पल्लू, पसीना और पहचान

Beautiful Indian woman standing in a traditional kitchen, wearing a sari, expressing strength and emotion


सुबह के पाँच बजे थे।

घर की रसोई में हल्की-हल्की खटर-पटर की आवाज़ आ रही थी।

सविता चुपचाप उठ चुकी थी।


सिर पर पल्लू, हाथ में झाड़ू और आँखों में अधूरी नींद —

फिर भी काम रुका नहीं।

क्योंकि इस घर में

औरत की थकान नहीं,

सिर्फ़ ज़िम्मेदारी देखी जाती थी।


“बहू, पल्लू ठीक से ओढ़ा है ना?”

पीछे से सासू माँ की आवाज़ आई।


“हाँ माँ जी…”

सविता ने बिना मुड़े, धीमे स्वर में जवाब दिया।


यह उसका ससुराल था —

जहाँ औरत की पहचान

उसके मन से नहीं,

उसके पल्लू से तय होती थी।



सविता को इस घर में आए अभी सिर्फ़ दो महीने ही हुए थे।


मायके में रहते हुए उसने हमेशा अपनी सुविधा और पसंद के कपड़े पहने थे —

कभी सूट, कभी सलवार और कभी-कभी जींस भी।


लेकिन ससुराल की देहरी लाँघते ही उसे साफ़ शब्दों में समझा दिया गया था —


“इस घर की बहुएँ साड़ी में ही अच्छी लगती हैं।”


सविता ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने विरोध नहीं किया, सवाल नहीं पूछा।


क्योंकि यहाँ

चुप रहना ही समझदारी माना जाता था,

और चुप रहना ही संस्कार कहलाता था।




एक दिन की बात...


ज़रूर। नीचे उसी दृश्य को और साफ़, भावनात्मक और बहाव के साथ ठीक से लिखा गया है — भाषा सरल रखी गई है, लेकिन असर गहरा होगा।



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उस दिन गर्मी कुछ ज़्यादा ही थी।

रसोई में गैस लगातार जल रही थी।

चारों तरफ़ भाप और गर्म हवा भरी हुई थी।


सविता का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था।

पसीने की बूँदें आँखों में जा रही थीं,

और जलन बढ़ती जा रही थी।


काम करते-करते उसने बस दो पल के लिए

सिर से पल्लू हटा लिया,

ताकि आँखें पोंछ सके और थोड़ा सुकून ले सके।


तभी पीछे से ननद की चहकती हुई आवाज़ आई—


“अरे भाभी!

ये क्या कर रही हो?

ऐसे नंगे सिर?”


फिर हल्की हँसी के साथ बोली—

“पापा जी देख लेते तो आफ़त आ जाती।”


सविता एकदम घबरा गई।

उसने बिना कुछ कहे

जल्दी से पल्लू दोबारा सिर पर रख लिया।


दिल के अंदर कुछ टूट-सा गया।

जैसे किसी ने बिना बोले ही

उसे उसकी जगह याद दिला दी हो।


पर सविता ने कुछ कहा नहीं।

वह चुपचाप फिर से काम में लग गई,

क्योंकि इस घर में

चुप रहना ही सबसे बड़ा संस्कार माना जाता था।



दूसरी ओर, बाहर की दुनिया...


उसी घर का बेटा — रवि।

एक प्राइवेट ऑफिस में नौकरी करता था।


ऑफिस में उसकी एक कलीग थी — राधा।

अक्सर सूट पहनती, खुले बाल रखती

और चेहरे पर आत्मविश्वास साफ़ झलकता था।


लंच के समय एक दिन

रवि अपने दोस्तों के साथ बैठा था।


किसी ने हँसते हुए कहा —

“यार, आजकल की औरतें भी ना…

ज़्यादा ही आज़ादी मिलने लगी है।”


सब हँस पड़े।

रवि भी उसी हँसी में शामिल हो गया।


उस पल

उसे यह याद ही नहीं आया

कि उसके अपने घर में

उसकी पत्नी किस हाल में रहती है,

क्या पहनती है

और कितनी चुपचाप

हर बात सह लेती है।




रवि की बहन पायल कॉलेज जाती थी।

शुरुआत में वह भी घर के माहौल से बहुत अलग नहीं थी।


जब सविता ने पहली बार पल्लू हटाया था,

तो पायल ने ही ताना मारा था —

“भाभी, ऐसे नंगे सिर? पापा देख लेते तो आफ़त आ जाती।”


दरअसल पायल डरती थी।

उसे लगता था कि अगर उसने कुछ नहीं कहा,

तो घर वाले उसी पर उंगली उठाएँगे।


पर कॉलेज की दुनिया अलग थी।

वहाँ उसने देखा कि

लड़कियाँ कपड़ों से नहीं,

अपनी सोच से पहचानी जाती हैं।


धीरे-धीरे पायल की समझ बदलने लगी।


अब जब उसने सविता को

रसोई में पसीने से जूझते देखा,

तो उसे अपना ताना याद आ गया।


उस दिन उसने अलग लहजे में कहा —

“भाभी, आप कभी कुर्ता पहनकर देखो।

काम भी आसान होगा और आपको आराम भी मिलेगा।”


