पाँच बहुएँ और बदनाम सास

 

A beautiful elderly Indian woman sitting alone indoors, softly crying with a calm and dignified expression, wearing a traditional sari in gentle lighting.


सुबह के साढ़े पाँच बजे थे।


घर में सब सो रहे थे,

लेकिन कामिनी देवी चुपचाप उठ चुकी थीं।


आईने के सामने खड़ी होकर उन्होंने अपने बाल सँवारे,

हल्की-सी क्रीम लगाई और सलवार-कुर्ता पहन लिया।


“इस उम्र में भी खुद को ठीक रखना ज़रूरी है,”

उन्होंने खुद से कहा और दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गईं।


उसी समय ऊपर की खिड़की से

बड़ी बहू शोभा सब देख रही थी।


कामिनी देवी को घर से निकलते देख

उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई,

जिसमें हैरानी कम और ताना ज़्यादा था।


वह बुदबुदाई—

“लो भई… फिर निकल पड़ी।

रोज़ सुबह-सुबह, जैसे कोई बहुत ज़रूरी काम हो।”


उसकी नज़र देर तक

कामिनी देवी की पीठ पर टिकी रही,

और उसके मन में सवाल नहीं,

शक पलने लगा।




कामिनी देवी के घर से निकलते ही

रसोई में बहुएँ जमा हो गईं।


चूल्हे पर चाय उबल रही थी।

दूसरी बहू किरण चम्मच चलाते हुए बोली—


“आज फिर वही कपड़े…

इस उम्र में कौन ऐसे सज-धज कर निकलता है?”


तीसरी बहू पायल ने गर्दन पास लाकर धीमी आवाज़ में कहा—


“कल मोहल्ले की गीता आंटी बता रही थीं,

पार्क में माँजी कुछ मर्दों से हँस-हँस कर बातें करती हैं।”


चौथी बहू नेहा ने ताना मारते हुए कहा—


“बातें नहीं,

खुलकर हँसती हैं।

जैसे कोई शर्म ही न हो।”


इतना सुनते ही

पाँचवीं बहू राधा ने बात में ज़हर घोल दिया—


“और सुना है…

दूध वाला भी अब रोज़ ज़्यादा देर तक रुकने लगा है।”


रसोई में पल भर को सन्नाटा छा गया।

फिर सबकी आँखों में अजीब-सी चमक आ गई।


तभी बड़ी बहू शोभा ने ठंडी आवाज़ में कहा—


“अब तो सब साफ़ समझ में आ रहा है।

हमारी सास सीधे-साधे बनने का नाटक करती हैं,

पर असलियत कुछ और ही है।”


रसोई की हवा में

अब सिर्फ़ शक, ताने

और बदनामी की गंध तैर रही थी।




पार्क में तूफ़ान...


उधर पार्क में कामिनी देवी रोज़ की तरह तेज़ क़दमों से टहल रही थीं।

सुबह की ठंडी हवा चेहरे से टकरा रही थी, पर उनके मन में हलचल थी।


तभी पास की बेंच पर बैठे चार अधेड़ आदमी उन्हें घूरने लगे।

उनकी नज़रें सम्मान से नहीं, बदतमीज़ी से भरी थीं।


एक ने फब्ती कसते हुए कहा—

“अरे वाह देवी जी,

आज तो बड़ी जवान लग रही हो।”


कामिनी देवी के कदम ठिठक गए।

वो रुक गईं।


उनकी आँखों में डर और ग़ुस्सा दोनों थे।

काँपती लेकिन सख़्त आवाज़ में बोलीं—

“ज़ुबान सँभाल कर बात करो।”


दूसरा आदमी ठहाका मारकर हँस पड़ा—

“अरे इतना क्यों बुरा मानती हो?

हम तो बस तारीफ़ कर रहे हैं।”


यह सुनते ही कामिनी देवी की आँखें भर आईं।

सीने में जैसे कुछ टूट गया हो।


उन्होंने भरे गले से कहा—

“मैं किसी की माँ हूँ…

किसी की सास हूँ।”


इतना कहकर वो अपनी नज़रें झुकाए,

तेज़ क़दमों से वहाँ से चली गईं।


उनके पीछे हँसी गूँजती रह गई,

और आगे उनके आँसुओं से भीगी खामोशी।



बहुओं की साज़िश...


दोपहर का समय था।

धूप आँगन में फैल चुकी थी।


तभी दरवाज़े पर आवाज़ आई—

“कामिनी मैडम जी… दूध।”


कामिनी देवी रसोई से बर्तन लेकर आईं।

उन्होंने चुपचाप आगे बढ़कर बर्तन बढ़ाया ही था कि

पीछे से राधा की तिरछी आवाज़ गूँज उठी—


“अरे माँजी,

आज तो बड़ी जल्दी में नज़र आ रही हो।”


कामिनी देवी एक पल को रुक गईं।

पीछे मुड़कर देखा—

राधा की आँखों में ताना था,

होंठों पर हल्की-सी मुस्कान।


लेकिन कामिनी देवी ने कुछ नहीं कहा।

चुपचाप दूध लिया और बर्तन अंदर रख दिया।


दूध वाला जैसे ही बाहर गया,

शोभा का सब्र टूट गया।


वह ऊँची आवाज़ में बोली—

“अब तो हद ही हो गई है!

