाथ में पुरानी थैली,
जिसमें कपड़े कम और चिंता ज़्यादा थी।
हरिहर ने बड़ी मुश्किल से पूछा—
“मोहन… खाना खाया?”
मोहन तुरंत बोला—
“हाँ बापू। सामने धर्मशाला में दो रुपए में थाली मिल जाती है।
सुबह-शाम एक साथ खा लेता हूँ।
आप बस दवा लेते रहो।”
हरिहर ने आँखें मूँद लीं।
कुछ पल बाद धीमे से बोले—
“मुझे अपनी बेटी रमा की चिंता होती है…
और छोटा अर्जुन…
दोनों गाँव में अकेले हैं।”
मोहन ने सिर हिलाया—
“चाची रोज़ हाल-चाल देख लेती हैं,
आप फ़िक्र मत कीजिए बापू।
रमा समझदार है, घर के काम सँभाल लेती है,
और अर्जुन भी अब छोटा बच्चा नहीं रहा।
आप बस जल्दी ठीक हो जाइए,
फिर सब अपने-अपने घर में साथ होंगे।”
हरिहर कुछ नहीं बोले।
बस इतना कहा—
“अगर मैं न बचा…
तो…”
इतना कहते-कहते खाँसी का दौरा पड़ा।
खून तकिया भिगो गया।
उसी रात डॉक्टर ने मोहन को अलग ले जाकर कहा—
“अब समय कम है।”
हरिहर ने जैसे सब सुन लिया हो।
रात के सन्नाटे में
उन्होंने मोहन का हाथ थाम लिया—
“तेरी माँ के जाने के बाद
मैंने तुम तीनों को
माँ-बाप बनकर पाला।
अब मेरी बारी पूरी हो गई है।
रमा और अर्जुन…
तेरी ज़िम्मेदारी हैं।”
मोहन रो पड़ा—
“मैं वचन देता हूँ बापू।
जब तक जिंदा हूँ,
उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
हरिहर ने हल्की मुस्कान दी।
सुबह होने से पहले
उनकी साँस थम गई।
हरिहर नगर पालिका में सफ़ाई निरीक्षक थे।
ईमानदार, समय के पाबंद,
कभी रिश्वत नहीं ली।
नगर पालिका ने तय किया—
“बड़ा बेटा है,
इंटर पास है,
इसे नौकरी दे दी जाए।”
मोहन की उम्र अठारह साल थी।
वह दफ़्तर में क्लर्क बन गया।
रमा बारहवीं में थी।
अर्जुन नौवीं में।
मोहन रोज़ सुबह चार बजे उठता,
खाना बनाता,
सबको खिला कर
साइकिल से दफ़्तर जाता।
अर्जुन ने एक दिन कहा—
“भैया, मैं पढ़ाई छोड़ दूँ?”
मोहन ने डाँट दिया—
“नहीं।
तू पढ़ेगा।
मेरी वजह से
तेरा भविष्य नहीं रुकेगा।”
रमा घर संभालती,
सिलाई सीखती,
और शाम को सबके लिए चाय बनाती।
समय बीतता गया।
मोहन की सेहत कमज़ोर थी—
वही छाती,
वही पतलापन।
रमा सुंदर थी—
माँ जैसी।
अर्जुन तेज़ दिमाग़ का।
मोहन के लिए रिश्ते आए।
पर वह हर बार कहता—
“पहले बहन की शादी,
फिर भाई को खड़ा कर लूँ।”
रमा का रिश्ता पास के गांव में तय हुआ।
मोहन ने सारी बचत लगा दी।
अर्जुन ने बीएससी कर ली।
एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी लग गई।
दोनों अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए।
मोहन वहीं रह गया—
वही साइकिल,
वही छोटा कमरा,
वही सादा जीवन।
शादी का एक रिश्ता आया भी,
तो लड़की वालों ने कहा—
“कमज़ोर लगता है…
पिता भी टीबी से मरे थे।”
मोहन चुप रहा।
उसे अब आदत हो गई थी।
रिटायरमेंट के बाद
वह अर्जुन के पास चला गया।
अर्जुन खुश था,
लेकिन उसकी पत्नी नहीं।
एक दिन उसने ऊँची आवाज़ में कहा—
“घर में बोझ बढ़ गया है।
दिनभर खाँसते रहते हैं।”
मोहन ने सब सुन लिया।
रात को
चुपचाप अपना बैग उठाया
और चला गया।
अर्जुन रोता रहा,
पर मोहन नहीं रुका।
अंतिम साल
मोहन ने एक किराए के कमरे में बिताए।
बीमारी बढ़ती गई।
पर किसी को बताया नहीं।
साल २०१८ की ठंड में
पड़ोसियों को
कमरे से बदबू आई।
दरवाज़ा तोड़ा गया।
मोहन कुर्सी पर बैठा था—
जैसे बस आराम कर रहा हो।
आँखें खुली थीं।
चेहरे पर कोई शिकायत नहीं।
बस वही पुराना साया—
जो जीवन भर
दूसरों को धूप में रखता रहा
और खुद छाया में खड़ा रहा।
कहानी का भाव:
कुछ लोग
इतिहास नहीं बनाते,
पर इतिहास को
संभाल कर रखते हैं।
वे शोर नहीं करते,
माँग नहीं रखते,
बस निभाते चले जाते हैं—
आख़िरी साँस तक।

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