ये बात पायल ने ताने में नहीं,

अपने अनुभव और समझ से कही थी।


अब वह ननद नहीं,

एक औरत की तरह

दूसरी औरत का दर्द समझने लगी थी।


सविता पहले झिझक गई।

उसे डर था कि कहीं कोई देख न ले।

पर फिर उसने खुद को समझाया और हिम्मत जुटाई।


दोपहर का वक्त था।

घर में कोई मर्द मौजूद नहीं था।


उसने धीरे से साड़ी उतारी

और कुर्ता पहन लिया।


काम करते समय उसे अजीब सा सुकून महसूस हुआ।

हाथ खुलकर चल रहे थे,

पसीना परेशान नहीं कर रहा था।


पहली बार उसे लगा

कि कपड़े सिर्फ पहनावे नहीं होते,

वे इंसान की सहूलियत भी होते हैं।



पर कहानी यहीं नहीं रुकी...


शाम को अचानक

ससुर, देवर, पति —

सब साथ में घर आ गए।


सविता को कुर्ते में देखकर

घर में सन्नाटा छा गया।


“ये क्या पहन रखा है?”

ससुर गरजे।


“इस घर की बहुएँ ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं।”


रवि चुप था।

नज़र झुकी हुई।



पहली बार आवाज़...


अब सविता से और सहा नहीं गया।

उसकी आँखें भर आईं, पर उसने खुद को संभाला।


वह ससुर की ओर मुड़ी और धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में बोली—


“बाबूजी, मैं कोई बेजान चीज़ नहीं हूँ…

मैं भी इंसान हूँ।


कपड़े अगर मेरे काम को आसान बना देते हैं,

तो इससे मेरे संस्कार छोटे नहीं हो जाते।


संस्कार दिल में होते हैं,

कपड़ों में नहीं।”


कमरे में कुछ पल का सन्नाटा छा गया।


तभी सासू माँ ने पहली बार बहू की ओर देखा,

उसकी आँखों में वही थकान थी

जो कभी उनके अपने चेहरे पर हुआ करती थी।


वह धीरे से बोलीं—


“बहू सही कह रही है…

इस गर्मी में पल्लू सच में भारी हो जाता है।

और औरत की इज्ज़त पल्लू से नहीं,

उसके व्यवहार से पहचानी जाती है।”


उन शब्दों ने

सविता के मन पर रखा

बरसों पुराना बोझ

कुछ हल्का कर दिया।



एक अनोखी शर्त...


देवर हँसते हुए बोला—

“अरे भाभी, इतनी ही परेशानी है तो एक दिन हम लोग ही साड़ी पहन लेते हैं। इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”


सविता की आँखों में एक पल के लिए चमक आई।

उसने उसी बात को थाम लिया और शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोली—


“ठीक है।

तो फिर इस रविवार आप सब साड़ी पहनिए

और पूरे दिन घर का सारा काम संभालकर दिखाइए।”


सविता की बात सुनते ही कमरे में ठहाके गूँज उठे।

घर के सारे मर्द हँसते हुए बोले—


“अरे, इसमें क्या मुश्किल है?

ये तो हमारे लिए बिल्कुल आसान है!”



रविवार की सुबह...


दो घंटे बीत चुके थे।

तीन–तीन क्लिप बालों में लग चुकी थीं।

कमर पर बेल्ट कस दी गई थी।


फिर भी साड़ी किसी तरह संभल ही नहीं रही थी।


कभी पल्लू पैरों में उलझ जाता,

तो कभी चलते-चलते ढीला पड़ जाता।


कोई रसोई में चूल्हे के पास जाने से डर रहा था,

कि कहीं आग में पल्लू न झुलस जाए।


और इतनी मशक्कत के बाद

नाश्ते के नाम पर जो तैयार हुआ —

वह थी जली हुई रोटी

और अधपकी, बेस्वाद चाय।



आख़िरकार समझ...


सासू माँ अब तक सब कुछ चुपचाप देख रही थीं।

आज पहली बार उनकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं, समझ थी।


वे धीमी आवाज़ में बोलीं —

“अब समझ आया… कि साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं, जिम्मेदारी भी होती है?”


रवि का सिर अपने आप झुक गया।

आज पहली बार उसने सविता को पत्नी की तरह नहीं,

एक इंसान की तरह देखा।


उसकी आँखों में अब हुक्म नहीं था,

सम्मान था।


रवि आगे बढ़ा और धीमे स्वर में बोला —

“मुझे माफ़ कर दो, सविता।

मैं तुम्हारी तकलीफ़ कभी समझ ही नहीं पाया।”


सविता की आँखें भर आईं,

पर इस बार वो आँसू दर्द के नहीं,

इज्ज़त मिलने के थे।



अब सविता कभी साड़ी पहनती है,

तो कभी सूट।


पल्लू अब उसकी मजबूरी नहीं,

बल्कि उसकी अपनी पसंद है।


उस घर में अब

औरतों की पहचान

कपड़ों से नहीं,

सम्मान से होती है।




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