पूरी गली देख रही है,

और माँजी को ज़रा भी शर्म नहीं!”


नेहा ने भी ज़हर घोल दिया—

“ऐसी सास से तो दुश्मन अच्छे।

कम से कम बदनामी तो नहीं करवाते।”


कामिनी देवी वहीं आँगन में खड़ी थीं।

हाथ काँप रहे थे।

आँखें भरी हुई थीं।


हर शब्द उन्होंने सुना था।

हर ताना उनके दिल में चुभ गया था।


लेकिन फिर भी…

उन्होंने कुछ नहीं कहा।


बस चुपचाप भीतर चली गईं—

अपनी इज़्ज़त और टूटे हुए आत्मसम्मान को

सीने से लगाए हुए।



घर में महायुद्ध...


शाम ढल चुकी थी।

दरवाज़े की कुंडी खटकी और विजय घर के अंदर आया।


बैठक में अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

कोई टीवी नहीं, कोई बात नहीं।


जैसे ही कामिनी देवी ने बेटे को देखा,

उनका बाँध टू‍ट गया।


वो फूट-फूटकर रो पड़ीं।


“बेटा…”

आवाज़ गले में अटक गई।


विजय घबरा गया।

“माँ, क्या हुआ? आप ऐसे क्यों रो रही हो?”


कामिनी देवी ने काँपते हाथों से आँसू पोंछे और बोलीं—


“मैंने क्या गुनाह किया है, बेटा?

बताओ… आखिर मेरी गलती क्या है?”


बहुएँ भी वहीं खड़ी थीं,

लेकिन किसी की नज़र उठ नहीं रही थी।


तभी शोभा ने चुप्पी तोड़ी—


“माँजी,

बात सिर्फ आपकी नहीं है।

हमारी भी समाज में इज़्ज़त है।”


ये सुनते ही कामिनी देवी का सब्र टूट गया।


वो अचानक चीख पड़ीं—


“तो क्या मैं जीना छोड़ दूँ?

बीमारी में तड़प-तड़प कर मर जाऊँ?

सिर्फ इसलिए कि लोग क्या कहेंगे?”


उनकी आवाज़ में इतना दर्द था

कि पूरा घर सन्न रह गया।


विजय के होंठ सूख गए।

बहुएँ एक-दूसरे को देखने लगीं।


कामिनी देवी ने भर्राई आवाज़ में कहा—


“बिना जाने…

बिना पूछे…

तुम सबने मुझे बदनाम कर दिया।


मैं तुम्हारी माँ हूँ,

कोई अपराधी नहीं।”


कमरे में सन्नाटा था।

सिर्फ सिसकियों की आवाज़ गूंज रही थी।



अगले दिन दोपहर के समय डॉक्टर घर पहुँचे।

सफ़ेद कोट में लिपटे डॉक्टर ने कुर्सी पर बैठते ही फ़ाइल खोली।


जैसे ही उनकी नज़र जाँच रिपोर्ट पर पड़ी,

उनके चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई।


भौंहें सिकुड़ गईं,

माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।


उन्होंने चश्मा ठीक किया,

रिपोर्ट को ध्यान से दोबारा देखा

और गहरी साँस लेते हुए बोले—


“हालात ठीक नहीं हैं…”


कमरे में सन्नाटा छा गया।

सबकी धड़कनें जैसे एक पल को थम 


डॉक्टर बोले,

“इनकी शुगर काफ़ी ज़्यादा बढ़ी हुई है

और BP भी कंट्रोल में नहीं है।


अगर इन्होंने रोज़ टहलना, हल्की एक्सरसाइज़

और अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखा,

तो आगे चलकर दिल का दौरा

या बड़ा खतरा हो सकता है।”


डॉक्टर की बात सुनते ही

घर में सन्नाटा छा गया।

सभी के सिर अपने-आप झुक गए।


कामिनी देवी चुपचाप खड़ी रहीं।

फिर भारी आवाज़ में बोलीं—


“अब बताओ बेटियों…

क्या अपनी जान बचाने की कोशिश करना

बेशर्मी कहलाता है?”


यह सुनते ही

राधा की आँखों से आँसू बह निकले।

वह आगे बढ़कर कामिनी देवी के पैरों के पास बैठ गई।


“नहीं माँजी…

हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई।

हमने आपको समझे बिना ही

आपके चरित्र पर सवाल उठा दिए।”


कमरे में रोने की आवाज़ गूँज उठी,

और पहली बार

कामिनी देवी की चुप्पी

सबसे ऊँची आवाज़ बन गई।



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