जब मैं चुप रही

 

A thoughtful Indian woman sitting quietly at the doorstep during evening time, soft lamp light near a tulsi plant, expressing silent emotions and inner strength in a calm household setting.


शाम ढल रही थी।

आँगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था,

पर मेरे भीतर अँधेरा उतर आया था।


मैं चौखट पर बैठी

सूनी सड़क को देख रही थी।

न जाने क्यों

आज सब कुछ बहुत भारी लग रहा था।


पीछे से उनके जूतों की आवाज़ आई।


“अभी तक बैठी हो?”

उनका स्वर सामान्य था,

पर मुझे चुभ गया।


“बस… ऐसे ही।”

मैं उठ खड़ी हुई।


वे भीतर चले गए।

मैं रसोई में गई।

दाल उबालते हुए

आँखों से आँसू गिर पड़े।


यह आँसू किसी एक बात के नहीं थे।

ये उन सारी चुप्पियों के थे

जो मैं रोज़ ओढ़ लेती थी।




शादी को छह महीने हो चुके थे।


लोग कहते थे—

“कितना अच्छा पति मिला है।”

“इतना शांत लड़का।”

“किस्मत वाली हो।”


मैं भी मुस्कुरा देती।


पर कोई यह नहीं पूछता था—

तुम कैसी हो?



सुबह मैं सबसे पहले उठती।

सास के लिए दवा,

ससुर के लिए अख़बार,

उनके लिए गरम नाश्ता।


कभी देर हो जाती,

तो वे कुछ नहीं कहते।


बस चुप हो जाते।


और उनकी चुप्पी

मेरे भीतर शोर मचा देती।



एक दिन मेरी माँ का फोन आया।


“बेटी, ठीक तो है ना?”


मैंने कहा—

“हाँ माँ… सब ठीक है।”


माँ कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं—

“तेरी आवाज़ में थकान है।”


मेरे होंठ काँप गए।


पर मैंने कहा—

“काम ज़्यादा है माँ।”


फोन रखते ही

मैं फूट-फूटकर रोई।


मुझे याद आया—

माँ कहा करती थीं—

“स्त्री का सबसे बड़ा दुःख

उसकी चुप्पी होती है।”



उस रात

उन्होंने खाना नहीं खाया।


मैं घबराई।


“भूख नहीं है?”

मैंने पूछा।


“नहीं।”

बस इतना ही।


मैं देर तक बैठी रही।

फिर पास जाकर बोली—

“मुझसे कुछ गलती हो गई क्या?”


वे मेरी तरफ़ देखे बिना बोले—

“हर बात गलती नहीं होती,

पर हर चुप्पी भी ठीक नहीं होती।”


मेरे भीतर कुछ टूट गया।




मैं पहली बार

उनके सामने जाकर बैठ गई।


“मैं थक जाती हूँ…”

मेरी आवाज़ काँप रही थी।


“कभी-कभी ऐसा लगता है

जैसे मैं यहाँ होते हुए भी

दिखाई नहीं देती।”


वे चौंककर मेरी ओर देखने लगे।


“मैंने कभी…”

कहते-कहते वे रुक गए।


“आपने कभी पूछा ही नहीं।”

इतना कहते ही

मेरी आँखों से आँसू बह निकले।


वे पास आए।

धीरे से मुझे अपने सीने से लगा लिया।


पहली बार।


“मुझे लगा था

तुम सब संभाल लेती हो…”

उनकी आवाज़ भी अब भारी हो चुकी थी।


“मैं इंसान हूँ,”

मैं सिसकते हुए बोली,

“मशीन नहीं।”




उस रात

हम दोनों देर तक बैठे रहे—

बिल्कुल ख़ामोश।


शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी।

न कोई सवाल,

न कोई सफ़ाई।


पर उस ख़ामोशी में

पहली बार

मेरी चुप्पी

मुझे बोझ नहीं लगी।




अगले दिन

मैं देर से जागी।


मन में डर था—

कहीं किसी बात पर

नाराज़गी तो नहीं होगी।


संकोच के साथ

मैं कमरे से बाहर निकली।


रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी।


वे खुद चाय बना रहे थे।


मुझे देखते ही

हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“आज आराम कर लो।”


बस इतना-सा शब्द…


मेरी आँखें भर आईं।


उस एक पल में

जैसे महीनों की थकान

आँसुओं बनकर बह निकली।


इतने छोटे से सहारे ने

मुझे वर्षों की ताक़त दे दी।




मैं समझ गई थी—


हर सहनशीलता महान नहीं होती,

और हर शिकायत स्वार्थ का नाम नहीं होती।


कभी-कभी

अपने भीतर दबे दर्द को

शब्दों में ढाल देना ही

एक रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।



आज भी

मैं सब कुछ संभालती हूँ,


पर अब

खुद को भूल नहीं जाती।


और जब कभी

आँखें भर आती हैं,

तो मैं चुप नहीं रहती।


क्योंकि

मैं जान चुकी हूँ—

चुप्पी रिश्तों को निभाती नहीं,

सच ही उन्हें जीवित रखता है।




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